13/08/2026
(कृष्ण कुमार)संसद का मानसून सत्र 2026 इस बार भी भारी राजनीतिक हंगामे, आरोप-प्रत्यारोप और लगातार बाधित होती कार्यवाही के बीच समाप्त हो गया। गुरुवार को सत्र के अंतिम दिन लोकसभा और राज्यसभा में एक बार फिर ऐसा ही माहौल देखने को मिला। विपक्षी दलों ने विभिन्न मुद्दों को लेकर सरकार से जवाब और चर्चा की मांग उठाई, जबकि सत्ता पक्ष की ओर से विपक्ष पर सदन की कार्यवाही बाधित करने के आरोप लगाए गए। हंगामे के बीच दोनों सदनों की कार्यवाही अंततः अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गई।
सत्र की समाप्ति के बाद संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सरकार का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि पूरे मानसून सत्र के दौरान संसद में 12 विधेयक पारित किए गए, लेकिन चर्चा की स्थिति अपेक्षित नहीं रही। रिजिजू के अनुसार केवल एक विधेयक पर दोनों सदनों में चर्चा हो सकी। उन्होंने विपक्ष पर सदन की कार्यवाही को बार-बार बाधित करने का आरोप लगाते हुए कहा कि लोकतंत्र में विरोध और असहमति का अधिकार है, लेकिन संसद को लगातार ठप करना संसदीय व्यवस्था के लिए उचित नहीं है।
अंतिम दिन भी हंगामे का असर
मानसून सत्र के अंतिम दिन संसद में सरकार और विपक्ष के बीच टकराव का माहौल बना रहा। कार्यवाही शुरू होने के साथ ही विभिन्न मुद्दों पर विपक्षी सांसदों की ओर से आवाज उठाई गई। नारेबाजी और विरोध के कारण पीठासीन अधिकारियों को सदन की कार्यवाही व्यवस्थित रखने में कठिनाई हुई। कई बार कार्यवाही रोकनी पड़ी और अंत में दोनों सदनों को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया।
इस पूरे सत्र की सबसे बड़ी तस्वीर यही रही कि संसद के भीतर राजनीतिक मतभेदों का असर सीधे सदन की उत्पादकता पर पड़ा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा की उत्पादकता लगभग 19 प्रतिशत और राज्यसभा की उत्पादकता करीब 39 प्रतिशत रही। यानी जिस समय का इस्तेमाल देश के कानून बनाने, जनहित के मुद्दों पर चर्चा करने और सरकार से जवाब मांगने में होना चाहिए था, उसका एक बड़ा हिस्सा हंगामे और व्यवधान में चला गया।
12 विधेयक पारित, लेकिन चर्चा पर सवाल
सत्र की समाप्ति के बाद सरकार ने यह जरूर रेखांकित किया कि संसद ने 12 विधेयक पारित किए। लेकिन इस उपलब्धि के साथ ही एक महत्वपूर्ण सवाल भी सामने आया—क्या सिर्फ विधेयक पारित करना पर्याप्त है, या उनके प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा भी उतनी ही जरूरी है?
