02/11/2020
बिहार चुनाव: यह राजनीति है या फिर नेताओं के चाल, चरित्र और चेहरे का रिपोर्ट कार्ड
- उम्मीद कीजिए...10 नवंबर की शाम नई भोर होगी और कुछ पुराने रिपोर्ट कार्ड किनारे रख दिए जाएंगे
बिहार में चुनावी बयार बह रही है। इस बयार में क्या नेता, क्या दल, क्या गठबंधन...बयानों और घोषणाओं के तूणीर से छलावों के तीर बरस रहे हैं। अपने सुनहरे भविष्य, अच्छे वर्तमान के लिए चुनाव होना है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग के मुद्दे विपक्ष और अन्य दलों के लिए अहम हैं। इन्हीं मुद्दों पर विपक्ष राजद के साथ केंद्र में सत्ता की साझीदार बनी लोजपा भी मुखर है। जाप, रालोसपा और महागठबंधन के घटक दल भी बरस रहे हैं, लेकिन एनडीए के लिए ये मुद्दे अहम नहीं। चुनाव लोकसभा के हों या फिर विधानसभा...एनडीए के लिए मुद्दे तो राष्ट्र केंद्रित ही हैं। हाल ही में एनडीए ने रिपोर्ट कार्ड जारी किया।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने, अयोध्या में राम मंदिर की नींव रखने को उपलब्धि बताई। केंद्रीय स्तर पर यह वाकई एनडीए की उपलब्धि है, लेकिन बताना तो यह भी होगा कि आखिर बिहार में सत्ता की साझेदार बनी एनडीए ने विकास की कितनी बड़ी लकीर 15 साल में खींची? रिपोर्ट कार्ड में एनडीए कह रहा है, 15 साल में 13 नए पुलों में दो बन गए। 8 निर्माणाधीन हैं। तीन प्रस्तावित हैं। इन दावों में आश्चर्य यह भी है कि 15 साल की सरकार में सिर्फ 2 पुल ही बन सके? इस देश में जहां 18-24 माह में कई पुल बनकर तैयार हो जाते हैं, वहां 15 साल में दो ही पुल? कोसी महासेतु पर रेल महासेतु के बनने से मिथिलांचल से जुड़ाव के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन यह भी तो सच है कि यह प्रोजेक्ट तो रक्षा मंत्री रहे जार्ज फर्नाडीस और प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में प्रस्तावित हुआ था। इस पर काम भी शुरू हो चुका था। पुराने प्रोजेक्ट को गति देना तो आने वाली सरकारों का नैतिक दायित्व है। इसे खुद की उपलब्धि बता देना कितना न्यायोचित?
जनता जब भी नई सरकार चुनती है तो एक नई उम्मीद के साथ...अच्छे भविष्य, बेहतर वर्तमान के लिए...इस पर कितने खड़े उतरे...यह बताना लाजिमी है...पर इस चुनाव में यह सब गौण है। नीतीश बाबू और एनडीए की सरकार में बिहार की सड़कें अच्छी हुईं, यह सच है, लेकिन पिछले 5-7 बरसों में जर्जर भी हो गई, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। इसे ऐसे समझिए कि पटना-गया सड़क की बदहाली पर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस पटना से गया जाने के बाद अपनी गाड़ी गया में ही छोड़कर ट्रेन से वापस लौटे थे। उन्होंने सड़क की दुर्दशा पर गहरी नाराजगी जतायी। उन्होंने कहा था कि वहां जाने के बाद उनकी हिम्मत सड़क से लौटने की नहीं हुई। ऐसी ही स्थिति एनएच-106, 107 की भी रही। डबल इंजन की सरकार में ऐसी दुर्दशा पर नेता अपनी जिम्मेदारी से भाग रहे हैं। यह कैसा चेहरा है?
यह भी एक चरित्र है
बिहार में चल रही डबल इंजन की सरकार में ही 264 करोड़ का पुल गोपालगंज के सत्तरघाट में बना। 16 जून को नीतीश बाबू ने इसका उद्घाटन किया और ठीक 29वें दिन पुल का एक हिस्सा ढहने से खुल गया। यह धवस्त हो गया। लोगों का लालछापर, मुजफ्फरपुर, मोतिहारी, बेतिया जाने का लिंक बंद हो गया। यह भी तो सत्ता का ही एक चरित्र है।
यह भी तो एक रिपोर्ट है, इसे क्यों छिपाते हैं, दुरुस्त तो कर लेते
इंडियन ब्रिज मैनेजमेंट सिस्टम ने देशभर के हाईवे पर बने 1 लाख 60 हजार पुलों का डेटा तैयार किया था। इसके अनुसार, देशभरके हाईवे पर बने 147 पुल इतने जर्जर हैं कि कभी भी गिर सकते हैं। इनमें से 40 अकेले बिहार में हैं। इन पर आवाजाही हो रही है। यह भी तो हमारे माननीयों के ही रिपोर्ट कार्ड हैं। इसे क्यों छिपाते हैं...कम से कम दुरुस्त ही कर लेते?
बदहाल शिक्षा की नींव भी सुशासनराज में ही पड़ी
- राज्य के ज़्यादातर सरकारी स्कूलों में बिजली कनेक्शन नहीं है, पंखे नहीं हैं?
- बच्चे अब भी ज़मीन पर बैठकर पढ़ाई करते हैं?
- 52 बच्चों पर एक शिक्षक हैं, जबकि मानक के अनुसार 40 बच्चों पर एक शिक्षक होना चाहिए
- बिहार सरकार के सभी स्कूल नेतरहाट विद्यालय के मॉडल पर बने सिमुलतला जैसे क्यों नहीं हैं?
शिक्षक सिर्फ वोट बैंक बन गए
2000 तक बीपीएससी से नियमित शिक्षकों की बहाली हुई थी। नीतीश जी आए तो शिक्षा मित्र बहाल हो गए। 2003 में पहली बार शिक्षकों का नियोजन हुआ। अभी 3.19 लाख नियोजित शिक्षक हैं, जबकि 70 हजार ही नियमित शिक्षक हैं। यहीं से एजुकेशन सिस्टम में गड़बड़ी शुरू हुई। नियोजन की प्रक्रिया में कई खामी थी। मुखिया, सरपंच, सचिव मिलकर अपने चहेतों को शिक्षक बना रहे थे। अब नियोजित 3.19 लाख शिक्षक हैं। वे वोट वैंक है। जिन्हें सरकार बनानी हो, वह इसकी उपेक्षा नहीं कर सकता।