Ashok Vatika Research Centre

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इस पेज के माध्यम से हम आपके साथ पेड़ पौधों से जुडी जानकारियां साझा करते हैं। पेड़ पौधों की देख-रेख, शहरी गार्डनिंग के तौर तरीके एवं बोन्साई से सम्बंधित जानकारिया, पोस्ट और वीडियो के माध्यम से साझा करते हैं। आप सभी का इस पेज पर हार्दिक स्वागत है।

दोस्तों आज नीम की तरह दिखने वाले इस बृक्ष के बारे में, इसके औषधीय प्रयोगों के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं। इ...
27/09/2026

दोस्तों आज नीम की तरह दिखने वाले इस बृक्ष के बारे में, इसके औषधीय प्रयोगों के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं। इस पेड़ की पत्तियों से लेकर, बीज से लेकर, तना एवं छाल तक बेशकीमती है। यह पूरा पेड़ ही प्रकृति की अनूठी रचना है। जिसे हम सभी बहुत कमतर आंकते हैं। चूँकि इसके बारे में चर्चा करने के लिए मेरी बचपन की जुडी यादें ही पर्याप्त है, लेकिन मैं इसके हर पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, यहाँ इसके सन्दर्भ में मौजूद सभी जानकारियों को संक्षिप्त में रखूँगा। पेज को फॉलो कर साथ में बने रहें।

दोस्तों इसकी पहली खास बात है कि यह पेड़ भारत का Native है, अर्थात भारत का देशी पेड़ है। दूसरी ख़ास बात यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ता है। तीसरी खास बात है कि इसका पेड़ बहुत ही घना और छायादार हो जाता है। चौथा यह बंजर या पथरीली जमीन में भी आसानी से उग जाता है और इसका सर्वाइवल रेट बहुत ही ज्यादा है। पांचवा इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है जिससे लोग फर्नीचर बनवाते हैं। इसकी बाकी खूबियों को हम कुछ अन्य बातों के साथ-साथ समझेंगे। शुरू करते हैं मेरे बचपन के दिनों कि यादों से। मेरे ही नहीं लगभग सभी के बचपन में एक से दो महीने, मामा के गांव में ही बीतते थे। मेरे मामा का गांव, जहां शुद्ध ग्रामीण संस्कृति और सभ्यता बसती थी। मुझे याद है गर्मी की वो लहलहाती तप्ति दोपहरी। इस पेड़ के नीचे हल्की मनोहर हवा चलती रहती थी। लोग खाट पर आराम फरमा रहे होते थे। बकरियां इसके पत्तों को बड़े चाव से खाती थी। इसके पत्ते और बीज तो ऐसे बहुत ही कड़वे होते हैं, लेकिन बकरियों को बहुत स्वादिष्ट लगते थे। उस समय बंदरों का एक छत्र राज हुआ करता था, बाग़ बगीचों में। महुआ के पेड़ों की पतली डालियों को फाड़ फाड़ कर गिरा देते थे। जिसे हमारे यहाँ चीरा बोलते थे। आम की, महुआ की पत्तो सहित डालियों (जिन्हे हम पल्लो कहते थे ) को काट देते, थोड़ा खाते और ज्यादा गिराते थे। तो लोग उन्हें उठा कर घर ले जाकर धुप में सुखाते थे। जिससे खाना बनाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। तो इन बंदरों को भगाने के लिए गुलेल (हम गुरिया गुरदेल बोलते थे) का इस्तेमाल किया जाता था। मेरे छोटे मामा इस काम में बहुत ज्यादा माहिर( कुशल, प्रवीण) थे। बहुत ही सटीक निशाना लगाते थे। तो उस समय वे मिटटी की गोलियों का इस्तेमाल बहुतायत से करते थे। लेकिन उसके विकल्प के रूप में हम इसके बीजो को भी इस्तेमाल करते थे। और गुलेल में इसके बीजो को डालकर बंदरो को मारते थे और बन्दर इस बाग़ से उस बाग़ भाग जाते थे। जो पेड़ आंधियों में उखड जाते थे। उन्हें कटवा कर, आरा मशीन से चिरवा कर, इसके पटरों से घर के फर्नीचर बनते थे, जैसे चौकी, पलंग, आलमारी, मेज और कुर्सी इत्यादि। इन पटरों की मजबूती के कारण, इनका इस्तेमाल भवन निर्माण के कामो में भी लिया जाता था।

दोस्तों इसके नाम की बात करूँ, तो इसको हमारे यहाँ बकाइन कहा जाता है। बाकि हिंदी भाषी प्रदेशों में अधिकतर लोग इसे बकैन या महानीम कहते है। कुछ जगहों पर इसे धरेक कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में चाइनाबेरी (Chinaberry) कहते हैं। इसे संस्कृत में रम्यक कहा जाता है। "रम्यक" का अर्थ होता है मनोरम, अत्यंत सुंदर या आकर्षक। इसका वानस्पतिक नाम: Melia azedarach है। और बकायन नीम की जाति या परिवार (मेलियासी) से मिलने वाला एक मध्यम आकार का पेड़ है। यह दिखने में बिल्कुल नीम जैसा ही लगता है, लेकिन इसके पत्ते नीम से कुछ बड़े और थोड़े चौड़े होते हैं। इस पर हल्के बैंगनी या गुलाबी रंग के खुशबूदार फूल गुच्छों में आते हैं और इसके फल नीम की तरह छोटे व कड़वे लेकिन गोल गोल होते हैं। आपके यहाँ इस पेड़ को किस नाम से जाना जाता है, कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं।

अब चर्चा करते हैं इसके औषधीय इस्तेमाल के बारे में। आयुर्वेद में इसकी छाल, पत्तों और फूलों का उपयोग त्वचा के रोग (जैसे दाद, खाज और खुजली) को ठीक करने के लिए किया जाता है। हालांकि, इसके बीज और फल कुछ विषैले होते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। बकायन एक जड़ी-बूटी वाला पेड़ है, तो इसके भी कई सारे औषधीय गुण हैं। आप सिर दर्द, मुंह के छाले की बीमारी, सांसों से जुड़ी बीमारियों, पेट दर्द, पेट में कीड़े होने पर बकायन के इस्तेमाल से फायदे ले सकते हैं। इतना ही नहीं, बवासीर, गालब्लैडर स्टोन, डायबिटीज, गर्भाश्य विकार से जुड़ी बीमारियों में भी बकायन के औषधीय गुण से लाभ मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, ल्यूकोरिया, सायटिका, गठिया, खुजली में भी बकायन के औषधीय गुण के फायदे ले सकते हैं। इसके अलावा आप कुष्ठ रोग, टाइफाइड बुखार, घाव, त्वचा रोग, मिर्गी और सूजन में भी बकायन से लाभ ले सकते हैं।

