Pushpalata Vlogs

Pushpalata Vlogs I am a pushpalata yadav my youtube channel name pushpalata’s kitchen ❤️

पति अपनी सैलरी लेकर शाम को थका हुआ घर आया। पत्नी इंतजार में थी कि कब पति आएगा। पति के आते ही उसने उसे गर्म-गर्म चाय पिला...
26/09/2026

पति अपनी सैलरी लेकर शाम को थका हुआ घर आया। पत्नी इंतजार में थी कि कब पति आएगा। पति के आते ही उसने उसे गर्म-गर्म चाय पिलाई और पूछा —
“आज सैलरी आ गई होगी आपके?”
पति मुस्कराहट के साथ बोला —
“हाँ, और इस महीने ओवर टाइम का ₹12,000 बोनस भी मिला है।”
पत्नी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। पत्नी मीठी आवाज़ में बोली —
“क्या हम इस रविवार को शॉपिंग करें?”
तो पति बोला —
“ठीक है, लेकिन सिर्फ एक शर्त पर। यदि तुम हफ्ते में कम से कम एक बार मेरी मां से फोन पर बात कर उनका हाल पूछोगी।”
पत्नी ने दबी आवाज़ में “हाँ” कर दी। पति सिर्फ यह चाहता था कि उसकी मां और पत्नी के बीच जो भी अनबन है, वह दूर हो जाए।
ठीक 2 मिनट बाद पति के मोबाइल पर मां का फोन आया। उधर से मां बोली —
“कैसे हो बेटा?”
बेटा बोला —
“मां, मैं ठीक हूँ। आप सबका हाल-चाल?”
तो पत्नी इधर मुंह बनाकर मन ही मन सोच रही थी —
“आज पहली तारीख है, सैलरी आई है, इसलिए फोन करके पैसे मंगवाना चाहती है। लेकिन इस बार मैं एक पैसा भी नहीं देने दूंगी।”
उधर मां बोली —
“बेटा, थोड़ी मदद चाहिए।”
तो बेटा बोला —
“बोलिए मां, क्या हुआ?”
मां बोली —
“बेटा, इस महीने ₹5000 मिल सकते हैं क्या?”
पति हर काम अपनी पत्नी से पूछकर करता था। उसने यह बात पत्नी से पूछी। पत्नी बोली —
“बोल दो कि अभी सैलरी नहीं आई है।”
बेटे ने मां से कहा —
“मां, अभी सैलरी आने में टाइम है।”
मां बोली —
“बेटा, कैसे भी करके भिजवा दो, प्लीज। हॉस्पिटल में इलाज के लिए चाहिए।”
पति ने यह बात पत्नी से दोहराई। पत्नी बोली —
“मां से बोल दो कि सरकारी हॉस्पिटल में इलाज करवा लें।”
पति ने मां को यही सलाह दी।
मां बोली —
“बेटा, सरकारी अस्पताल में सही इलाज नहीं होता और वहाँ ध्यान भी नहीं रखते। इस बार तो…”
पत्नी को गुस्सा आ गया और वह पति से बोली —
“बोल दो उन्हें कि हमारे सर पर पहले से इतना बोझ है और अब इससे ज्यादा हम सह नहीं पाएंगे। इसलिए सरकारी अस्पताल में ही इलाज करवाओ।”
पत्नी के शब्द बिगड़ गए। यह बोलते हुए बोली —
“वैसे भी चार-पांच दिन की मेहमान हैं।”
पति इस बार बोला —
“ऐसे तो मत बोलो मां के बारे में।”
पति को थोड़ा गुस्सा आ गया, लेकिन मन को शांत करते हुए मां से बोला —
“मां, इस महीने नहीं हो पाएगा। इसलिए सरकारी हॉस्पिटल में ही करवा लीजिए इलाज।”
मां उधर से भीख मांगने लगी —
“बेटा, प्लीज ₹2000 तो दे दो।”
तो पति आँखों में आंसू लिए पत्नी से बोला —
“कम से कम ₹2000 तो देने दो।”
पत्नी गुस्से में थी लेकिन जैसे-तैसे मान गई और बोली —
“ठीक है, बोल दो कि ₹2000 भिजवा देंगे कल।”
तो उधर पति बोला —
“सासू मां, आपको कल ₹2000 भिजवा दूंगा।”
पति के मुंह से इस बार “मां” की जगह “सासू मां” सुनते ही पत्नी को चक्कर आने लगे। जुबान लड़खड़ाने लगी, पसीना छूट गया और पति से पूछा —
“क्या यह मेरी मां का फोन आया है?”
पति बोला —
“हाँ, तुम्हारी मां का ही फोन है। मैं तो तुम्हारी मां को भी अपनी मां ही समझता हूँ। लेकिन तुमने कभी मेरी मां को अपनी मां की तरह समझा ही नहीं।”
पत्नी इस बार जोर से रो पड़ी और फोन में माफी मांगने लगी —
“मुझे माफ कर दो मां, मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है।”
तो उधर से मां बोली —
“बेटी, यदि सिर्फ एक मां का दिल दुखाया होता तो माफ कर देती। लेकिन तुमने तो आज एक नहीं बल्कि दो मांओं का दिल दुखाया है।
यदि आज मैं तुम्हें माफ भी कर दूं, तो भी ऊपर वाला तुम्हें माफ नहीं करेगा।”

तो दोस्तों, ऐसा माना जाता है कि अगर ऊपर वाला भी मां का कर्ज चुकाने आ जाए तो वह भी कंगाल हो जाए।
एक मां खुद मौत के मुंह में जाकर ज़िंदगी को जन्म देती है। उस मां का सम्मान करें।
मां तो मां होती है, उसको मरने से पहले जीते-जी न रुलाएँ।

****कहानी पसंद आई हो तो अपने दोस्तों को शेयर करें शायद किसी बहू-बेटे की आंखें खुल जाएं....😢😢😢

👉🏿 जब बच्चों की शादी 20 साल में होती थी तो एक सदी में 5 पीढ़ियां होती थी👉🏿 जब बच्चों की शादी 25 साल में होती थी तो एक सद...
26/09/2026

👉🏿 जब बच्चों की शादी 20 साल में होती थी तो एक सदी में 5 पीढ़ियां होती थी

👉🏿 जब बच्चों की शादी 25 साल में होती थी तो एक सदी में 4 पीढ़ियां होती थी

👉🏿 *अब* बच्चों की शादी 33 साल में होती है, तो एक सदी में 3 पीढ़ियां होती हैं।

👉🏿सोचने वाली बात है।

क्या हमारा समाज अगली सदी तक ज़िंदा रहेगा?

