23/06/2026
उत्तर प्रदेश की राजनीति में हाल ही में "कोइरी भगाओ, मऊ बचाओ" जैसे विभाजनकारी नारों का सामने आना बेहद चिंताजनक और निंदनीय है इस प्रकार की संकीर्ण मानसिकता न केवल हमारे संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है, बल्कि समाज के ताने-बाने को भी कमजोर करती है।लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में रहने, बसने और कार्य करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। किसी भी विशेष जाति, वर्ग या समुदाय को किसी जिले या शहर से बाहर निकालने की बात करना सीधे तौर पर संविधान की मूल भावना का उल्लंघन है। मऊ जैसे ऐतिहासिक और विविध संस्कृतियों वाले शहर में इस तरह की भाषा का प्रयोग सामाजिक सौहार्द के लिए एक बड़ा खतरा है।भाईचारे और एकता पर प्रहारहमारा समाज सदियों से विभिन्न जातियों, धर्मों और समुदायों के आपसी सहयोग से आगे बढ़ा है। कोइरी (मौर्य/कुशवाहा/शाक्य) समुदाय समाज का एक मेहनतकर्म और अभिन्न हिस्सा है, जिसने राष्ट्र निर्माण और स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। किसी एक वर्ग को निशाना बनाकर ऐसे उन्मादी नारे लगाना समाज में अविश्वास, घृणा और द्वेष की खाई को गहरा करता है विकास के बजाय संकीर्ण राजनीतिराजनीति और जन-प्रतिनिधित्व का मुख्य आधार विकास, जनहित और सभी को साथ लेकर चलना होना चाहिए। लेकिन जब मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए जातिगत और विभाजनकारी हथकंडे अपनाए जाते हैं, तो इससे पूरे क्षेत्र का विकास बाधित होता है। ऐसे नारों का समर्थन करने वाले स्वार्थी तत्व अक्सर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने के लिए आम जनता को आपस में लड़ाने का काम करते हैं।निष्कर्ष और आवश्यक कदम"कोइरी भगाओ, मऊ बचाओ" जैसे जातिवादी नारों का पुरजोर विरोध किया जाना चाहिए। यह समय की मांग है कि प्रबुद्ध नागरिक और आम जनता ऐसे नफरत फैलाने वाले असामाजिक तत्वों की पहचान करें और उन्हें खारिज करें। प्रशासन को भी चाहिए कि ऐसे मामलों में त्वरित और सख्त कार्रवाई करे ताकि समाज में शांति, भाईचारा और कानून का राज कायम रह सके। मऊ को किसी जाति विशेष से नहीं, बल्कि सभी के आपसी प्रेम, सम्मान और विकास से बचाया और आगे बढ़ाया जा सकता है।