दोस्तों, इस वृक्ष के किसी भी हिस्से का प्रयोग उचित मात्रा में और सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यह कुछ विषैला होता है। फलों की तुलना में छाल और फूल कम विषैले होते हैं। मेरा निवेदन है की चिकित्सकीय परामर्श और देखरेख में ही इसका इस्तेमाल करें। ऐसा माना जाता है कि इसके फलों और बीजों की माला बनाकर दरवाजे और खिड़कियों पर टांगने से बीमारियों का प्रभाव नहीं होता है। इसके फलों की माला पहनने से संक्रामक रोगों से बचाव होता है। तो दोस्तों मैंने इसके उपयोग से होने वाली बिमारियों के इलाज की जानकारी आपको दे दी है, लेकिन मैं आपको इसके प्रयोग विधि को नहीं बताना चाहता। मैं चाहता हूँ की किसी अनुभवी आयुर्वेद के चिकत्सक से परामर्श कर, उनकी देख रेख में, उनके बताये अनुसार ही इसका इस्तेमाल करें।

तो दोस्तों आज की यह पोस्ट आपको कैसी लगी? आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है? क्या आपके यहाँ इसका पेड़ मौजूद है? क्या आपने कभी इसका औषधीय प्रयोग किया है ? उसका क्या परिणाम रहा ? अपना अनुभव और विचार कमेंट के माध्यम से जरूर साझा करें। ऐसी ही मजेदार पोस्ट को पढ़ने के लिए, गार्डनिंग एवं बोन्साई से जुडी जानकारियों के लिए, पेड़ पौधों से जुडी जानकारियों के लिए, मेरे इस अशोक वाटिका रिसर्च सेंटर पेज को जरूर फॉलो करें, जिससे हम साथ जुड़ें, और हमारे सभी पोस्ट आप तक आसानी से पहुँच सके। आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

आज विस्तार से बात करने वाले हैं इन अत्यंत विषैले बीजों के बारे में, जो देखने में बेहद ही खूबसूरत और चमकदार दिखते है। खूब...
25/09/2026

आज विस्तार से बात करने वाले हैं इन अत्यंत विषैले बीजों के बारे में, जो देखने में बेहद ही खूबसूरत और चमकदार दिखते है। खूबसूरती ऐसी कि आपकी ऑंखें अमूमन इन पर टिक जाएँ। आकर्षण ऐसा कि आप इन्हे स्नेह से देखें। लेकिन जैसा कि आप जानते हैं कि जो चीज जितनी अधिक खूबसूरत होती है, उतनी ही ज्यादा खतरनाक भी होती है। ठिक वैसे ही, ये बीज भी अत्यंत विषैले होते हैं। क्योंकि इनमें 'एब्रिन' (Abrin) नामक टॉक्सिन होता है। साबुत बीज का बाहरी आवरण (shell) बहुत सख्त होता है, इसलिए अगर इसे बिना चबाए पूरा निगल लिया जाए तो यह कभी-कभी बिना नुकसान पहुंचाए पेट से बाहर निकल जाता है। लेकिन बीज के टूटने या चबाने पर जहर तुरंत शरीर में फैल जाता है। यह सांप के जहर जितना खतरनाक साबित हो सकता है और महज एक या दो बीज चबाने से भी किसी वयस्क या बच्चे की मौत हो सकती है। और सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात है कि इसकी कोई एंटीडोट (जहर काटने की दवा) नहीं है। इसके अंदर मौजूद ऐब्रिन (Abrin) का सिर्फ 3 माइक्रोग्राम किसी भी इंसान की जान लेने के लिए काफी है। इसके बीज को चबाकर खाने पर गंभीर उल्टी, पेट में तेज ऐंठन, खूनी दस्त (डायरिया), गले में जलन, चक्कर आना और कुछ मामलों में अंगों का काम बंद होना (Organ Failure) शामिल हैं। ऐसी स्थिति में बिना समय गंवाए 24 घंटे के भीतर नजदीकी अस्पताल जाना चाहिए ताकि डॉक्टर चारकोल या पाइप के जरिए पेट की सफाई (Gastric Lavage) कर सकें।

जब हम छोटे थे तो गांव के पूरब साइड में खेतों में एक विशाल वरगद का पेड़ था, देखने से बहुत ही डरावना लगता था। सुनसान खेतों में वह पेड़ था। लोग उसके बारे में भूतों से जुड़े बहुत सारी कहानिया बनाये थे। लेकिन मुझे शुरू से ही सत्य का सामना करने में रूचि थी, और निर्भीकता वही से शुरू हो गयी। दस या बारह साल कि उम्र में, मैं अकेले उस पेड़ के पास चला जाता था। चारो और गेंहू और सरसो कि फसल लगी होती थी। लेकिन इस पेड़ के निचे इस पौधे कि झाड़ियां फैली होती थी। पहले मुझे नहीं मालूम था, कि ऐसा कुछ पौधा होता है। लेकिन जब मैं वहा गया था, बस उस जगह को देखने और वहां भूतों कि सच्चाई को जानने कि इक्षा से। लेकिन उस समय मुझे इसकी लताओं पर मटर या अरहर की तरह की फटी हुई फलियों में चमकते लाल पर काळा धब्बो वाले सुन्दर बीज दिखे। मैं उन्हें बड़े ही ध्यान से निरखता रहा। फिर काफी सारे बीजों को पॉकेट में भर लिया और घर लाया। घर पर दादी ने इसके बारे में थोड़ी बहुत बताया। मुझे यह बताया गया की इसके बीजो से पहले कीमती रत्नो का वजन किया जाता था और इसका माला बनता है। फिर मैंने इन बीजो को पानी में फुला कर सुई धागे की मदद से माला बनाया था।

दोस्तों इसका नाम रत्ती है। मुझे लगता है कि कामदेव कि पत्नी रत्ती कि खूबसूरती से इसकी खूबसूरती का तुलना करके ही इसका नाम रखने वालों ने इसका नाम रत्ती रखा होगा। मेरे यहां इसे करेजनी के नाम से भी जाना जाता है। रत्ती के पौधे को हिंदी में गुंजा या घुंघची (वैज्ञानिक नाम: Abrus precatorius) कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में 'रोज़री पी' (Rosary Pea) कहते हैं। यह आज भी आपको पंसारी की दुकानों पर आसानी से मिल जायेगा। इसे आप ऑनलाइन प्लैटफॉर्म्स जैसे की अमेज़न और फ्लिपकार्ट से भी खरीद सकते हैं।

