04/02/2026
गरिमा गृह के नाम पर अपमान! राज्यपाल के उद्घाटन से पहले बदहाली उजागर, प्रशासन गहरी नींद में
-प्रधानमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट पर लापरवाही का दाग, वीवीआईपी आगमन से पहले ही खुल गई सिस्टम की पोल
बस्ती।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट—किन्नर समाज को सम्मान, सुरक्षा और आत्मनिर्भरता प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू किया गया गरिमा गृह आज बस्ती जनपद में प्रशासनिक लापरवाही का शिकार होता नजर आ रहा है। जिस योजना का उद्देश्य समाज के सबसे उपेक्षित वर्ग को गरिमापूर्ण जीवन देना है, उसी गरिमा गृह तक पहुँचने का रास्ता खुद अपमान और अव्यवस्था की तस्वीर पेश कर रहा है।
इस महत्त्वपूर्ण सामाजिक जिम्मेदारी को बस्ती जनपद में इन्दिरा चैरिटेबल सोसायटी को सौंपा गया है। सोसायटी लगातार किन्नर समाज को हुनरमंद बनाने, रोजगार उपलब्ध कराने और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए प्रयासरत है। बीते दिनों कप्तानगंज स्थित केंद्रीय कार्यालय पर उत्तर प्रदेश की राज्यपाल महामहिम आनंदी बेन पटेल का आगमन हुआ था। राज्यपाल ने इंदिरा चैरिटेबल सोसायटी के कार्यों की खुले मंच से सराहना की और हुनरमंद किन्नरों के लिए संचालित गरिमा गृह एवं कार्यशाला का अवलोकन भी किया।
इसी क्रम में 10 फरवरी को महामहिम द्वारा बस्ती जनपद के गरिमा गृह के उद्घाटन का कार्यक्रम प्रस्तावित है। यह आयोजन न केवल बस्ती बल्कि पूरे पूर्वांचल के लिए गौरव का विषय होना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कार्यक्रम से पहले ही जिला प्रशासन और नगर पालिका की संवेदनहीनता उजागर हो चुकी है।
साकेत पुरी, नेवुलुवा ताल क्षेत्र में स्थित गरिमा गृह तक पहुँचने वाला मार्ग बदहाल स्थिति में है। उद्घाटन स्थल तक पहुँचने के लिए महामहिम को लगभग 50 मीटर पैदल चलकर गुजरना होगा जहां टूटी इंटरलॉकिंग सड़क, उखड़ी ईंटें, बजबजाती नालियां और फैली गंदगी प्रशासन की कार्यशैली पर करारा तमाचा है। सवाल यह नहीं कि राज्यपाल वहां जाएंगी या नहीं, सवाल यह है कि आम नागरिक रोज इसी रास्ते से कैसे गुजरता होगा?
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिला प्रशासन और नगर पालिका को पिछले छह महीनों से राज्यपाल के प्रस्तावित आगमन की जानकारी थी। इसके बावजूद न तो सड़क दुरुस्त की गई, न नालियों की सफाई हुई, न ही बिजली-पानी जैसी बुनियादी सुविधाओं पर ध्यान दिया गया। क्या प्रशासन किसी वीवीआईपी के आने तक इंतजार करता है, तभी विकास की फाइलें खुलती हैं?
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि राज्यपाल का कार्यक्रम न होता, तो शायद यह इलाका यूं ही बदहाली में पड़ा रहता। नगर पालिका और जिला प्रशासन की यह लापरवाही यह सवाल खड़ा करती है कि क्या आम जनता की समस्याएं किसी अधिकारी की प्राथमिकता में नहीं हैं?
सूत्रों की मानें तो जिला प्रशासन कभी भी इन्दिरा चैरिटेबल सोसायटी के सीईओ अजय पाण्डेय से संपर्क कर कार्यक्रम की रूपरेखा को लेकर बैठक कर सकता है। यह भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि अंतिम समय में प्रशासन रातों-रात सड़क पर बालू डालकर मैट बिछा दे, नालियों को अस्थायी रूप से ढक दे या जल्दबाजी में अधूरा निर्माण कराकर औपचारिकता निभा दे। लेकिन सवाल यह है कि क्या यही विकास है? क्या यही सुशासन का मॉडल है?
गरिमा गृह जैसे सामाजिक सरोकार से जुड़े प्रोजेक्ट के साथ यह लापरवाही केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाती है। जिस योजना का उद्देश्य किन्नर समाज को सम्मान देना है, उसी योजना के उद्घाटन स्थल तक पहुँचने का रास्ता अपमानजनक स्थिति में होना, सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
यक्ष प्रश्न यह है कि बिजली, पानी, सड़क और नाली जो हर नागरिक का मौलिक अधिकार है क्या उसे पाने के लिए बस्ती की जनता को हर बार किसी वीवीआईपी के आगमन का इंतजार करना पड़ेगा? क्या प्रशासन में इतनी भी नैतिक जिम्मेदारी नहीं बची कि वह बिना दबाव के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे?
बस्ती जनपद के कई मोहल्ले आज भी बदहाल सड़कों, जाम नालियों और पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। जनता पूछ रही है कि कितने मोहल्लों में राज्यपाल, मुख्यमंत्री या मंत्री जाएंगे, तभी वहां की दशा सुधरेगी? क्या विकास केवल फोटो सेशन और उद्घाटन तक ही सीमित रह गया है?
अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और नगर पालिका पर टिकी हैं। देखना यह है कि क्या वे समय रहते नींद से जागते हैं या फिर यह महत्वपूर्ण आयोजन भी प्रशासनिक लापरवाही की भेंट चढ़ जाता है। गरिमा गृह का उद्घाटन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज के प्रति प्रशासन की सोच और संवेदना की परीक्षा है।
यदि इस परीक्षा में प्रशासन फिर फेल होता है, तो यह सिर्फ एक रास्ते या नाली की कहानी नहीं होगी बल्कि पूरे सिस्टम पर लगा एक और बदनुमा दाग होगा।