29/07/2026
सतेन्द्र PS जी द्वारा फेसबुक पर पोस्ट किया गया है वहां से कापी किया गया है हम सब को विचार करना चाहिए इस पर -:
अनुप्रिया पटेल को लेकर सोशल मीडिया पर तमाम टिप्पड़ी आये दिन देखता रहता हूँ. उनके प्रशंसक भी हैं और विरोधी भी हैं. दोनों मुखर होकर अपनी बात कहते हैं.
मैंने अपने फेसबुक के इतिहास में अनुप्रिया पटेल के बारे में शायद 5-6 बार लिखा होगा. उसमें भी 6 में से 4 बार तब लिखा होगा, जब वह सपा के शासन में छात्रों के मसलों पर सड़क पर संघर्ष कर रही थी. एक बार सत्ता में थी, तब लिखा था जब एक पीड़ित परिवार की एफआईआर सत्तासीन विधायक के दबाव में नहीं लिखी जा रही थी.
वह मामला इतना मार्मिक था कि मैंने उस पर खूब लिखा. इतनी भयावह स्थिति थी कि डर के मारे इलाके में कोई बोल नहीं पा रहा था और छोटे मोटे नेताओं की पीड़ित परिवार से मिलने जाने तक की हिम्मत नहीं थी.
उस मामले में अनुप्रिया पटेल करीब 200 गाड़ियों का काफिला लेकर उस गाँव में पहुँच गई. परिवार से मिलीं, कुछ दहशत कम हुई और हालत यह हुई कि अगले इलेक्शन मे भाजपा का वह दबंग विधायक चुनाव हार गया, वहाँ से सपा के कोई पटेल विधायक जीत गए.
अमेठी, रायबरेली, प्रतापगढ़, सुल्तानपुर सामंतवाद के गढ़ रहे हैं और अमेठी रायबरेली तो अभी भी हैं. सिर्फ इसलिए कि सपा ने इसे कांग्रेस के लिए छोड़ रखा था और कांग्रेस ने कभी किसी ओबीसी को वहाँ प्रधानी लायक भी नहीं समझा.
जब हारी सीट मानकर भाजपा द्वारा प्रतापगढ़ लोकसभा अपना दल को दी गई तब वहाँ ओबीसी राजनीति का खेल शुरू हुआ और 3 लोकसभा चुनाव में हालत यह है कि वहाँ के सारे समीकरण बदल चुके हैं.
इलाहाबाद और फूलपुर का भी वही हाल रहा कि कांग्रेस उस सीट को अपनी बपौती मानती रही कि ओबीसी भेंड़ बकरी है, इसको टिकट क्यों देना भला? लेकिन समाजवादी पार्टी और बसपा ने समीकरण बदल दिया. मेजा में करवरिया गिरोह का राज चलता था, जहाँ विश्वनाथ प्रताप सिंह की छोटी सी मांडा रियासत थी. वहाँ सपा ने छात्र नेता रहे संदीप पटेल को टिकट दिया और सारी माफियागिरी, सारी सवर्ण बहुलता घुस गई.
उत्तर प्रदेश पोलिटिकल अवेयर स्टेट है. यहाँ हवाबाजी नहीं चलती, जनता तत्काल उठाकर बाहर कर देती है सत्ता से. और इस जागरूकता के प्रसार में चुटकी भर योगदान अनुप्रिया का भी है. आलोचना से परे कोई नहीं है लेकिन मूर्ख की तरह लिहो लिहो करना गलत है. अनुप्रिया पटेल अपने विचारों को लेकर साफ हैं, कर्मों मे साफ हैं. आपने उनको जितना दिया है, जितनी ताकत दी है, उतने में अपनी औकात से ज्यादा आपके लिए संघर्ष करती हैं, मुझे ऐसा लगता है. आप उनसे यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह मुख्यमन्त्री या प्रधानमन्त्री के पावर से काम करें.
अनुप्रिया संघियों के साथ हैं, मेरे लिए कोई खुशी की बात नहीं है. माई बिटिया आपस में लड़ती हैं यह तो उससे भी ज्यादा दुख की बात है. लेकिन जो अच्छाई है वह भी अपनी जगह है. अनुप्रिया पटेल कोई सिल्वर स्पून लेकर नहीं जन्मी. पिता ने संघर्ष किया और वह विरासत है लेकिन विधानसभा और लोकसभा की राजनीति में जगह बनाना उनकी अपनी उपलब्धि है.
नोट: मैं अनुप्रिया पटेल से कभी मिला नहीं हूँ. वह मेरी मित्र नहीं हैं. हाँ, संसद में ओबीसी आरक्षण के मसले पर उन्होंने बहुत साल पहले एक बार मेरी किताब "मण्डल कमीशन:राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी पहल" को कोट किया था. मैंने कभी अनुप्रिया पटेल से मिलने की कोशिश तक नहीं की है. आज संसद मे बोलते हुए उनकी फोटो न्यूज एजेंसी पीटीआई ने जारी की थी तो दिमाग में ढेर सारी बातें घूम गई. ऐसा लगा कि लिखना चाहिए तो लिख दिया.