रत्ती (गुंजा) के पौधे को उगाने का सबसे सही समय वसंत ऋतु (मार्च से अप्रैल) और मानसून (जून से अगस्त) का महीना होता है। इस पौधे को बीज और कलम (Stem Cutting) दोनों तरीकों से आसानी से उगाया जा सकता है। बीजों को 12 से 24 घंटे के लिए गुनगुने पानी में भिगोकर रख दें। पानी सोखने के बाद बीज थोड़े फूल जाएंगे। इसके लिए अच्छी जल निकासी वाली (Well-drained) बलुई या सामान्य बगीचे की मिट्टी लें, जिसमें थोड़ी गोबर की खाद या केंचुआ खाद (Vermicompost) मिली हो। मले या जमीन में बीजों को लगभग आधा इंच की गहराई पर दबाएं और ऊपर से हल्की मिट्टी से ढक दें। मिट्टी में हल्की नमी बनाए रखें। बीज 2 से 3 सप्ताह के भीतर अंकुरित होकर बाहर आ जाते हैं। मानसून के अंत में यानी अगस्त से अक्टूबर के बीच इस बेल पर छोटे गुलाबी, बैंगनी या सफेद रंग के फूल गुच्छों में आते हैं. फूल झड़ने के बाद इस पर हरी मटर जैसी छोटी फलियाँ (Pods) बनना शुरू होती हैं, जो सर्दियों के मौसम यानी नवंबर से जनवरी के दौरान धीरे-धीरे पककर भूरी और सख्त हो जाती हैं। सर्दियों के अंत और वसंत ऋतु की शुरुआत यानी फरवरी से अप्रैल के महीने में जब तेज धूप पड़ती है, तो ये सूखी भूरी फलियाँ अपने आप बीच से फट (फूट) जाती हैं। फलियाँ फटने के बाद उनके अंदर से चमकीले लाल-काले रंग के रत्ती के बीज बाहर की ओर दिखाई देने लगते हैं और बेल पर ही लटके रहते हैं, नीचे भी गिर जाते हैं.

प्राचीन काल में सुनार सोने और चांदी जैसी बहुमूल्य धातुओं को तोलने के लिए रत्ती के बीजों का उपयोग करते थे क्योंकि इन बीजों का वजन लगभग एक समान (लगभग 121 मिलीग्राम) होता था।

यदि पारंपरिक वजन का पैमाना की बात करूँ तो नीचे लिखे पैमानों को ध्यान से देख लीजिये। इन्ही से वजन को मापा जाता था।
1 माशा = 8 रत्ती
1 तोला = 12 माशा = 96 रत्ती
5 तोला = 1 छटांक
16 छटांक = 80 तोला = 1 सेर (लगभग 933 ग्राम)
40 सेर = 1 मन (लगभग 37.32 किलोग्राम)

पारंपरिक रूप से 1 तोला = 11.664 ग्राम (या लगभग 11.67 ग्राम) होता है। लेकिन आधुनिक समय में कई जगहों पर सर्राफा बाजार (सुनार) में आसानी के लिए 10 ग्राम को ही एक तोला मान लिया जाता है। इसे कच्ची या सुनारी रत्ती भी कहा जाता है। एक पक्की या रत्‍न रत्ती होती है, जो ज्योतिष शास्त्र और कीमती रत्नों (जैसे पुखराज, पन्ना) के लिए 182.25 मिलीग्राम की पक्की रत्ती मानी जाती है, जो कि अंतरराष्ट्रीय 'कैरेट' पैमाने के करीब होती है।

दादी जी बताती थी कि पहले जो महाजनी शिक्षा होती थी अर्थात अकाउंटेंसी, उसने इन्हीं इकाइयों को पढ़ाया जाता था। सवाल सुनेगे तो आपको मजा आएगा। एक सवाल उन्होंने बताया था कि - 80 मन का लकड़ा, उस पर बैठा मकड़ा। रति रति खायेगा तो, कितने दिन में खायेगा? यानि प्रति दिन एक रत्ती खायेगा तो पूरी 80 मन की लकड़ी को खाने में कितने दिन लग जाएंगे? अब यह सवाल आपसे भी है। ऊपर दिये यूनिट्स का प्रयोग कर इसका उत्तर निकालें और कॉमेंट में लिखें।

दोस्तों इन बीजो का आयुर्वेद में भी बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। आयुर्वेद में इसकी जड़, पत्तियों और बीजों (शोधन के बाद) का उपयोग त्वचा रोगों, बालों के विकास, और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के लिए किया जाता है। धार्मिक और तांत्रिक मान्यताओं में भी इसके बीजों का विशेष महत्व माना गया है। आप इसका चिकत्सकीय प्रयोग सिर्फ और सिर्फ चिकित्सक के परामर्श के अनुसार ही करें।

गुंजा के बीजों में मौजूद 'एब्रिन' (Abrin) नामक जहर को निष्क्रिय करने के लिए आयुर्वेद में 'दोला यंत्र' विधि का उपयोग किया जाता है। शोधन के बाद, चिकित्सक की देखरेख में गुंजा का उपयोग निम्नलिखित समस्याओं के लिए किया जाता है-

बालों का झड़ना और गंजापन: शोधित गुंजा के बीजों का पेस्ट बनाकर या इसके तेल को तिल के तेल के साथ मिलाकर सिर पर लगाने से 'इंद्रलुप्त' (Alopecia/गंजापन) में लाभ होता है और नए बाल उगने लगते हैं।

त्वचा रोग: इसके पत्तों और बीजों के लेप का उपयोग कुष्ठ (Leprosy), दाद-खाज, और जिद्दी त्वचा संक्रमण के इलाज में किया जाता है।

जोड़ों का दर्द और सूजन: इसके पत्तों को गर्म करके जोड़ों पर बांधने या बीजों के तेल की मालिश करने से गठिया (Arthritis) और साइटिका के दर्द में राहत मिलती है।

घाव सुखाने में: इसके पत्तों के रस में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो पुराने घावों को जल्दी भरने में मदद करते हैं। बिना शोधित बीजों का लेप कभी भी कटे हुए या खुले घाव पर नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि यह सीधे खून में मिलकर जहर फैला सकता है।

रत्ती से जुडी अनेकों मुहावरे हम प्रतिदिन बोल जाते है, लेकिन कभी ख्याल भी नहीं आता कि हम इसके बारे में बोल रहे हैं। जैसे "मुझे रत्ती भर भी फर्क नहीं पड़ता"। आप भी कमेंट में कुछ प्रसिद्ध मुहावरे लिखिए।

दोस्तों आज की यह पोस्ट आपको कैसी लगी? इन बीजो को आपके यहाँ किस नाम से जाना जाता है ? क्या आपने कभी इन्हे साक्षात् पौधे पर देखा है? आपने इनका प्रयोग किया है ? अपना अनुभव, राय और विचार हमारे साथ जरूर साझा करें। ऐसी ही महत्वपूर्ण जानकारियों के लिए इस पेज को फॉलो कर लीजिये। इतने ध्यान से इस पोस्ट को पढ़ने के लिए आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

24/09/2026

Beautiful Ficus Bonsai. See it's Beauty. Available for Sale. If anyone wants to buy, Please DM.

