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06/02/2026
ट्रंप–मोदी वार्ता: सहयोग और चुनौती के बीच एक कूटनीतिक संवादआज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के पूर्व राष्...
02/02/2026

ट्रंप–मोदी वार्ता: सहयोग और चुनौती के बीच एक कूटनीतिक संवाद
आज भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई बातचीत ने एक बार फिर भारत-अमेरिका संबंधों को वैश्विक मंच पर चर्चा का विषय बना दिया। यह संवाद केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि व्यापार, सुरक्षा और वैश्विक राजनीति के व्यापक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण माना गया।
🔹 सकारात्मक पहलू (सकारात्मक रूप)
सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि दोनों नेताओं ने रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। रक्षा सहयोग, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त प्रयासों पर सहमति से यह संकेत मिला कि दोनों देश वैश्विक शांति और सुरक्षा को लेकर एक साझा दृष्टिकोण रखते हैं।
आर्थिक मोर्चे पर भी बातचीत ने आशा की किरण जगाई। निवेश, तकनीकी सहयोग और व्यापार को बढ़ावा देने की बातों से यह उम्मीद बनी कि आने वाले समय में दोनों देशों के कारोबारी संबंध और अधिक मजबूत होंगे। विशेष रूप से स्टार्टअप्स, रक्षा उत्पादन और ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी पर ज़ोर दिया गया, जो दोनों अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी हो सकता है।
इसके अलावा, प्रवासी भारतीयों और छात्रों के मुद्दों पर सकारात्मक रुख ने यह दिखाया कि मानवीय पहलुओं को भी कूटनीति में महत्व दिया जा रहा है।
🔸 नकारात्मक पहलू (नकारात्मक रूप)
हालाँकि बातचीत में कई सकारात्मक संकेत मिले, लेकिन कुछ मतभेद और चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आईं। व्यापार शुल्क (टैरिफ) और बाजार पहुंच को लेकर दोनों देशों के दृष्टिकोण में अब भी अंतर बना हुआ है। अमेरिका की ओर से “अमेरिका फर्स्ट” नीति का प्रभाव भारतीय निर्यातकों के लिए चिंता का विषय बना रह सकता है।
इसके साथ ही, आव्रजन नीति और वीज़ा नियमों को लेकर भी स्पष्टता की कमी महसूस की गई। भारतीय आईटी पेशेवरों और छात्रों के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है, जिस पर ठोस आश्वासन की अपेक्षा थी।
भू-राजनीतिक स्तर पर, कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर दोनों नेताओं की प्राथमिकताएँ पूरी तरह मेल खाती नहीं दिखीं, जिससे भविष्य में नीति-समन्वय एक चुनौती बन सकता है।
📝 निष्कर्ष
ट्रंप और मोदी की आज की बातचीत ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत और अमेरिका के संबंध सहयोग और प्रतिस्पर्धा के संतुलन पर टिके हुए हैं। जहाँ एक ओर रणनीतिक और आर्थिक साझेदारी को लेकर उत्साह है, वहीं दूसरी ओर व्यापार, आव्रजन और वैश्विक नीति के सवालों पर मतभेद भी बने हुए हैं।
यह संवाद एक कदम आगे बढ़ने का संकेत देता है, लेकिन वास्तविक प्रगति इस बात पर निर्भर करेगी कि आने वाले दिनों में इन चर्चाओं को नीति और कार्यवाही में कैसे बदला जाता है।

16/01/2026

🗣 सफलता पाने का एक शानदार विचार

अपने जीवन के किसी भी क्षेत्र में मिली सफलता पर ध्यान दें — जैसे खेल, पैसे से जुड़ा काम, पढ़ाई या कोई और काम।

सोचिए कि उस क्षेत्र में आपको सफलता क्यों मिली। क्या वह आपकी मेहनत थी, आपका धैर्य, आपकी लगन, या आपका रोज़ अभ्यास और अनुशासन? हर इंसान में कुछ न कुछ खास गुण होते हैं।

अब वही तरीका अपनाइए उस क्षेत्र में, जहाँ आपको परेशानी हो रही है। जीवन के सभी क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। सफलता पाने का तरीका लगभग एक जैसा ही होता है, बस उसे उस काम के हिसाब से ढालना पड़ता है।

आप पहले भी सफल हुए हैं, इसका मतलब आपको सफलता पाने का तरीका आता है। आपके अंदर पूरी क्षमता है और जो चाहिए, वह सब पहले से मौजूद है। 💪

10/01/2026

Nobody likes you when you're depressed. Plain and simple. We can talk all day about mental health and how important it is, but the moment you are depressed, people start to distance themselves.

They see you as negative, a burden, and someone too heavy to handle.

08/01/2026
28/12/2025

संघी मंत्री बनाम भ्रष्ट लॉबी

(बिहार)

बिहार में एगो उपमुख्यमंत्री बाड़ें — विजय कुमार सिन्हा। संघ के पक्के, शाखा के घिसे-पिटे, आरम्भः करते-करते मंत्री बन गइनी। ऊपर से कहलावें — नरेंद्र मोदी के करीबी। तेवर कड़क, बोली तल्ख, और अंदाज ऐसा कि बाबू-लोग कांप जाए।

अभी इनके जिम्मे है राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग — मतलब बिहार के सबसे कमाऊ विभाग में से एक। इहां भ्रष्टाचार कोई गुनाह नहीं, परंपरा है। अमीन से लेके सीओ, फिर ऊपर के साहब — सब दरिया में डुबकी मारते रहते हैं। सच पूछिए तो बिहार में कौन सा विभाग पाक-साफ है, ये बताना मुश्किल है। फर्क बस इतना है कि कहीं बाल्टी भरता है, कहीं ड्रम।

