02/11/2024
🌾 *खरिप फसलों के जावा (निवोद/भोग) चढाने, खुशियों और मनोरंजन का पंडूम दिवारी/दियारी/देवारी पंडूम !* 🤼♀️
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👍 *गोंड समुदायों की दिवारी उत्सव गोंड नायकों की हत्याओं के जश्न से सबंध नही है । दिवारी उत्सव दसरे को गोंडी नृत्यो के अधिष्ठाता दस रावपेनों (राउड) की पुजा से शुरु होकर पुर्णिमा से अगली पुर्णिमा को संभू-गवरा के विवाहतक चलता है । दिवारी उत्सव महज एक या पाच दिनो का नही है पुरे एक माह चलता है ।*
*गोंड समुदाय के मौसमी फसलों के आधार पर वार्षिक चक्र के दो भाग होते है । उष्मकालीन खरिप फसलें और शीतकालीन रबी फसलों का बुआई पूर्व जमीन तैयार करने से लेकर फसल निकलने तक का समय पांच-पांच महिनों का माना जाता है । खरिप फसलों का काल अश्विन पूर्णिमा तक और रबी फसलों का काल फागुन पूर्णिमा तक होता है । इन अंतिम पूर्णिमाओं के आगे के अमावस तक का पखवाड़ा नारपेनों , दाईशक्तियो को जावा(निवोद/भोग) चढाने और आगे बुआई जानेवाली फसलों के बरकत की कामना करने का होता है । इन्ही को दिवारी(दियारी) , धुराडी(शिमगा), कोलटा पंडूमो के रुप मे मनाया जाता है । इन अवसरोंपर खेती कार्यों से फुरसत मिलने के कारण दंडारी, घुसाडी, हुलकी, करमा आदि नृत्यो उत्सवों के माध्यम से मनोरंजन कर खेती कार्यों से थकान दूर कर चेतना लायी जाती है । इन अवसरोंपर होनेवाले नृत्य उत्सवों और मंडियों के माध्यम से विवाह योग्य युवा युवतियों को अपना साथी चुनने का अवसर मिलता है ।*
👉🏻 *गोंड समुदाय मे दिवारी महोत्सव की मान्यताएं :-*
*१)वर्षाकालीन फसलो का चक्र पुरा होता है और फसल निकालकर खाने के लिए इस्तेमाल मे लाने से पूर्व अपने इष्ट पेनों को नये फसलो का निवोद/भोग दिवारी मे चढाना । धन की बरकत देनेवाली येरुंग प्रकार की दाईयो (लग+सीमी) को नये फसल का निवोद चढाकर अगले शीतकालीन फसलो की अच्छी कामना करना ।अपने घर के गाय, भेस, बकरी आदी पशूओं की भी धन के रुप मे पुजा की जाती है ।*
*२)अपने इष्ट पेन संभू गवरा (तुलसा) के जीवन मे इस अवधी मे घटित मिलन और विवाह की घटना को इसर-गवरा उत्सव के रुप मे दिवारी के माह मे मनाना । बाद के पुनम को विवाह संपन्न का उत्सव मनाना । यह उत्सव वर्षाकालीन फसल चक्र पुरा होने के कारण पुनः उर्जावान बनने के लिए खुशी और मनोरंजन के रुप मे मनाया जाता है ।*
*३)गोंडी नृत्यो के अधिष्ठाता पेन/देव येत्मासूर पेनों की याद मे घुसाडी,दंडारी,हुलकी,करमा,ढेमसा आदी नृत्यों का आयोजन करना । रोजमर्रा की जिंदगी से निजात पाकर मनोरंजन और खुशी के माध्यम से पुनः उर्जावान बनना । सयुंग/पाच सगाओ के राउड पेन और मानकोदाई के जीवन मे घटित मिलन और विवाह की घटना को दंडारी नृत्य के माध्यम से याद करना । मानकोदाई का विवाह दिवारी के बाद के पुनम को हुआ था ।*
👉🏻 *खरिप फसलों का जावा पंडूम दिवारी (दियारी):-*