👉🏿आज एक अजीब सा अंधेरा फैल रहा है।

🏚️ गांव वीरान हैं, आस-पास खाली घर है 👉आज घरों में बच्चों की आवाज कम मिया बीबी की आवाज ज्यादा सुनाई देती हैं

👉लड़कियां 30-35 साल तक कुंवारी हैं

👉लड़के 35 साल के बाद भी कुँवारें घूम रहे हैं।

👉 देर से शादी ...

फिर तलाक़...

टूटते परिवार...

दुखी मां बाप...

👉माता-पिता अकेले..

👉पूरी पीढ़ी खालीपन महसूस करती है

👉क्या हम इसे "पढ़ा-लिखा समाज" कहें या "खुद को नुकसान पहुंचाने वाला समाज"?

👉यह तो आबादी कम करने की एक खामोश साज़िश है।

👉अगर 50 जोड़े में सिर्फ़ एक बच्चा हो

तो अगली पीढ़ी में सिर्फ़ .....बच्चे होंगे।

👉अगर ऐसा ही चलता रहा, तो तीसरी पीढ़ी लगभग गायब हो जाएगी।

👉 मोहल्ले,गलिया खाली पड़ी है सब लोग रोड़ पर है जीवन की आधी जिंदगी तो रोड़ पर ही बीत जाती हैं

👉गांव के गॉव खत्म हो रहे हैं

👉शहरों में ऊंची इमारतें हैं, लेकिन जॉइंट फैमिली सिस्टम खत्म हो गया है।

👉 नई बहुएं

"सिर्फ़ एक ही बच्चा" चाहती हैं

👉क्या यही समाज है?

👉क्या यही हमारे पुरखों की विरासत है

👉 सच तो यह कि बच्चे अब प्यार की निशानी नही रहे

बल्कि बच्चे पैदा करना एक मजबूरी सी है

👉 The truth is that children are no longer a symbol of love. Instead, having children is a compulsion.

⚖️ सबसे बड़ी गलती — लड़की के पिता की है वही पिता जिसने 20-22 साल की उम्र में शादी करके परिवार बसाया था

अब वही पिता 30 साल की उम्र तक अपनी बेटी की शादी न करके बहादुरी दिखा रहे है

👉 नतीजा

लड़के लड़कियां डिप्रेशन में जा रहे हैं

👉आज बच्चों की सही समय पर शादी नही हो रही हैं और

न सही समय पर कोई नौकरी मिल रही है

👉समाज धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा है।

👉इसी कारण बच्चे समाज के साथ नही अकेले रहना पसंद करते हैं यानी Single family यहाँ तक बच्चे भी नही चाहिए

👉देर से शादी करना

👉देर से बच्चा करना फिर

👉एक बच्चे के बाद मेडिकल बहाना करना

यह आम बात हो गई

👉हजारों जवान लड़के लड़कियां उम्र के कारण बिना शादी के घूम रहे हैं

🧘‍♂️ समाज के समझदार लोग चुप्पी साधे हुएं है

🎈शादी, परिवार, बच्चे – इन सब को बोझ समझा जा रहा है।

🎈 शादी कोई दुनियावी बंधन नहीं है यह घर परिवार और समाज का पिलर है

🎈नस्ल और कल्चर को आगे बढ़ाने का एक तरीका है।

🎈Marriage is not a worldly commitment; it is a pillar of home, family, Hindu rashtra and society. It is a way to carry forward race and culture.

💥 अब हम सब को समझ ने का समय आ गया है

🫵 बच्चों को ‘हद से ज्यादा आजादी दे कर हमने उनकी समझ छीन ली

🫵 शादी टलती रही — और जब हुई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी...

फिर वही अकेलापन

🫵 लड़के लड़कियों की शादी की सही उम्र

🔹 लड़कों के लिए 26/27 साल से पहले

लड़कियों के लिए 20/25 साल से पहले

शादी को प्राथमिकता दें

🔹 समय पर शादी समय पर बच्चे no medical बहना 2/3 बच्चे पैदा करना समाज की जुम्मेवारी निभाना

🔹 बच्चों के पिता — कृपा अपने बच्चों की भावनाएँ, उम्र और उसके भविष्य को समझें

📉 कोई जवान लड़के-लड़कियां नहीं होंगे

📉 कोई बच्चे नहीं, कोई संस्कृति नहीं

📉 कोई समाज नहीं, कोई मंदिर नहीं

🚩 इतिहास लिखेगा

“वह हिंदू समाज, जिसने चुपचाप खुद को खत्म कर लिया।” सोचो और एनालाइज़ करो..

और समझदारी दिखाओ🌿🌿

✨और जिन बच्चों की उम्र 20/25 साल लड़की की और 23/27 साल लड़का की हो गई कृपा और इंतजार मत कीजिए।

अपने बच्चों की शादी समय पर कीजिये।🙏🙏🙏🙏



🌿🌿🌿🌿

जब मेरी शादी हुई थी तो मेरी उम्र महज 22 साल थी पतिदेव की उम्र 33 साल थी, शादी के शुरुवाती दिन में हमारे बीच सब अच्छा था,...
26/09/2026

जब मेरी शादी हुई थी तो मेरी उम्र महज 22 साल थी
पतिदेव की उम्र 33 साल थी, शादी के शुरुवाती दिन में हमारे बीच सब अच्छा था, दिन में कितना भी झगड़ा हो लेकिन रात में पति को करीब पता देख हम दोनो भूल कर एक हो जाते
पहले तो मैंने घर वालों को मना किया क्यों की पति को उम्र ज्यादा थी पर घर वाले नहीं माने
समय के साथ रिश्तों में खटास आती है जो मेरे साथ भी होने लगा

अब क्यों की मैं सिर्फ 22 की था तो खाली होने के बाद मैं अपनी सहेलियों से बात करती और जोर जोर से हंसती थी

ये बात मेरी सास को बिलकुल पसंद नहीं थी उन्होंने बोला बेटा नया नया शादी हुआ है ससुर हैं जेठ हैं इनका लिहाज किया करो

लेकिन मैं आदत से मजबूर थी समय के साथ साथ मेरी सास मुझसे नफरत करने लगी और मुझे भी इसकी कोई परवाह नहीं थी

शादी के 1 साल बाद मेरे पति को काम से विदेश जाना हुआ जिसके लिए मैने भी बोला, तो उन्होंने बोला की मात्र 2 महीने के लिए जाना है कम्पनी सिर्फ मेरा पैसा देगी

लेकिन मुझे तो बस जाना था इसी बात को लेके हम दोनो में अनबन हो गई और मैं अपने मायके aagayi

