31/12/2025
“हर बच्चा माँ के गर्भ से बाहर आते समय इतना कष्ट क्यों देता है? और हर बच्चा जन्म लेते ही रोता क्यों है? यदि तुम इन छोटी-छोटी बातों को गहराई से देखो, तो जीवन के बड़े रहस्य प्रकट हो सकते हैं।
बच्चा गर्भ से बाहर आने का विरोध करता है, क्योंकि वही उसका घर रहा है। वह किसी कैलेंडर को नहीं जानता। नौ महीने उसके लिए लगभग अनंतकाल हैं—जैसे सदा-सदा। जब से उसने अपने होने को जाना है, वह हमेशा गर्भ में ही रहा है।
अब अचानक उसका घर उससे छीना जा रहा है। उसे बाहर फेंका जा रहा है, निष्कासित किया जा रहा है; वह अपनी पूरी शक्ति से इसका विरोध करता है। वह गर्भ से चिपक जाता है—यही समस्या है। माँ चाहती है कि बच्चा जल्दी पैदा हो जाए, क्योंकि जितनी देर वह भीतर रहेगा, उतना ही अधिक कष्ट उसे सहना पड़ेगा। लेकिन बच्चा चिपका रहता है, और वह हमेशा रोता हुआ ही जन्म लेता है—हर बच्चा, बिना किसी अपवाद के।
हर बच्चा रोता हुआ क्यों जन्म लेता है? क्योंकि उसका घर छूट रहा है, उसकी पूरी दुनिया नष्ट हो रही है। अचानक वह अपने आप को एक अजनबी दुनिया में, अजनबी लोगों के बीच पाता है। और वह रोता ही रहता है, क्योंकि हर दिन उसकी स्वतंत्रता कम होती जाती है और उसकी ज़िम्मेदारियाँ बोझिल होती जाती हैं। अंततः वह पाता है कि अब कोई स्वतंत्रता नहीं बची, केवल कर्तव्य हैं, ज़िम्मेदारियाँ हैं—उसे ढोना है, निभाना है। वह बोझ ढोने वाला पशु बन जाता है।
निर्दोष आँखों की स्पष्टता से यदि वह यह सब देख ले और रो पड़े, तो तुम उसे दोष नहीं दे सकते।
मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि सत्य की खोज, ईश्वर की खोज, स्वर्ग की खोज—असल में गर्भ में बच्चे के अनुभव पर आधारित है। वह उसे भूल नहीं पाता। भले ही वह चेतन मन से उसे भूल जाए, लेकिन वह अनुभव उसके अचेतन में गूंजता रहता है। वह फिर से उन सुंदर दिनों की तलाश में है—जहाँ पूर्ण विश्राम था, कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी, और सारी स्वतंत्रता उपलब्ध थी।
और कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने उसे फिर से पा लिया है। मैं उसे ‘प्रबुद्धता’ कहता हूँ। तुम कोई भी शब्द चुन सकते हो, लेकिन उसका मूल अर्थ वही रहता है। तब मनुष्य पाता है कि पूरा ब्रह्मांड उसके लिए माँ के गर्भ जैसा ही है—वह भरोसा कर सकता है, विश्राम कर सकता है, आनंदित हो सकता है, गा सकता है, नृत्य कर सकता है। उसके पास अमर जीवन है और सार्वभौमिक चेतना है।”