24/05/2026
नेपाल की रोमांचक और जोखिम भरी यात्रा — ऐसा सफर जिसे आँखें आज भी भूल नहीं पातीं
सुबह का धुंधलका अभी पूरी तरह छंटा भी नहीं था कि बस्ती की सड़कों पर मेरी सुपर स्प्लेंडर की हल्की गड़गड़ाहट गूंज उठी। हवा में हल्की ठंडक थी और मन में एक अजीब सा रोमांच। मंज़िल थी — नेपाल के प्यूठान जिले की सबसे ऊँची पहाड़ी पर स्थित भगवान भोलेनाथ का पावन धाम “प्रभुनाथ मंदिर”, जिसे लोग श्रद्धा से स्वर्गद्वारी भी कहते हैं।
करीब 550 किलोमीटर की यह पूरी यात्रा सिर्फ दूरी नहीं थी, बल्कि डर, रोमांच, आस्था और साहस का जीवंत अनुभव बनने वाली थी।
बस्ती से निकलकर मैं नौगढ़ के सनई चौराहे से होते हुए शोहरतगढ़ तहसील पहुंचा। सड़क पर सुबह की हलचल धीरे-धीरे बढ़ रही थी। चाय की दुकानों से उठती भाप और ताज़े पकौड़ों की खुशबू सफर को और भी जीवंत बना रही थी। कुछ ही देर में मैं खुनवा बॉर्डर पहुंच गया।
सीमा पर नेपाल पुलिस और भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की जांच प्रक्रिया चल रही थी। मोटरसाइकिल के कागजात, ड्राइविंग लाइसेंस, हेलमेट और आरसी की जांच के बाद नेपाली “भंसार” प्रक्रिया पूरी करनी पड़ी। छोटे से कार्यालय में खिड़की के पीछे बैठे कर्मचारी ने 400 नेपाली रुपये शुल्क जमा कराया और दो दिन की अनुमति थमा दी। वह छोटी सी पर्ची मानो रोमांच के दरवाज़े की चाबी बन गई।
नेपाल में प्रवेश करते ही दृश्य बदलने लगे। सड़क किनारे नेपाली भाषा के बोर्ड, अलग पहनावा, अलग बोली और पहाड़ियों से उतरती ठंडी हवा एक नए देश में होने का एहसास करा रही थी।
तौलियाहवा बाजार पहुंचते ही भीड़भाड़ और चहल-पहल दिखाई दी। दुकानों के बाहर रंग-बिरंगे फल, नेपाली मसाले और पहाड़ी लोगों की मुस्कुराहटें मन मोह रही थीं। इसके बाद रास्ता धीरे-धीरे जंगलों की ओर मुड़ गया। ऊँचे-ऊँचे साल के पेड़, घुमावदार सड़कें और बीच-बीच में सुनाई देती पक्षियों की आवाजें ऐसा एहसास करा रही थीं मानो कोई फिल्मी दृश्य चल रहा हो।
कुछ घंटों बाद मैं गोरूसिंगी पहुंचा। यह नेपाल का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जहां से देश के कई धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के लिए गाड़ियां मिलती हैं। यहां चाय पीते हुए मैंने पहाड़ों की तरफ देखा — बादलों से ढकी चोटियां जैसे दूर से बुला रही थीं।
इसके बाद यात्रा चंद्रौटा की ओर बढ़ी। यहां तक सड़क सामान्य थी, लेकिन जैसे ही डांग जिले की तरफ बढ़ा, अचानक हिमालय की पहाड़ियां सामने आ खड़ी हुईं। सड़क अब संकरी होने लगी थी। एक तरफ ऊँची चट्टानें और दूसरी तरफ गहरी खाइयां।
मोटरसाइकिल का हर मोड़ अब परीक्षा जैसा लग रहा था।
पहाड़ों के टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते हुए कभी नीचे बहती नदी दिखाई देती, तो कभी बादल इतने करीब आ जाते कि लगता हाथ बढ़ाकर छू लेंगे। हवा अब ठंडी और तेज हो चुकी थी। रास्ते में कहीं-कहीं छोटे नेपाली गांव दिखाई देते, जहां मिट्टी और पत्थरों से बने घर पहाड़ों की गोद में शांत खड़े थे।
