Prasanna Kumar Das

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📜 Facebook Caption (Hindi)⚔️ जब अधर्म अपनी सीमा लाँघ जाता है, तब धर्म स्वयं जाग उठता है।प्रभु जगन्नाथ का यह दिव्य स्वरूप...
05/08/2026

📜 Facebook Caption (Hindi)

⚔️ जब अधर्म अपनी सीमा लाँघ जाता है, तब धर्म स्वयं जाग उठता है।
प्रभु जगन्नाथ का यह दिव्य स्वरूप केवल युद्ध का नहीं, बल्कि सत्य, न्याय और धर्म की विजय का प्रतीक है।

"जहाँ धर्म डगमगाता है, वहाँ प्रभु स्वयं मार्ग बन जाते हैं।
जहाँ अन्याय सिर उठाता है, वहाँ सुदर्शन काल बन जाता है।
भय नहीं, विश्वास रखो—
जग के नाथ आज भी अपने भक्तों की रक्षा के लिए खड़े हैं।
अंत में जीत हमेशा सत्य की होती है, क्योंकि धर्म का रक्षक स्वयं जगन्नाथ है।"

🚩 जय जगन्नाथ 🚩 🙏✨

🌼 प्रभु जगन्नाथ — भक्त और भगवान 🌼हे नीलाचल के नाथ,हे जग के पालनहार,तुम्हारे चरणों में झुकता हैसारा यह संसार।काष्ठ रूप मे...
05/08/2026

🌼 प्रभु जगन्नाथ — भक्त और भगवान 🌼

हे नीलाचल के नाथ,
हे जग के पालनहार,
तुम्हारे चरणों में झुकता है
सारा यह संसार।

काष्ठ रूप में विराजे हो,
पर चेतना अनंत है,
जो एक बार तुम्हें पुकारे,
उसका जीवन धन्य है।

बड़ी-बड़ी आँखों से तुम,
सबका दुख पहचानते हो,
निर्बल, निर्धन, हर भक्त को
अपने हृदय से लगाते हो।

पुरी की पावन धरती पर,
श्रीमंदिर की दिव्य शान,
बड़दांडा गूँज उठता है
"जय जगन्नाथ" के मधुर गान।

जब वृद्ध भक्त प्रेम से आकर
तुमको गले लगाता है,
उस पल सारा ब्रह्मांड भी
भक्ति में शीश झुकाता है।

न धन चाहिए, न वैभव,
बस चरणों का प्यार मिले,
हर जन्म में प्रभु तुम्हारी
भक्ति का उपहार मिले।

तुम दीनों के हो सहारे,
तुम जीवन की आस हो,
हर संकट में साथ निभाने वाले
मेरे विश्वास हो।

अधर्म जहाँ सिर उठाए,
वहाँ धर्म का दीप जलाना,
हर मानव के हृदय में प्रभु,
प्रेम और सत्य बसाना।

हे जगन्नाथ! ऐसी कृपा करना,
मन कभी अभिमान न करे,
हर साँस में तुम्हारा नाम रहे,
और जीवन तुम्हें अर्पण करे।

जय जगन्नाथ!
तुम्हारी महिमा अनंत है,
तुम्हारा प्रेम अमर है,
जो तुम्हारे चरणों में झुक गया,
उसका जीवन सफल है।
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प्रभु जगन्नाथ कल्कि रूप मेंजब अधर्म ने धरती को घेरा,हर दिशा में छा गया अँधियारा।तब नीलाचल से गूँजी वाणी,आ पहुँचे प्रभु ज...
05/08/2026

प्रभु जगन्नाथ कल्कि रूप में

जब अधर्म ने धरती को घेरा,
हर दिशा में छा गया अँधियारा।
तब नीलाचल से गूँजी वाणी,
आ पहुँचे प्रभु जगन्नाथ कल्कि अवतारी।

दिव्य अश्व पर तेज समाया,
हाथों में धर्म का शस्त्र उठाया।
नेत्रों में अग्नि, मुख पर मुस्कान,
काँप उठा सारा दुष्ट जहान।

जहाँ अन्याय ने सिर उठाया,
वहाँ प्रभु ने न्याय बरसाया।
हर प्रहार में सत्य की शक्ति,
हर श्वास में भक्तों की भक्ति।

रणभूमि गूँजी "जय जगन्नाथ",
मिटने लगा अधर्म का साथ।
असत्य का हर किला ढह गया,
सत्य का सूरज फिर उग गया।

