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08/08/2026

Rizq me barkat nahi ho rahi ?

नबी (सल्ल.) का बुज़ुर्ग यहूदी के प्रति प्रेम और सम्मानयह वाकया हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अख्लाक़-ए-हसना...
03/08/2026

नबी (सल्ल.) का बुज़ुर्ग यहूदी के प्रति प्रेम और सम्मान

यह वाकया हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अख्लाक़-ए-हसना (उच्च चरित्र) की एक और मिसाल है। एक यहूदी बुज़ुर्ग मदीना के रास्ते में अक्सर बैठा करता था। जब भी नबी (सल्ल.) वहां से गुज़रते, वह बुज़ुर्ग आपसे कुछ न कुछ मांगता। आप (सल्ल.) कभी उसे मना नहीं करते थे।
एक दिन, वह बुज़ुर्ग बीमार हो गया। जब नबी (सल्ल.) को यह पता चला, तो वे फ़ौरन उसके घर गए। आप (सल्ल.) ने उसकी खैरियत पूछी, उसे सहारा दिया, और अपने हाथों से उसे पानी पिलाया। बुज़ुर्ग यहूदी इस स्नेह से इतना प्रभावित हुआ कि उसकी आँखों में आँसू आ गए।
سبحان الله (सुभान अल्लाह)! नबी पाक का यह व्यवहार हमें सिखाता है कि इस्लाम सिर्फ़ एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक बेहतरीन तरीका है, जिसमें हर इंसान, चाहे वह किसी भी धर्म का हो, सम्मान का पात्र है।
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नबी-ए-करीम (सल्ल.) का सब्र और बदवी का सुलूकएक बार नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक गाढ़ी चादर ओढ़े जा रहे थे। तभी...
02/08/2026

नबी-ए-करीम (सल्ल.) का सब्र और बदवी का सुलूक

एक बार नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) एक गाढ़ी चादर ओढ़े जा रहे थे। तभी एक बदवी (देहाती) आया और उसने पीछे से चादर को इतनी तेज़ी से खींचा कि आपकी गर्दन मुबारक पर निशान पड़ गया।
उसने बड़ी रुखाई से कहा, "मुहम्मद! अल्लाह के माल में से जो आपके पास है, मुझे भी दीजिए।"
नबी पाक ने उसकी तरफ देखा, मुस्कुराए और फरमाया:
إِنَّمَا بُعِثْتُ لِأُتَمِّمَ صَالِحَ الْأَخْلَاقِ
(अनुवाद: मुझे तो उत्तम चरित्र (अख़्लाक) को पूरा करने के लिए ही भेजा गया है।)
आपने बिना किसी गुस्से के सहाबा को हुक्म दिया कि उसे अनाज और खजूरें दे दी जाएं।
सबक: सच्चे अख्लाक की पहचान यही है कि इंसान बदतमीज़ी का जवाब भी नरमी और सब्र से दे।

23/07/2026

Biwi ya sohar se nakhush.... बीवी या सोहर से नाखुश

21/07/2026

हुज़ूर (सल्ल.) और ताएफ़ की दुआ

ताएफ़ के मैदान में लोगों ने नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर इतने पत्थर बरसाए कि आपके नैलैन (जूते) मुबारक खून से भर गए। तभी हज़रत जिब्रईल (अ.) आए और अर्ज़ किया, "अगर आपका हुक्म हो तो इन पहाड़ों को मिलाकर इस बस्ती को तबाह कर दूँ?"
लेकिन रहमुल-लिल-आलमीन (رَحْمَةً لِّلْعَالَمِينَ) ने फरमाया:
اللَّهُمَّ اهْدِ قَوْمِي فَإِنَّهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
(अनुवाद: ऐ अल्लाह! मेरी कौम को हिदायत दे, बेशक ये अनजान हैं।)
आपने ज़ुल्म का जवाब बददुआ से नहीं, बल्कि रहम और दुआ से दिया।
सबक: सच्चे मोमिन का काम नफरत का जवाब मोहब्बत और दुआ से देना है।

19/07/2026

16/07/2026

नबी-ए-रहीम (सल्ल.) और बुज़ुर्ग की दुआ

एक बार एक कमज़ोर बुज़ुर्ग शख्स नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मजलिस में हाज़िर हुए। वह बहुत धीरे चल रहे थे। सहाबा ने उन्हें जगह देने में थोड़ी सी देर कर दी।
यह देखकर अल्लाह के रसूल (सल्ल.) ने फरमाया:
لَيْسَ مِنَّا مَنْ لَمْ يَرْحَمْ صَغِيرَنَا وَيَعْرِفْ شَرَفَ كَبِيرِنَا
(अनुवाद: वह शख्स हममें से नहीं जो हमारे छोटों पर रहम न करे और हमारे बड़ों के मर्तबे को न पहचाने।)
आपने उस बुज़ुर्ग को अपने पास बड़े अदब से बैठाया और खुद उनकी ज़रूरत पूरी की।
सबक: बड़ों का अदब और छोटों पर शफ़क़त (प्यार) करना ही सच्चे मोमिन की पहचान है।