फिर रोज हमारी लड़ाई इसी बात पर होती की मुझे भी साथ जाना है और वो बोलते घर में मां पापा अकेले हैं भैया को तबियत खराब है तुम रहो

मैने भी जवाब में बोला की परिवार से शादी नही हुई है तुमसे हुई है, काफी बहस के बाद मेरे पति ने बोला

जाओ करो अपने मन का बनावा लो पासपोर्ट
इधर उन्होंने हां कहा और मैं निकल ली पासपोर्ट बनवाने

अब जब पासपोर्ट बना तो ये और गुस्सा हो गए और बोलने लगे तुम सिर्फ अपने मन का करती हो

मैने बोला हां मुझे कुछ करने के लिए किसी की ओपिनियन की जरूरत नहीं होती

बात आगे बढ़ी और सास तक पहुंची तो उन्होंने भी यहीं बोला की तुम अभी चली जाओगी तो मैं अकेली हो जाऊंगी सिर्फ 2 महीने की बात है

उसके बाद मैं इस शर्त पे रुकती हूं की मैं ये 2 महीना अपने मायके रहूंगी

उसके बाद पति बाहर जाते हैं और 2महीने बाद वापस आते हैं लेकिन वो मुझे विदा कराने नही आते

हमने जब फोन किया तो उधर से जवाब आता है शादी की जाती है एक परिवार आसानी से चले, सहयोग से चले पर तुम सिर्फ अपने बारे में सोचती हो

अब ये रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता मैं तुम्हे लेने नही आऊंगा

जब ये बात मेरे घर वालो को पता चली तो पापा और मां कॉल करने लगे

में भी अपनी सेल्फ रिस्पेक्ट से कभी समझौता नहीं करना चाहती थी तो मैंने भी माना कर दिया की अब मैं तब तक नहीं जाऊंगी जब tk तुम मुझे लेने नही आते

वो तो नहीं आया और उसके रिश्ते तोड़ने के लिए पेपर भेज दिए
मैने भी कोई समझौता नहीं किया और तलाक दे दिया

22 में शादी हुई और 23 साल में मेरा तलाक हो गया

घर वालों ने बहुत समझाया, लेकिन मुझे मेरी सेल्फ रिस्पेक्ट प्यारी थी,

आज मेरी उम्र 30 साल है,

25 साल की उम्र में मैने फिर से शादी करने का फैसला लिया
लेकिन अब असली समस्या सामने आने लगी

25 की उम्र में मुझे 45 40 साल के पुरुष मिलते या तो इनकी पत्नी मर चुकी थी या फिर कोई तलाक शुदा था

लेकिन अभी तक मेरी दूसरी शादी नही हो पाए है क्यों की मेरे यार एक ठप्पा लगा है दूसरी शादी का

ताव में लिए गए फैसले अकसर गलत होते हैं, जब मैं अकेली होती हूं तो यही सोचती हूं काश बाहर जाने की जिद ना की होती तो ये दिन ना देखना पड़ता

लड़के की दूसरी शादी हो गई एक बेटी भी है लेकिन मेरी जिंदगी कई साल पीछे चली गई और भविष्य भी अंधकार में है

मेरी 5 बहन हैं उस समय सब ने मेरा साथ दिया था लेकिन आज सिर्फ मुंह पर बोलें भर का रिश्ता है कोई भी सपोर्ट नही है ना बहनों से ना मां बाप से

आज कल को लड़किया जिंदगी अपने शर्त पर जीना चाहती है, तलाक लेना या शादी तोड़ना एक बहुत ही आम बात समझती हैं क्यों की फिल्मों और सीरियल में यही दिखाया जाता है

बिना पुरुष के सपोर्ट के और प्रोटेक्ट के हम लड़किया कितनी भी काबिल हो जाएं मन में एक डर हमेशा बना रहता है
लेकिन कोई पुरुष आप के पीछे है तो वो डर मन में नही आता ये बात अधिकतर महिला नही बोलंगी क्यों किस इससे उन्हें अहम को ठेस पहुंचती है

आज की लड़कियों से मैं ये बोलूंगी की कुछ भी हो जाए
कभी भी चोटी चोटी बातो को आधार बनाकर तलाक जैसा फैसला मत लेना
क्यों की इसके बाद तुम्हारी जिंदगी और भी बत्तर हो जाएगी
🌸🌸🌸 sabhar facebook 💐🪻

इकलौता बेटा पहली बार अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर लौट रहा था। रास्ते में अचानक फोन आया। उसकी पत्नी ने फोन करके कहा...
26/09/2026

इकलौता बेटा पहली बार अपने पिता को वृद्धाश्रम में छोड़कर लौट रहा था। रास्ते में अचानक फोन आया। उसकी पत्नी ने फोन करके कहा—

“तुम एक बार फिर वृद्धाश्रम लौट जाओ, एक बात कहना भूल गई हूँ।

वहाँ जाकर अपने पिता को अच्छी तरह समझा देना कि पूजा-पर्व हो, यहाँ तक कि तुम्हारा जन्मदिन ही क्यों न हो—तुम्हारे पिता को उसी वृद्धाश्रम में रहना होगा। हमारे घर नहीं आएँगे।”

मजबूर होकर पत्नी की बात मानते हुए वह फिर वृद्धाश्रम लौट गया। वहाँ जाकर उसने एक अजीब-सा दृश्य देखा। उसका बूढ़ा पिता वृद्धाश्रम के बुज़ुर्ग मालिक के साथ बहुत हँस-हँसकर बातें कर रहा था। यह देखकर बेटे के मन में संदेह हुआ। उसने मन ही मन सोचा—क्या पिता पहले से ही इस वृद्धाश्रम के मालिक को जानते थे? कौन जाने!

वह थोड़ी देर इंतज़ार करने लगा। कुछ समय बाद पिता अपने निर्धारित कमरे में चले गए। तब बेटा वृद्धाश्रम के मालिक के पास गया और उनसे पूछा—

“सर, एक बात पूछ रहा हूँ, बुरा न मानें। अभी-अभी आप जिस तरह मेरे पिता से बात कर रहे थे, उससे मुझे लग रहा है कि आप दोनों पहले से परिचित हैं। क्या सच में ऐसा है?”

वृद्धाश्रम के मालिक ने कहा—

“हाँ। मैं उन्हें लगभग 40 सालों से अच्छी तरह जानता हूँ। मुझे नहीं पता किन परिस्थितियों में वे आज यहाँ आए हैं, लेकिन दिल से आपके पिता बहुत बड़े इंसान हैं।”

बेटा बोला—

“मैं यही जानना चाहता हूँ कि आप मेरे पिता को कैसे जानते हैं?”