रक्त नहीं, धर्म की ज्योति बही,
करुणा भी प्रभु के संग रही।
जो शरण में आया विनम्र होकर,
उसे अपनाया प्रेम से झुककर।

दुष्टों का अभिमान चूर हुआ,
पाप का हर बंधन दूर हुआ।
कल्कि रूप में जब प्रभु आए,
सतयुग के शुभ दीप जलाए।

हे जगन्नाथ, हे विश्वनाथ,
रखना सदा धर्म का साथ।
जब-जब संकट जग पर छाए,
कल्कि बनकर फिर तुम आए।

04/08/2026

Experience the divine moment Lord Jagannath emerged from the ocean waves. The sacred Daru brings a new form for the world to worship. Jai Jagannath! 🙏 Share this if you feel the divine energy.

प्रभु जगन्नाथ की महिमानीलांचल के पावन धाम में,करुणा का अमृत बहता है।जगन्नाथ के दिव्य चरणों में,हर दुख स्वयं ही ढहता है।ग...
04/08/2026

प्रभु जगन्नाथ की महिमा

नीलांचल के पावन धाम में,
करुणा का अमृत बहता है।
जगन्नाथ के दिव्य चरणों में,
हर दुख स्वयं ही ढहता है।

गोल-गोल निर्मल से नयन,
स्नेह की भाषा कहते हैं।
जो भी श्रद्धा से शीश झुकाए,
उसके जीवन में सुख रहते हैं।

काष्ठ स्वरूप में छिपी हुई,
अनंत प्रेम की ज्योति है।
भक्तों के हर छोटे मन में,
बस उनकी ही प्रभु प्रीति है।

रथ पर जब प्रभु निकल पड़ते,
आनंद का सागर उमड़ता।
हर मुख से जय-जयकार गूँजे,
हर हृदय प्रेम से भर उठता।

न कोई ऊँचा, न कोई नीचा,
सबको गले लगाते हैं।
जग के नाथ जगन्नाथ प्रभु,
सबके भाग्य जगाते हैं।

महाप्रसाद की पावन महिमा,
सद्भाव का संदेश सुनाए।
भूखा कोई न रहे जगत में,
प्रेम का दीप सदा जलाए।

समुद्र की लहरें भी जैसे,
उनके चरण पखारने आएँ।
पुरी की पावन धूल स्वयं,
भक्तों का जीवन महकाएँ।

हे दीनबंधु, हे करुणानिधि,
हम पर अपनी कृपा बरसाओ।
भटके मन को राह दिखाकर,
भक्ति का अमृत पिलवाओ।

जब जीवन में अंधियारा हो,
तुम आशा का दीप बनो।
जब मन भय से भर जाए,
तुम साहस का स्वरूप बनो।

तुममें ही मेरा विश्वास रहे,
तुममें ही मेरी शान रहे।
हर श्वास तुम्हारा नाम जपे,
हर पल तेरा ध्यान रहे।

नीलचक्र की छाया जैसी,
रक्षा तुम हर बार करो।
भक्ति, सेवा, प्रेम और सत्य से,
मेरा जीवन साकार करो।

जय जगन्नाथ! जय जगदीश!
हर हृदय में तुम बस जाओ।
जब तक यह जीवन चलता रहे,
अपनी कृपा सदा बरसाओ।

प्रभु जगन्नाथ की ज्वर लीलास्नान पूर्णिमा का पावन दिन था,नीलाचल धाम दिव्यता से भरा था।एक सौ आठ कलशों के पवित्र जल से,प्रभ...
04/08/2026

प्रभु जगन्नाथ की ज्वर लीला

स्नान पूर्णिमा का पावन दिन था,
नीलाचल धाम दिव्यता से भरा था।
एक सौ आठ कलशों के पवित्र जल से,
प्रभु जगन्नाथ का अभिषेक हुआ प्रेम से।

शीतल जल की धारा तन पर आई,
तब प्रभु ने ज्वर की लीला रचाई।
जो सृष्टि के पालनहार कहलाते हैं,
वे भी मानव भाव अपनाते हैं।

यह रोग नहीं, करुणा का संदेश है,
हर भक्त के जीवन का उपदेश है।
दुख और पीड़ा से मत घबराना,
हर अँधेरे के बाद है उजियारा आना।

अनसर गृह में प्रभु विश्राम करते,
दैतापति प्रेम से सेवा में रहते।
औषधि, जड़ी-बूटी और पथ्य भोग,
भक्ति से भर जाता हर एक योग।

