28/12/2025
संघी मंत्री बनाम भ्रष्ट लॉबी
(बिहार)
बिहार में एगो उपमुख्यमंत्री बाड़ें — विजय कुमार सिन्हा। संघ के पक्के, शाखा के घिसे-पिटे, आरम्भः करते-करते मंत्री बन गइनी। ऊपर से कहलावें — नरेंद्र मोदी के करीबी। तेवर कड़क, बोली तल्ख, और अंदाज ऐसा कि बाबू-लोग कांप जाए।
अभी इनके जिम्मे है राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग — मतलब बिहार के सबसे कमाऊ विभाग में से एक। इहां भ्रष्टाचार कोई गुनाह नहीं, परंपरा है। अमीन से लेके सीओ, फिर ऊपर के साहब — सब दरिया में डुबकी मारते रहते हैं। सच पूछिए तो बिहार में कौन सा विभाग पाक-साफ है, ये बताना मुश्किल है। फर्क बस इतना है कि कहीं बाल्टी भरता है, कहीं ड्रम।
अब दिक्कत इहां से शुरू हुई।
सिन्हा जी ठहरे ठेठ संघी। घूस-पानी, लटकाओ-भटकाओ-खींचो वाला फार्मूला इन्हें बिल्कुल नहीं सुहाता। सीधे फरमान सुना दिए —
“आप सेवक हैं, मालिक नहीं। विभाग का मालिक मंत्री है और मंत्री का मालिक जनता। घूस बंद करो, काम तेज करो, जनता को परेशान मत करो।”
अब बताइए, ई भी कोई बात हुई?
सरकारी नौकरी अगर ईमानदारी से करनी हो तो फिर नौकरी में आने का फायदा का? दरमाहा में घर चलता है भला? पान-गुटखा की गुमटी खोल के इससे ज्यादा कमा लेंगे लोग!
वेतन तो पूर्णमासी का चांद है — महीने में एक बार दिखता है। लेकिन दफ्तर की कमाई? सदा बहार! उसी से पटना में फ्लैट, प्लॉट, गाड़ी, बीवी का फैशन, बच्चों की अय्याशी और सोने-चांदी के जेवर सब चलता है।
एक-एक सीओ, रजिस्ट्रार की कमाई सुन लीजिए तो आदमी गश खा के गिर जाए।
और यही सब सिन्हा जी बंद करना चाहते हैं।
उन्हें लगता है घूस पाप है।
अब इन्हें कौन समझाए कि विनोबा भावे बहुत पहले कह गए थे —
“इस देश में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन चुका है।”
विनोबा जी के कहने पर जयप्रकाश नारायण ने जीवन खपा दिया। हजारों बिहारियों ने लाखों एकड़ जमीन भूदान में दे दी। और इधर सिन्हा जी, उसी जमीन के हिसाब-किताब वाले विभाग के मंत्री होकर भी मानने को तैयार नहीं कि घूस अब सिस्टम का हिस्सा है।
अब तो मंत्री जी को सनक सवार है —
“पूरे विभाग को बदल डालूंगा।”
जिले-जिले घूम रहे हैं, भूमि सुधार जन-कल्याण संवाद शिविर लगा रहे हैं, और लोगों की समस्या ऑन-द-स्पॉट निपटा रहे हैं। जनता खुश है — बरसों से जो काम घूस के बिना अटका था, वो मिनटों में हो रहा है।
लेकिन बाबू-साहब लोग?
उनका खून खौल रहा है।
पहले रोज जेब भर के घर जाते थे, अब खाली जेब, मुंह लटकाए लौटना पड़ रहा है।
जिस जनता को पहले डांट-फटकार कर भगा देते थे, उसी के सामने मंत्री जी उन्हें खड़ा करके क्लास ले रहे हैं।
कमाई भी गई, रौब भी गया — इससे बड़ा अपमान और क्या!
ऊपर से ब्लॉक स्टाफ की पुरानी प्रैक्टिस जस-की-तस है, लेकिन इनके लिए बोहनी भी मुश्किल हो गई है।
अब राजस्व सेवा संघ मैदान में कूद पड़ा है।
सीधे नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखी गई है। कहा गया है कि मंत्री जी की शासन शैली “तमाशाई” है, औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है, जहां संवाद से ज्यादा दंड प्रदर्शन होता था।
सार्वजनिक मंच से अधिकारियों को फटकारने से विभाग की गरिमा खत्म हो रही है। मंत्री तालियों के लिए अफसरों को निलंबन की धमकी दे रहे हैं।
और अगर यही मॉडल सही है, तो इसे सारे विभागों में लागू किया जाए — सिर्फ राजस्व में क्यों?
मतलब साफ है —
अगर हमारी कमाई बंद होगी, तो दूसरों की भी बंद होनी चाहिए।
काम के बोझ का रोना रोकर रिश्वतखोरी को जायज ठहराने की ऐसी बेशर्मी शायद ही कहीं दिखे।
मंत्री जी को यह भी समझना चाहिए कि साहब, बीबी और बच्चे दुखी होंगे तो उनकी आह निकलेगी। और घूसखोरों की आह ने बड़े-बड़े तख्त पलटे हैं।
चारा घोटाले के दौर में अफसर मुख्यमंत्री तक को नचाते थे। कांग्रेस काल में बिहार में एक “एक्साइज किंग” था — मंत्री तक उसकी मर्जी से चलते थे।
इतिहास गवाह है।
और ये भी कि बिहार के अफसर मुख्यमंत्री के जिगर के टुकड़े माने जाते हैं। कब दिल पिघल जाए और मंत्री जी का विभाग बदल जाए — कोई नहीं जानता।
बिहार की शादी में एक गीत गूंजता है —
“दूल्हा धीरे-धीरे चल ससुर गलिया…”
राजनीति में इसका मतलब और भी गहरा है।
समझदारी इसी में है कि धीरे चला जाए।
हालांकि, सिन्हा जी ठोक-बजा कर कह चुके हैं —
“हम गीदड़-भभकी से डरने वाले नहीं, न किसी दबाव में आएंगे।”
अब लड़ाई खुल चुकी है।
देखना दिलचस्प होगा कि जीत किसकी होती है —
भ्रष्टाचार की मजबूत लॉबी की,
या एक जिद्दी संघी मंत्री की।