वृद्ध मालिक बोले—

“40 साल पहले मेरे अधीन एक अनाथालय था। वहाँ से उन्होंने एक अनाथ बच्चे को गोद लिया था। और अगर मेरा अनुमान गलत नहीं है, तो 40 साल पहले गोद लिया गया वही अनाथ बच्चा आज मेरे सामने खड़ा है।”

यह सुनते ही बेटे को सब समझ में आ गया। 40 साल पहले का वह अनाथ बच्चा वही स्वयं था। उसकी आँखों से झर-झर कर आँसू बहने लगे। वह फूट-फूट कर रोने लगा। बिना देर किए वह दौड़कर अपने पिता के कमरे में गया और उनके पैरों से लिपटकर रोने लगा।

कहने लगा—

“मुझे माफ कर दो, पिताजी। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई।

दो दिनों के प्यार के लिए मैंने 40 साल के प्यार को भुला दिया।”

बेटे की यह करुण दशा देखकर पिता भी रो पड़े। उन्होंने बेटे को पैरों से उठाकर अपने सीने से लगा लिया और बोले—

“अरे मूर्ख बेटे, इसके लिए रोने की क्या ज़रूरत है? मैं तो तुम्हें पहले ही माफ कर चुका हूँ।”

इसके बाद बेटे ने आँसू पोंछे और अपने पिता को वृद्धाश्रम से लेकर घर की ओर लौट गया।

दुनिया के सभी पिताओं को मेरा प्रणम

पत्नी को गुजरे पांच साल हो चुके थे। उसके बाद कुछ समय वह अपने पुराने मोहल्ले में अकेले रहे, लेकिन जब एक बार सीढ़ियों से उ...
26/09/2026

पत्नी को गुजरे पांच साल हो चुके थे। उसके बाद कुछ समय वह अपने पुराने मोहल्ले में अकेले रहे, लेकिन जब एक बार सीढ़ियों से उतरते हुए उनका पैर फिसल गया तो बेटे निखिल ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए बुला लिया।

दादा ने घर छोड़ने की बात कही तो पोते ने पहली बार उन्हें रोक लिया

“मैं कल चला जाऊँगा।”

दादा की यह बात सुनकर चौदह साल का आरव कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।

उसे लगा शायद उसने गलत सुना है।

“कहाँ जाओगे दादा?”

दादा ने मुस्कुराकर कहा, “जहाँ पहले रहता था।”

“लेकिन आपका पुराना घर तो है ही नहीं।”

“घर नहीं है तो क्या हुआ? जगह तो है।”

आरव को उनकी बात समझ नहीं आई।

सामने टीवी चल रहा था। रसोई से बर्तन रखने की आवाज़ आ रही थी। उसकी माँ ने शायद दादा की बात सुनी भी नहीं थी।

दादा ने अपना चश्मा उतारा, कुर्सी के पास रख दिया और धीरे से बोले, “तुम्हारी पढ़ाई भी है, तुम्हारी माँ-पापा की अपनी जिंदगी है। मेरी वजह से घर में किसी को परेशानी हो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता।”

आरव ने तुरंत पूछा, “आपको किसने कहा कि आपकी वजह से परेशानी है?”

दादा ने जवाब नहीं दिया।

बस हल्की-सी मुस्कान दी।

और वही मुस्कान आरव के मन में अटक गई।

दादा का नाम गोपाल था।

उम्र करीब बहत्तर साल।

पत्नी को गुजरे पांच साल हो चुके थे। उसके बाद कुछ समय वह अपने पुराने मोहल्ले में अकेले रहे, लेकिन जब एक बार सीढ़ियों से उतरते हुए उनका पैर फिसल गया तो बेटे निखिल ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए बुला लिया।

शुरुआत में सब ठीक था।

आरव को दादा का घर आना बहुत अच्छा लगा था।

सुबह स्कूल जाने से पहले वह दादा के पास बैठता।

दादा उसे दूध पीने के लिए कहते और वह जानबूझकर कहता, “दादा, दूध तो आप पियो।”

दादा हंसते हुए कहते, “मैंने तुम्हारी उम्र में जितना दूध पीना था, पी लिया।”

दोनों में रोज छोटी-छोटी बहस होती।

कभी क्रिकेट पर।

कभी पढ़ाई पर।

कभी इस बात पर कि चाय में चीनी कितनी होनी चाहिए।

लेकिन पिछले कुछ महीनों से कुछ बदल गया था।

दादा पहले की तरह बातें नहीं करते थे।

घर में किसी चीज की जरूरत होती तो खुद नहीं कहते।

खाना बनता तो पूछते, “सब खा चुके?”

अगर कोई कह देता कि आज सब्जी कम बनी है, तो दादा तुरंत बोलते, “मेरे लिए मत रखना, मैं बाद में खा लूँगा।”

अगर घर में कोई बाहर जाने की बात करता, तो दादा कहते, “तुम लोग जाओ, मेरी वजह से अपना कार्यक्रम मत बदलो।”

आरव को तब भी कुछ अजीब लगता था।

लेकिन उसने कभी पूछा नहीं।

उस दिन पहली बार दादा ने खुद घर छोड़ने की बात कह दी थी।

आरव रात को अपने कमरे में गया, लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगा।

उसे बार-बार वही वाक्य सुनाई दे रहा था।

“मैं कल चला जाऊँगा।”

करीब आधे घंटे बाद वह फिर बाहर आया।

दादा बालकनी में बैठे थे।

“दादा।”

“हां?”

“आप सच में चले जाओगे?”

“शायद।”

“क्यों?”

दादा कुछ देर चुप रहे।

फिर बोले, “बेटा, कभी-कभी इंसान को समझ आ जाता है कि अब उसे कहाँ होना चाहिए।”

आरव ने सामने वाली इमारत की तरफ देखते हुए पूछा, “और आपको कैसे समझ आया?”

दादा ने उसकी तरफ देखा।

“तुम बड़े हो रहे हो। तुम्हें पढ़ना है। तुम्हारे पापा को काम करना है। तुम्हारी माँ पूरे घर को संभालती है। मैं दिनभर क्या करता हूँ?”