जिसे पौधे को आप इस फोटो में देख रहे हैं, यह इतना अधिक पौष्टिक है, कि यह कई मामलो में पालक से भी बहुत ज्यादा आगे है। स्वा...
23/09/2026

जिसे पौधे को आप इस फोटो में देख रहे हैं, यह इतना अधिक पौष्टिक है, कि यह कई मामलो में पालक से भी बहुत ज्यादा आगे है। स्वाद में बेमिसाल है। आज इसके फायदों को भी समझेंगे, इसके बारे में पूरी चर्चा करेंगे। यह भी बताऊंगा कि यह पालक से भी ज़्याफ़ा पौष्टिक कैसे है और किन मामलो में है।

दोस्तों इस पौधे को आप सालों भर ऊगा सकते है, और कमाल कि बात है कि इसे सीड्स अर्थात बीज के साथ साथ कटिंग से भी उगाया जा सकता है। ऐसी मिटटी में लगाएं जिसमे पानी जमा न हो। यह एक बार लगा देने से पुरे साल बेल के रूप में फैलता रहता है। इसे तेज धुप की आवश्यकता नहीं होती। छाव में यह ज्यादा तेज ग्रोथ करता है। इसकी पत्तिया मोटी और रस से भरी होती है। इसे देखने से यह सुकुलेंट्स कि पत्तियों कि तरह दिखती है। इन्हे आप अपनी बालकनी में सजा कर रख सकते है। इसकी बेल पान या मनी प्लांट कि तरह फलती रहेगी। बस इसकी डालियों को फैलने के लिए रस्सी या लकड़ियों से सपोर्ट दे दीजिये। ये सालों भर पत्तियां देता रहेगा। इसकी डाली और पत्तियां दोनों की ही सब्जी बनायीं जाती है। और इसकी सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट बनती है और मुझे बहुत ही पसंद है। इसे भारत के तटीय और पूर्वी राज्यों में दाल, करी या चने की दाल के साथ मिलाकर बनाया जाता है। इसके पौधे दो रंगो के होते है। एक शुद्ध हरा और दूसरा बैंगनी रंग के डंठल या तनाओं वाला और हरी पत्तियों वाला होता है। दोनों ही पौधों में एक समान पौष्टिकता होती है।

दोस्तों इसका नाम मालाबार स्पिनॅच (Malabar Spinach) है। इसे हमारे यहाँ पोई का साग कहा जाता है। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है? कमेंट में जरूर बताएं। इसे वैज्ञानिक भाषा में बेसेला अल्बा (Basella alba) कहते हैं। जो देसी पालक होती है वह अमरंथासाए परिवार से सम्बंधित है जबकि मालाबार पालक, असली पालक नहीं है। और यह बसेललसाए परिवार से सम्बंधित है। दोनों के वंश के साथ साथ स्वाद, जीवनचर्या और जीवनचक्र भी अलग अलग है।

पालक और मालाबार पालक दोनों में भी अच्छे मात्र में प्रोटीन पाए जाते है, तुलनात्मक रूप से मालाबार स्पिनॅच में थोड़ी ज्यादा प्रोटीन पायी जाती है। ठीक उसी तरह, दोनों विटामिन C के बेहतरीन श्रोत है लेकिन इसमें भी मालाबार स्पिनॅच, पालक से बहुत ज्यादा आगे है। १०० ग्राम पालक में मात्र 28 मिलीग्राम विटामिन C पाया जाता है, जबकि मालाबार स्पिनॅच में १०२ मिलीग्राम। अर्थात मालाबार पालक में साधारण पालक की तुलना में लगभग तीन गुना अधिक विटामिन C पाया जाता है, जो इम्यून सिस्टम (रोग प्रतिरोधक क्षमता) को मजबूत करता है। इसमें कैल्शियम की मात्रा साधारण पालक से थोड़ी अधिक होती है, जो हड्डियों को मजबूत बनाती है।

यह एक प्राकृतिक शीतलक है। इसमें मौजूद घुलनशील फाइबर और चिपचिपापन (mucilage) पेट को साफ रखने, और पाचन तंत्र को सुधारने में बेहद मददगार है। इसमें आयरन प्रचुर मात्रा में होता है, जो खून की कमी (एनीमिया) को दूर करने में मदद करता है। इसमें पालक की तुलना में विटामिन ए की मात्रा थोड़ी काम होती है, लेकिन होती है। जो की आँखों और त्वचा के लिए बहुत फायदेमंद है।

बहुत ही ज्यादा कम देख भाल, धुप की कोई आवश्यकता नहीं, और सालों भर हरी भरी, नरम और मुलायम पत्तियों के साथ साथ पौष्टिकता से भरे इस पौधे को अपने गार्डन में रखना नहीं चाहते ? कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है। आपको इसकी सब्जी पसंद है या नहीं ? अपना अनुभव, राय, एवं विचार हमारे साथ जरूर साझा कीजिये। आज की यह पोस्ट आपको कैसी लगी यह भी बताएं। आपने इतने ध्यान से इस पोस्ट को पढ़ा, आप सभी प्रिय मित्रों को बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

दोस्तों सितंबर में लगाए जाने वाले ये खूबसूरत पौधे हैं। इन्हें आप बीजों से और कटिंग से भी लग सकते हैं। जैसे ही मौसम सर्द ...
22/09/2026

दोस्तों सितंबर में लगाए जाने वाले ये खूबसूरत पौधे हैं। इन्हें आप बीजों से और कटिंग से भी लग सकते हैं। जैसे ही मौसम सर्द होना शुरू होगा ये बंपर फ्लावरिंग करते हैं। आप अपने घर, टेरेस गार्डन, या बालकनी को इन रंग बिरंगे फूलों से सजा सकते हैं।

