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21/07/2026
*"जयपुर के नीलगर रंगरेजों ने चूनड़ी और लहरिया को जग प्रसिद्ध किया"*  *जितेन्द्रसिंहशेखावत*राजस्थान पत्रिका11 जुलाई ,  एक...
12/07/2026

*"जयपुर के नीलगर रंगरेजों ने चूनड़ी और लहरिया को जग प्रसिद्ध किया"*

*जितेन्द्रसिंहशेखावत*
राजस्थान पत्रिका
11 जुलाई ,

एक वो भी समय रहा जब सड़कों पर वाहनों का आज जितना दवाब नहीं था । खाली सड़कों पर कपड़े को रंगने के बाद उसे सुखाते हुए नीलगर और रंगरेज नजर आते ।
रंगी हुई ओढ़नियों, पगड़ी और साफों के दोनों छोर को पकड़े महिला व पुरुष सड़क पर सुखाते नजर आते । नीलगर व रंग रेजों के हाथ भी रंग में रंगे होते।
जयपुर का लहरिया और चूनड़ी को नीलगरों ने ही प्रसिद्ध किया है।
राई के बीज जितनी बारीक बंधेज की चूंदड़ी को रंगने वाले नीलगर रंगरेजों ने जयपुर का नाम ऊंचा किया है।
सवाई जयसिंह ने कपड़ों पर कलात्मक रंगाई करने वाले नीलगरों को आगरा आदि शहरों से बुलाकर रामंगज बाजार में लाडली जी का खुर्रा के नीचे एवं पुरानी बस्ती में मोहन नगर आदि मोहल्लों में बसाया । नीलगरों का नला के नाम से मशहूर मौहल्ले में नीलगरों को मस्जिद भी है।
समाजसेवी उस्मान खान के मुताबिक रंगरेज बिरादरी ने शादी विवाह आदि के समाज सुधार कार्यो में उल्लेखनीय कार्य किया है। नीलगरों के मोहल्ले में झुलसाती गर्मी के बीच बड़े बर्तनों में खौलता रंगीन पानी और नीलगरों का सारा परिवार रंगों में नहाये कपड़ों को सुखाने में मशगुल रहता है। कपड़ा रंगने का काम कई पीढ़ियों से जारी है। वो भी समय रहा जब लहरिया, चुनरी, मोठड़ा, पीले पोमचे, सुआ बेल के पीले परिधानों के प्रति लोगों की दीवानी रही है ।
गणगौर व तीज जैसे त्यौहारों पर पर महिलाएं लहरिया बड़े चाव से ओढ़ती है। हाड़ तोड़ मेहनत से भरपूर कपड़ों पर रंगाई का काम एक कठिन प्रक्रिया है। घर के आदमी कपड़ों की गाठें, रंग, रसायन ईंधन व कच्चे माल का इंतजाम करते हैं । धार्मिक आयोजन में कलाई पर बांधी जाने वाली .मोली का धागा भी तैयार करते हैं । इतिहास के जानकार देवेन्द्र भगत ने बताया कि नीलगर व रंगेरेज समाज के लोग राजघरानों से जुड़े थे । जनानी ड्योढ़ी की शाही महिलाओं के वस्त्रों की रंगाई नीलगर समाज ही करता था । यह समाज आपसी सद्‌भाव को कायम रखता आया है। पुराने समय में प्राकृतिक रंगो का उपयोग होता । इसके लिए कसूले के फूल, हल्दी, राख व कोयला आदि से रंग बनते थे। शेखावाटी और सांगानेरी रंगरेजों का कलात्मक काम बहुत मन भाता है।
( नई पीढ़ी को इतिहास की जानकारी देने के लिए इस स्टोरी को आगे बढ़ाएं)

सेहत के साथ कोई खिलवाड़ नहींइथेनॉल की तर्ज पर दूध की वैरायटी किसानो ने बनाया M0, M20, M50 और M100देखे जयपुर से पूरी रिपो...
09/07/2026

सेहत के साथ कोई खिलवाड़ नहीं
इथेनॉल की तर्ज पर दूध की वैरायटी
किसानो ने बनाया M0, M20, M50 और M100
देखे जयपुर से पूरी रिपोर्ट

इथेनॉल वाले पेट्रोल की तरह जयपुर के पशुपालकों ने लॉन्च किया दूध का ...

29/06/2026

एक सवाल जो आशूरा के बाद भी बाकी रह गया....

पहला आशूरा मुकम्मल हुआ। मातम थमा नहीं, केवल समय आगे बढ़ गया। लेकिन जाते-जाते एक मासूम का प्रश्न मन में ठहर गया

“हुसैन कौन थे? और अली कौन थे?”