आरव ने तुरंत कहा, “आप मेरे साथ रहते हो।”

दादा मुस्कुराए।

“वह तो तुम कहते हो।”

“क्योंकि सच है।”

“लेकिन सच सिर्फ इतना नहीं होता।”

आरव को पहली बार लगा कि दादा कुछ छिपा रहे हैं।

अगले दिन उसने स्कूल जाने से पहले माँ-पापा की बातचीत सुन ली।

उसकी माँ कह रही थी, “पापा जी को कुछ दिन उनके पुराने परिचितों के पास रहने देना शायद ठीक रहेगा। यहां उन्हें भी अकेलापन लगता है और हमें भी समझ नहीं आता कि उन्हें कैसे व्यस्त रखें।”

पापा बोले, “मैंने भी यही सोचा है। उनके लिए कोई अच्छा-सा कमरा देख लेते हैं।”

आरव दरवाजे के बाहर खड़ा रह गया।

उसे गुस्सा आया।

उसे लगा कि उसके माता-पिता दादा को घर से निकालना चाहते हैं।

वह सीधे दादा के पास गया।

“आप कहीं नहीं जाओगे।”

दादा ने चौंककर देखा।

“क्यों?”

“क्योंकि मैंने सुन लिया है।”

“क्या?”

“मम्मी-पापा आपको यहां नहीं रखना चाहते।”

दादा कुछ क्षण शांत रहे।

फिर बोले, “ऐसा नहीं है।”

“तो क्या है?”

“उन्हें भी लगता है कि मैं यहां रहकर अकेला पड़ गया हूँ।”

“लेकिन आप अकेले नहीं हो।”

“तुम स्कूल चले जाते हो।”

“तो?”

“तुम्हारे पापा ऑफिस चले जाते हैं।”

“तो?”

“तुम्हारी मां अपने काम में लगी रहती है।”

“तो?”

दादा हंस पड़े।

“हर बात पर ‘तो’ क्यों बोल रहा है?”

आरव की आंखें भर आईं।

“क्योंकि आप मेरे दादा हो। आपको कोई अकेला कैसे कह सकता है?”

दादा ने उसका सिर सहलाया।

“बेटा, अकेलापन लोगों की कमी से नहीं होता। कभी-कभी अपनी जरूरत महसूस न होने से होता है।”

यह बात आरव के दिल में उतर गई।

उस शाम उसने दादा को ध्यान से देखना शुरू किया।

दादा सुबह उठते थे।

पौधों में पानी डालते थे।

अखबार पढ़ते थे।

फिर कई घंटे चुप बैठे रहते।

कभी टीवी चलाते, लेकिन देखते नहीं।

किसी से बात करने की कोशिश करते तो सामने वाला काम में व्यस्त होता।

आरव को समझ आया कि दादा को घर से नहीं, अपनी पुरानी भूमिका से दूर होने का दुख था।

पहले दादा की अपनी दुकान थी।

लोग उनसे सलाह लेने आते थे।

पड़ोस के बच्चे उनके पास बैठते थे।

किसी को बिजली का बिल समझ नहीं आता तो दादा मदद करते।

किसी को बैंक का काम समझना होता तो दादा साथ चले जाते।

किसी को पुराने हिसाब-किताब की जरूरत होती तो दादा बैठकर समझा देते।

अब वह सब पीछे छूट चुका था।

आरव ने अगले दिन स्कूल से लौटकर दादा से पूछा, “दादा, आपको अपनी दुकान याद आती है?”

दादा ने चौंककर देखा।

“तुम्हें कैसे पता?”

“पापा ने बताया था।”

दादा कुछ देर मुस्कुराते रहे।

“बहुत याद आती है।”

“तो वापस क्यों नहीं जाते?”

“अब दुकान नहीं है।”

“दुकान नहीं है तो क्या हुआ?”

“क्या मतलब?”

आरव कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन रुक गया।

उसे अचानक एक विचार आया।

उसने अगले कुछ दिन अपने मोहल्ले को ध्यान से देखा।

पास के पार्क में कई छोटे बच्चे शाम को खेलते थे।

कुछ बच्चों के दादा-दादी थे, कुछ के नहीं।

कई बुजुर्ग शाम को अकेले बेंच पर बैठे रहते थे।

आरव ने सोचा कि दादा सिर्फ अपने लिए दुखी नहीं हैं।

शायद आसपास ऐसे और लोग भी हैं।

एक रविवार वह दादा को पार्क में ले गया।

वहां जाकर उसने कहा, “आप यहां बैठो।”

दादा ने पूछा, “क्यों?”

“बस बैठो।”

कुछ देर बाद तीन छोटे बच्चे उनके पास आ गए।

एक ने पूछा, “दादाजी, यह पहाड़ा कैसे याद करें?”

दादा हंस पड़े।

“पहाड़ा याद नहीं होता, समझा जाता है।”

फिर उन्होंने बच्चे को एक आसान तरीका बताया।

दूसरा बच्चा पास बैठ गया।

तीसरा भी।

कुछ ही देर में तीनों बच्चे दादा से सवाल पूछने लगे।

आरव दूर खड़ा देखता रहा।

दादा का चेहरा बदल गया था।

वही पुरानी चमक लौट आई थी।

अगले रविवार आरव चार बच्चों को लेकर आया।

फिर पांच।

फिर सात।

किसी को गणित समझना था।

किसी को हिंदी पढ़नी थी।

किसी को सिर्फ कहानी सुननी थी।

दादा ने किसी से कोई फीस नहीं ली।

उन्होंने बस एक शर्त रखी—

“जिसे कुछ आता हो, वह किसी और को सिखाए।”

धीरे-धीरे पार्क का वह कोना हर शाम बच्चों से भरने लगा।

आरव की माँ को जब पता चला तो वह भी एक दिन देखने आई।

उन्होंने देखा कि दादा एक पेड़ के नीचे बैठे बच्चों को समझा रहे थे और आरव उनके पास खड़ा सब संभाल रहा था।

माँ कुछ देर चुपचाप देखती रही।

शाम को उसने दादा से कहा, “पापा जी, आप हमसे नाराज थे क्या?”

दादा ने पूछा, “क्यों?”

“क्योंकि आपने घर छोड़ने की बात कही।”

दादा मुस्कुराए।

“मैं नाराज नहीं था।”

“फिर?”

“मुझे लगा मैं तुम्हारे घर में रह रहा हूँ, अपने जीवन में नहीं।”

बहू की आंखें झुक गईं।

“हमें समझ नहीं आया कि आपको क्या चाहिए।”

दादा ने कहा, “मुझे कुछ चाहिए भी नहीं था। बस ऐसा लगा कि मैं किसी के काम नहीं आ रहा।”

वह बात सुनकर बहू की आंखें भर आईं।

“पापा जी, घर में किसी के काम आना ही जरूरी नहीं होता। कभी-कभी बस घर में होना भी जरूरी होता है।”

दादा ने कुछ नहीं कहा।

लेकिन उस दिन पहली बार उन्होंने घर जाने की जल्दी नहीं की।

अगले कुछ महीनों में पार्क का वह छोटा-सा समूह बड़ा हो गया।

आरव ने उसका नाम रखा—“शाम की पाठशाला।”

दादा ने नाम सुनकर कहा, “नाम अच्छा है, लेकिन पाठशाला सिर्फ बच्चों की नहीं होगी।”

“तो किसकी?”