9 Flowering Plants:
1️⃣ गुलदाउदी (Chrysanthemum)
2️⃣ गेंदा (Marigold)
3️⃣ पेटूनिया (Petunia)
4️⃣ पैंसी (Pansy)
5️⃣ डहेलिया (Dahlia)
6️⃣ कैलेंडुला (Calendula)
7️⃣ फ्लॉक्स (Phlox)
8️⃣ डायन्थस (Dianthus)
9️⃣ एंटीराइनम / Snapdragons 🌸
इन पौधों को सही sunlight, soil mix, watering और fertilizer मिलने पर अच्छी growth और flowering मिल सकती है। 🪴
💡 Gardening Tip: पौधे लगाने से पहले गमले में अच्छी drainage और पौष्टिक potting soil जरूर रखें।

यदि आपको इनसे जुड़ा कोई सवाल हो तो कमेंट में बताएं। हम आपको रिप्लाई जरूर करेंगे। धन्यवाद 🙏

इस पौधे को देखकर आपको बताना है की आखिर यह पौधा है कौन सा? समय मात्र 10 सेकंड है। खुद से खुद को चेक करना है। मैं तो यहाँ ...
22/09/2026

इस पौधे को देखकर आपको बताना है की आखिर यह पौधा है कौन सा? समय मात्र 10 सेकंड है। खुद से खुद को चेक करना है। मैं तो यहाँ इसकी पूरी जानकारी निचे लिखने वाला हूँ ही, तो इस जानकारी से अपनी जानकारी को जांचिए। फिर कमेंट में बताइये कि आपने जो अंदाजा या अनुमान लगाया था, वो सही था या फिर गलत। जानकारी न होना बुरी बात नहीं, अगर नहीं है तो स्वीकारने में क्या हर्ज़? सब जानकारी सबके पास होने जरुरी नहीं। जरुरी है सीखना, जानना, और नयी चीजों को जानने के लिए उत्सुक रहना। इससे हमारे लिए सिखने के द्वार खुल जाते हैं, नयी जानकारियों को पाने के रास्ते खुल जाते हैं। इंटरनेट पर खोजने पर तुरंत पूरी जानकारी मिल जाएगी। लेकिन उससे क्या हासिल होगा? इस आदत के कारण हमारा आईक्यू स्तर कम हो रहा है। मस्तिष्क को सोचने देना, या परिश्रम करने देना चाहते ही नहीं हम। पढ़ना चाहते नहीं हम। और इसी कारण से ऐआई और इंटरनेट वाली पीढ़ी का दिमागी विकास अवरुद्ध हो रहा है।

दोस्तों इसकी खेती कम लागत और कम पानी में अधिक मुनाफा देने वाली एक प्रमुख तिलहनी फसल है। यह मुख्यतः खरीफ की फसल है, बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से जुलाई के मध्य तक सबसे अच्छी होती है। घर में उपयोग होने वाली तिल से भी यह पौधा उग आता है, और इसमें भारी पैदावार होती है। जैसा की फोटो में आप देख पा रहे हैं कि एक पौधे में कितने सारी फलियां लगी है और हर फली दानों से भारी हुई रहती है। इसे आप गमले में भी ऊगा सकते है।

दोस्तों इस पौधे का प्रयोग हर घर में होता है। पारम्परिक चीजों से लेकर, औषधीय चीजों से लेकर, धार्मिक चीजों से लेकर, सामान्य खान पान में भी इसका बड़ा ही महत्व है। सबसे पहले मैं शुरुआत कर रहा हूँ उससे, जो मुझे बहुत ही पसंद है। जी इसके लड्डू। मुझे इसके लड्डू बहुत ही पसंद हैं। मकर संक्रांति के समय इसके लड्डू बनाये जाते हैं, गुड़ में मिलाकर। यह तीन रंगो में होता है, एक सफ़ेद, दूसरा काला, और तीसरा भूरा/लाल रंग का। शहरों में ज्यादातर सफ़ेद वाली किस्म ही बिकती और लोग खरीदते हैं। कुछ मेरे दोस्त तो यह मानने को तैयार नहीं थे, कि यह काले रंग की भी होती है। लेकिन अब मुझे काले रंग वाली किश्म भी मिल जाती है और मुझे वही ज्यादा पसंद है।

दोस्तों इसका नाम तिल है। अंग्रेजी में Sesame कहा जाता है और हिंदी में 'तिल'। तिल एक प्राचीन और बेहद पौष्टिक तिलहन फसल है। यह बहुत पौष्टिक होता है, जिसके बारे में आगे विस्तार से इसी पोस्ट में चर्चा करने वाले हैं। इसे हल्का भूनकर सलाद, सूप, दही या सब्जियों में डालकर भी खाया जाता है। सर्दियों में इसके लड्डू या चिक्की बहुत पसंद किए जाते हैं। तिल की तासीर गर्म होती है, इसलिए यह सर्दियों के मौसम में शरीर को अंदर से गर्म रखने और ठंड से बचाने में बहुत मदद करती है। यह शरीर में वात और कफ दोष को कम करने में मददगार है।

सफेद वाली तिल का उपयोग सबसे ज्यादा मिठाइयों (जैसे लड्डू, गजक, चिक्की) को बनाने में होता है। हमारे यहाँ एक मिठाई बनती है जिसके ऊपर इस सफ़ेद वाली तिल चिपकी रहती है, उसका नाम है "अनारसा मिठाई"। मुझे यह मिठाई बहुत पसंद है। जबकि काली तिल को आयुर्वेद में ज्यादा गुणकारी और पौष्टिक माना जाता है, जबकि सफेद तिल मध्यम और लाल तिल सामान्य गुणों वाले होते हैं। भूरा/लाल वाली तिल का उपयोग कुछ विशेष व्यंजनों और बेकिंग में किया जाता है।

दोस्तों तिल का तेल (Sesame oil) को भी खाया जाता है और यह सेहत के लिए बहुत फायदेमंद माना जाता है। शुद्ध कच्ची घानी या बिना भुने तिल के बीजों से निकला हुआ तिल का तेल खाना पकाने, तलने और सलाद में इस्तेमाल किया जाता है। भुने हुए तिल के तेल का उपयोग एशियाई व्यंजनों में स्वाद और खूशबू बढ़ाने के लिए किया जाता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन ई और हेल्दी फैट होते हैं जो दिल और हड्डियों की सेहत के लिए अच्छे होते हैं।

हालांकि, बाजार में मिलने वाले कुछ तिल के तेल केवल मालिश (बॉडी मसाज) के लिए होते हैं, इसे खाने में प्रयोग न करें। क्यूंकि कई आयुर्वेदिक और यूनानी 'टिला ऑयल' (जैसे गुप्त अंगों की मालिश या सहनशक्ति बढ़ाने के लिए) विशेष जड़ी-बूटी जैसे अश्वगंधा और केसर मिलाकर तैयार किए जाते हैं। इसलिए खाने के लिए हमेशा खाद्य (Edible) और शुद्ध कच्ची घानी तिल का तेल ही चुनें।

