26/09/2026
पत्नी को गुजरे पांच साल हो चुके थे। उसके बाद कुछ समय वह अपने पुराने मोहल्ले में अकेले रहे, लेकिन जब एक बार सीढ़ियों से उतरते हुए उनका पैर फिसल गया तो बेटे निखिल ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए बुला लिया।
दादा ने घर छोड़ने की बात कही तो पोते ने पहली बार उन्हें रोक लिया
“मैं कल चला जाऊँगा।”
दादा की यह बात सुनकर चौदह साल का आरव कुछ पल तक उन्हें देखता रहा।
उसे लगा शायद उसने गलत सुना है।
“कहाँ जाओगे दादा?”
दादा ने मुस्कुराकर कहा, “जहाँ पहले रहता था।”
“लेकिन आपका पुराना घर तो है ही नहीं।”
“घर नहीं है तो क्या हुआ? जगह तो है।”
आरव को उनकी बात समझ नहीं आई।
सामने टीवी चल रहा था। रसोई से बर्तन रखने की आवाज़ आ रही थी। उसकी माँ ने शायद दादा की बात सुनी भी नहीं थी।
दादा ने अपना चश्मा उतारा, कुर्सी के पास रख दिया और धीरे से बोले, “तुम्हारी पढ़ाई भी है, तुम्हारी माँ-पापा की अपनी जिंदगी है। मेरी वजह से घर में किसी को परेशानी हो, यह मुझे अच्छा नहीं लगता।”
आरव ने तुरंत पूछा, “आपको किसने कहा कि आपकी वजह से परेशानी है?”
दादा ने जवाब नहीं दिया।
बस हल्की-सी मुस्कान दी।
और वही मुस्कान आरव के मन में अटक गई।
दादा का नाम गोपाल था।
उम्र करीब बहत्तर साल।
पत्नी को गुजरे पांच साल हो चुके थे। उसके बाद कुछ समय वह अपने पुराने मोहल्ले में अकेले रहे, लेकिन जब एक बार सीढ़ियों से उतरते हुए उनका पैर फिसल गया तो बेटे निखिल ने उन्हें अपने साथ रहने के लिए बुला लिया।
शुरुआत में सब ठीक था।
आरव को दादा का घर आना बहुत अच्छा लगा था।
सुबह स्कूल जाने से पहले वह दादा के पास बैठता।
दादा उसे दूध पीने के लिए कहते और वह जानबूझकर कहता, “दादा, दूध तो आप पियो।”
दादा हंसते हुए कहते, “मैंने तुम्हारी उम्र में जितना दूध पीना था, पी लिया।”
दोनों में रोज छोटी-छोटी बहस होती।
कभी क्रिकेट पर।
कभी पढ़ाई पर।
कभी इस बात पर कि चाय में चीनी कितनी होनी चाहिए।
लेकिन पिछले कुछ महीनों से कुछ बदल गया था।
दादा पहले की तरह बातें नहीं करते थे।
घर में किसी चीज की जरूरत होती तो खुद नहीं कहते।
खाना बनता तो पूछते, “सब खा चुके?”
अगर कोई कह देता कि आज सब्जी कम बनी है, तो दादा तुरंत बोलते, “मेरे लिए मत रखना, मैं बाद में खा लूँगा।”
अगर घर में कोई बाहर जाने की बात करता, तो दादा कहते, “तुम लोग जाओ, मेरी वजह से अपना कार्यक्रम मत बदलो।”
आरव को तब भी कुछ अजीब लगता था।
लेकिन उसने कभी पूछा नहीं।
उस दिन पहली बार दादा ने खुद घर छोड़ने की बात कह दी थी।
आरव रात को अपने कमरे में गया, लेकिन उसका मन पढ़ाई में नहीं लगा।
उसे बार-बार वही वाक्य सुनाई दे रहा था।
“मैं कल चला जाऊँगा।”
करीब आधे घंटे बाद वह फिर बाहर आया।
दादा बालकनी में बैठे थे।
“दादा।”
“हां?”
“आप सच में चले जाओगे?”
“शायद।”
“क्यों?”
दादा कुछ देर चुप रहे।
फिर बोले, “बेटा, कभी-कभी इंसान को समझ आ जाता है कि अब उसे कहाँ होना चाहिए।”
आरव ने सामने वाली इमारत की तरफ देखते हुए पूछा, “और आपको कैसे समझ आया?”
दादा ने उसकी तरफ देखा।
“तुम बड़े हो रहे हो। तुम्हें पढ़ना है। तुम्हारे पापा को काम करना है। तुम्हारी माँ पूरे घर को संभालती है। मैं दिनभर क्या करता हूँ?”
