27/09/2026
दोस्तों आज नीम की तरह दिखने वाले इस बृक्ष के बारे में, इसके औषधीय प्रयोगों के बारे में विस्तार से चर्चा करने वाले हैं। इस पेड़ की पत्तियों से लेकर, बीज से लेकर, तना एवं छाल तक बेशकीमती है। यह पूरा पेड़ ही प्रकृति की अनूठी रचना है। जिसे हम सभी बहुत कमतर आंकते हैं। चूँकि इसके बारे में चर्चा करने के लिए मेरी बचपन की जुडी यादें ही पर्याप्त है, लेकिन मैं इसके हर पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, यहाँ इसके सन्दर्भ में मौजूद सभी जानकारियों को संक्षिप्त में रखूँगा। पेज को फॉलो कर साथ में बने रहें।
दोस्तों इसकी पहली खास बात है कि यह पेड़ भारत का Native है, अर्थात भारत का देशी पेड़ है। दूसरी ख़ास बात यह है कि यह बहुत तेजी से बढ़ता है। तीसरी खास बात है कि इसका पेड़ बहुत ही घना और छायादार हो जाता है। चौथा यह बंजर या पथरीली जमीन में भी आसानी से उग जाता है और इसका सर्वाइवल रेट बहुत ही ज्यादा है। पांचवा इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है जिससे लोग फर्नीचर बनवाते हैं। इसकी बाकी खूबियों को हम कुछ अन्य बातों के साथ-साथ समझेंगे। शुरू करते हैं मेरे बचपन के दिनों कि यादों से। मेरे ही नहीं लगभग सभी के बचपन में एक से दो महीने, मामा के गांव में ही बीतते थे। मेरे मामा का गांव, जहां शुद्ध ग्रामीण संस्कृति और सभ्यता बसती थी। मुझे याद है गर्मी की वो लहलहाती तप्ति दोपहरी। इस पेड़ के नीचे हल्की मनोहर हवा चलती रहती थी। लोग खाट पर आराम फरमा रहे होते थे। बकरियां इसके पत्तों को बड़े चाव से खाती थी। इसके पत्ते और बीज तो ऐसे बहुत ही कड़वे होते हैं, लेकिन बकरियों को बहुत स्वादिष्ट लगते थे। उस समय बंदरों का एक छत्र राज हुआ करता था, बाग़ बगीचों में। महुआ के पेड़ों की पतली डालियों को फाड़ फाड़ कर गिरा देते थे। जिसे हमारे यहाँ चीरा बोलते थे। आम की, महुआ की पत्तो सहित डालियों (जिन्हे हम पल्लो कहते थे ) को काट देते, थोड़ा खाते और ज्यादा गिराते थे। तो लोग उन्हें उठा कर घर ले जाकर धुप में सुखाते थे। जिससे खाना बनाने के लिए ईंधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। तो इन बंदरों को भगाने के लिए गुलेल (हम गुरिया गुरदेल बोलते थे) का इस्तेमाल किया जाता था। मेरे छोटे मामा इस काम में बहुत ज्यादा माहिर( कुशल, प्रवीण) थे। बहुत ही सटीक निशाना लगाते थे। तो उस समय वे मिटटी की गोलियों का इस्तेमाल बहुतायत से करते थे। लेकिन उसके विकल्प के रूप में हम इसके बीजो को भी इस्तेमाल करते थे। और गुलेल में इसके बीजो को डालकर बंदरो को मारते थे और बन्दर इस बाग़ से उस बाग़ भाग जाते थे। जो पेड़ आंधियों में उखड जाते थे। उन्हें कटवा कर, आरा मशीन से चिरवा कर, इसके पटरों से घर के फर्नीचर बनते थे, जैसे चौकी, पलंग, आलमारी, मेज और कुर्सी इत्यादि। इन पटरों की मजबूती के कारण, इनका इस्तेमाल भवन निर्माण के कामो में भी लिया जाता था।
