16/02/2026
हिल जाएगी सृष्टि, अगर पड़ी संत की दृष्टि
जहां तक स्मरण और शास्त्रीय परंपराओं का प्रश्न है, हठयोग केवल शरीर का अभ्यास नहीं, बल्कि चेतना की वह साधना है जिससे साधक स्वयं के साथ प्रकृति और समस्त सृष्टि के सूक्ष्म संबंध को अनुभव करता है। कहा जाता है कि जब संत अपनी तपस्या, संकल्प और कोपदृष्टि के माध्यम से धर्म की रक्षा के लिए खड़े होते हैं, तो उसका प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि युग और व्यवस्था तक को झकझोर देता है।
संत करपात्री महाराज जैसे महापुरुषों का जीवन इस बात का प्रमाण रहा है कि संत केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शक नहीं, बल्कि समाज और सनातन मूल्यों के प्रहरी भी होते हैं। परंपराओं में उल्लेख मिलता है कि गोपाष्टमी जैसे पवित्र अवसरों पर संतों के संकल्प और चेतावनी ने अधर्म और अन्याय के प्रतीकों को समाप्त होते देखा है।
यह भी एक निर्विवाद सत्य है कि मंदिर, तालाब, प्रकृति, ओरण और गोचर ये केवल भौतिक धरोहर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक आत्मा के प्रतीक हैं। इनका संरक्षण केवल शासन की नीतियों से नहीं, बल्कि संतों की तपस्या, समाज की आस्था और परंपरा की चेतना से संभव हुआ है। अनेक स्थानों पर
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