03/06/2026
प्रभु जगन्नाथ की अनंत शरण
गरजते सागर की लहरों में, जब भय ने रूप दिखाया,
चारों ओर अंधियारा छाया, संकट ने मन घबराया।
तब नभ से एक दिव्य प्रकाश, जग को राह दिखाने आया,
नीलवर्ण प्रभु जगन्नाथ ने अपना करुण रूप सजाया।
विशाल स्वरूप धारण करके, सागर मध्य विराजे हैं,
भक्तों की रक्षा करने को, दोनों कर फैलाए हैं।
उनकी पावन हथेलियों में, एक परिवार समाया है,
जैसे जग का हर दुख उनका अपना ही बन आया है।
माता की आँखों में आँसू, बच्चों के मन में डर भारी,
किन्तु प्रभु की छाया पाकर, मिट गई सारी लाचारी।
वृद्ध पिता भी आश्वस्त हुए, जब प्रभु ने उन्हें थामा,
भक्ति के उस अमृत क्षण में, मिला सभी को सच्चा धाम।
पीछे खड़ा श्रीमंदिर पावन, गौरव की गाथा गाता है,
जगन्नाथ का दिव्य संदेश, हर हृदय तक पहुँचाता है।
जो भी उनकी शरण में आए, कभी न वह निराश रहे,
प्रेम, दया और विश्वासों से उसका जीवन खास रहे।
सागर की ऊँची लहरें भी, उनके आगे झुक जाती हैं,
प्रभु की इच्छा के सम्मुख, सारी शक्तियाँ रुक जाती हैं।
वे ही रक्षक, वे ही पालक, वे ही जीवन आधार हैं,
उनके चरणों में बसते सारे जग के शुभ संस्कार हैं।
जब-जब संकट घोर बढ़ेगा, जब मन आशा खो बैठेगा,
तब-तब जग का नाथ हमारा, हाथ पकड़कर साथ चलेगा।
करुणा जिनकी सीमा रहित, प्रेम जिनका अपार है,
ऐसे दीनबंधु जगन्नाथ को शत-शत बार नमस्कार है।
हे नाथ, हमें भी शक्ति देना, सेवा का सुंदर वरदान,
हर प्राणी में देख सकें हम, आपका ही दिव्य सम्मान।
जब तक साँसें चलती जाएँ, नाम तुम्हारा गाते रहें,
जगन्नाथ प्रभु की महिमा से जीवन अपना सजाते रहें।॥