14/07/2026

नबी-ए-अकरम (सल्ल.) और सोने के कंगन

एक बार एक गरीब और लाचार सहाबी, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की खिदमत में हाज़िर हुए। उन्होंने रोते हुए अपनी तंगहाली और भूख का ज़िक्र किया। नबी पाक के पास उस वक्त घर में देने के लिए कुछ नहीं था।
आपने अपनी लाडली बेटी, हज़रत फ़ातिमा (रज़ि.) के घर का रुख किया। जब सैयदा फ़ातिमा को मालूम हुआ, तो उन्होंने बिना झिझक अपने हाथों के सोने के कंगन (जो उनकी इकलौती कीमती चीज़ थी) उतारकर नबी पाक को दे दिए ताकि उस गरीब की मदद हो सके।
नबी-ए-करीम (सल्ल.) ने वह कंगन उस सहाबी को दे दिए। जब वह कंगन बिके और उस गरीब की ज़रूरत पूरी हुई, तो नबी पाक की आँखों में खुशी के आँसू आ गए और उन्होंने अपनी बेटी के इस त्याग के लिए दुआ की।
सबक: अपनी ज़रूरत को पीछे छोड़कर दूसरों की भूख मिटाना और बेसहारा की मदद करना ही नबी पाक के घराने का तरीका है।

13/07/2026

नबी-ए-रहमद (सल्ल.) और थका हुआ ऊँट👇🏻

एक बार अल्लाह के रसूल, हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने सहाबा के साथ एक सफर पर थे। रास्ते में एक अंसारी सहाबी के बाग में एक ऊँट खड़ा था। जैसे ही उस बेज़ुबान जानवर की नज़र नबी पाक के नूरानी चेहरे पर पड़ी, वह ज़ोर-ज़ोर से रोने लगा और उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
रहमतुल-लिल-आलमीन (सल्ल.) का दिल तड़प उठा। आप फौरन उसके पास गए और बड़े प्यार से उसके सिर और पीठ को सहलाया, जिससे ऊँट को सुकून मिला और वह शांत हो गया।
आपने गुस्से में बाग के मालिक को बुलाया और फरमाया, "क्या तुम्हें इस बेज़ुबान के मामले में अल्लाह का खौफ नहीं आता? यह मुझसे शिकायत कर रहा है कि तुम इससे काम तो बहुत ज़्यादा लेते हो, लेकिन इसे भरपेट खाना नहीं देते।" मालिक ने शर्मिंदा होकर अपनी गलती मानी।
सबक: इस्लाम सिर्फ इंसानों पर ही नहीं, बल्कि बेज़ुबान जानवरों के साथ भी नरमी और हमदर्दी बरतने की सख्त ताकीद करता है।

11/07/2026

ताजदार-ए-मदीना (सल्ल.) और यहूदी का कर्ज़👇🏻

एक बार एक गैर-मुस्लिम साहूकार ज़ैद बिन साना ने हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) को कुछ कर्ज़ दिया था। तयशुदा वक्त से दो-तीन दिन पहले ही वह आया और बेहद बदतमीज़ी से नबी पाक का कुर्ता पकड़कर खींचने लगा और कर्ज़ वापस मांगने लगा।

पास खड़े हज़रत उमर (रज़ि.) गुस्से से लाल हो गए और अपनी तलवार पर हाथ रख लिया। लेकिन रहमतुल-लिल-आलमीन (सल्ल.) ने मुस्कुराकर हज़रत उमर से फरमाया, "उमर! तुम्हें हम दोनों से अलग बर्ताव करना चाहिए था। तुम्हें इसे तसल्ली से मांगने को कहना चाहिए था, और मुझे वक्त पर अदा करने की नसीहत देनी चाहिए थी।"

नबी पाक ने न सिर्फ उसका कर्ज़ चुकाया, बल्कि हज़रत उमर के डांटने के मुआवज़े में उसे कुछ खजूरें भी ज़्यादा दीं। इस बेमिसाल सब्र (धैर्य) को देखकर वह शख्स दंग रह गया और तुरंत ईमान ले आया।
सबक: गुस्से का जवाब सब्र और कड़वाहट का जवाब मिठास से देना ही नबी करीम (सल्ल.) की सच्ची सुन्नत है।

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