09/05/2026
हसदेव अरण्य पर फिर मंडराया संकट! केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मंजूरी की तैयारी, 7 लाख पेड़ों की कटाई की आशंका
राज्य सरकार की अनुशंसा के बाद केंद्र स्तर पर चल रहा विचार, पर्यावरण, जल स्रोत और आदिवासी जीवन पर खतरे को लेकर उठे सवाल
अंबिकापुर/रायपुर।
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य क्षेत्र को लेकर एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। अडानी समूह से जुड़े बताए जा रहे केते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को मंजूरी देने पर केंद्र सरकार विचार कर रही है, जबकि राज्य सरकार पहले ही इस परियोजना के लिए अपनी अनुशंसा भेज चुकी है। इस प्रस्तावित खनन परियोजना को लेकर पर्यावरणविदों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय ग्रामीणों में भारी चिंता देखी जा रही है।
जानकारी के मुताबिक इस परियोजना के चलते करीब 7 लाख पेड़ों की कटाई होने की आशंका जताई जा रही है। यदि ऐसा होता है तो हसदेव अरण्य की समृद्ध जैव विविधता, वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास और पूरे क्षेत्र के पर्यावरण संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। हसदेव नदी और बांगो जलाशय जैसे महत्वपूर्ण जल स्रोतों पर भी खतरा बढ़ने की बात कही जा रही है।
बताया जा रहा है कि हसदेव क्षेत्र में पहले से संचालित कोल ब्लॉकों के कारण हजारों एकड़ जंगल और लाखों पेड़ पहले ही खत्म हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से इलाके में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ने, हाथी कॉरिडोर प्रभावित होने और खेती-किसानी पर असर पड़ने की आशंका लगातार जताई जाती रही है।
स्थानीय ग्रामीणों और आदिवासी समुदाय का कहना है कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं बल्कि उनकी संस्कृति, आजीविका और अस्तित्व का आधार है। खदान विस्तार से कई गांवों के विस्थापन और पारंपरिक जीवनशैली पर असर पड़ने की चिंता भी सामने आ रही है।
विवाद का एक बड़ा कारण यह भी है कि विधानसभा में पहले हसदेव अरण्य क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर प्रस्ताव पारित होने की बात सामने आ चुकी है। ऐसे में अब खनन परियोजना को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया पर सवाल उठ रहे हैं। विरोध कर रहे संगठनों का आरोप है कि निजी हितों को लाभ पहुंचाने के लिए पर्यावरणीय और सामाजिक चिंताओं को नजरअंदाज किया जा रहा है।
इतना ही नहीं, रामगढ़ जैसे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व वाले क्षेत्रों पर भी इस परियोजना के प्रभाव की आशंका जताई जा रही है। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई और खनन जारी रहा, तो आने वाले समय में इसका असर पूरे उत्तर छत्तीसगढ़ के जलवायु संतुलन और जल संकट पर भी दिखाई दे सकता है।
फिलहाल इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है। आने वाले दिनों में केंद्र सरकार के फैसले पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।