15/03/2026
विष पान की कथाप्राचीन काल में देवता और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। मंदराचल पर्वत को मथनी बनाया और वासुकि नाग को रस्सी। मंथन से पहले हलाहल नामक भयंकर विष निकला, जो सृष्टि को भस्म करने लगा। समस्त जगत व्याकुल हो गया।देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु से प्रार्थना की, किंतु वे असमर्थ। तब भगवान शिव प्रकट हुए। वे जानते थे कि विष का प्रभाव केवल वे ही सह सकते हैं। शिव ने अपनी जटाओं से गंगा को बुलाया, विष को हथेली पर लिया और एक घूँट में पी लिया। विष उनके कंठ को नीला कर गया, इसलिए वे 'नीलकंठ' कहलाए।पर शिव ने विष को पेट तक नहीं जाने दिया। अपनी योग शक्ति से उसे कंठ में ही रोक लिया। इससे जगत की रक्षा हुई। देवता-ासुर आनंदित हो गए। अमृत भी निकला, किंतु शिव की महिमा सर्वोपरि रही।इस कथा से सीख: शिव का त्याग और करुणा अनंत है। वे संहार के देव हैं, किंतु रक्षक भी।