कुछ विशेष हर्बल 'तिल ऑयल' पुरुषों की शारीरिक कमजोरी, जोड़ों के दर्द और मालिश के लिए भी बनाए जाते हैं। आयुर्वेद में तिल के तेल से मालिश को वात दोष शांत करने और हड्डियों-मांसपेशियों को मजबूत बनाने के लिए श्रेष्ठ माना गया है। घुटनों, जोड़ों और पीठ के दर्द में इस तेल की मालिश से राहत मिलती है।

तिल के पौस्टिक गुणों की बात करें तो इसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम और मैग्नीशियम होता है, जो हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाता है। इसमें स्वस्थ फैट और प्रोटीन होते हैं जो शरीर को ऊर्जा देते हैं। यह त्वचा की नमी बनाए रखता है और बालों को पोषण देता है। इसमें मौजूद हेल्दी फैट्स और एंटीऑक्सीडेंट कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करते हैं। यह डायबिटीज या शुगर के मरीजों के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। एक सामान्य वयस्क रोजाना 1 से 2 बड़े चम्मच (10–20 ग्राम) तिल खा सकता है। इसे हल्का भूनकर सलाद, सूप, दही या सब्जियों में डालकर खाया जाता है। सर्दियों में इसके लड्डू या चिक्की बहुत पसंद किए जाते हैं। सर्दियों के मुकाबले गर्मियों में इसकी मात्रा आधी कर दें. रोजाना आधा से एक छोटा चम्मच ही लें।

तो दोस्तों आज की यह पोस्ट आपको कैसी लगी ? कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं। इसे आपके क्षेत्र में किस नाम से जाना जाता है यह भी बताएं। क्या आपने घर पर तिल के पौधे लगाएं है? आपको तिल का कौन सा व्यंजन ज्यादा पसंद है। हमारे साथ अपने अनुभव जरूर साझा करें। इतने ध्यान से आपने इस पोस्ट को पढ़ा, आप सभी ह्रदय की गहराइयों से बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

21/09/2026

🌙 A magical garden moment at 10 PM! 🌸

This is Parijat, also known as Harshringar. Unlike most flowers, it blooms at night and naturally falls to the ground before morning. Its delicate white flowers carry a soft, beautiful fragrance that makes a night visit to the garden truly special. 🌿✨

And one interesting fact: Parijat is different from the plant commonly called “Raat Ki Rani.”

Have you ever seen Parijat blooming at night? 🌸

एक चूक और एक ही परिवार की तीन महिलाओं की मौत। इस पौधे के बारे में अक्सर आप पढ़ते रहते होंगे की बहुत ही कमाल की आयुर्वेदिक...
21/09/2026

एक चूक और एक ही परिवार की तीन महिलाओं की मौत। इस पौधे के बारे में अक्सर आप पढ़ते रहते होंगे की बहुत ही कमाल की आयुर्वेदिक औषधि है। लेकिन यदि आप बिना चिकित्सकीय परामर्श के इस्तेमाल करते हैं तो आपकी मौत भी हो सकती है। और सबसे जरुरी बात यह है कि ऐसी औषधियों को बच्चो की पहुंच से दूर रखें, या फिर सुरक्षित जगह रखें जिससे कि कोई इसका दुरुपयोग न कर सके।

मामला उत्तर प्रदेश के बलिया का है। एक के बाद एक घर कि तीन महिलाओं की मौत हो गयी। यह दुखद घटना बलिया के बिल्थरा रोड तहसील के पशुहारी गांव की है। इस घटना में मां जोनिया देवी (80 वर्ष), पत्नी आशा देवी (45 वर्ष) और बेटी प्रीति (24 वर्ष) की इलाज के दौरान मौत हो गई। अर्थात तीन पीढ़ियां काल के गाल में समां गयी। 29 अगस्त 2026 को आशा देवी की मौत हो गई। इसके बाद 1 सितंबर 2026 को उनकी 80 वर्षीय मां जोनिया देवी की मौत हो गई। परिवार के लोग अंतिम संस्कार से लौटे ही थे कि उसी दिन वाराणसी के ट्रॉमा सेंटर से 24 वर्षीय बेटी प्रीति की मौत की सूचना मिली। एक के बाद एक तीन मौतों से परिवार में मातम छा गया। मामले को विस्तार से समझ लेते हैं।

डाक्टरों ने शिवचंद की जांचें भी कराई लेकिन कोई कारण समझ में नहीं आया। इसके बाद सलेमपुर सांसद रमाशंकर राजभर की पहल पर परिवार के बचे सदस्यों शिवचंद और उनके बेटे मनन को इलाज और बीमारी का कारण पता लगाने के लिए एम्स गोरखपुर भेजा गया। जहां जांच के बाद शरीर में जहरीले अंश सामने आने के बाद डाक्टरों ने शिवचंद के भतीजे चंदन से पूछताछ की। चंदन ने पूरी घटना का जिक्र करते हुए एम्स के डाक्टरों को ‘सत्यानाशी’ के बीज की जानकारी दी। डॉक्टर ‘सत्यानाशी’ को ही तीन मौतों और तबियत बिगड़ने का कारण मान रहे हैं। गोरखपुर AIIMS में हुई इस जांच में ड्रॉप्सी बीमारी की पुष्टि हुई है। एम्स की टीम ने तेल की सैम्पलिंग कराते हुए रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग को भेज दी।

हुआ ये था कि परिवार के मुखिया शिवचंद राजभर घुटने के दर्द से राहत पाने के घरेलू उपचार के लिए कर्नाटक से सत्यानाशी के बीज लाए थे। उन्होंने बीजों से करीब 7-8 किलो तेल निकलवाया था। इसका इस्तेमाल वे लंबे समय से दर्द और अन्य बीमारियों के घरेलू उपचार के तौर पर कर रहे थे। चिकित्सकों का मानना है कि परिवार की तीन महिलाओं ने इसे सरसों के तेल की जगह इस्तेमाल किया, जिससे उनमें ड्रॉप्सी के लक्षण विकसित हुए। बीमारी बढ़ने के साथ उनकी हालत गंभीर होती गई और इलाज के दौरान तीनों की मौत हो गईं।

शिवचंद के बेटे मनन में बीमारी के लक्षण नहीं मिले। बताया गया कि वह ज्यादातर समय घर से बाहर रहता था। एहतियात के तौर पर उसे चिकित्सकों की निगरानी में रखा गया। उपचार के बाद शिवचंद और मनन की हालत में सुधार होने पर दोनों को एम्स से डिस्चार्ज कर दिया गया।

