29/06/2026
एक सवाल जो आशूरा के बाद भी बाकी रह गया....
पहला आशूरा मुकम्मल हुआ। मातम थमा नहीं, केवल समय आगे बढ़ गया। लेकिन जाते-जाते एक मासूम का प्रश्न मन में ठहर गया
“हुसैन कौन थे? और अली कौन थे?”
यह बताना आसान नहीं था कि अली और हुसैन केवल दो नाम नहीं हैं। वे मानव सभ्यता की नैतिक चेतना के शिखर हैं। उनका परिचय किसी मज़हब, किसी फिरके या किसी भूगोल से पूरा नहीं होता। वे
न्याय,
सत्य,
करुणा,
मर्यादा और
आत्मबलिदान के ऐसे मानदंड हैं, जिनकी आवश्यकता हर युग को रहती है।
और उतना ही आवश्यक यह समझना भी है कि यज़ीद भी केवल एक व्यक्ति नहीं था। यज़ीद हर उस विचार का नाम है जो सत्ता को सत्य से ऊपर रखता है, जो भय को न्याय से बड़ा मानता है और जो मनुष्य से उसका विवेक छीन लेता है।
इसीलिए कर्बला चौदह सौ वर्ष पुरानी घटना नहीं है। कर्बला हर उस समय जीवित हो जाती है, जब सत्ता सत्य से टकराती है, जब स्वार्थ इंसानियत पर भारी पड़ता है और जब मौन, अन्याय का साथी बन जाता है।
बहुत से लोग पूछते हैं
“दोनों मुसलमान थे, फिर हमें इससे क्या लेना-देना?”
मेरा उत्तर है,यदि आप केवल धर्म देख रहे हैं, तो आपने कर्बला को देखा ही नहीं।
कर्बला दो व्यक्तियों का संघर्ष नहीं था। वह दो विचारधाराओं का निर्णायक संघर्ष था।
जैसे भगवान श्रीराम और रावण दोनों विद्वान, दोनों शिवभक्त; परंतु
एक मर्यादा का प्रतीक बना और
दूसरा अहंकार का।
अंतर पूजा,पद्धति का नहीं, चरित्र का था।
उसी प्रकार हुसैन और यज़ीद में भी अंतर पहचान का नहीं, बल्कि
ईमान और सत्ता,
सिद्धांत और स्वार्थ,
अंतरात्मा और अहंकार का था।
दुर्भाग्य यह है कि हमने इतिहास के सबसे बड़े नैतिक प्रतीकों को अपने-अपने संकीर्ण खाँचों में बाँट दिया।
श्रीराम को केवल एक धर्म की सीमा में रख दिया, जबकि उनका जीवन सम्पूर्ण मानवता के लिए मर्यादा का आदर्श है।
और अली तथा हुसैन को पहले मुसलमान, फिर शिया-सुन्नी के दायरों में सीमित कर दिया;
जबकि उनका संदेश हर उस इंसान के लिए था जो
न्याय,
करुणा और
सत्य में विश्वास रखता है।
यदि राम केवल हिंदुओं के हैं और हुसैन केवल शियाओं के, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी धर्म का नहीं, मानवता का हुआ है।
आज संसार को किसी नए युद्ध की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है
राम की मर्यादा,
अली के न्याय और
हुसैन के साहस की।
एक वैश्विक समाज तब बनेगा जब हम व्यक्तियों की नहीं, उनके मूल्यों की विरासत को अपनाएँगे।
आशूरा हमें यह नहीं पूछता कि हम किस धर्म में जन्मे हैं।
वह केवल एक प्रश्न छोड़ जाता है
जब सत्य और सत्ता आमने-सामने खड़े हों, तब तुम किसके साथ खड़े हो?
कर्बला का उत्तर तलवारों में नहीं, अंतरात्मा में मिलता है।
यदि आज भी हम अन्याय के सामने मौन हैं, तो यज़ीद केवल इतिहास में नहीं है।
और यदि आज भी हम सत्य, न्याय और मानव गरिमा के पक्ष में खड़े हैं, तो हुसैन केवल कर्बला में नहीं हैं,वे हर उस दिल में जीवित हैं जो ज़ुल्म के सामने झुकना नहीं जानता।
आशूरा समाप्त हुआ है, लेकिन उसका संदेश अमर है।
आइए, अपने-अपने धर्म से पहले अपने भीतर के इंसान को जीवित रखें।
यही कर्बला की विरासत है।
यही हुसैन का पैग़ाम है।
और शायद यही मानवता की सबसे बड़ी उम्मीद है।