26/09/2026
(कृष्ण कुमार)संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर से जुड़े एक कार्यक्रम में उस वक्त माहौल चर्चा का विषय बन गया, जब एक पाकिस्तानी पत्रकार ने भारत और पाकिस्तान से जुड़े मुद्दे पर सवाल करने की कोशिश की। सवाल पूछने का अंदाज भी सुर्खियों में रहा और इसके बाद विदेश मंत्री एस. जयशंकर के जवाब ने पूरे घटनाक्रम को और ज्यादा चर्चा में ला दिया। जयशंकर ने अपने जवाब के जरिए आतंकवाद और भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर भारत का रुख एक बार फिर स्पष्ट करने की कोशिश की।
कार्यक्रम अंतरराष्ट्रीय मंच से जुड़ा था और वहां अलग-अलग देशों के प्रतिनिधि, पत्रकार तथा अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार मौजूद थे। ऐसे मंचों पर भारत की विदेश नीति, पड़ोसी देशों के साथ संबंध और आतंकवाद जैसे विषय अक्सर चर्चा के केंद्र में रहते हैं। इसी दौरान पाकिस्तान से आए पत्रकार की ओर से सवाल किए जाने की कोशिश हुई।
बताया जा रहा है कि पत्रकार ने जिस अंदाज में विदेश मंत्री को संबोधित किया, उससे कार्यक्रम का माहौल कुछ देर के लिए असहज हो गया। इसके बाद एस. जयशंकर ने सवाल का जवाब देते हुए पाकिस्तान और आतंकवाद के मुद्दे पर भारत की स्थिति को सामने रखा। उनके जवाब का मूल संदेश यही रहा कि भारत आतंकवाद को लेकर किसी भी तरह के दोहरे मानदंड को स्वीकार नहीं करता।
सवाल के बीच जयशंकर का सख्त रुख
एस. जयशंकर अपनी स्पष्ट और बेबाक शैली के लिए जाने जाते हैं। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी वह कई बार भारत के हितों से जुड़े मुद्दों पर बिना घुमाए-फिराए अपनी बात रखते रहे हैं। पाकिस्तान से जुड़े सवालों पर उनका जोर लगातार इस बात पर रहा है कि दोनों देशों के संबंधों में सबसे बड़ी बाधा आतंकवाद है।
इस कार्यक्रम में भी जब पाकिस्तानी पत्रकार की ओर से सवाल किया गया तो जयशंकर ने जवाब को केवल व्यक्तिगत बहस तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने सवाल के पीछे मौजूद व्यापक संदर्भ को सामने लाने की कोशिश की। उनका संदेश था कि जिस देश की जमीन से आतंकवाद को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं, उसके प्रतिनिधि जब भारत से सवाल करते हैं तो उस सवाल के साथ उसके संदर्भ को भी देखना जरूरी है।
यही वजह है कि जयशंकर का जवाब सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया। समर्थकों ने इसे भारत की कूटनीतिक दृढ़ता बताया, जबकि पूरे घटनाक्रम को लेकर अलग-अलग तरह की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगीं।
भारत-पाकिस्तान संबंधों में आतंकवाद सबसे बड़ा मुद्दा
भारत और पाकिस्तान के रिश्ते लंबे समय से बेहद संवेदनशील रहे हैं। दोनों देशों के बीच राजनीतिक और कूटनीतिक मतभेदों के अलावा सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा भी लगातार प्रमुख रहा है। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कहता रहा है कि पाकिस्तान को आतंकवाद के खिलाफ ठोस और विश्वसनीय कार्रवाई करनी चाहिए।
भारत का तर्क रहा है कि आतंकवाद और बातचीत साथ-साथ नहीं चल सकते। नई दिल्ली की ओर से कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह संदेश दिया गया है कि अगर पाकिस्तान वास्तव में सामान्य संबंध चाहता है तो उसे आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाने होंगे।
एस. जयशंकर ने भी विभिन्न मौकों पर इसी नीति को दोहराया है। उनका कहना रहा है कि भारत अपने पड़ोस में शांति चाहता है, लेकिन शांति की कीमत आतंकवाद को नजरअंदाज करके नहीं चुकाई जा सकती।
पाकिस्तानी पत्रकार के सवाल ने क्यों खींचा ध्यान?