“जो सीखना चाहे, उसकी।”

धीरे-धीरे कुछ बुजुर्ग भी वहां आने लगे।

कोई बच्चों को पुराने खेल सिखाता।

कोई कविता सुनाता।

कोई पौधों की देखभाल समझाता।

एक महिला बच्चों को खाना बनाने की छोटी-छोटी बातें बताती।

आरव को एहसास हुआ कि उसके दादा को किसी कमरे में बंद करके आराम देना उनकी देखभाल नहीं थी।

उन्हें फिर से जिंदगी में शामिल करना असली देखभाल थी।

एक दिन दादा ने आरव को बुलाया।

“बेटा।”

“हां?”

“मैं अब कहीं नहीं जा रहा।”

आरव हंस पड़ा।

“मैंने कहा था ना!”

“लेकिन एक बात है।”

“क्या?”

“कल से तू भी समय पर पढ़ेगा।”

आरव का चेहरा उतर गया।

“दादा!”

दादा जोर से हंसने लगे।

“सबको पढ़ाने वाला खुद पढ़ाई से भागेगा तो कैसे चलेगा?”

कुछ महीने बाद घर में दादा की पुरानी कुर्सी खिड़की के पास रखी थी।

शाम होते ही वह वहीं बैठते।

लेकिन अब घर में कोई यह नहीं पूछता था कि दादा क्या कर रहे हैं।

सब जानते थे।

वह अगले दिन की “शाम की पाठशाला” की तैयारी कर रहे हैं।

और आरव?

वह जब भी स्कूल से लौटता, सबसे पहले दादा के पास जाता।

एक दिन उसने पूछा,

“दादा, अगर उस दिन आप चले जाते तो?”

दादा ने मुस्कुराकर कहा,

“तो शायद मुझे पता ही नहीं चलता कि मेरी जरूरत अभी खत्म नहीं हुई।”

आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।

उस दिन उसे समझ आया कि बुजुर्गों को हमेशा सहारे की जरूरत नहीं होती।

कई बार उन्हें सिर्फ यह महसूस कराने की जरूरत होती है कि उनकी जिंदगी अब भी किसी के लिए मायने रखती है।

और शायद परिवार की सबसे बड़ी गलती यही होती है कि वह बुजुर्गों की जरूरतों का अंदाजा उनकी उम्र देखकर लगाने लगता है, उनकी इच्छा पूछना भूल जाता है।

क्या आपके घर के बुजुर्गों से भी कभी यह पूछा जाता है कि वे सच में क्या चाहते हैं?

कहानी पसंद आई तो लाइक, शेयर और पेज को फॉलो जरूर करें।

अंबिका सरगम ❤️

Radhe radhe family
26/09/2026

Radhe radhe family

बेटे ने बाहर बरामदे में शेड के किनारे एक गद्दा डाल दिया और मां का सामान वहीं रख दिया जमीन पर । मां तुम यहीं सो जाया करो....
25/09/2026

बेटे ने बाहर बरामदे में शेड के किनारे एक गद्दा डाल दिया और मां का सामान वहीं रख दिया जमीन पर । मां तुम यहीं सो जाया करो.......

विमला जी ने अपना बिखरा सामान समेट कर बैग में रख लिया और टेबल पर रखी पति की फोटो भी उठा कर रख ली और बाहर निकल पड़ी ।

गार्ड को फ्लैट की चाबी दी और नारायण राय जी के साथ कैब से स्टेशन आ गई। अब विमला जी को नारायण राय जी ने ट्रेन में बैठा दिया और कहा पहुंच कर भाभी फोन कर देना । अच्छा भइया ।

और विमला जी आ गई अपने घर ।
घर पहुंचीं ताला खोला तभी आहट सुनकर जेठ जी की बड़ी बहू आ गई और विमला जी के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और बोली चाचाजी आप अकेले कैसे आ गईं । अकेले दुकेले क्या होता है बहू तेरे चाचा जी के दोस्त नारायण राय आते थे न यहां हां हां देखा है मैंने चाचा जी से मिलने आते थे बस उन्हीं ने ट्रेन में बिठा दिया और आ गई ।

अब इतनी भी अनपढ़ गंवार नहीं है तेरी चाची । अच्छा अच्छा आप हाथ मुंह धो लें मैं चाय नाश्ता ले आती हूं और हां रात का खाना भी हमारे साथ ही खा लेना अब अकेले बनाने न लग जाना। इतना कहकर अमिता बहू चली गई।

चाय नाश्ता करने के बाद विमला जी आराम करने लग गई.....
तभी फोन बजा उठा उधर से बेटे शिवम् का फोन था और कहा है मां ये फ्लैट की चाभी गार्ड को देकर कहां चली गई आप । अपने घर आ गई बेटा.....
अपने घर तो क्या यहां आपका घर नहीं था क्या ।
नहीं बेटा अपना घर तो ये है जहां मैं तेरे बाबूजी के साथ ब्याह कर आई थी ।

जिंदगी के इतने साल बिताए ।
ये अलग बात है कि तेरे बाबूजी पूरे सफर में मेरा साथ नही निभा पाए और बीच राह में छोड़ कर चले गए । लेकिन सम्मान से जीना सीखा गए वो हमेशा कहते थे कि सम्मान से जीना चाहें नमक रोटी खा कर रह लेना लेकिन अपमान सहकर मत रहना । इसलिए बेटा मैं अपने घर में सम्मान की सूखी रोटी खाकर रह लूंगी,

तेरे यहां के अपमान के छतीस व्यंजन भी हमारे लिए बेकार है। बहू तो बहू तू भी मेरा अपमान करने से नहीं चूकता था । अब मैं यही रहूंगी और यही से मेरी अंतिम यात्रा भी निकलेगी कहकर विमला जी ने फोन रख दिया ।

और सोचने लगी कितने मनुहार करने पर मैं बेटे शिवम् के साथ उसके घर गई थी। अचानक पति श्यामलाल जी चल बसे । शिवम् इकलौता बेटा था तो अपनी जिम्मेदारी समझ कर मां से कहने लगा कि अब यहां अकेले कैसे रहोगी चलो मेरे साथ ।

विमला जी ने मना भी किया कि अकेली कहां हूं यहां तेरे ताऊ जी का परिवार है। भले अब ताऊजी और ताई जी नहीं है तो क्या बड़ी बहू और बेटा मेरा खूब ख्याल रखते हैं मैं यह लूंगी। लेकिन शिवम् नहीं माना ।

