09/05/2026
सत्य की को खोज में बालक सुकरात
बालक सुकरात का जन्म ईसासे ४६९ साल पूर्व यूनानके एथेन्स नगरमें हआ था। उनकी माताका नाम
फिनेरिट था। उनके पिता एफ्रोनिस्कस एक साधारण संगतराश थे। दिनभरकी मेहनत मजदरीसे अपने छोटे-से
परिवारका भरण-पोषण करते थे। उनकी आर्थिक अवस्था अच्छी नहीं थीं। बालक सुकरातने कुछ दिनोंतक
विद्यालय और व्यायामशाला में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त की। संगीत और विज्ञानमें भी उनकी रुचि बढती गयी।
एथेन्स बडे-बडे विद्धानों कलाकारों दार्शनिकों तथा कवियों और संगीतज्ञोंका निवासस्थान था; बालक सकरात
उनके सम्पर्कमें रहना अधिक पसंद करते थे. इसलिये वे दिनमें प्रातःसे संध्यातक उनके दरवाजेपर कई चक्कर
लगाया करते थे। उनके करूप शरीर, चिपटी नाक, बडे नथने, भद्दे मख और बडी-बडी आँखों से लोग अनायास
प्रभावित हो जाते थे। यद्यपि वे गरीब होनेके नाते चिथडे पहनकर नंगे पाँव सारे नगर में घुमा करते थेतो र्भ
उनकी प्रखर प्रतिभा, दार्शनिक गम्भीरता और जिज्ञासा बाल-सुलभ चपलतामें छिपी नहीं रह पाती थी। लोग
उनकी ओर धीरे-धीरे आकष्ट होने ही लगे। बालक सुकरात बड़े सरल और प्रेमी स्वभावके थे। गरीबीके कारण
भखे रहने पर मित्रों के निवास स्थान पर भोजन कर लेनेमें वे तनिक भी संकोच नहीं करते थे।
बालक सुकरात सत्य-चिन्तनमें इतने व्यस्त रहते थे कि उन्हें कई दिनोंतक खाने-पीनेकी भी सधि नहीं रहर्त
थीः उनकी ज्ञान-पिपासा उत्तरोत्तर बढती गयी। एथेन्स छोडकर बाहर जाना उन्हें किसी भी स्थितिमें रुचिकर नही
था जंगलों और बागोंमें तो वे कभी जाते ही नहीं थे। बाल्यकालकी यह मनोव्त्ति उनके निःस्पह तथा गम्भी
भावी दार्शनिक जीवनकी भूमिका थी। बड़ोंका बचपन इसी तरह असाधारण हआ करता है। जहाँ कहीं भी
सडककी पटरी और चौराहेपर वे मनष्योंका जमघट देखते थे, वहीं पहँच जाते थे और ज्ञानकी चर्चा करने लगत
थे।
उनके शिक्षा-गरुका नाम प्राडिक्स था। वे सुकरातको बड़़े स्नेहकी दृष्टिसे देखते थे। एथेन्सके बड़़े-बूढ़े
बालक सुकरातको अपने बच्चोंकी ही तरह प्यार करते थे।
बालक सुकरातको धन और सखके प्रति बड़ी चिढ थीं, उनका मन इन दोनोंसे सदा द्र भागा करता था।
वे असत्यको महापातक मानते थे। द्सरेका अहित-चिन्तन सुकरातकी दृष्टिमें बड़ा भारी अपराध था
उन्हें अपने बाल्यकालमें ऐसा लगा कि परमात्माने उन्हें किसी देवकार्यके पवित्र सम्पादनके लिये ही
धरतीपर भेजा है। निःसंदेह वह देवकार्य सत्यका अनशीलन ही था। वे स्वभावसे ही धार्मिक प्रवत्तिके बालक थे
उन्होंने अपनी अन्तरात्माके प्रतिकल कोई कार्य नहीं किया ।
एक बार वे सडकपर खडे-खडे प्रातःकालसे शामतक कछ सोचते रहे, रातमें भी अविराम गतिसे यही
क्रम चलता रहा। लोग उनसे कछ दर चटाई बिछाकर लेट गये और यह देखते रहे कि यह सोचना कब बन्द
होगा। मेधावी सुकरात रातभर सोचते ही रह गये और दूसरे दिन प्रातःकाल सूर्यको नमस्कार कर वे अपने
निवास-स्थानपर लौट आये। इस घटनासे उनकी साधना और संयमी जीवनका पता लगता है। वास्तवमें वे महान्
विचारशील थे। उन्होंने आगे चलकर स्वीकार किया था कि जब मेैं बालक था. मझे प्रकति क्या है. ईश्वर क्य
है, सृष्टि किस तरह बनती-बिगडती है--इस प्रश्नोंपर विचार करना अच्छा लगता था। एथेन्स नगर ही उनक
विद्यालय था, उसके चलते-फिरते जीव उनके शिक्षक थे। उनका बाल्य-जीवन बहत ही हृदयग्राही और
उत्साहवर्धक है। ' अपने-आपको जानो' यही उनके जीवनका महान ध्येय था।