संयुक्त राष्ट्र जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर किसी पत्रकार का सवाल अपने आप में असामान्य बात नहीं है। लेकिन इस मामले में सवाल पूछने के तरीके और उसके बाद आए जवाब ने इसे सुर्खियों में ला दिया। सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो और उसके अलग-अलग हिस्सों को लेकर लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएं दीं।
भारत में बड़ी संख्या में लोगों ने जयशंकर के जवाब को इसलिए महत्वपूर्ण माना क्योंकि उनका मानना है कि पाकिस्तान की ओर से भारत पर सवाल उठाने से पहले आतंकवाद से जुड़े आरोपों और घटनाओं पर जवाब देना जरूरी है।
वहीं, इस तरह के घटनाक्रम यह भी दिखाते हैं कि भारत और पाकिस्तान के बीच कूटनीतिक तनाव केवल सरकारी स्तर तक सीमित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और मीडिया कार्यक्रमों में भी दोनों देशों से जुड़े सवाल अक्सर तीखे राजनीतिक और सुरक्षा संदर्भों के साथ सामने आते हैं।
जयशंकर की कूटनीतिक शैली फिर चर्चा में
एस. जयशंकर की पहचान ऐसे विदेश मंत्री के रूप में बनी है जो अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को मजबूती से रखने के लिए जाने जाते हैं। चाहे रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा हो, पश्चिमी देशों के साथ भारत के संबंध हों, चीन से जुड़ा सवाल हो या पाकिस्तान और आतंकवाद का विषय—जयशंकर अक्सर भारत के हितों को केंद्र में रखकर जवाब देते दिखाई देते हैं।
उनकी शैली में एक खास बात यह है कि वह किसी सवाल का जवाब देते समय केवल तत्काल राजनीतिक प्रतिक्रिया देने के बजाय उसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ से जोड़ देते हैं। यही वजह है कि उनके कई बयान देश के भीतर राजनीतिक बहस का हिस्सा बनने के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा का विषय बनते रहे हैं।
पाकिस्तानी पत्रकार के सवाल पर भी यही तस्वीर देखने को मिली। जवाब में केवल पत्रकार को प्रतिक्रिया देने के बजाय आतंकवाद के मुद्दे को केंद्र में लाया गया।
‘आतंकवाद’ पर भारत का संदेश स्पष्ट
भारत की विदेश नीति में आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई लंबे समय से महत्वपूर्ण प्राथमिकता रही है। भारत का कहना है कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और आतंकवादियों तथा उन्हें समर्थन देने वालों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक समान नीति अपनानी चाहिए।
भारत लगातार यह भी कहता रहा है कि आतंकवाद को किसी राजनीतिक उद्देश्य या कथित स्वतंत्रता संघर्ष के नाम पर सही नहीं ठहराया जा सकता। नई दिल्ली की ओर से संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहयोग की मांग की जाती रही है।
यही कारण है कि पाकिस्तान से जुड़े किसी भी सवाल के सामने आते ही आतंकवाद का मुद्दा स्वाभाविक रूप से केंद्र में आ जाता है। भारत का कहना है कि जब तक सीमा पार आतंकवाद का सवाल हल नहीं होता, तब तक दोनों देशों के बीच संबंधों में सामान्य स्थिति कायम करना मुश्किल रहेगा।
संयुक्त राष्ट्र महासभा का मंच और भारत की भूमिका
संयुक्त राष्ट्र महासभा का सत्र दुनिया के सबसे बड़े कूटनीतिक मंचों में से एक है। यहां दुनिया के तमाम देशों के प्रतिनिधि वैश्विक राजनीति, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था, आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखते हैं।