दोस्तों यह पोस्ट जागरूकता को ध्यान में रखकर लिखा गया है। हमारा इस पोस्ट को लिखने का एकमात्र उद्देश्य पारम्परिक चिकित्सा प्रणाली में उपयोग किये जाने वाले दवाओं को लेकर आगाह करना है। इस पोस्ट में लिखी सारी जानकारियां प्रामाणिक है। एक चूक ने इस परिवार को ही ख़त्म कर दिया। तो दोस्तों औषधि को लेकर सही चिकित्सकीय परामर्श और निगरानी में ही इस्तेमाल करें। उसे सही स्थान पर रखें, जिससे उसका दुरुपयोग न हो।

इस पोस्ट को अधिक से अधिक शेयर करें, जिससे लोगो में जागरूकता फैले। हम सभी के कुशल एवं स्वस्थ होने की कामना करते हैं। इस पोस्ट के बारे में अपनी राय और विचार कमेंट के माध्यम से साझा कर सकते हैं। धन्यवाद 🙏

मैंने कभी नहीं सोचा था, कि इस पौधे के ढेर सारे औषधीय उपयोग होते हैं। हम तो इन्हें अभी तक सिर्फ जंगली घास समझते थे। मेरे ...
21/09/2026

मैंने कभी नहीं सोचा था, कि इस पौधे के ढेर सारे औषधीय उपयोग होते हैं। हम तो इन्हें अभी तक सिर्फ जंगली घास समझते थे। मेरे घर के पास एक गोपाल सागर है। ज्यादा दूर नहीं चंद कदमों की दुरी पर। आप सोच रहे होंगे कि यह कौन सा सागर है? और सागर के चंद कदमो पर घर? जी बिलकुल सही कह रहा हूँ। लेकिन ये सागर एक छोटा सा तालाब है, जिसे लोग बहुत पुराने समय से गोपाल सागर कहते थे, हम इसी नाम से उसे जानते हैं। उसके किनारों और आस पास यह भारी संख्या में लगा रहता था। चुकी इसके किनारे के काफी क्षेत्र में हमेशा पानी ही लगा रहता था तो खेती नहीं होती थी, और वहां ढेर सारे इसके पेड़ उग जाते थे, और कोई इन्हे उखाड़ता भी नहीं था। इसके बीज गिर जाते, और फिर उग आते थे। और यह प्रक्रिया हम सालों से देखते आ रहे हैं। गर्मी कि तपती दुपहरी में भी इसके पेड़ हरे भरे रहते थे।

लेकिन कुछ समय से हमने नोटिस किया है, कि अब यह वहां से भी ख़त्म हो रहा है। थोड़ा बहुत बचा होगा। और यह सिर्फ इस एक पौधे के मामले में नहीं हो रहा है, ऐसी अनेकों वनस्पतिया है जो विलुप्त हो रही है इसका मुख्य कारण कीटनाशक दवाओं से घासों को ख़त्म किया जा रहा है। वे केमिकल वनस्पतियों का समूल नाश कर रही है, परिणाम स्वरुप एक असंतुलन दिख रहा है, जो मनुष्य के जीवन को कष्टकर बनाते जा रहा है, लेकिन हम उस ओर नहीं देख पा रहे हैं या फिर देखना नहीं चाहते हैं।

हम इसका प्रयोग अपने साथियों, भाई-बहनो के बालों में लिपटाने के लिए करते थे। यह बालों में बुरे तरीके से फंस जाता था। लड़कों के बालों में से तो थोड़ी ही देर में निकल जाता था, लेकिन लड़कियों के बालों से तो निकलता ही नहीं था, कुछ बाल तोड़ के बड़े मुश्किल से निकलता था। हमारी शरारत करने का तरीका, और हंसी ठिठोली के मापदंड अलग थे, जो आजकल के परिदृश्य में समझना और समझाना दोनों ही मुश्किल है। जो 90s या उससे पहले के पीढ़ी के लोग हैं, वह महसूस कर लिए होंगे या फिर उस दौर में पहुंच गए होंगे।

सबसे पहले मैं इसका नाम बता दूँ। इसे हम लापाटा या लपटा कहते थे, लेकिन इसे छोटा धतूरा (वैज्ञानिक नाम: Xanthium strumarium, जिसे गोटखुरा या साइबेरियन कॉकलबुर भी कहते हैं) के नाम से जाना जाता है। इसे हिंदी में घाघरा, गोखरू, बॉन ओकरा कहते है। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है? कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं। दोस्तों यह एक पारंपरिक औषधीय पौधा है, जिसका उपयोग कई प्रकार की शारीरिक समस्याओं में किया जाता है। जिसे निचे विस्तार से समझते हैं।

इसे त्वचा और बाल (Skin and Hair) के लिए रामबाण औषधि माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसके बीजों के तेल या रस को सिर पर लगाने से बालों का झड़ना रुकता है और नए बाल उगने में मदद मिलती है। यह गंजापन को दूर करता है। इससे चर्म रोग का भी इलाज किया जाता है, त्वचा के फोड़े-फुंसी, खाज-खुजली और अन्य संक्रमणों में इसके लेप का बाहरी उपयोग किया जाता है।

पारंपरिक चिकित्सा में इसके पंचांग या अर्क का उपयोग सर्दी, जुकाम और पुरानी खांसी (ब्रोंकाइटिस) के लक्षणों को कम करने के लिए किया जाता है। इसमें सूजन कम करने (Anti-inflammatory) और दर्द निवारक गुण होते हैं, जिससे जोड़ों या घुटनों के दर्द और सूजन वाली जगह पर लगाने से राहत मिलती है। यह हल्के रेचक (Laxative) के रूप में कार्य करता है और बवासीर जैसी तकलीफों में आराम पहुंचाता है। आप यदि रेचक या Laxative का मतलब नहीं समझ पाए तो मै इसे स्पष्ट कर देता हूँ। ये वे पदार्थ या दवाएं होती हैं जो मल को नरम करके पेट साफ करने और कब्ज (Constipation) से राहत दिलाने में मदद करती हैं। ये पेट में मरोड़ या तेज दर्द पैदा किए बिना, बहुत ही सौम्य तरीके से पाचन तंत्र को काम करने में मदद करती हैं।

वैधानिक चेतावनी : धतूरा और छोटा धतूरा दोनों ही प्रजातियों में विषैले तत्व होते हैं। इनका आंतरिक सेवन (खाना) अत्यधिक खतरनाक हो सकता है और इसके नशे या विषाक्तता (Poisoning) के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। किसी भी रूप में इसका उपयोग करने से पहले आयुर्वेदिक डॉक्टर या विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।

