05/11/2025
कचेहरी वाली जलेबी की दूकान पर किसी दिन स्वनामधन्य कोई कवि जलेबी-दही खा रहे थे। उसी समय जलेबी की दूकान पर कौवा आया और दही के भगोने में चोंच मार दी। हलवाई ने क्रोधित होकर कौवे को एक पत्थर मारा और कौवा वहीं जमीन पर गिरकर मर गया। इस बात से वह कवि महोदय बहुत दुखी हुए। दूकान से जाते वक्त मरे हुए कौवे के बगल में कवि ने कोयले से एक वाक्य लिखा- ‘‘काग दही पे जान गवायो।’’ जो कि बाद में महावाक्य साबित हुआ।
कवि के जाने के कुछ ही देर बाद उसी दूकान पर एक लेखपाल साहब आये। लेखपाल साहब बहुत दुखी थे। उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था, जैसे न्यायालय के आला अफसर ने उन्हें बहुत फटकार लगायी हो। वह दुखी मन से चाय की चुस्कियाँ लेते हुए मरे कौवे के बगल में लिखे वाक्य को लगातार घूरते रहे। जब कुल्हड़ की चाय खत्म हुई, तो लेखपाल ने कहा, ‘‘जिसने भी लिखा है, बिल्कुल सही लिखा है। कागद ही पे जान गवायो।’’ मतलब कानूनी कागजात में हेर-फेर करने के चक्कर में लेखपाल साहब वाकई फँस गये थे।
लेखपाल साहब के जाने के बाद उसी दूकान पर आम जनता के हाथों पिटा कोई आशिक आया और चाय लेकर पीने लगा। चाय पीते-पीते उसकी भी नजर मरे हुए कौवे और उसकी बगल में लिखे उसी वाक्य पर गयी। वह वाक्य उसके भी मन में घर कर गया। उसने सोचा कि जिसने भी लिखा है, सही लिखा है। प्रेम की कद्र न करने वाली स्त्री के चक्कर में आज मेरी हालत ऐसी हुई है। आशिक ने उस वाक्य को ऐसे पढ़ा- 'का गदही पे जान गवायो।'
इसीलिए कहा गया है कि जिसकी भावना जैसी होती है, वह वैसे ही अर्थ भी समझता है और उसी के अनुसार आचरण करता है। इसीलिए प्रत्येक मस्तिष्क में भिन्न-भिन्न मति का वास होता है। शायद इसीलिए मति भी बहुवचन तक का सफर तय करती है।