22/12/2025
✍️✍️ अकेले की उड़ान
गांव के किनारे बसे एक छोटे से झोपड़े में रामू का जन्म हुआ था। मां का दूध पीते ही उसके पिता की मजदूरी करते हुए ट्रक के नीचे दब जाने से मौत हो गई। रामू तब महज तीन साल का था। मां ने आंसुओं से भरी आंखों से उसे सीने से लगाया, लेकिन किस्मत ने फिर करवट ली। एक साल बाद मां को टीबी ने लील लिया। गांव वालों ने रामू को अनाथ आश्रम भेज दिया। वहां से शुरू हुई रामू की जिंदगी की जंग, जहां न कोई अपना था, न कोई सहारा।
आश्रम में रामू बड़ा होता गया। सुबह चार बजे उठना, झाड़ू लगाना, बर्तन धोना—यह उसका रोज का रूटीन था। बड़े बच्चे उसे तंग करते, छोटे उसका मजाक उड़ाते। लेकिन रामू के दिल में एक जज्बा था। रात को जब सब सो जाते, वह तेल के दीये की रोशनी में पुरानी किताबें पढ़ता। आश्रम के एक बुजुर्ग चाचा जी ने उसे पहली किताब दी—'भगवद्गीता'। "बेटा, कर्म करो, फल की चिंता मत करो," उन्होंने कहा। रामू ने मान लिया।
बारह साल की उम्र में आश्रम से निकाल दिया गया। "अब तू बड़ा हो गया, खुद कमाओ," वार्डन साहब ने कहा। रामू ने नर्णौंद के बाजार में चाय की टपरी पर काम शुरू किया। सुबह चार से रात दस बजे तक चाय बनाता, ग्राहकों की थाली सजाता। मजा आता जब कोई ग्राहक टिप दे देता। लेकिन पैसे बचाने का सपना था—पढ़ाई का। रात को चाय के स्टॉल के पीछे बैठकर वह सरकारी स्कूल की किताबें चुराकर पढ़ता। पड़ोस का एक टीचर साहब ने उसकी लगन देखी और मुफ्त ट्यूशन देना शुरू किया।
एक दिन चाय स्टॉल पर आग लग गई। रामू ने जान बचाई, लेकिन सारा सामान जल गया। मालिक ने उसे निकाल दिया। भूखे-प्यासे सड़कों पर भटकते हुए रामू ने फैसला लिया—हरिद्वार जाऊंगा, वहां भगवान विष्णु का आश्रम है, शायद कोई रास्ता मिले। पैदल ही निकल पड़ा। रास्ते में गांव-गांव मजूरी करता, रोटी का टुकड़ा कमाता। रास्ते में एक बार डाकूओं ने लूट लिया, लेकिन रामू ने हार नहीं मानी। "मैं अकेला हूं, लेकिन भगवान मेरे साथ है," वह खुद से कहता।
हरिद्वार पहुंचा तो गंगा के घाट पर चाय बेचने लगा। वहां एक साधु बाबा ने उसे देखा। "बेटा, तेरी आंखों में आग है। पढ़-लिख जा," बाबा ने कहा। उन्होंने रामू को एक छोटे से स्कूल में दाखिला दिलाया। दिन में पढ़ाई, रात में घाट पर चाय बेचना। लेकिन पढ़ाई का शौक ऐसा चढ़ा कि रामू ने हाईस्कूल पास किया। फिर कॉलेज की परीक्षा दी। नतीजा—सरकारी स्कॉलरशिप मिली। दिल्ली चला गया।
दिल्ली की चकाचौंध ने रामू को हिला दिया। हॉस्टल में रहता, दिन में क्लास, शाम को ट्यूशन पढ़ाता। लेकिन एक रात चोरों ने हॉस्टल लूट लिया। सारी किताबें, पैसे सब चले गए। रामू रोया नहीं। अगले दिन नई किताबें उधार लीं, दोस्तों से मदद मांगी। "संघर्ष ही तो जीवन है," वह सोचता। ग्रेजुएशन में टॉप किया। फिर आईआईटी की प्रवेश परीक्षा। रात-रात भर जागकर पढ़ा। नतीजा—सिलेक्शन।
आईआईटी में रामू अब इंजीनियर बनने की राह पर था। लेकिन चुनौतियां खत्म कहां? अमीर बच्चों के बीच वह गरीब अनाथ लगता। मॉडर्न लड़कियां हंसतीं, "अनाथ का क्या भविष्य?" रामू ने जवाब किताबों से दिया। प्रोजेक्ट में नई सोलर एनर्जी मशीन बनाई, जो गांवों में बिजली पहुंचा सके। प्रोफेसर प्रभावित हुए। प्लेसमेंट में टाटा ग्रुप ने चुन लिया। सैलरी—पचास हजार महीना। रामू का सपना पूरा हो गया।
लेकिन रामू रुका नहीं। नौकरी के साथ-साथ गांव लौटा। नर्णौंद में अनाथ बच्चों के लिए एक स्कूल खोला। "मैं जो झेला, वो कोई न झेले," उसका मंत्र था। आज रामू की कंपनी सोलर पैनल बनाती है, जो पूरे हरियाणा के गांवों को रोशन कर रही है। सैकड़ों अनाथ बच्चे उसके स्कूल में पढ़ते हैं। रामू शादीशुदा है, दो बच्चे हैं, लेकिन कहता है, "मां-बाप न होने से क्या? दुनिया मां-बाप है।"
रामू की कहानी हर उस बच्चे के लिए प्रेरणा है जो अकेला महसूस करता है। संघर्ष में डूबना नहीं, उससे तैरना सीखना है। रामू ने साबित किया—न कोई जन्म देता है सफलता, न कोई मरता है उसके साथ। सफलता खुद कमाई जाती है। आज रामू कहता है, "अकेले की उड़ान सबसे ऊंची होती है।"