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कालिया हर बार🚩

31/07/2026
16/07/2026

जहां इतिहास दोहराया जाता था, वहां राकेश कालिया ने इतिहास ही बदल दिया

राजनीति में कुछ नाम सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं होते हैं। वे स्थापित धारणाओं को बदलने के लिए भी याद किए जाते हैं। चिंतपूर्णी विधानसभा क्षेत्र में राकेश कालिया ऐसा ही एक नाम रहे हैं, जिन्होंने उस लंबे समय से चले आ रहे इस मिथक को भी तोड़ा कि इस विधानसभा क्षेत्र से कोई भी विधायक खुद को दोबारा ‘रिपीट’ कर पाने में सफल नहीं हो पाता है। हालांकि 1977 व 1980 में हंसराज अकरोट अपवाद थे, लेकिन उन्होंने पार्टी बदलकर जीत हासिल की थी। इसके बाद गणेश दत्त भरवाल, सुषमा शर्मा, हरिदत्त शर्मा और प्रवीण शर्मा जैसे कई दिग्गज नेताओं के बाद यह धारणा लगभग राजनीतिक सच बन चुकी थी, लेकिन राकेश कालिया ने अपने जनाधार और कार्यशैली के दम पर इसे बदलकर रख दिया।
वर्ष 2003 के विधानसभा चुनाव में पेशे से इंजीनियर और स्वभाव से जीतने के जुनूनी राकेश कालिया ने पहली बार चिंतपूर्णी विधानसभा क्षेत्र से चुनावी मैदान में कदम रखा। उनके सामने तत्कालीन भाजपा सरकार में मंत्री रहे प्रवीण शर्मा जैसे मजबूत और अनुभवी नेता थे। इसके बावजूद कालिया ने 10,871 मतों के बड़े अंतर से जीत दर्ज कर राजनीतिक हलकों में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी। असली परीक्षा वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में थी। क्षेत्र में यह चर्चा आम थी कि चिंतपूर्णी की जनता किसी भी विधायक को लगातार दूसरी बार विधानसभा नहीं भेजती है। भाजपा ने इस बार नए चेहरे नरेन्द्र शर्मा को मैदान में उतारा, जबकि मुकाबला त्रिकोणीय भी था। तमाम राजनीतिक समीकरणों और कयासों के बीच राकेश कालिया ने दोबारा जीत हासिल की और 16 हजार से अधिक मतों के अंतर से विजय प्राप्त कर वर्षों पुराने राजनीतिक मिथक को हमेशा के लिए तोड़ दिया। उस चुनाव में उनकी जीत का अंतर इतना बड़ा था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री राजा वीरभद्र सिंह के मतांतर से भी अधिक रहा। हालांकि राजनीति में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। वर्ष 2012 में परिसीमन के बाद चिंतपूर्णी विधानसभा सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हो गई। इसके चलते राकेश कालिया को अपना राजनीतिक क्षेत्र बदलकर गगरेट से चुनाव लड़ना पड़ा। नए क्षेत्र, नए समीकरण और नए प्रतिद्वंद्वियों के बीच उनका मुकाबला भाजपा के सुशील कालिया से था, जबकि कांग्रेस के बागी रमन जसवाल भी मैदान में थे। कठिन परिस्थितियों के बावजूद राकेश कालिया ने करीब पांच हजार मतों के अंतर से जीत दर्ज कर यह साबित किया कि उनकी राजनीति केवल क्षेत्र विशेष तक सीमित न होकरजनता के भरोसे पर आधारित है। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने नए चेहरे राजेश ठाकुर पर दांव लगाया। पहली बार चुनाव लड़ रहे ठाकुर ने राकेश कालिया को नौ हजार से अधिक मतों से पराजित कर उनके लगातार जीतते चले आ रहे विजय रथ को थाम दिया। यह हार कालिया के राजनीतिक जीवन का कठिन पड़ाव जरूर बनी, लेकिन उनकी राजनीतिक यात्रा का अंत नहीं थी। समय ने एक बार फिर करवट ली। गगरेट के तत्कालीन विधायक चैतन्य शर्मा की राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के बाद विधानसभा उपचुनाव की स्थिति बनी। इस चुनाव में राकेश कालिया ने दमदार वापसी करते हुए कांग्रेस के लिए गगरेट सीट दोबारा जीत ली। यह जीत कालिया की वापसी के साथ संघर्ष, धैर्य और जनता के विश्वास की पुनर्स्थापना का प्रतीक भी बनी।
राकेश कालिया का राजनीतिक सफर इस बात का उदाहरण है कि लोकतंत्र में नेता की असली ताकत जनता का विश्वास होता है। उन्होंने जहां चिंतपूर्णी में वर्षों पुरानी राजनीतिक परंपरा को बदला, वहीं गगरेट में हार के बाद वापसी कर यह भी साबित किया कि राजनीति में अंतिम फैसला जनता ही लिखती है। यही कारण है कि उनका सफर आज भी प्रदेश की राजनीति में दृढ़ संकल्प, संघर्ष और जनविश्वास की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।

अपनों के साथ।
15/07/2026

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12/07/2026

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09/07/2026

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