13/12/2025
एक बार हमने एक शराबी को प्रणाम किया था। शराब पिए था। हम गंगा के किनारे बैठे, गंगा जी की तरंगों का आनंद ले रहे थे, मंत्र जपते हुए। उस समय 22-24 की जो भी अवस्था हो, नई अवस्था थी।
"ए, खड़ा हो।" मतलब एक कौतूहल। उसकी गंध से तो समझ गए शराब पिए है। हमने कहा "क्या करेगा?"। तो खड़े हुए। यह स्वभाव शुरू से रहा है, जी। बोले, "आ"। हमने कहा, "कहाँ ले जाएगा?"। "बाबा, इससे क्या फर्क पड़ता है, ले चलो"।
वो ले गया और वैकुंठ धाम ले गया, वहाँ ब्रम्हावर्त बिठूर में है वैकुंठ धाम, वो पास में ही था। और भगवान की छवि को, ऐसे नशे में ही बोल रहा है। बोला, "देख रहा है इनको तू? कौन हैं ये?"। हमने कहा, "भगवान"। "किसके बने?"। "वो भगवान तो भगवान होते हैं।"। बोले, "नहीं, जो मैं बात पूछ रहा हूँ, असली बता"। हमने कहा, "संगमरमर"। बोले, "ये क्या है?"। हमने कहा, "संगमरमर"। बोले, "समझ ले। एक पैरों के नीचे रौंदा जाता है, और एक भगवान बनकर पूज रहा है। क्यों? ये तिल-तिल काटा गया, लेकिन टूटा नहीं। ये टूटा नहीं, तो आज भगवान बनकर पूज रहा है। टूटना नहीं जीवन में"।
हम उसे पंचांग प्रणाम किए थे, जैसे संत को प्रणाम करते हैं, कि भगवान नाटक करके, शराबी का मुझे उपदेश कर रहे हैं। अगर उपदेश सही मिले, तो एक शराबी का भी उपदेश मान लेना चाहिए। तो हमको बात माननी है, वो कहीं से भी हो। अगर सही बात बोल रहा है, तो हमें शिक्षा लेनी चाहिए। यह नहीं देखना चाहिए ये कौन है।
जैसे हम मिठाई, अच्छी लगी तो ले लिया। मिठाई वाला ये मिठाई खाता है कि नहीं, ये नहीं। मेरी पसंद है, मैंने खरीद ली। तो अच्छी बात मुझे जहाँ से मिले, वहाँ से स्वीकार करना चाहिए। वो छोटा व्यक्ति हो, वो संसारी व्यक्ति हो, या वो पागल आदमी भी हो, तो भी हमें स्वीकार करना चाहिए। अच्छी बात स्वीकार करनी चाहिए।
🙏 उपदेश का सार (Summary of the Teaching)
महाराज श्री प्रेमानंद गोविंद शरण जी ने शराबी को प्रणाम इसलिए किया क्योंकि वह उसे केवल एक शराबी नहीं मानते थे, बल्कि उसे भगवान द्वारा दिया गया एक उपदेश मानते थे।
यहाँ इस घटना से मिलने वाले मुख्य उपदेश का सार है:
1. ज्ञान कहीं से भी मिले, स्वीकार करो: महाराज जी कहते हैं कि अगर उपदेश या सही बात एक शराबी से भी मिले, तो उसे मान लेना चाहिए। हमें यह नहीं देखना चाहिए कि बात कौन कह रहा है, बल्कि यह देखना चाहिए कि बात सही है या नहीं।
2. टूटना नहीं (Non-breaking Resolve): शराबी उन्हें वैकुंठ धाम (बिठूर) ले गया और भगवान की संगमरमर की मूर्ति दिखाते हुए पूछा कि यह क्या है। शराबी ने कहा, एक संगमरमर पैरों के नीचे रौंदा जाता है और एक भगवान बनकर पूजा जाता है, क्योंकि यह तिल-तिल काटा गया, लेकिन टूटा नहीं।
इस घटना से महाराज जी को यह शिक्षा मिली कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ आएँ, साधना और दृढ़ संकल्प से टूटना नहीं चाहिए।
3. विनम्रता और सम-भाव: शराबी को प्रणाम करना महाराज जी की अत्यधिक विनम्रता को दर्शाता है। उन्होंने शराबी में भी भगवान के नाटक (लीला) को देखा, जो उन्हें उपदेश दे रहे थे।