आरव ने तुरंत कहा, “आप मेरे साथ रहते हो।”
दादा मुस्कुराए।
“वह तो तुम कहते हो।”
“क्योंकि सच है।”
“लेकिन सच सिर्फ इतना नहीं होता।”
आरव को पहली बार लगा कि दादा कुछ छिपा रहे हैं।
अगले दिन उसने स्कूल जाने से पहले माँ-पापा की बातचीत सुन ली।
उसकी माँ कह रही थी, “पापा जी को कुछ दिन उनके पुराने परिचितों के पास रहने देना शायद ठीक रहेगा। यहां उन्हें भी अकेलापन लगता है और हमें भी समझ नहीं आता कि उन्हें कैसे व्यस्त रखें।”
पापा बोले, “मैंने भी यही सोचा है। उनके लिए कोई अच्छा-सा कमरा देख लेते हैं।”
आरव दरवाजे के बाहर खड़ा रह गया।
उसे गुस्सा आया।
उसे लगा कि उसके माता-पिता दादा को घर से निकालना चाहते हैं।
वह सीधे दादा के पास गया।
“आप कहीं नहीं जाओगे।”
दादा ने चौंककर देखा।
“क्यों?”
“क्योंकि मैंने सुन लिया है।”
“क्या?”
“मम्मी-पापा आपको यहां नहीं रखना चाहते।”
दादा कुछ क्षण शांत रहे।
फिर बोले, “ऐसा नहीं है।”
“तो क्या है?”
“उन्हें भी लगता है कि मैं यहां रहकर अकेला पड़ गया हूँ।”
“लेकिन आप अकेले नहीं हो।”
“तुम स्कूल चले जाते हो।”
“तो?”
“तुम्हारे पापा ऑफिस चले जाते हैं।”
“तो?”
“तुम्हारी मां अपने काम में लगी रहती है।”
“तो?”
दादा हंस पड़े।
“हर बात पर ‘तो’ क्यों बोल रहा है?”
आरव की आंखें भर आईं।
“क्योंकि आप मेरे दादा हो। आपको कोई अकेला कैसे कह सकता है?”
दादा ने उसका सिर सहलाया।
“बेटा, अकेलापन लोगों की कमी से नहीं होता। कभी-कभी अपनी जरूरत महसूस न होने से होता है।”
यह बात आरव के दिल में उतर गई।
उस शाम उसने दादा को ध्यान से देखना शुरू किया।
दादा सुबह उठते थे।
पौधों में पानी डालते थे।
अखबार पढ़ते थे।
फिर कई घंटे चुप बैठे रहते।
कभी टीवी चलाते, लेकिन देखते नहीं।
किसी से बात करने की कोशिश करते तो सामने वाला काम में व्यस्त होता।
आरव को समझ आया कि दादा को घर से नहीं, अपनी पुरानी भूमिका से दूर होने का दुख था।
पहले दादा की अपनी दुकान थी।
लोग उनसे सलाह लेने आते थे।
पड़ोस के बच्चे उनके पास बैठते थे।
किसी को बिजली का बिल समझ नहीं आता तो दादा मदद करते।
किसी को बैंक का काम समझना होता तो दादा साथ चले जाते।
किसी को पुराने हिसाब-किताब की जरूरत होती तो दादा बैठकर समझा देते।
अब वह सब पीछे छूट चुका था।
आरव ने अगले दिन स्कूल से लौटकर दादा से पूछा, “दादा, आपको अपनी दुकान याद आती है?”
दादा ने चौंककर देखा।
“तुम्हें कैसे पता?”
“पापा ने बताया था।”
दादा कुछ देर मुस्कुराते रहे।
“बहुत याद आती है।”
“तो वापस क्यों नहीं जाते?”
“अब दुकान नहीं है।”
“दुकान नहीं है तो क्या हुआ?”
“क्या मतलब?”
आरव कुछ बोलने ही वाला था, लेकिन रुक गया।
उसे अचानक एक विचार आया।
उसने अगले कुछ दिन अपने मोहल्ले को ध्यान से देखा।
पास के पार्क में कई छोटे बच्चे शाम को खेलते थे।
कुछ बच्चों के दादा-दादी थे, कुछ के नहीं।
कई बुजुर्ग शाम को अकेले बेंच पर बैठे रहते थे।
आरव ने सोचा कि दादा सिर्फ अपने लिए दुखी नहीं हैं।
शायद आसपास ऐसे और लोग भी हैं।
एक रविवार वह दादा को पार्क में ले गया।
वहां जाकर उसने कहा, “आप यहां बैठो।”
दादा ने पूछा, “क्यों?”
“बस बैठो।”
कुछ देर बाद तीन छोटे बच्चे उनके पास आ गए।
एक ने पूछा, “दादाजी, यह पहाड़ा कैसे याद करें?”