तो दोस्तों आज की यह पोस्ट कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताएं। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है? आपने इसका प्रयोग कभी किया है? अपना अनुभव और सुझाव हमारे साथ साझा जरूर जरूर करें। अपने इतने ध्यान से इस पोस्ट को पढ़ा, आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

इसको तो आपने देखा ही होगा? खाया भी होगा। गांव में मैंने देखा है, कि अधिकतर लोग इसकी सब्जी बनाते हैं। देखने में यह पूरी ड...
20/09/2026

इसको तो आपने देखा ही होगा? खाया भी होगा। गांव में मैंने देखा है, कि अधिकतर लोग इसकी सब्जी बनाते हैं। देखने में यह पूरी डंडी कुछ खास आकर्षक नहीं लगती, लेकिन जब इसके छोटे छोटे गोल गोल टुकड़े किये जाते हैं, तो बहुत खूबसूरत और आकर्षक लगने लगती हैं। एक समान आकार के, सजावटी और विल्कुल सफ़ेद। ऐसा लगता है कि ये मशीन से बनाये गए हैं। जितने सुन्दर दिखते हैं, उतनी ही स्वादिष्ट इसकी सब्जी बनती है। हमारे यहाँ मंडियों में भी अक्सर यह सब्जी दिख जाती है। आज इसके बारे में विस्तार से समझते हैं।

मेरे गांव के पास ही एक बड़ा दह है। इसको ऐसा समझ लीजिये कि नदी से अलग हुआ एक नाला। मेरे गांव के पास से ही सरयू नदी गुजरती है, और उसी में से से एक भाग अलग होकर एक बड़े दह अर्थात सरोवर या ताल का रूप ले लेता है। उसमे खूब कमल खिलते हैं और उसी में से यह डंडी निकलती है, और बाजारों तक पहुँचती हैं। मतलब यह है कि कमल का जो हिस्सा पानी के निचे रहता है, ये वही है। अर्थात यह कमल के पौधे से निकलती है।

दोस्तों कमल से यह निकलती है इसलिए इसे कमल ककड़ी या लोटस स्टेम भी कहा जाता है। दूसरा इसे भसीड़ के नाम से जाना जाता है। कुछ जगहों पर इसे भेंड़ा कहा जाता है। आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है, कमेंट में जरूर बताएं।

दोस्तों भसीड़ कि सब्जी बहुत ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होती है। दोस्तों इसकी तमाम तरह से सब्जी बनायीं जाती है, आप यूट्यूब से देख सकते है, बहुत सारे लोग इसकी सब्जी बनाने कि आसान विधि बताएं है, तो आप आसानी से इसकी सब्जी बना सकते है। इसकी डंडी कीचड़ में रहती है इसलिए मिटटी से सनी होती है तो इसे यूज़ करने से पहले अच्छे से धोना पड़ता है। इसकी स्टेम को छोटे छोटे गोल टुकड़े में काटकर अच्छे से धोना पड़ता है, तब इसकी मिटटी धुलती है। तो अच्छी तरह से इसकी सफाई करने के बाद ही आप इसे यूज़ में ले सकते है।

दोस्तों इसके बहुत सारे स्वास्थ्य लाभ है, जिसे हम इस पैराग्राफ में समझते है। पहला यह पाचन और पेट के लिए बहुत ही बढ़िया है। इसमें भरपूर मात्रा में डायटरी फाइबर होता है, जो पाचन क्रिया को मजबूत बनाता है और मल त्याग को आसान करता है। दूसरा यह आंतों की सेहत में सुधार करती है और पेट को साफ रखती है। इससे आपके शरीर में अधिकतर रोग होते ही नहीं है क्यूंकि अधिकतर रोगो कि जड़ अपच और पेट में बनने वाली गैस है।

यह मानसिक स्वास्थ्य और तनाव से मुक्ति पाने में भी बहुत ही लाभकारी और असरदार है। इसमें विटामिन बी-कॉम्पप्लेक्स (विशेषकर पाइरिडोक्सिन) पाया जाता है, जो मस्तिष्क के तंत्रिका रिसेप्टर्स (Neural Receptors) के साथ काम करता है। इसके नियमित सेवन से मानसिक शांति मिलती है, और तनाव, सिरदर्द व चिड़चिड़ापन कम होता है।

इसके नियमित सेवन से रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ती है और खून की कमी भी नहीं होती। इसमें विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करते हैं और मौसमी बीमारियों से बचाते हैं। इसमें आयरन और कॉपर की अच्छी मात्रा होती है, जो लाल रक्त कोशिकाओं (RBC) के निर्माण में मदद करते हैं और खून की कमी (एनीमिया) का खतरा कम करते हैं।

यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करता है और हृदय स्वास्थ्य अर्थात आपके दिल को स्वस्थ रखता है। इसमें मौजूद पोटैशियम एक प्राकृतिक वैसोडिलेटर (रक्त वाहिकाओं को आराम देने वाला) के रूप में काम करता है। यह शरीर में सोडियम के असर को कम करके हाई ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखता है और दिल की बीमारियों के जोखिम को कम करता है।

यह त्वचा और बालों के लिए भी बहुत ही फायदेमंद है। आपकी चेहरा चमकने दमकने लगता है। इसमें मौजूद विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स कोलेजन के निर्माण में मदद करते हैं, जिससे त्वचा चमकदार और स्वस्थ बनती है। यह बालों को मजबूत और चमकदार बनाने में भी मददगार है।

बस एक ही सावधानी बरतनी है कि इसे कभी भी कच्चा न खाएं और ज्यादा न खाएं। चूंकि कमल ककड़ी पानी और कीचड़ के नीचे उगती है, इसलिए इसके छिद्रों में बैक्टीरिया या परजीवी (Parasites) हो सकते हैं। इसे हमेशा अच्छी तरह छीलकर, धोकर और अच्छी तरह पकाकर ही खाएं। और फाइबर की अधिकता के कारण बहुत ज्यादा मात्रा में खाने से संवेदनशील पेट वाले लोगों को गैस या पेट दर्द हो सकता है। किसी भी चीज कि अति ख़राब होती है।

तो दोस्तों आज कि यह पोस्ट आपको कैसी लगी? कमेंट में जरूर बताएं ? आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है ? आपको इसका स्वाद कैसा लगता है ? क्या आपके यहाँ कि मंडियों में यह मिलता है ? इसको लेकर अपनी राय एवं विचार भी हमारे साथ जरूर साझा करें। आपने इतने ध्यान से इस पोस्ट को पढ़ा। आपका बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏

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