29/06/2026
पुरी धाम की उस पवित्र सुबह में सब कुछ हमेशा की तरह था। मंदिर की घंटियां बज रही थीं। शंखों की ध्वनि गूंज रही थी। भक्तों की लंबी कतारें भगवान जगन्नाथ के दर्शन के लिए खड़ी थीं। उन्हीं भक्तों में एक व्यक्ति था—सेठ धनश्याम। पूरे नगर में उसकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। विशाल हवेली, सोने-चांदी के बर्तन, नौकर-चाकर, अनाज के भरे गोदाम। धन की कोई कमी नहीं थी। हर सुबह वह बड़े ठाठ से मंदिर आता। रेशमी वस्त्र पहनता, माथे पर बड़ा तिलक लगाता और भगवान जगन्नाथ के चरणों में सोने के सिक्के चढ़ाता। लोग उसे देखकर कहते, “वाह! कितना बड़ा भक्त है।” लेकिन एक सच्चाई ऐसी थी जो केवल जगन्नाथ जी जानते थे। सेठ रोज मंदिर आता था, पर किसी गरीब की मदद कभी नहीं करता था। मंदिर के बाहर बैठे भूखे भिखारियों को देखकर वह मुंह फेर लेता। कोई वृद्ध भोजन मांगता तो कहता, “काम क्यों नहीं करते?” कोई बच्चा रोटी मांगता तो नौकरों से उसे दूर हटवा देता। उसके लिए भक्ति केवल मंदिर तक सीमित थी, इंसानियत उसके दिल तक पहुंची ही नहीं थी।
एक दिन मंदिर के मुख्य पुजारी ने कथा सुनाते हुए कहा, “सुनो भक्तों, भगवान केवल फूल और धन से प्रसन्न नहीं होते। उन्हें सबसे प्रिय दया और सेवा है।” सब लोग ध्यान से सुन रहे थे। लेकिन सेठ मन ही मन मुस्कुरा रहा था। उसने सोचा, “मेरे जितना दान कौन देता है? भगवान मुझसे अवश्य प्रसन्न होंगे।” उसी समय गर्भगृह में बैठे जगन्नाथ जी अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से सेठ को देख रहे थे। उनके अधरों पर हल्की मुस्कान आई। मानो कह रहे हों, “धनश्याम, अब समय आ गया है कि तुम्हें सच्ची भक्ति का अर्थ समझाया जाए।”
उस दिन शाम को तेज बारिश शुरू हो गई। आसमान में काले बादल छा गए। बिजली चमक रही थी। लोग अपने-अपने घरों में दुबक गए। उधर सेठ अपनी हवेली में बैठा गरम-गरम पकवान खा रहा था। चांदी की थाली में पूरी, कचौड़ी, मिठाइयां, खीर सब सजा था। तभी हवेली के मुख्य द्वार पर दस्तक हुई। एक नौकर दौड़कर गया। बाहर एक बूढ़ा साधु खड़ा था। भीगे हुए कपड़े, हाथ में कमंडल, आंखों में थकावट। उसने folded hands करके कहा, “बेटा, कई दिनों से भूखा हूं। थोड़ा भोजन मिल जाए तो प्रभु तुम्हारा भला करेंगे।”
नौकर अंदर गया और सेठ को बताया। सेठ ने मुंह बनाते हुए कहा, “अभी-अभी तो खाना लगा है। हर रोज कोई ना कोई मांगने आ जाता है। कह दो आगे बढ़े।” नौकर ने बाहर जाकर वही बात कह दी। लेकिन साधु शांत स्वर में बोला, “बेटा, बहुत भूख लगी है। थोड़ा सा प्रसाद ही दे दो।” सेठ खुद गुस्से में बाहर आया। बोला, “अरे बाबा, मंदिर जाओ। वहां प्रसाद मिलेगा। यहां कोई धर्मशाला नहीं चल रही। जाओ आगे।” साधु ने एक बार उसकी आंखों में देखा। उस नजर में अजीब करुणा थी। फिर मुस्कुराकर बोला, “ठीक है बेटा। जैसा तुम्हारा मन।” और धीरे-धीरे बारिश में आगे बढ़ गया।
