22/09/2026
आर्काइव | 23 मई, 2019 की सुबह जब देशभर के लोग टीवी पर लोकसभा चुनाव के परिणाम देख रहे थे, तब मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल में अफ़रा-तफ़री का माहौल था. पिछली रात क़रीब 7 बजे, अस्पताल के प्रसूति एवं स्त्रीरोग विभाग में द्वितीय वर्ष की स्नातकोत्तर छात्रा जूनियर रेजिडेंट पायल ताडवी अपने हॉस्टल के कमरे में छत के पंखे से लटकी हुई पाई गई थीं. 22 मई को ऑपरेशन थिएटर में अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद पायल आराम करने के लिए अपने कमरे में गई थीं. दोपहर 3.30 बजे उन्होंने अपनी मां अबेदा से बात की और उन्हें बताया कि कैसे उनके वरिष्ठों ने उन्हें अपमानित किया था. यह मां से उनकी आख़िरी बातचीत थी. शाम 7 बजे तक जब किसी के भी फ़ोन का कोई जवाब नहीं मिला, तब उनके कमरे का दरवाज़ा ज़बरदस्ती खोलना पड़ा.
पुलिस ने पहले आकस्मिक मृत्यु का मामला दर्ज किया था, लेकिन अबेदा की शिकायत पर उसने प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की. पुलिस ने सीनियर छात्राओं, हेमा आहूजा, भक्ति मेहरे और अंकिता खंडेलवाल, पर आत्महत्या के लिए उकसाने और भारतीय दंड संहिता, महाराष्ट्र रैगिंग निषेध अधिनियम, सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत आरोप लगाए. अगले कुछ महीनों में घटना से जुड़े और तथ्य सामने आए जिनसे पता चला कि कैसे तीनों ने पायल को उनकी जाति के कारण परेशान किया.
अदालत में दिए गए अपने बयानों और दलीलों में, अबेदा ने कहा है कि उन्होंने, पायल और पायल के पति ने कॉलेज प्रशासन और शिक्षकों को चल रहे उत्पीड़न के बारे में सूचित किया था. अबेदा की वकील दिशा वाडेकर ने मुझे बताया, ‘अगर पायल के पास कोई ऐसा मंच होता जहां वह अपनी चिंता व्यक्त कर सकती, जिससे कोई समाधान या जांच हो सकती थी, तो शायद पायल यह फ़ैसला नहीं लेतीं.’ वाडेकर ने कहा कि उन्होंने यूजीसी की वेबसाइट की छानबीन की कि क्या ऐसा कोई प्लेटफॉर्म मौजूद है. वाडेकर को वेबसाइट के एक कोने में 2012 के नियम दिखाई दिए. उन्होंने मुझसे कहा, ‘ये नियम थे, दिशानिर्देश नहीं. यह अनिवार्य था कि प्रत्येक कॉलेज एक समान अवसर प्रकोष्ठ स्थापित करेगा.’
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