दोस्तों इसके नाम की बात करूँ, तो इसको हमारे यहाँ बकाइन कहा जाता है। बाकि हिंदी भाषी प्रदेशों में अधिकतर लोग इसे बकैन या महानीम कहते है। कुछ जगहों पर इसे धरेक कहा जाता है। इसे अंग्रेजी में चाइनाबेरी (Chinaberry) कहते हैं। इसे संस्कृत में रम्यक कहा जाता है। "रम्यक" का अर्थ होता है मनोरम, अत्यंत सुंदर या आकर्षक। इसका वानस्पतिक नाम: Melia azedarach है। और बकायन नीम की जाति या परिवार (मेलियासी) से मिलने वाला एक मध्यम आकार का पेड़ है। यह दिखने में बिल्कुल नीम जैसा ही लगता है, लेकिन इसके पत्ते नीम से कुछ बड़े और थोड़े चौड़े होते हैं। इस पर हल्के बैंगनी या गुलाबी रंग के खुशबूदार फूल गुच्छों में आते हैं और इसके फल नीम की तरह छोटे व कड़वे लेकिन गोल गोल होते हैं। आपके यहाँ इस पेड़ को किस नाम से जाना जाता है, कमेंट के माध्यम से जरूर बताएं।
अब चर्चा करते हैं इसके औषधीय इस्तेमाल के बारे में। आयुर्वेद में इसकी छाल, पत्तों और फूलों का उपयोग त्वचा के रोग (जैसे दाद, खाज और खुजली) को ठीक करने के लिए किया जाता है। हालांकि, इसके बीज और फल कुछ विषैले होते हैं, इसलिए इनका इस्तेमाल सावधानी से किया जाना चाहिए। बकायन एक जड़ी-बूटी वाला पेड़ है, तो इसके भी कई सारे औषधीय गुण हैं। आप सिर दर्द, मुंह के छाले की बीमारी, सांसों से जुड़ी बीमारियों, पेट दर्द, पेट में कीड़े होने पर बकायन के इस्तेमाल से फायदे ले सकते हैं। इतना ही नहीं, बवासीर, गालब्लैडर स्टोन, डायबिटीज, गर्भाश्य विकार से जुड़ी बीमारियों में भी बकायन के औषधीय गुण से लाभ मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार, ल्यूकोरिया, सायटिका, गठिया, खुजली में भी बकायन के औषधीय गुण के फायदे ले सकते हैं। इसके अलावा आप कुष्ठ रोग, टाइफाइड बुखार, घाव, त्वचा रोग, मिर्गी और सूजन में भी बकायन से लाभ ले सकते हैं।
दोस्तों, इस वृक्ष के किसी भी हिस्से का प्रयोग उचित मात्रा में और सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यह कुछ विषैला होता है। फलों की तुलना में छाल और फूल कम विषैले होते हैं। मेरा निवेदन है की चिकित्सकीय परामर्श और देखरेख में ही इसका इस्तेमाल करें। ऐसा माना जाता है कि इसके फलों और बीजों की माला बनाकर दरवाजे और खिड़कियों पर टांगने से बीमारियों का प्रभाव नहीं होता है। इसके फलों की माला पहनने से संक्रामक रोगों से बचाव होता है। तो दोस्तों मैंने इसके उपयोग से होने वाली बिमारियों के इलाज की जानकारी आपको दे दी है, लेकिन मैं आपको इसके प्रयोग विधि को नहीं बताना चाहता। मैं चाहता हूँ की किसी अनुभवी आयुर्वेद के चिकत्सक से परामर्श कर, उनकी देख रेख में, उनके बताये अनुसार ही इसका इस्तेमाल करें।
तो दोस्तों आज की यह पोस्ट आपको कैसी लगी? आपके यहाँ इसे किस नाम से जाना जाता है? क्या आपके यहाँ इसका पेड़ मौजूद है? क्या आपने कभी इसका औषधीय प्रयोग किया है ? उसका क्या परिणाम रहा ? अपना अनुभव और विचार कमेंट के माध्यम से जरूर साझा करें। ऐसी ही मजेदार पोस्ट को पढ़ने के लिए, गार्डनिंग एवं बोन्साई से जुडी जानकारियों के लिए, पेड़ पौधों से जुडी जानकारियों के लिए, मेरे इस अशोक वाटिका रिसर्च सेंटर पेज को जरूर फॉलो करें, जिससे हम साथ जुड़ें, और हमारे सभी पोस्ट आप तक आसानी से पहुँच सके। आप सभी प्रिय मित्रों का बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार 🙏