सेठ वापस अंदर आ गया। उसने फिर खाना शुरू किया। लेकिन पता नहीं क्यों आज भोजन में स्वाद नहीं आ रहा था। खीर फीकी लग रही थी। मिठाई बेस्वाद लग रही थी। उसने गुस्से में थाली हटा दी। रात हुई। वह सोने चला गया। लेकिन नींद बेचैन थी। आधी रात को अचानक उसके कमरे में तेज प्रकाश फैल गया। हवा में चंदन और फूलों की दिव्य सुगंध भर गई। सेठ घबराकर उठा। सामने देखा तो उसका शरीर कांपने लगा। साक्षात भगवान जगन्नाथ उसके सामने खड़े थे। वही विशाल आंखें, वही मधुर मुस्कान, वही दिव्य तेज। सेठ तुरंत बिस्तर से उतरकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा। बोला, “प्रभु! आप स्वयं मेरे घर?” जगन्नाथ जी की आंखों में करुणा थी, पर चेहरे पर हल्की उदासी भी थी।
भगवान धीरे से बोले, “धनश्याम, तुम रोज मुझे सोना चढ़ाते हो। बड़े-बड़े भोग लगाते हो। लेकिन आज तुमने मुझे भूखा लौटा दिया।” सेठ चौंक गया। बोला, “प्रभु! मैंने तो आज आपके लिए विशेष भोग चढ़ाया था।” जगन्नाथ जी बोले, “मैं वही साधु बनकर तुम्हारे द्वार पर आया था। मुझे भूख लगी थी। मैंने तुमसे भोजन मांगा। लेकिन तुमने मुझे लौटा दिया।” यह सुनते ही सेठ के पैरों तले जमीन खिसक गई। उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। वह कांपती आवाज में बोला, “प्रभु, मैं आपको पहचान नहीं पाया।” भगवान बोले, “भक्ति केवल मंदिर में सिर झुकाने से पूरी नहीं होती। सच्ची भक्ति तब होती है जब किसी भूखे को भोजन, किसी दुखी को सहारा और किसी गरीब को सम्मान दिया जाए। जो इंसान में मुझे नहीं देखता, वह मंदिर में भी मुझे नहीं पा सकता।”
इतना कहकर भगवान का स्वरूप धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन होने लगा। जाते-जाते उन्होंने कहा, “याद रखो धनश्याम, मैं पत्थर की मूर्ति में कम, भूखे इंसान की आंखों में ज्यादा रहता हूं।” और फिर पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया। सेठ हांफता हुआ उठ बैठा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था। सुबह होते ही वह दौड़ता हुआ मंदिर पहुंचा। गर्भगृह में जाकर भगवान के चरणों में गिर पड़ा और फूट-फूटकर रोने लगा। पुजारी और भक्त हैरान थे। सेठ बार-बार कह रहा था, “प्रभु मुझे क्षमा कर दो। मैं अंधा था।”
उस दिन के बाद धनश्याम पूरी तरह बदल गया। उसने अपनी हवेली के बाहर रोज अन्नदान शुरू किया। कोई भूखा उसके दरवाजे से खाली नहीं लौटता था। वह खुद अपने हाथों से गरीबों को भोजन परोसता। मंदिर जाने से पहले वह जरूरतमंदों की सेवा करता। लोग हैरान थे कि इतना घमंडी सेठ अचानक इतना विनम्र कैसे हो गया। लेकिन सेठ हर बार मुस्कुराकर केवल इतना कहता, “जिस दिन मैंने भगवान को भूखा लौटा दिया था, उसी दिन मुझे सच्ची भक्ति समझ आई।”
कहते हैं, कुछ महीनों बाद वही बूढ़ा साधु फिर एक दिन मंदिर के बाहर दिखाई दिया। इस बार सेठ दौड़कर उनके चरणों में गिर पड़ा। आंखों में आंसू भरकर बोला, “प्रभु, इस बार मुझे सेवा का अवसर दीजिए।” साधु मुस्कुराए। उनकी आंखों में वही दिव्य चमक थी। उन्होंने सेठ के सिर पर हाथ रखा और अगले ही पल भीड़ में कहीं गायब हो गए। सेठ समझ चुका था—उसके कालिया ठाकुर फिर उसे दर्शन देकर चले गए।
तब से पुरी धाम में एक बात बड़े प्रेम से कही जाती है—भगवान जगन्नाथ को केवल बड़े मंदिर और सोने के भोग प्रिय नहीं हैं। उन्हें सबसे प्रिय है एक दयालु हृदय। क्योंकि जहां किसी भूखे को भोजन मिलता है, जहां किसी दुखी को सहारा मिलता है, वहीं साक्षात जगन्नाथ निवास करते हैं। जय जगन्नाथ🙏