21/02/2026
हवस से बड़ा था लालच
रामभवन का मकसद केवल हवस को मिटाना नहीं था. बल्कि वह पैसे का भूखा था. उसने अपराध को कारोबार बना दिया था. घर के अंदर बच्चों की अश्लील तस्वीरें और वीडियो बनाए जाते. फिर वे फाइलें इंटरनेट के उस अंधेरे हिस्से में पहुंचाई जातीं, जहां पहचान छुपाकर गुनाह खरीदे-बेचे जाते हैं. वह डार्क वेब और विदेशी पोर्न साइट्स के जरिए इन वीडियो को बेचता था. ईमेल की जांच की गई तो सामने आया कि वह देश-विदेश के कई गिरोहों के संपर्क में था. यह कोई अकेला अपराध नहीं था- यह एक अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क से जुड़ा संगठित अपराध था. अगर कोई बच्चा किसी तरह का विरोध करता तो उसे उन्हीं तस्वीरों के जरिए ब्लैकमेल किया जाता. साथ ही परिवारों को भी धमकी दी जाती. इस पर गरीब परिवार, जिनके पास इज्जत ही सबसे बड़ी पूंजी थी, खामोश हो जाते और इसी खामोशी में कई साल बीत गए.
इंटरपोल से आया पहला संकेत
17 अक्टूबर 2020 को भारत की प्रमुख जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को एक चौंकाने वाली सूचना मिली. यह सूचना अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन इंटरपोल से आई थी. एक पेन ड्राइव में 34 बच्चों से जुड़े वीडियो और 679 तस्वीरें थीं. डिजिटल ट्रैकिंग से पता चला कि इनका स्रोत बुंदेलखंड का एक सरकारी इंजीनियर है. 31 अक्टूबर 2020 को नई दिल्ली में केस दर्ज हुआ. जांच की कमान डीएसपी अमित कुमार को सौंपी गई. अब तक जो अंधेरा घर की चारदीवारी में छुपा था, वह जांच की रोशनी में आने लगा.
इस दिन हुआ था गिरफ्तार
16 नवंबर 2020 को इस पूरे मामले से परदा हट गया. चित्रकूट की एसडीएम कॉलोनी को सीबीआई की 10 सदस्यीय टीम ने चुपचाप घेर लिया. दरवाजा खुला तो अंदर जो मिला, उसने जांच अधिकारियों तक को हिला दिया. 8 मोबाइल फोन, एक लैपटॉप, पेन ड्राइव, मेमोरी कार्ड, सेक्स टॉयज, 8 लाख रुपये नकद और डिजिटल फोल्डरों में छुपी 66 वीडियो और 600 से ज्यादा तस्वीरें. कुछ ही दिनों बाद दुर्गावती भी गिरफ्तार कर ली गई.गवाही ऐसी कि कांप गई रूह
अब यह मामला केवल स्थानीय पुलिस का नहीं रहा था. यह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अपराध का केस बन चुका था. जांच के दौरान कई बच्चों को मेडिकल जांच के लिए एम्स दिल्ली भेजा गया. डॉक्टरों की टीम ने जो देखा, उसने उन्हें अंदर तक हिला दिया. कोर्ट में जब उन्होंने गवाही दी, तो शब्द कांप रहे थे. कुछ बच्चों की आंखों में स्थायी डर था. कुछ शारीरिक रूप से गंभीर रूप से आहत थे. मगर, सबसे गहरा घाव उनके मन पर था. कई बच्चे अब भी अंधेरे कमरे से डरते थे. किसी अजनबी की मुस्कान उन्हें सिहरन दे जाती थी. कोर्ट में पेश हुए 25 पीड़ित बच्चों ने जब बयान दिए, तो पूरा माहौल भारी हो गया. यह केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं थी, यह मासूमियत की चीख थी.
24 फरवरी 2021 को बांदा कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की गई.
2023 में आरोप तय हुए. रामभवन और दुर्गावती ने खुद को निर्दोष बताया.
5 जून 2023 से विशेष पॉक्सो कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई.
74 गवाह पेश हुए. बच्चे, डॉक्टर, शिक्षक, डिजिटल विशेषज्ञ सब शामिल थे.
हर गवाही के साथ अपराध का एक नया पहलू सामने आता. हर डिजिटल सबूत अदालत के सामने एक और दरवाजा खोलता, जिसके पीछे घिनौनी सच्चाई छुपी थी.
अब मिला न्याय
20 फरवरी 2026 का सबसे ज्यादा दिन अहम था. इसी दिन इन मासूमों को न्याय मिला. बांदा की विशेष पॉक्सो अदालत में 163 पन्नों का फैसला पढ़ा गया. जज प्रदीप कुमार मिश्रा ने कहा कि यह अपराध विरल से विरलतम की श्रेणी में आता है. कोर्ट ने दोनों दोषियों को मौत होने तक फांसी पर लटकाए जाने की सजा सुनाई. वहीं, हर पीड़ित बच्चे को एक-एक लाख रुपये की क्षतिपूर्ति दिए जाने को कहा. राज्य और केंद्र सरकार को 10-10 लाख रुपये सहायता देने का आदेश दिया. फैसले के समय कोर्ट में सन्नाटा था. यह केवल सजा नहीं थी. यह समाज की ओर से एक संदेश था कि मासूमियत के खिलाफ अपराध को बख्शा नहीं जाएगा.