दादा हंस पड़े।
“पहाड़ा याद नहीं होता, समझा जाता है।”
फिर उन्होंने बच्चे को एक आसान तरीका बताया।
दूसरा बच्चा पास बैठ गया।
तीसरा भी।
कुछ ही देर में तीनों बच्चे दादा से सवाल पूछने लगे।
आरव दूर खड़ा देखता रहा।
दादा का चेहरा बदल गया था।
वही पुरानी चमक लौट आई थी।
अगले रविवार आरव चार बच्चों को लेकर आया।
फिर पांच।
फिर सात।
किसी को गणित समझना था।
किसी को हिंदी पढ़नी थी।
किसी को सिर्फ कहानी सुननी थी।
दादा ने किसी से कोई फीस नहीं ली।
उन्होंने बस एक शर्त रखी—
“जिसे कुछ आता हो, वह किसी और को सिखाए।”
धीरे-धीरे पार्क का वह कोना हर शाम बच्चों से भरने लगा।
आरव की माँ को जब पता चला तो वह भी एक दिन देखने आई।
उन्होंने देखा कि दादा एक पेड़ के नीचे बैठे बच्चों को समझा रहे थे और आरव उनके पास खड़ा सब संभाल रहा था।
माँ कुछ देर चुपचाप देखती रही।
शाम को उसने दादा से कहा, “पापा जी, आप हमसे नाराज थे क्या?”
दादा ने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि आपने घर छोड़ने की बात कही।”
दादा मुस्कुराए।
“मैं नाराज नहीं था।”
“फिर?”
“मुझे लगा मैं तुम्हारे घर में रह रहा हूँ, अपने जीवन में नहीं।”
बहू की आंखें झुक गईं।
“हमें समझ नहीं आया कि आपको क्या चाहिए।”
दादा ने कहा, “मुझे कुछ चाहिए भी नहीं था। बस ऐसा लगा कि मैं किसी के काम नहीं आ रहा।”
वह बात सुनकर बहू की आंखें भर आईं।
“पापा जी, घर में किसी के काम आना ही जरूरी नहीं होता। कभी-कभी बस घर में होना भी जरूरी होता है।”
दादा ने कुछ नहीं कहा।
लेकिन उस दिन पहली बार उन्होंने घर जाने की जल्दी नहीं की।
अगले कुछ महीनों में पार्क का वह छोटा-सा समूह बड़ा हो गया।
आरव ने उसका नाम रखा—“शाम की पाठशाला।”
दादा ने नाम सुनकर कहा, “नाम अच्छा है, लेकिन पाठशाला सिर्फ बच्चों की नहीं होगी।”
“तो किसकी?”
“जो सीखना चाहे, उसकी।”
धीरे-धीरे कुछ बुजुर्ग भी वहां आने लगे।
कोई बच्चों को पुराने खेल सिखाता।
कोई कविता सुनाता।
कोई पौधों की देखभाल समझाता।
एक महिला बच्चों को खाना बनाने की छोटी-छोटी बातें बताती।
आरव को एहसास हुआ कि उसके दादा को किसी कमरे में बंद करके आराम देना उनकी देखभाल नहीं थी।
उन्हें फिर से जिंदगी में शामिल करना असली देखभाल थी।
एक दिन दादा ने आरव को बुलाया।
“बेटा।”
“हां?”
“मैं अब कहीं नहीं जा रहा।”
आरव हंस पड़ा।
“मैंने कहा था ना!”
“लेकिन एक बात है।”
“क्या?”
“कल से तू भी समय पर पढ़ेगा।”
आरव का चेहरा उतर गया।
“दादा!”
दादा जोर से हंसने लगे।
“सबको पढ़ाने वाला खुद पढ़ाई से भागेगा तो कैसे चलेगा?”
कुछ महीने बाद घर में दादा की पुरानी कुर्सी खिड़की के पास रखी थी।
शाम होते ही वह वहीं बैठते।
लेकिन अब घर में कोई यह नहीं पूछता था कि दादा क्या कर रहे हैं।
सब जानते थे।
वह अगले दिन की “शाम की पाठशाला” की तैयारी कर रहे हैं।
और आरव?
वह जब भी स्कूल से लौटता, सबसे पहले दादा के पास जाता।
एक दिन उसने पूछा,
“दादा, अगर उस दिन आप चले जाते तो?”
दादा ने मुस्कुराकर कहा,
“तो शायद मुझे पता ही नहीं चलता कि मेरी जरूरत अभी खत्म नहीं हुई।”
आरव ने उनका हाथ पकड़ लिया।
उस दिन उसे समझ आया कि बुजुर्गों को हमेशा सहारे की जरूरत नहीं होती।
कई बार उन्हें सिर्फ यह महसूस कराने की जरूरत होती है कि उनकी जिंदगी अब भी किसी के लिए मायने रखती है।
और शायद परिवार की सबसे बड़ी गलती यही होती है कि वह बुजुर्गों की जरूरतों का अंदाजा उनकी उम्र देखकर लगाने लगता है, उनकी इच्छा पूछना भूल जाता है।
क्या आपके घर के बुजुर्गों से भी कभी यह पूछा जाता है कि वे सच में क्या चाहते हैं?
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अंबिका सरगम ❤️