04/08/2026
प्रभु जगन्नाथ की ज्वर लीला
स्नान पूर्णिमा का पावन दिन था,
नीलाचल धाम दिव्यता से भरा था।
एक सौ आठ कलशों के पवित्र जल से,
प्रभु जगन्नाथ का अभिषेक हुआ प्रेम से।
शीतल जल की धारा तन पर आई,
तब प्रभु ने ज्वर की लीला रचाई।
जो सृष्टि के पालनहार कहलाते हैं,
वे भी मानव भाव अपनाते हैं।
यह रोग नहीं, करुणा का संदेश है,
हर भक्त के जीवन का उपदेश है।
दुख और पीड़ा से मत घबराना,
हर अँधेरे के बाद है उजियारा आना।
अनसर गृह में प्रभु विश्राम करते,
दैतापति प्रेम से सेवा में रहते।
औषधि, जड़ी-बूटी और पथ्य भोग,
भक्ति से भर जाता हर एक योग।
मंदिर का आँगन शांत दिखाई देता,
भक्तों का मन विरह में रोता रहता।
दर्शन की आशा आँखों में सजती,
हर साँस में "जय जगन्नाथ" बसती।
माँ लक्ष्मी की चिंता भी निराली,
बलभद्र और सुभद्रा की रखवाली।
पूरा नीलाचल जैसे ठहर जाता,
जब प्रभु विश्राम को अपनाता।
वे सिखाते—शक्ति का अर्थ अभिमान नहीं,
सेवा से बढ़कर कोई सम्मान नहीं।
जो सबका दुःख अपने ऊपर ले ले,
वही सच्चा भगवान कहलाए भले।
दिन बीतते हैं प्रेम की प्रतीक्षा में,
भक्त डूबे रहते हैं आराधना में।
हर हृदय बस यही पुकार लगाता,
"प्रभु, अब दर्शन का समय कब आता?"
फिर आता नवयौवन दर्शन का दिन,
खिल उठता हर भक्त का मन।
नवीन आभा, अनुपम मुस्कान,
जगमग हो उठता सारा धाम।
रथयात्रा का मंगल समय आता,
जग का नाथ सबको गले लगाता।
ज्वर लीला बन जाती मधुर कहानी,
जिसमें छिपी है प्रभु की अमृत वाणी।
हे जगन्नाथ! तुम दया के सागर,
भक्तों के जीवन के सच्चे पथप्रदर्शक।
हमारे मन से अहंकार मिटा देना,
प्रेम और सेवा का दीप जला देना।
तुम्हारी ज्वर लीला यही बताती,
ईश्वर हर पीड़ा को अपनाते।
जो श्रद्धा से तुम्हारा नाम धरे,
उसके जीवन में सुख के दीप जलें।
जय नीलाचल के नाथ दयालु,
जय भक्तवत्सल, कृपालु।
हर हृदय में तुम्हारा वास रहे,
हर जीवन में तुम्हारा प्रकाश रहे।
जय जगन्नाथ!