28/04/2026
साहेब औरंगजेब और नेहरू से लड़ने में इतने मसरूफ हैं कि भूल गए हैं 2026 में जनता को 'इतिहास' नहीं, 'इलाज' और 'इंप्लॉयमेंट' (रोजगार) चाहिए। ये एक ऐसी सरकार है जो गंदे नाले पर 'अमृत सरोवर' का बोर्ड लगाकर खुश हो जाती है।"
इतिहास गवाह है कि जब राजा के पास देने के लिए रोटी नहीं होती, तो वह जनता को 'भगवान' की सुरक्षा का जिम्मा सौंप देता है। आज देश में अस्पताल कम और उत्सव ज्यादा हैं।
साहब ने जनता को एक ऐसे 'धार्मिक कोमा' में भेज दिया है जहाँ युवा डिग्री जलाकर पकोड़े तलने को 'स्टार्टअप' मान रहा है और अपनी बदहाली पर रोने के बजाय दूसरे के घर जलते देख तालियां बजा रहा है।
यह शासन नहीं, एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग है जहाँ भूखे पेट को 'भक्ति' की अफीम चटा दी गई है।"
दुनिया को दिखाने के लिए दिल्ली की झोपड़ियों पर पर्दे डाले जाते हैं और विदेशी मेहमानों के लिए सड़कों पर इत्र छिड़का जाता है। साहब की विदेश नीति का कुल जमा हासिल यह है कि वो बाहर जाकर 'लोकतंत्र' की दुहाई देते हैं और घर लौटते ही उसे ईडी (ED) के पैरों तले कुचल देते हैं।
यह एक ऐसा 'ग्लोबल लीडर' है जिसे व्हाइट हाउस में सम्मान चाहिए, लेकिन अपने ही देश के किसानों और छात्रों से बात करने में डर लगता है। इनकी कूटनीति सिर्फ हेडलाइंस के लिए है, जमीनी हकीकत के लिए नहीं।"
आज के दौर में संविधान की रक्षा की शपथ नहीं, 'साहब की रक्षा' की वफादारी चलती है। एजेंसियां अब भ्रष्टाचार नहीं ढूंढतीं, बल्कि 'चुनाव' की तारीखें और 'विपक्ष के पते' ढूंढती हैं। जो कल तक 'भ्रष्ट' था, वो सहाब की तिजोरी में चंदा देते ही 'पुण्य आत्मा' हो जाता है।
कानून की देवी की आंखों पर पट्टी इसलिए नहीं है कि वो निष्पक्ष है, बल्कि इसलिए है ताकि वो सत्ता के गुंडों को खुली छूट देते हुए देख न सके। यह 'कानून का राज' नहीं, 'एजेंसियों का आतंक' है।"
सरकार ने एक नई कला का आविष्कार किया है 'गायब होने वाला डेटा'। यहाँ बेरोजगारी का डेटा गायब है, गंगा में बहती लाशों का डेटा गायब है, और इलेक्टोरल बॉन्ड के पीछे की सांठगांठ का डेटा भी 'तकनीकी खराबी' बताकर छिपा लिया जाता है।
इनकी डिक्शनरी में 'झूठ' को 'जुमला' कहा जाता है और 'धोखे' को 'रणनीति'।
2047 के विकसित भारत का सपना उस आदमी को दिखाया जा रहा है जिसे 2026 में राशन की लाइन में खड़ा किया गया है। यह 'अमृत काल' सिर्फ चंद पूंजीपतियों के लिए है जिनके मुनाफे का ग्राफ चांद छू रहा है, जबकि आम आदमी के लिए यह 'विष काल' है जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और न्याय उसकी पहुंच से बाहर हो चुके हैं।
साहब ने देश में फैक्ट्रियां तो नहीं लगाईं, लेकिन 'अंधभक्ति' के ऐसे प्लांट लगा दिए हैं जहाँ तर्क मरते हैं और नफरत पैदा होती है। यहाँ महंगाई पर सवाल पूछो तो जवाब 'राम मंदिर' मिलता है, और चीन के कब्जे पर पूछो तो जवाब 'पाकिस्तान की बर्बादी' मिलता है।
इन्होंने एक ऐसी फौज तैयार की है जो अपने ही बच्चों के भविष्य की बलि चढ़ाने को तैयार है, बस उनके कान में 'हिंदू खतरे में है' का मंत्र फूंक दिया जाए। यह नागरिकों का देश नहीं, 'वोटिंग मशीनों' का गोदाम बन गया है।"
नारा दिया था 'बेटी बचाओ', लेकिन बेटियों को किससे बचाना है, यह बताना भूल गए। जब मेडल जीतने वाली बेटियां सड़कों पर घसीटी जा रही थीं, तब 'प्रधान-सेवक' अपनी नई संसद के उद्घाटन में फोटो खिंचवा रहे थे।
इस सरकार की नैतिकता का पैमाना यह है कि आरोपी अगर अपनी पार्टी का हो, तो तिरंगा उसकी ढाल बन जाता है। यहाँ न्याय सड़कों पर नहीं, सत्ता के रसोइये में पकता है।
बेटियों के लिए न्याय सिर्फ एक 'चुनावी इवेंट' है, हकीकत में तो यहाँ 'अपराधी बचाओ' का गुप्त एजेंडा चलता है।"
शाम सात बजते ही टीवी पर जो सर्कस शुरू होता है, उसे पत्रकारिता कहना लोकतंत्र का अपमान है। ये एंकर नहीं, बल्कि सरकार के 'पेड हंटर' हैं जिन्हें शिकार के लिए विपक्ष की गर्दन दी जाती है।
साहेब प्रेस कॉन्फ्रेंस से इसलिए भागते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि उनके पालतू एंकर पहले ही जनता का ध्यान 'सीमा पार' भटका चुके हैं। आज न्यूज़ रूम में सवाल दफन होते हैं और झूठ का अंतिम संस्कार 'ब्रेकिंग न्यूज़' के नाम पर किया जाता है। कलम अब स्याही नहीं, 'चाटुकारिता का शहद' उगल रही है।"
2022 में किसानों की आय दोगुनी होनी थी, 2025 में 5 ट्रिलियन की इकॉनमी बननी थी तारीखें बदलती रहीं, बस जुमलों का रंग नहीं बदला। अब 2047 का नया गाजर लटका दिया गया है।
सहाब वो डॉक्टर हैं जो मरीज को ऑक्सीजन देने के बजाय उसे 'लंबी उम्र का सपना' देखने की सलाह देते हैं।
आज का युवा डिग्री लेकर बेरोजगार घूम रहा है और सरकार उसे 'अमृत काल' के पकौड़े तलने की ट्रेनिंग दे रही है। यह विकास नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों के साथ खेला गया एक 'क्रूर मजाक' है।"
देश की संपत्ति को ऐसे बेचा जा रहा है जैसे किसी की निजी जागीर हो। एक तरफ गरीब को 5 किलो अनाज की गुलामी में बांध दिया गया है, और दूसरी तरफ 'खास मित्रों' को पूरा देश थाली में सजाकर परोस दिया गया है।
साहेब झोला उठाकर चलने की बात करते हैं, लेकिन उस झोले में पूरे देश के एयरपोर्ट, पोर्ट और कोयले की खदानें भरी हुई हैं।
यह 'राष्ट्रवाद' नहीं, बल्कि 'मित्र-वाद' है जहाँ जनता का पसीना अडानी के एयर कंडीशनर की हवा बनकर उड़ रहा है।"