संसद लोकतंत्र का वह मंच है जहां किसी कानून को अंतिम रूप देने से पहले उसके प्रभाव, संभावित कमियों, सामाजिक असर और प्रशासनिक चुनौतियों पर सांसदों को अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। सरकार जहां विधेयकों को देश की जरूरतों से जोड़कर देखती है, वहीं विपक्ष का दायित्व होता है कि वह उन विधेयकों की कमियों और संभावित प्रभावों पर सवाल उठाए। ऐसे में अगर चर्चा का समय सीमित हो जाता है तो संसदीय प्रक्रिया की गुणवत्ता को लेकर स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने भी सत्र के बाद चर्चा की गुणवत्ता को लेकर असंतोष जताया। सरकार का कहना है कि विपक्ष को अपने मुद्दे सदन के भीतर उठाने चाहिए थे और सरकार चर्चा के लिए तैयार थी। दूसरी ओर विपक्ष का तर्क रहा कि जिन महत्वपूर्ण मुद्दों को वह उठाना चाहता था, उन पर पर्याप्त चर्चा का अवसर नहीं मिला। यही मतभेद पूरे सत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव का प्रमुख कारण बना रहा।
विपक्ष का आरोप—सरकार जवाब देने से बच रही है
विपक्ष की ओर से लगातार यह आरोप लगाया गया कि सरकार महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दों पर चर्चा से बच रही है। विपक्षी दलों ने अलग-अलग मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने की कोशिश की और संबंधित मंत्रियों से जवाब की मांग की। कई मौकों पर विपक्षी सांसदों ने सदन के भीतर प्रदर्शन और नारेबाजी की।
विपक्ष का कहना रहा कि संसद केवल कानून पारित करने का स्थान नहीं है, बल्कि जनता से जुड़े सवालों पर सरकार को जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक मंच भी है। इसलिए महंगाई, रोजगार, छात्रों से जुड़े मुद्दे, प्रशासनिक कार्रवाई और अन्य राजनीतिक एवं सामाजिक विषयों पर चर्चा जरूरी है।
हालांकि सरकार ने विपक्ष के इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। सत्ता पक्ष की ओर से लगातार कहा गया कि विपक्ष चर्चा में हिस्सा लेने के बजाय हंगामा कर रहा है। किरेन रिजिजू ने सत्र के समापन के बाद विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि संसद में व्यवधान के कारण कई सांसदों को बोलने और अपने क्षेत्र के मुद्दे उठाने का अवसर नहीं मिल पाया।
लोकतंत्र में विरोध जरूरी, लेकिन सदन चलना भी जरूरी
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि लोकतंत्र में सरकार और विपक्ष दोनों की भूमिका बराबर महत्वपूर्ण है। विपक्ष का काम केवल सरकार का समर्थन करना नहीं, बल्कि उसकी नीतियों पर सवाल उठाना और जनता की समस्याओं को सदन में मजबूती से उठाना भी है। लेकिन दूसरी ओर सरकार और सत्तापक्ष का भी तर्क है कि विरोध ऐसा होना चाहिए जिससे सदन का काम पूरी तरह बाधित न हो।
संसदीय लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है। अलग-अलग दलों के विचार अलग हो सकते हैं और कई मुद्दों पर तीखी बहस भी हो सकती है। लेकिन अंतिम उद्देश्य सदन को चलाना और जनता से जुड़े मुद्दों पर निर्णय तक पहुंचना होना चाहिए। यदि लगातार हंगामे के कारण प्रश्नकाल, चर्चा और विधायी काम प्रभावित होते हैं, तो इसका असर केवल सरकार या विपक्ष पर नहीं बल्कि पूरे संसदीय तंत्र पर पड़ता है।
उत्पादकता के आंकड़े ने बढ़ाई चिंता
मानसून सत्र की समाप्ति के बाद सामने आए उत्पादकता के आंकड़े भी चर्चा का विषय बन गए हैं। लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत और राज्यसभा की करीब 39 प्रतिशत बताई गई है। यह आंकड़ा बताता है कि निर्धारित संसदीय समय का बड़ा हिस्सा अपेक्षित कार्य में इस्तेमाल नहीं हो सका।
संसद की उत्पादकता केवल यह नहीं बताती कि कितने विधेयक पारित हुए, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि सांसदों को कितने समय तक बोलने का अवसर मिला, कितनी देर तक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा हुई और कितने प्रश्नों के जवाब दिए गए। इसलिए 12 विधेयकों के पारित होने के बावजूद चर्चा के सीमित अवसर को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।
सरकार ने गिनाईं उपलब्धियां
सरकार की नजर से देखें तो सत्र पूरी तरह निष्फल नहीं रहा। कई विधायी प्रस्तावों को मंजूरी मिली और सरकार ने अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाया। सरकार का कहना है कि विपक्षी हंगामे के बावजूद महत्वपूर्ण विधेयकों को आगे बढ़ाया गया और संसद ने अपना संवैधानिक काम किया।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसी आधार पर सरकार की उपलब्धियों को सामने रखा। उनका कहना था कि सरकार संसद में काम करने और महत्वपूर्ण कानूनों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध रही। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिस स्तर की चर्चा और बहस होनी चाहिए थी, वह नहीं हो सकी।