अब दिक्कत इहां से शुरू हुई।
सिन्हा जी ठहरे ठेठ संघी। घूस-पानी, लटकाओ-भटकाओ-खींचो वाला फार्मूला इन्हें बिल्कुल नहीं सुहाता। सीधे फरमान सुना दिए —

“आप सेवक हैं, मालिक नहीं। विभाग का मालिक मंत्री है और मंत्री का मालिक जनता। घूस बंद करो, काम तेज करो, जनता को परेशान मत करो।”

अब बताइए, ई भी कोई बात हुई?
सरकारी नौकरी अगर ईमानदारी से करनी हो तो फिर नौकरी में आने का फायदा का? दरमाहा में घर चलता है भला? पान-गुटखा की गुमटी खोल के इससे ज्यादा कमा लेंगे लोग!
वेतन तो पूर्णमासी का चांद है — महीने में एक बार दिखता है। लेकिन दफ्तर की कमाई? सदा बहार! उसी से पटना में फ्लैट, प्लॉट, गाड़ी, बीवी का फैशन, बच्चों की अय्याशी और सोने-चांदी के जेवर सब चलता है।
एक-एक सीओ, रजिस्ट्रार की कमाई सुन लीजिए तो आदमी गश खा के गिर जाए।

और यही सब सिन्हा जी बंद करना चाहते हैं।
उन्हें लगता है घूस पाप है।
अब इन्हें कौन समझाए कि विनोबा भावे बहुत पहले कह गए थे —

“इस देश में भ्रष्टाचार शिष्टाचार बन चुका है।”

विनोबा जी के कहने पर जयप्रकाश नारायण ने जीवन खपा दिया। हजारों बिहारियों ने लाखों एकड़ जमीन भूदान में दे दी। और इधर सिन्हा जी, उसी जमीन के हिसाब-किताब वाले विभाग के मंत्री होकर भी मानने को तैयार नहीं कि घूस अब सिस्टम का हिस्सा है।

अब तो मंत्री जी को सनक सवार है —
“पूरे विभाग को बदल डालूंगा।”

जिले-जिले घूम रहे हैं, भूमि सुधार जन-कल्याण संवाद शिविर लगा रहे हैं, और लोगों की समस्या ऑन-द-स्पॉट निपटा रहे हैं। जनता खुश है — बरसों से जो काम घूस के बिना अटका था, वो मिनटों में हो रहा है।

लेकिन बाबू-साहब लोग?
उनका खून खौल रहा है।
पहले रोज जेब भर के घर जाते थे, अब खाली जेब, मुंह लटकाए लौटना पड़ रहा है।
जिस जनता को पहले डांट-फटकार कर भगा देते थे, उसी के सामने मंत्री जी उन्हें खड़ा करके क्लास ले रहे हैं।
कमाई भी गई, रौब भी गया — इससे बड़ा अपमान और क्या!

ऊपर से ब्लॉक स्टाफ की पुरानी प्रैक्टिस जस-की-तस है, लेकिन इनके लिए बोहनी भी मुश्किल हो गई है।

अब राजस्व सेवा संघ मैदान में कूद पड़ा है।
सीधे नीतीश कुमार को चिट्ठी लिखी गई है। कहा गया है कि मंत्री जी की शासन शैली “तमाशाई” है, औपनिवेशिक दौर की याद दिलाती है, जहां संवाद से ज्यादा दंड प्रदर्शन होता था।
सार्वजनिक मंच से अधिकारियों को फटकारने से विभाग की गरिमा खत्म हो रही है। मंत्री तालियों के लिए अफसरों को निलंबन की धमकी दे रहे हैं।
और अगर यही मॉडल सही है, तो इसे सारे विभागों में लागू किया जाए — सिर्फ राजस्व में क्यों?

मतलब साफ है —
अगर हमारी कमाई बंद होगी, तो दूसरों की भी बंद होनी चाहिए।

काम के बोझ का रोना रोकर रिश्वतखोरी को जायज ठहराने की ऐसी बेशर्मी शायद ही कहीं दिखे।

मंत्री जी को यह भी समझना चाहिए कि साहब, बीबी और बच्चे दुखी होंगे तो उनकी आह निकलेगी। और घूसखोरों की आह ने बड़े-बड़े तख्त पलटे हैं।
चारा घोटाले के दौर में अफसर मुख्यमंत्री तक को नचाते थे। कांग्रेस काल में बिहार में एक “एक्साइज किंग” था — मंत्री तक उसकी मर्जी से चलते थे।

इतिहास गवाह है।
और ये भी कि बिहार के अफसर मुख्यमंत्री के जिगर के टुकड़े माने जाते हैं। कब दिल पिघल जाए और मंत्री जी का विभाग बदल जाए — कोई नहीं जानता।

बिहार की शादी में एक गीत गूंजता है —

“दूल्हा धीरे-धीरे चल ससुर गलिया…”

राजनीति में इसका मतलब और भी गहरा है।
समझदारी इसी में है कि धीरे चला जाए।

हालांकि, सिन्हा जी ठोक-बजा कर कह चुके हैं —

“हम गीदड़-भभकी से डरने वाले नहीं, न किसी दबाव में आएंगे।”

अब लड़ाई खुल चुकी है।
देखना दिलचस्प होगा कि जीत किसकी होती है —
भ्रष्टाचार की मजबूत लॉबी की,
या एक जिद्दी संघी मंत्री की।

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