मंदिर का आँगन शांत दिखाई देता,
भक्तों का मन विरह में रोता रहता।
दर्शन की आशा आँखों में सजती,
हर साँस में "जय जगन्नाथ" बसती।

माँ लक्ष्मी की चिंता भी निराली,
बलभद्र और सुभद्रा की रखवाली।
पूरा नीलाचल जैसे ठहर जाता,
जब प्रभु विश्राम को अपनाता।

वे सिखाते—शक्ति का अर्थ अभिमान नहीं,
सेवा से बढ़कर कोई सम्मान नहीं।
जो सबका दुःख अपने ऊपर ले ले,
वही सच्चा भगवान कहलाए भले।

दिन बीतते हैं प्रेम की प्रतीक्षा में,
भक्त डूबे रहते हैं आराधना में।
हर हृदय बस यही पुकार लगाता,
"प्रभु, अब दर्शन का समय कब आता?"

फिर आता नवयौवन दर्शन का दिन,
खिल उठता हर भक्त का मन।
नवीन आभा, अनुपम मुस्कान,
जगमग हो उठता सारा धाम।

रथयात्रा का मंगल समय आता,
जग का नाथ सबको गले लगाता।
ज्वर लीला बन जाती मधुर कहानी,
जिसमें छिपी है प्रभु की अमृत वाणी।

हे जगन्नाथ! तुम दया के सागर,
भक्तों के जीवन के सच्चे पथप्रदर्शक।
हमारे मन से अहंकार मिटा देना,
प्रेम और सेवा का दीप जला देना।

तुम्हारी ज्वर लीला यही बताती,
ईश्वर हर पीड़ा को अपनाते।
जो श्रद्धा से तुम्हारा नाम धरे,
उसके जीवन में सुख के दीप जलें।

जय नीलाचल के नाथ दयालु,
जय भक्तवत्सल, कृपालु।
हर हृदय में तुम्हारा वास रहे,
हर जीवन में तुम्हारा प्रकाश रहे।
जय जगन्नाथ!

प्रभु जगन्नाथ के दारु रूप पर कविता(लगभग 322 शब्द)हे दारु-ब्रह्म, जग के नाथ,तेरी महिमा सबसे है साथ।नीम की पावन लकड़ी में,...
04/08/2026

प्रभु जगन्नाथ के दारु रूप पर कविता

(लगभग 322 शब्द)

हे दारु-ब्रह्म, जग के नाथ,
तेरी महिमा सबसे है साथ।
नीम की पावन लकड़ी में,
बसता है अनंत प्रभु का प्रकाश।

न पत्थर, न स्वर्ण का श्रृंगार,
फिर भी तू है सबसे महान।
तेरे गोल-गोल करुणामय नयन,
देखते सारा यह संसार।

अधूरे से दिखते तेरे अंग,
पर पूर्ण है तेरा दिव्य रंग।
जो भी तेरी शरण में आए,
जीवन का हर दुःख मिट जाए।

नीलाचल का पावन धाम,
गूँज उठे तेरा पावन नाम।
"जय जगन्नाथ" की मधुर पुकार,
भर दे मन में प्रेम अपार।

रथ पर बैठकर जब तू आता,
हर भक्त का भाग्य जगाता।
राजा-रंक का भेद मिटाकर,
सबको अपने गले लगाता।

तेरे महाप्रसाद की महिमा,
मिटा दे मन की हर गरिमा।
एक कण भी अमृत बन जाए,
भक्त का जीवन धन्य हो जाए।

दया, प्रेम और सत्य का सागर,
तू ही जग का है उद्धारक।
तेरी मुस्कान देती आशा,
हर हृदय में भरती भाषा।

हे दारु रूप के दिव्य स्वामी,
तेरी लीला सबसे न्यारी।
लकड़ी में भी ब्रह्म समाया,
यही जग को तूने समझाया।

जब-जब मन हो जाए व्याकुल,
तेरा स्मरण करे यह आकुल।
तेरी कृपा की शीतल छाया,
हर संकट से पार लगाया।

हे पुरुषोत्तम, विश्व-वंद्य,
तेरा यश है सदा अनंत।
दीनों के तुम सच्चे सहारे,
भक्तों के जीवन के तारे।

तेरा दारु रूप सिखाता है,
ईश्वर रूप नहीं, भाव निभाता है।
जहाँ प्रेम, करुणा और विश्वास,
वहीं बसता है तेरा निवास।

हे जगन्नाथ, स्वीकार करो,
भक्ति का यह छोटा उपहार।
जीवन भर बस यही प्रार्थना—
रहे चरणों में मेरा संसार।

03/08/2026

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