विपक्ष ने भी सरकार पर साधा निशाना
विपक्ष की ओर से भी सत्र की समाप्ति के बाद सरकार पर हमला बोला गया। विपक्षी नेताओं का कहना है कि संसद में केवल विधेयक पारित करना पर्याप्त नहीं है। किसी कानून का वास्तविक महत्व तब सामने आता है जब उसके प्रावधानों पर विस्तृत चर्चा हो, सांसद सवाल पूछें और सरकार उनका जवाब दे।
विपक्ष का यह भी तर्क रहा कि संसद में उठाए जाने वाले मुद्दे जनता की आवाज होते हैं। इसलिए यदि किसी मुद्दे पर विपक्ष सरकार से जवाब मांगता है तो उसे केवल राजनीतिक विरोध के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। विपक्ष के अनुसार सरकार को असहमति का सामना करते हुए भी सदन में चर्चा की प्रक्रिया को मजबूत करना चाहिए।
इस तरह मानसून सत्र के अंतिम दिन भी सत्ता पक्ष और विपक्ष की पुरानी बहस दोहराई गई—सरकार विपक्ष पर संसद बाधित करने का आरोप लगाती रही, जबकि विपक्ष सरकार पर महत्वपूर्ण मुद्दों से बचने का आरोप लगाता रहा।
संसद के कामकाज पर बड़ा सवाल
मानसून सत्र की समाप्ति एक बड़े सवाल को पीछे छोड़ गई है—आखिर संसद में हंगामे और चर्चा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद में आने वाले विधेयक देश के करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। कानून बनना केवल राजनीतिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उसका असर प्रशासन, अर्थव्यवस्था, समाज, शिक्षा, रोजगार और नागरिक अधिकारों तक पड़ता है। ऐसे में कानूनों पर अधिकतम संभव चर्चा लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत करती है।
यदि किसी विधेयक पर चर्चा कम होती है तो उसके प्रावधानों की गहराई से समीक्षा का अवसर भी सीमित हो सकता है। दूसरी ओर यदि विपक्ष लगातार कार्यवाही रोकता है तो सरकार के पास अपने विधायी कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए सीमित समय रह जाता है। दोनों स्थितियां संसद की कार्यक्षमता के लिए चुनौती हैं।
आगे क्या होना चाहिए?
मानसून सत्र की घटनाओं से यह स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को संसदीय कामकाज को लेकर आत्ममंथन करने की जरूरत है। सरकार को विपक्ष की महत्वपूर्ण मांगों और जनहित के मुद्दों पर पर्याप्त चर्चा का अवसर देने की कोशिश करनी चाहिए, वहीं विपक्ष को भी विरोध और प्रदर्शन के साथ-साथ सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलने देने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
संसद में तीखी बहस हो सकती है, राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप भी हो सकते हैं और सरकार की नीतियों की कड़ी आलोचना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन अंततः सदन का उद्देश्य कानून बनाना, जनता की समस्याओं को उठाना और सरकार को जवाबदेह बनाना है।
मानसून सत्र 2026 इसी विरोधाभास के साथ समाप्त हुआ। एक तरफ सरकार यह कह रही है कि हंगामे के बावजूद 12 विधेयक पारित किए गए, वहीं दूसरी तरफ उत्पादकता के कम आंकड़े और सीमित चर्चा यह सवाल खड़ा करते हैं कि संसद में कानून बनाने की प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर संसद का यह मानसून सत्र भारतीय राजनीति में बढ़ती राजनीतिक खींचतान की तस्वीर पेश करता है। सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर तीखा टकराव देखने को मिला और इसका सीधा असर सदन की कार्यवाही पर पड़ा। गुरुवार को दोनों सदनों के अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के साथ सत्र समाप्त हो गया।
12 विधेयकों का पारित होना सरकार के लिए विधायी उपलब्धि हो सकता है, लेकिन केवल कानूनों की संख्या से संसद के कामकाज का पूरा मूल्यांकन नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र की असली ताकत सार्थक बहस, जवाबदेही, असहमति के सम्मान और व्यापक चर्चा में है। इसलिए आने वाले सत्रों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि राजनीतिक मतभेद कायम रहते हुए भी संसद की कार्यवाही प्रभावी ढंग से चलती रहे।
संसद में सरकार और विपक्ष एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी जरूर हैं, लेकिन दोनों की अंतिम जिम्मेदारी देश और जनता के प्रति है। यदि दोनों पक्ष हंगामे से आगे बढ़कर संवाद, बहस और सहमति की दिशा में कदम बढ़ाते हैं, तो संसद न केवल अधिक उत्पादक बनेगी बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा भी और मजबूत होगा।(कृष्ण कुमार)
🙏🇮🇳🎉🎊