शाम होते-होते मैं डांग जिले के चर्चित भालूबांग पहुंचा। यहां से आगे का रास्ता सचमुच डर पैदा करने वाला था। सड़क कई जगह टूटी हुई थी। पहाड़ों को काटकर बनाई गई पतली सड़क पर जरा सी चूक सीधा गहरी खाई में ले जा सकती थी।
भालूबांग से प्यूठान की तरफ बढ़ते हुए करीब 65 किलोमीटर का रास्ता ऐसा था, जहां हर मिनट भगवान का नाम अपने आप जुबान पर आ जाता था।
धीरे-धीरे अंधेरा घिरने लगा और मैं भींगरी पहुंचा। यह वही जगह थी जहां से प्रभुनाथ मंदिर सिर्फ 14 किलोमीटर दूर रह जाता है। यहां होटल और धर्मशालाएं थीं। कई लोगों ने सलाह दी कि रात यहीं रुक जाइए, लेकिन मन अब मंज़िल तक पहुंचने के लिए बेचैन था।
सायं के लगभग 5 बज चुके थे जब मैंने स्वर्गद्वारी की ओर बाइक मोड़ी।
जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था, रास्ता और भी खतरनाक होता जा रहा था। पहाड़ों के किनारे बनी पतली सड़क… बगल में सैकड़ों फीट गहरी खाई… और ऊपर से तेजी से बढ़ता अंधेरा।
एक पल ऐसा भी आया जब मन ने कहा — “वापस लौट चलो…”
लेकिन अगले ही पल भोलेनाथ का स्मरण हुआ और हाथ फिर से बाइक के हैंडल पर मजबूत हो गए।
अब बाइक की हेडलाइट ही रास्ता दिखा रही थी। पहाड़ों की खामोशी इतनी गहरी थी कि मोटरसाइकिल की आवाज दूर-दूर तक गूंज रही थी। कई मोड़ों पर ऐसा लगता कि बस अब रास्ता खत्म हो जाएगा, लेकिन फिर अचानक एक नया मोड़ सामने आ जाता।
महज 14 किलोमीटर का यह सफर लगभग डेढ़ घंटे में पूरा हुआ और आखिरकार मैं मंदिर के नीचे बनी पार्किंग तक पहुंच गया।
बाइक खड़ी करने के बाद ऊपर मंदिर तक जाने वाली सीढ़ियां शुरू हुईं। ठंडी हवा अब और तेज हो चुकी थी। शरीर थक चुका था, लेकिन मन में अद्भुत ऊर्जा थी।
करीब 45 मिनट की लगातार चढ़ाई के बाद अचानक सामने मंदिर दिखाई दिया।
पहाड़ों के बीच, बादलों के करीब, घंटियों की आवाज और “हर-हर महादेव” के जयकारों से गूंजता प्रभुनाथ मंदिर…
उस क्षण सारी थकान जैसे गायब हो गई।
मंदिर परिसर में 150 रुपये भारतीय मुद्रा जमा कर रहने और भोजन की व्यवस्था मिली। रात बेहद ठंडी थी। पहाड़ों पर बहती हवा हड्डियों तक को कंपा रही थी।
सुबह ठीक 4 बजे जब स्नान के लिए पानी हाथ में लिया, तो ऐसा लगा जैसे बर्फ को छू लिया हो। पानी इतना ठंडा था कि शरीर कांप उठा, लेकिन भगवान शिव की भक्ति के आगे सब आसान लग रहा था।
स्नान के बाद मंदिर में आरती और दर्शन का दृश्य मन को अद्भुत शांति दे रहा था। पहाड़ों के बीच उगता सूरज, दूर-दूर तक फैले बादल और मंदिर में गूंजते शंख की आवाज… वह दृश्य आज भी आंखें बंद करते ही सामने आ जाता है।
सुबह 8 बजे मैं वापस भारत के लिए रवाना हुआ। दिनभर फिर उन्हीं दुर्गम पहाड़ियों, घुमावदार रास्तों और खतरनाक मोड़ों को पार करता हुआ रात लगभग 9 बजे बस्ती पहुंचा।
यह सिर्फ एक यात्रा नहीं थी…
यह डर पर जीत, विश्वास की ताकत और भोलेनाथ की कृपा का ऐसा अनुभव था, जिसे शब्दों में पूरी तरह बांध पाना शायद कभी संभव नहीं।