26/04/2026
फास्टफूड के दुष्परिणामों को खत्म करना है तो पारंपरिक खानपान से नाता जोड़ें
बिहार की समृद्ध खानपान की परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक संदर्भों को समर्पित पुस्तक “बिहार के व्यंजन: संस्कृति और इतिहास” पर एक विशेष पुस्तक परिचर्चा का आयोजन शनिवार को प्लैनेट पटना, प्रथम तल, डुमरांव पैलेस, फ्रेजर रोड पटना में किया गया। संध्या 6 बजे से 7 बजे तक आयोजित इस परिचर्चा में लेखक रविशंकर उपाध्याय ने कहा कि बिहार की खानपान की परंपरा में बेहतर स्वास्थ्य के सूत्र छिपे हुए हैं। बिहार का पारंपरिक खानपान फास्टफूड के कई दुष्परिणामों को कम करने में काफी कारगर है, बशर्ते यह आधुनिक फास्टफूड की जगह नियमित और संतुलित आहार के रूप में अपनाया जाए।
फास्टफूड आमतौर पर अधिक तेल, नमक, चीनी और प्रोसेस्ड कार्बोहाइड्रेट से भरा होता है, फाइबर और जरूरी विटामिन व मिनरल कम होते हैं।
इसके कारण मोटापा, मधुमेह, दिल की बीमारियाँ, ब्लड प्रेशर, पेट–संबंधी रोग और बच्चों में फूड अलर्जी जैसी समस्याएँ निरंतर बढ़ रही हैं।
बिहार की पारंपरिक थाली में आमतौर पर गेहूँ/चावल, दाल, दही, घर के तेल (सरसों/तिल/नारियल) से बनी रसोई,
हरी सब्जियाँ, सलाद, चिल्का, दही, मखाना, चना बादाम जैसे स्नैक्स आदि शामिल हैं।
उन्होंने परिचर्चा में बिहार के प्रसिद्ध लिट्टी चोखा, पिट्ठा/बगिया, दूधपिट्ठी, हाथी कानपुरी, खाजा, खुरमा, भूंजा जैसे पारंपरिक व्यंजनों को फास्ट फूड का विकल्प बताते हुए इसे अपनाने पर जोर दिया।
प्लैनेट पटना के संचालक आदित्य जलान ने बताया कि बिहार के लोक प्रचलित व्यंजनों के माध्यम से राज्य की सांस्कृतिक आत्मा, लोक-स्मृतियों और परंपरागत ज्ञान-परंपरा को सामने लाना आवश्यक है। परिचर्चा के दौरान पावर प्वाइंट प्रजेंटेशन के माध्यम से बिहार की खाद्य- संस्कृति के विभिन्न पहलुओं पर विचार-विमर्श के उपरांत सवाल जवाब का सत्र भी आयोजित किया गया। इसमें बिहार के व्यंजनों के ऐतिहासिक विकास, उनके क्षेत्रीय स्वरूप, सामाजिक-सांस्कृतिक महत्व तथा बदलते समय में उनकी प्रासंगिकता जैसे विषयों पर चर्चा की गई। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में बुद्धिजीवी, पत्रकार, कलाकार आदि मौजूद थे।