ऐसे मंच पर भारत की भूमिका पिछले वर्षों में लगातार महत्वपूर्ण हुई है। भारत खुद को विकासशील देशों की आवाज के रूप में भी प्रस्तुत करता रहा है और वैश्विक संस्थाओं में सुधार की मांग करता रहा है।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की इसी व्यापक नीति को सामने रखते रहे हैं। पाकिस्तान से जुड़े सवालों पर भी भारत की कोशिश यही रही है कि द्विपक्षीय विवाद को केवल राजनीतिक मतभेद के रूप में नहीं, बल्कि आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा के संदर्भ में देखा जाए।
पाकिस्तान पर भारत का पुराना आरोप
भारत लंबे समय से पाकिस्तान पर आतंकवादी संगठनों को पनाह और समर्थन देने के आरोप लगाता रहा है। पाकिस्तान इन आरोपों से इनकार करता रहा है और दोनों देशों के बीच आतंकवाद को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला लंबे समय से जारी है।
भारत का कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई केवल बयान जारी करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। आतंकवादी नेटवर्क, उनके वित्तीय स्रोत, प्रशिक्षण और उन्हें मिलने वाले समर्थन के खिलाफ ठोस कार्रवाई जरूरी है।
यही भारत का वह पक्ष है जिसे जयशंकर जैसे नेता अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाते रहे हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल हुआ जवाब
कार्यक्रम के बाद जयशंकर के जवाब से जुड़े वीडियो और पोस्ट सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से चर्चा में आए। लोगों ने इसे भारत की आक्रामक कूटनीति से जोड़कर देखा। कई यूजर्स ने कहा कि पाकिस्तान से आने वाले सवालों का जवाब आतंकवाद के मुद्दे को सामने रखकर देना जरूरी है।
कुछ लोगों ने जयशंकर की भाषा और अंदाज की तारीफ की, तो कुछ ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इस तरह के तीखे संवाद की प्रकृति को लेकर अपनी राय रखी। हालांकि सोशल मीडिया पर वायरल किसी भी वीडियो के मामले में पूरे संदर्भ को देखना जरूरी होता है, क्योंकि छोटे वीडियो क्लिप से कई बार घटनाक्रम का पूरा संदर्भ सामने नहीं आता।
फिर भी, इस घटना ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान संबंधों और आतंकवाद के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ला दिया।
भारत की कूटनीति में अब ‘आतंकवाद’ पर समझौते की गुंजाइश नहीं?
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने पाकिस्तान के साथ संबंधों को लेकर अपनी नीति में आतंकवाद को केंद्रीय मुद्दा बनाया है। भारत की ओर से बार-बार यह संकेत दिया गया है कि सीमा पार आतंकवाद समाप्त किए बिना सामान्य संबंधों की उम्मीद नहीं की जा सकती।
इस नीति का उद्देश्य केवल पाकिस्तान पर दबाव बनाना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह बताना भी है कि आतंकवाद का मुद्दा भारत-पाकिस्तान विवाद का एक मूल हिस्सा है।
जयशंकर के बयान इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति का हिस्सा माने जा सकते हैं, जहां भारत कोशिश करता है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर पाकिस्तान के साथ किसी भी चर्चा में आतंकवाद का मुद्दा नजरअंदाज न हो।
पाकिस्तान के लिए संदेश, दुनिया के लिए संकेत
जयशंकर के जवाब को केवल पाकिस्तानी पत्रकार के साथ हुई बहस के रूप में देखना शायद पूरे घटनाक्रम को सीमित कर देगा। इसका बड़ा संदेश भारत-पाकिस्तान संबंधों और आतंकवाद के मुद्दे से जुड़ा है।