यह बताना आसान नहीं था कि अली और हुसैन केवल दो नाम नहीं हैं। वे मानव सभ्यता की नैतिक चेतना के शिखर हैं। उनका परिचय किसी मज़हब, किसी फिरके या किसी भूगोल से पूरा नहीं होता। वे
न्याय,
सत्य,
करुणा,
मर्यादा और
आत्मबलिदान के ऐसे मानदंड हैं, जिनकी आवश्यकता हर युग को रहती है।

और उतना ही आवश्यक यह समझना भी है कि यज़ीद भी केवल एक व्यक्ति नहीं था। यज़ीद हर उस विचार का नाम है जो सत्ता को सत्य से ऊपर रखता है, जो भय को न्याय से बड़ा मानता है और जो मनुष्य से उसका विवेक छीन लेता है।

इसीलिए कर्बला चौदह सौ वर्ष पुरानी घटना नहीं है। कर्बला हर उस समय जीवित हो जाती है, जब सत्ता सत्य से टकराती है, जब स्वार्थ इंसानियत पर भारी पड़ता है और जब मौन, अन्याय का साथी बन जाता है।

बहुत से लोग पूछते हैं

“दोनों मुसलमान थे, फिर हमें इससे क्या लेना-देना?”

मेरा उत्तर है,यदि आप केवल धर्म देख रहे हैं, तो आपने कर्बला को देखा ही नहीं।

कर्बला दो व्यक्तियों का संघर्ष नहीं था। वह दो विचारधाराओं का निर्णायक संघर्ष था।

जैसे भगवान श्रीराम और रावण दोनों विद्वान, दोनों शिवभक्त; परंतु
एक मर्यादा का प्रतीक बना और
दूसरा अहंकार का।

अंतर पूजा,पद्धति का नहीं, चरित्र का था।

उसी प्रकार हुसैन और यज़ीद में भी अंतर पहचान का नहीं, बल्कि
ईमान और सत्ता,
सिद्धांत और स्वार्थ,
अंतरात्मा और अहंकार का था।

दुर्भाग्य यह है कि हमने इतिहास के सबसे बड़े नैतिक प्रतीकों को अपने-अपने संकीर्ण खाँचों में बाँट दिया।

श्रीराम को केवल एक धर्म की सीमा में रख दिया, जबकि उनका जीवन सम्पूर्ण मानवता के लिए मर्यादा का आदर्श है।

और अली तथा हुसैन को पहले मुसलमान, फिर शिया-सुन्नी के दायरों में सीमित कर दिया;
जबकि उनका संदेश हर उस इंसान के लिए था जो
न्याय,
करुणा और
सत्य में विश्वास रखता है।

यदि राम केवल हिंदुओं के हैं और हुसैन केवल शियाओं के, तो सबसे बड़ा नुकसान किसी धर्म का नहीं, मानवता का हुआ है।

आज संसार को किसी नए युद्ध की आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है

राम की मर्यादा,
अली के न्याय और
हुसैन के साहस की।

एक वैश्विक समाज तब बनेगा जब हम व्यक्तियों की नहीं, उनके मूल्यों की विरासत को अपनाएँगे।

आशूरा हमें यह नहीं पूछता कि हम किस धर्म में जन्मे हैं।

वह केवल एक प्रश्न छोड़ जाता है

जब सत्य और सत्ता आमने-सामने खड़े हों, तब तुम किसके साथ खड़े हो?

कर्बला का उत्तर तलवारों में नहीं, अंतरात्मा में मिलता है।

यदि आज भी हम अन्याय के सामने मौन हैं, तो यज़ीद केवल इतिहास में नहीं है।

और यदि आज भी हम सत्य, न्याय और मानव गरिमा के पक्ष में खड़े हैं, तो हुसैन केवल कर्बला में नहीं हैं,वे हर उस दिल में जीवित हैं जो ज़ुल्म के सामने झुकना नहीं जानता।

आशूरा समाप्त हुआ है, लेकिन उसका संदेश अमर है।

आइए, अपने-अपने धर्म से पहले अपने भीतर के इंसान को जीवित रखें।

यही कर्बला की विरासत है।
यही हुसैन का पैग़ाम है।
और शायद यही मानवता की सबसे बड़ी उम्मीद है।

24/06/2026

वेज चिकन पार्टी थी शायद...

कल तक गंगा में इफ्तार करने से जिनकी भावनाएँ आहत हो रही थीं, आज उसी गंगा में चिकन और शराब की पार्टी से किसी की भावनाएँ आहत क्यों नहीं हो रही हैं? शायद इसलिए कि इस बार पार्टी करने वाले दूसरे समुदाय के हैं।

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