श्यामलाल जी की किराने की दुकान थी । पैसा संभाल कर खर्च करते थे कुछ जोड़कर बैंक में भी रखा था विमला को बताते रहते थे कि यदि हममें से कोई एक न रहा तो कुछ पैसे बैंक में जमा है जिंदगी बसर हो जाएगी । लेकिन बेटे के बहकावे में आकर सब पैसा उसको मत दे देना अपने लिए रखना। वैसे जेठ के बेटा बहू कहते रहते थे

कि चाची अब अलग क्या बनाती है हमारे संग खा लिया करो बुढ़ापे में कितना सा खाना होता है । तो विमला जी कभी जेठ के बेटे बहू के यहां तो कभी अपने आप बना लेती थी। जेठ के दो बेटे थे जिसमें बड़े बेटा बहू बड़े संस्कारी और बड़ों को मान सम्मान देने वाले थे। शिवम् के मनुहार करने पर विमला जी शिवम् के घर आईं थीं ।

वहां आकर दो कमरे के फ्लैट में समझ नहीं आ रहा था कि कहां सामान रखें ।

फिर शिवम् बोला मां अभी बैठो आपके लेटने बैठने का इंतजाम अभी करता हूं। शिवम् अंदर गया जो अभी तक बाहर निकल कर विमला जी से मिली भी नहीं थी शिवम् मेघा से बोला अब मां को तो ले आया हूं पर समझ नहीं आ रहा है मां को कहां जगह दूं।

मेघा ने चिढ़कर कहा अब पता है फ्लैट में जगह नहीं है तो क्यों लेकर आए । अब खुद ही व्यवस्था करो मुझे मालूम नहीं है। शिवम् ने बाहर बरामदे में शेड के किनारे एक गद्दा डाल दिया और मां का सामान वहीं रख दिया जमीन पर । मां तुम यहीं सो जाना कहकर शिवम् कमरे में चला गया ।

दूसरे दिन सुबह जब मेघा सोकर उठी तो देखा मां जी अंदर सोफे पर सिकुड़ी हुई पड़ी थी । मेघा ने शिवम् को आवाज लगाई ये देखो तुम्हारी मां सोफे पर सो रही है सारा सोफ़ा खराब हो जाएगा सोफ़ा कोई सोने की जगह है क्या।

मां मां सोफे पर क्यों हो रही हो, वो बेटा वहां मच्छर बहुत लग रहे थे और वारिश भी आ गई थी तो छींटे पड रहे थे कपड़े गीले हो रहे थे इसलिए यहां आ गई थी। अच्छा मां मैं आपके लिए आज एक फोल्डिंग पलंग ले आऊंगा और मच्छर का भी कुछ इंतजाम कर दूंगा ।

विमला जी को उठे बहुत देर हो गई लेकिन न अभी तक एक कप चाय ही मिली न कुछ नाश्ता । मेघा और शिवम् जल्दी जल्दी तैयार होकर अपना टिफिन लेकर आफिस को निकल गए । फिर खुद ही विमला जी ने एक कप चाय बनाई और कुछ बिस्किट लेकर बैठ गई। फिर नहा धोकर पूजा पाठ भी कर ली । दोपहर हो गई भूख लगने लगी

लेकिन खाने को कुछ नहीं था तो दो परांठे सेंके और अचार के साथ खा लिया। शाम को जब शिवम् और मेघा आफिस से आए अपने कमरे में घुस गए । विमला जी से दो दिन से कोई बात नहीं हुई थी

मेघा और शिवम् की । मेघा बोली शिवम् खाना बनाने का बिल्कुल मूड नहीं है पिज्जा आर्डर करो । पिज्जा आया और दोनों खा पीकर सो गए विमला जी से किसी ने पूछा भी नहीं । ऐसे ही चलता रहा कभी शाम को खाना बनता तो दो रोटी रखी रहती कभी सब्जी है तो कभी नहीं है वो दोनों कमरे में ही खा लेते विमला जी से कोई पूछता ही नहीं था।

ऐसे ही एक हफ्ता बीत गया एक दिन भी बेटा बहू से बात नहीं हुई। आज संडे था तो दोनों तैयार होकर बाहर जा रहे थे तो विमला जी ने पूंछ लिया बेटा कहीं जा रहे हो क्या हां मां आज छुट्टी है तो सारा दिन घूमने का प्लान है मूवी देखेंगे, शापिंग करेंगे फिर बाहर ही खाना खाकर फिर लौटेंगे और मेरे खाने का क्या होगा, आप अपने लिए कुछ बना लेना और घर की साफ सफाई कर देना मेघा बोली और रसोई भी ठीक ठाक कर देना। बेटा एक हफ्ता हो गया एक दिन भी ढंग से खाना नहीं मिला। कभी दो सूखी रोटी

पड़ी है न दाल है न सब्जी है, न कुछ नाश्ता है आप बना लो अपना क्या किसी ने रोका है क्या अब मैं अपने लिए अलग से कुछ बनाए जो खाना बनता है मेघा बनाती है उसी में थोड़ा मेरा भी बना लिया करें। अब मेघा को आफिस जाना होता है मां उसके पास इतना समय कहां है। हां बेटा सही कह रहे हो मेरे लिए दो रोटी बनाने को कहां समय है । इस तरह बेटा बहू की बेरूखी देखकर विमला जी को बहुत दुख हुआ। इस तरह अपमान सहकर रहने से क्या फायदा । इससे तो अपना छोटा सा घर ही अच्छा था। भले ही अपने पेट से मैंने जेठ के बेटे को जन्म नहीं दिया था लेकिन बेटा और बहू मेरा कितना ख्याल रखते थे।। ज्यादा नहीं था लेकिन सम्मान से दो रोटी तो खा रहे थे। भले ही पति ने बहुत पैसे नहीं छोड़े थे लेकिन जो था उससे गुज़ारा हो जाता।