भारत लगातार यह बताने की कोशिश करता रहा है कि वह पाकिस्तान के साथ शांतिपूर्ण संबंध चाहता है, लेकिन इसके लिए वातावरण आतंकवाद-मुक्त होना चाहिए। भारत का मानना है कि पड़ोसी देशों के बीच सामान्य संबंध तभी संभव हैं जब एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं का सम्मान किया जाए।
इसी संदर्भ में जयशंकर का जवाब भारत की उस कूटनीतिक लाइन को मजबूत करता दिखाई देता है जिसमें आतंकवाद को द्विपक्षीय संबंधों का सबसे गंभीर मुद्दा माना जाता है।
‘सवाल कौन पूछ रहा है’ से ज्यादा महत्वपूर्ण है ‘सवाल किस संदर्भ में है’
इस पूरे घटनाक्रम की सबसे बड़ी सीख यही है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में किसी सवाल का जवाब केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ से भी जुड़ा होता है। जब भारत और पाकिस्तान जैसे दो देशों के बीच दशकों से तनाव रहा हो और आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा बना हुआ हो, तब किसी भी सवाल का राजनीतिक और सुरक्षा संदर्भ अपने आप महत्वपूर्ण हो जाता है।
जयशंकर ने भी जवाब देते समय इसी संदर्भ को सामने रखने की कोशिश की। उनका रुख यह बताता है कि भारत अब पाकिस्तान से जुड़े सवालों को केवल पारंपरिक भारत-पाकिस्तान विवाद के नजरिए से नहीं देखना चाहता, बल्कि आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा के बड़े मुद्दे से जोड़कर देखता है।
क्यों याद रखा जाएगा यह जवाब?
पाकिस्तानी पत्रकार का सवाल कुछ क्षणों की घटना हो सकता था, लेकिन उसके जवाब ने इसे बड़ी कूटनीतिक बहस में बदल दिया। जयशंकर का नाम पहले से ही अपनी स्पष्टवादिता के लिए जाना जाता है और पाकिस्तान से जुड़े मुद्दों पर उनके जवाब अक्सर भारतीय राजनीति और सोशल मीडिया में तेजी से चर्चा का विषय बनते हैं।
इस घटना में भी यही हुआ। एक पत्रकार का सवाल आया, विदेश मंत्री ने जवाब दिया और देखते ही देखते चर्चा का केंद्र सवाल से ज्यादा जवाब बन गया।
भारत में इसे उन मौकों में गिना जा रहा है जब अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश के विदेश मंत्री ने आतंकवाद के मुद्दे को सीधे केंद्र में रखकर पाकिस्तान को संदेश दिया।
निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 81वें सत्र के दौरान सामने आया यह घटनाक्रम भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिलता को फिर सामने लाता है। पाकिस्तान से जुड़े किसी भी सवाल के साथ आतंकवाद का मुद्दा आज भी भारत की विदेश नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
एस. जयशंकर का जवाब इसी नीति की झलक माना जा सकता है। संदेश साफ है—भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपने खिलाफ उठाए जाने वाले सवालों का जवाब देने के लिए तैयार है, लेकिन आतंकवाद के मुद्दे को नजरअंदाज करके नहीं।
पाकिस्तानी पत्रकार के सवाल पर जयशंकर की प्रतिक्रिया इसलिए चर्चा में है क्योंकि इसमें केवल एक पत्रकार के सवाल का जवाब नहीं, बल्कि भारत की उस व्यापक कूटनीतिक सोच की झलक दिखाई देती है जिसमें आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख को राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति का अहम आधार माना गया है।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का यही संदेश लगातार उभरता रहा है कि पड़ोसी देशों के साथ शांति और सहयोग की इच्छा अपनी जगह है, लेकिन आतंकवाद के खिलाफ समझौता नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र के मंच से आया यह जवाब आने वाले दिनों में भारत-पाकिस्तान कूटनीति पर होने वाली चर्चाओं में भी बार-बार उद्धृत किया जा सकता है।(कृष्ण कुमार)