*दिवारी (दियारी) पंडूम का अर्थ ठंड दिनों का पंडूम (दिवा/दिया+आरी) होता है। जेठ माह से शुरू होनेवाला खरिप फसलों के पूर्व बुआई से काम अश्विन पूर्णिमा तक फसल निकलने तक चलता है । इस काल मे गोंड समुदाय फसलों के बुआई और देखभाल मे व्यस्त होता है । इस काल मे ली गयी धान, जवार आदि फसलें खाने के उपयोग के लिए तैयार होती है । अश्विन माह मे खरिप फसलें निकालनै का काम पुरा होता है । इन फसलों के अन्न के रूप मे इस्तेमाल करने से पूर्व अपने इष्ट नारदाई शक्तियों और नारपेनों को जावा(निवोद/भोग) चढाया जाता है । दिवारी और कोलटा पंडूम नारदाईया और नारपेनों को निवोद चढाने का पंडूम है । ये पंडूम पांच दिनोंतक चलता है । भोग चढाने का पंडूम होने के कारण कुछ क्षेत्रों मे इसे भोगी भी कहते है । नारपेनों के साथ साथ अन्नदाई, धनदाई, दिपदाई, जल्कादाई, भुईदाई, मालदाई, सामीदाई इन येरूंग दाईशक्तियो की निवोद चढाकर और दिये जलाकर पुजा की जाती है । बस्तर क्षेत्र मे कोलटा पंडूम नाम से दिवारी पंडूम मनाया जाता है । कोलटा पंडूम मे भी नारपेनों और नारदाईयो नये फसल का निवोद चढाकर आनेवाली शीतकालीन रबी फसलों की बरकत की कामना की जाती है । दियारी पंडूम के बाद नये अनाज का उपयोग करना शुरू हो जाता है ।*
👉🏻 *मनोरंजन और नवचेतना पाने का उत्सव देवारी :-*
*गोंड समुदाय मे खेती काम के व्यस्तता से आयी थकान से नवचेतना पाने के लिए और मनोरंजन के लिए देवारी उत्सवों का प्रयोजन किया जाता है । देवारी उत्सवों के माध्यम से व्यस्त मनुष्य को अपने घर परिवार कार्यों और मनोरंजन केलिए समय मिलता है । इन सब बातों के लिए देवारी उत्सव भी दिवारी पंडूम के साथ मनाया जाता है । उत्सव का नाम देवारी गोंड समुदाय के नृत्य देवता येत्मासूर के देवारपेदेर इस नाम से लिया गया है । देवारी उत्सव के अवसरपर गावों गावों मे गोंड समुदाय द्वारा दंडारी, घुसाडी, हुलकी, करमा आदि नृत्य उत्सवों का आयोजन किया जाता है । इन अवसरोंपर इन नृत्यों के अधिष्ठाता देवता येत्मासूर पेन की पुजा की जाती है । दंडारी, घुसाडी, हुलकी, करमा आदि नृत्यों के समुह एक गाव से दुसरे गाव अपनी नृत्यकला की प्रदर्शन के लिए जाते है । वहा उनका स्वागत कर खानेपीने का खयाल रखकर यथोचित सन्मान किया जाता है । रात मे प्रकाश के लिए दिये जलाकर इनके नृत्यों के कार्यक्रम का आनंद लिया जाता है । इसी दौरान युवा युवतियों को अपना पसंदीदा जीवनसाथी चुनने का अवसर भी मिलता है । मंडई उत्सवों का भी आयोजन इन्ही बातों का उद्देश्य रखकर किया जाता है । यहासे उनके शादी की बात आगे बढ सकती है । इसप्रकार देवारी खुशियों और मनोरंजन का पर्व है । अपने दैनंदिन कामों के व्यस्तता से छुटकारा पाने का नजरिया है ।*
*इसप्रकार गोंडो का दिवारी(दियारी) पंडूम और देवारी उत्सव खरिप फसलों जावा (निवोद/भोग) चढाने और मनोरंजन का पंडूम है । प्राकृतिक पंडूम और उत्सवों का आयोजन है । इसमे खेती और नार के खुशहाली के अधिष्ठाता पेन , गोंड समुदाय के नायकों के कुटिलता से कोयतूर (किसान) राजा बली और नार रक्षकपेन नारकासूर के हत्याओं से जोडा गया है । लेकिन इन काली करतुतों का सबंध इस पंडूम से जोडकर इसके असली रुप को मिटाया जा रहा है । इस अवसरोंपर गोंड समुदाय येरूंग दाईशक्तियो, नारपेनों की पुजा करता और मनोरंजन के लिए दंडारी, घुसाडी, हुलकी, करमा आदि उत्सवों का आयोजन करता है ।*
तिरुमाल कुशाबराव विश्वनाथ पेंदोर