यहां आकर विमला जी अपने को बहुत अपमानित महसूस कर रही थी लेटी थी अपने बिस्तर पर तभी नारायण राय जी का फोन आया जो श्यामराव जी के बड़े अच्छे मित्र थे। पूछने लगे अरे भाभी जी आप कहां है घर गया था मैं तो पता लगा आप बेटे के पास आई हैं। हां भइया अभी बीस दिन हुए हैं यही आए हुए शिवम् ले आया था। अब तो मेरा दोस्त नहीं है तो आपको अकेले न रहकर बेटे के साथ ही रहना चाहिए नारायण राय जी में बोले। नारायण का बेटा भी दिल्ली में कहीं नौकरी करता था तो वहां आना जाना होता रहता था। और शिवम् भी दिल्ली में ही था। फिर विमला जी ने सोचा कमी न नारायण जी से कुछ मदद ली जाए और वो बोली नारायण भाई कुछ काम है आपसे हां बोलिए भाभी, मुझेअपने घर जाना है क्या आप मेरा टिकट करा देंगे और टेन में बिठा देंगे। क्यों बेटे के पास कुछ तकलीफ़ है क्या नहीं घर की याद आ रही है विमला देवी बोली। अच्छा भाभी मैं कल बेटे के पास आ रहा हूं किसी डाक्टर से चेकअप कराना है तो आपका काम कर दूंगा।

और फिर विमला जी अपने घर आ गई। अब फिर से बेटे के पास न जाने का वादा करके। विमला जी के घर में तीन कमरे थे तो एक कमरा बरामद अपने पास रखकर दो कमरे और रसोई किराए पर उठा दिया। अपना क्या कमरे में ही एक कोने में गैस रख ली जब कुछ खुद बनाना होता तो बना लेती वरना जेठ की बहू तो ख्याल रखती ही थी।

विमला जी सोच रही थी अपने से बढ़कर तो पराए ख्याल रख रहे हैं।
यहां आकर सम्मान की सूखी रोटी ही सही इज्जत से तो खा रही हूं।
किसी की मोहताज तो नहीं हूं। और यहां चार लोग जान पहचान को है सबसे बोलते चालते समय निकल जाता है। और बाकी समय अपना भगवान के ध्यान पूजा में लगा दिया।
वहां बेटे के यहां बरामदे में लावारिस सी पड़ी थी न बहू ने बेटा कभी हार चाल पूछते थे।

इंसान सबकुछ सह सकता है लेकिन अपमान और तिरस्कार नहीं।
सम्मान की तो नमक रोटी भी किसी पकवान से कम नहीं लगती🙏

बाकी सब राधे राधे है🙏🙏
Credit for unknown

मेरी शादी को पाँच साल बीत चुके थे। हम दोनों का जीवन बहुत खुशहाल चल रहा था, लेकिन हमें घर में एक कमी हमेशा खलती थी? शादी ...
25/09/2026

मेरी शादी को पाँच साल बीत चुके थे। हम दोनों का जीवन बहुत खुशहाल चल रहा था, लेकिन हमें घर में एक कमी हमेशा खलती थी? शादी के इतने सालों बाद भी हमारी कोई संतान नहीं थी।

​शुरुआत में तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया, समाज, रिश्तेदारों और आस-पड़ोस के लोगों के ताने बढ़ने लगे। जब भी कोई पारिवारिक समारोह होता, लोग दबी ज़बान में मुझे लेकर तरह-तरह की बातें करने लगते। मै अंदर ही अंदर टूट चुकी थी और खुद को कसूरवार मानने लगी थी।

​अस्पताल में सभी जांचों के बाद डॉक्टरों ने स्पष्ट कह दिया कि मै कभी माँ नहीं बन सकती। इस रिपोर्ट के आने के बाद तो मानो मेरी दुनिया ही उजड़ गई।

​एक दिन, मेरे पतिदेव की मौसी और कुछ वरिष्ठ रिश्तेदार घर आए। मै चुपचाप रसोई में चाय बना रही थी। मौसी जी ने मेरी सास से गंभीर होकर कहा—

​"दीदी, अब तो डॉक्टरों ने भी साफ़ कह दिया है। हमारी कुल-परंपरा और वंश को आगे बढ़ाने के लिए वारिस तो चाहिए ही। सुनीता बहुत अच्छी लड़की है, लेकिन इस मामले में मजबूर है। तुम सूरज की दूसरी शादी के बारे में क्यों नहीं सोचतीं?

सुनीता को यहीं रहने दो, लेकिन सूरज का घर तो बसने दो।"

​रसोई की चौखट के पीछे खड़ी मेरे हाथ में चाय की ट्रे कांपने लगी। मेरी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। मै अपनी किस्मत को कोसती हुई ज़मीन पर बैठने ही वाली थी कि तभी मेरी सास की कड़क और स्पष्ट आवाज़ गूंजी—

​" सावित्री..., दोबारा यह बात अपने मुँह से मत निकालिएगा!"

​सासु मां ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—

"जब सुनीता इस घर में आई थी, तो हमने ईश्वर से एक गृहलक्ष्मी मांगी थी, जो हमें मिल गई। संतान का होना या न होना ईश्वर के हाथ में है। अगर यही कमी मेरे बेटे सूरज में होती, तो क्या आप सुनीता के माता-पिता से उसकी दूसरी शादी कराने को कहतीं? तब भी तो सुनीता मेरे बेटे के साथ ही खड़ी रहती ना?"

​उन्होंने आगे कहा—

"वंश सिर्फ खून से आगे नहीं बढ़ता, संस्कार और प्रेम से बढ़ता है। दुनिया में लाखों ऐसे बच्चे हैं जिनके सिर पर माँ-बाप का साया नहीं है। अगर ईश्वर की यही मर्जी है, तो हम किसी अनाथ बच्चे को गोद लेकर उसे अपने जिगर का टुकड़ा बनाएंगे और अपना नाम देंगे। लेकिन अपनी बहू को नीचा दिखाकर या उसका दिल दुखाकर मुझे कोई वारिस नहीं चाहिए। सुनीता इस घर की बेटी है, कोई वंश बढ़ाने वाली मशीन नहीं!"

​दरवाज़े के पीछे खड़ी मेरी आँखें सम्मान और कृतज्ञता से भर आईं। मेरा सारा डर और हीनभावना एक पल में बह गई।

मै चाय की ट्रे लेकर बाहर आई और अपनी सासू मां के चरणों में झुक गई।

​सासु मां ने तुरंत मुझे उठाकर गले से लगा लिया और कहा—

"रोती क्यों हो बेटी? जब तक तुम्हारी यह माँ तुम्हारे साथ है, दुनिया की कोई ताकत तुम्हें अधूरा नहीं महसूस करा सकती।"

​मौसी और बाकी रिश्तेदार निरुत्तर हो चुके थे। उस दिन मुझको समझ आया कि एक सच्चे परिवार का आधार केवल खून का रिश्ता या सामाजिक परंपराएं नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, बराबरी और एक-दूसरे के सम्मान में ढाल बनकर खड़े होना है।🌹🙏

Address

Ahmedabad

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Pushpalata Vlogs posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share

l="false"> Add listing
  • Login
  • Subscribe

    We will notify you when anything happens in Ahmedabad.