01/04/2025
"हिंदुपत मेवाड़ नरेश महाराणा सांगा के इतिहास का भाग - 3"
"महाराणा सांगा द्वारा दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को धूल चटाने का वर्णन"
"1517 ई. - खातोली का युद्ध"
महाराणा सांगा ने दिल्ली के सिकंदर लोदी के अधीनस्थ इलाके जीतने शुरू कर दिए। लेकिन सिकन्दर लोदी महाराणा सांगा का सामना करने का साहस नहीं कर सका।
इसलिए उसने महाराणा से इन इलाकों को पुनः जीतने के प्रयास नहीं किए। 21 नवम्बर, 1517 ई. को सिकंदर लोदी की मृत्यु हो गई। सिकंदर लोदी के बाद उसका बेटा इब्राहिम लोदी दिल्ली के तख़्त पर बैठा।
महाराणा सांगा द्वारा साम्राज्य विस्तार करने की खबर सुनकर दिल्ली का बादशाह इब्राहिम लोदी अपनी कुल फौज के साथ मेवाड़ की तरफ निकला। महाराणा सांगा भी मेवाड़ी बहादुरों के साथ उसका सामना करने निकले।
हाड़ौती की सीमा पर खातोली गाँव में दोनों फौजों में मुकाबला हुआ। एक पहर तक भीषण लड़ाई हुई। इस लड़ाई में महाराणा सांगा का बायां हाथ तलवार से कट गया व घुटने पर ऐसा सख्त तीर लगा कि पैर ने काम करना बन्द कर दिया।
लेकिन ये तीर और तलवार के घाव महाराणा सांगा के साहस को कम न कर सके। महाराणा ने खातोली में ऐसा पराक्रम दिखाया कि इब्राहिम लोदी की फ़ौज को मैदान छोड़कर भागना पड़ा।
इब्राहिम लोदी ने अपनी फौज को रोकने की बड़ी कोशिश की, पर कामयाबी नहीं मिली। फ़ौज को भागते हुए देख इब्राहिम लोदी के हौंसले भी पस्त हो गए और उसने भी भागने में गनीमत समझी।
लेकिन इब्राहिम लोदी के 20 वर्ष से भी कम आयु के बेटे को ये शिकस्त मंजूर नहीं थी। उसने अपनी सैनिक टुकड़ी को रोकने में सफलता प्राप्त की और मुड़कर मेवाड़ी फ़ौज पर हमला किया। मेवाड़ की सेना ने अपनी तलवारों से इस हमले का करारा जवाब दिया।
सुल्तान का बेटा महाराणा सांगा के हाथों कैद हुआ और उसकी फ़ौज शिकस्त खाकर भाग निकली। खातोली के युद्ध में महाराणा सांगा ने ऐतिहासिक विजय प्राप्त की और वे सुल्तान के बेटे को बन्दी बनाकर चित्तौड़गढ़ ले आए।
महाराणा सांगा ने चित्तौड़ पहुंचकर शहजादे से जुर्माना वसूला और कुछ दिन तक कैद में रखने के बाद उसे छोड़ दिया। अपने शत्रु को कैद करके छोड़ना निश्चित ही रणनीति के तौर पर उचित नहीं था।
परन्तु यहां महाराणा सांगा की उदारता देखिए कि जिस युद्ध में उन्होंने अपना एक हाथ व एक पैर खो दिया, उस युद्ध में विपक्ष के सुल्तान के बेटे को कैद करके भी छोड़ दिया।
बहरहाल, खातोली के युद्ध में महाराणा सांगा की विजय से समूचे हिंदुस्तान में महाराणा सांगा का नाम प्रसिद्ध हो गया। दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को परास्त करने के बाद महाराणा सांगा ने "हिंदुपत" की उपाधि धारण की।
"1518 ई. - बाड़ी (धौलपुर) का युद्ध"
खातोली के युद्ध में हुई पराजय का बदला लेने के लिए दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी ने सेनापति मियां माखन के नेतृत्व में एक बड़ी फ़ौज मेवाड़ की तरफ रवाना की।
सेनापति मियां माखन के नेतृत्व में मेवाड़ अभियान में भाग लेने वाले बादशाही सिपहसलार :- मियां हुसैन खां ज़रबख्श, मियां खानखाना फारमुली, मियां मारूफ़, सैय्यद खां फुरत, हाजी खां, दौलत खां, अल्लाहदाद खां, यूसफ़ खां।
मेवाड़ की तरफ़ कूच करते समय रास्ते में किसी बात पर मियां माखन और हुसैन खां के बीच तकरार हो गई। हुसैन खां सुल्तान इब्राहिम लोदी से भी नाराज़ चल रहा था। ऊपर से मियां माखन से तकरार हो जाने के बाद बात और बिगड़ गई।
हुसैन खां एक हज़ार की फ़ौज लेकर आगे निकल गया और महाराणा सांगा से कहा कि "मैं इस जंग में आपकी तरफ से लड़ना चाहता हूँ।"
महाराणा सांगा ने हुसैन खां को अपनी फौज में शामिल कर लिया।
मियां माखन के पास अभी भी 30 हज़ार सैनिक व 300 हाथी थे। महाराणा सांगा भी दिल्ली की शाही फ़ौज की चढ़ाई की खबर सुनकर फ़ौज समेत चित्तौड़गढ़ से रवाना हुए। महाराणा सांगा स्वयं हाथी पर सवार थे।
दोनों सेनाएं बाड़ी (धौलपुर) में जमा हुईं। मियां माखन ने 7 हज़ार घुड़सवारों सहित सैय्यद खां फुरत और हाजी खां को दायीं ओर, अल्लाहदाद खां, दौलत खां व यूसुफ खां को बायीं ओर तैनात किया।
पहले दिन बाड़ी (धौलपुर) में दोनों पक्षों में लड़ाई हुई, जिसमें दिल्ली की फ़ौज बुरी तरह परास्त हुई। शाही फ़ौज के बहुत से सिपाही मारे गए। जब दोनों पक्षों के सिपाही अपने शिविर में गए, तब हुसैन खां ने मियां माखन को एक ख़त लिखा।
इस ख़त में लिखा था कि "अब तुम्हें मालूम हुआ होगा कि एक दिल होकर लड़ने वाले लोग क्या-क्या कर सकते हैं। तुम पर लानत है कि 30 हज़ार सवार होने के बावजूद राजपूतों से हार गए।"
इस वक्त लोदी की फ़ौज की एक और टुकड़ी का नेतृत्व मियां मारूफ कर रहा था। हुसैन खां ने मारूफ़ को भी एक ख़त लिखकर कहा कि "अब तुम्हें मालूम पड़ गया होगा कि मियां माखन किस तरह लड़ाई की कमान संभाल रहा है।"
(हुसैन के कहने का आशय था कि यदि फौज का नेतृत्व उसके हाथ में होता तो शाही सेना की ऐसी पराजय नहीं होती)
रात के वक्त ही मियां मारूफ़, मियां माखन और हुसैन खां ने पत्र के ज़रिए सलाह की और इस नतीजे पर पहुंचे कि "सुल्तान इब्राहिम लोदी ने हमारे साथ सही बर्ताव नहीं किया, फिर भी हमें मिलकर इन राजपूतों से लड़ना चाहिए।"
अगले दिन फिर लड़ाई शुरू हुई। लड़ाई की शुरुआत में ही हुसैन खां महाराणा सांगा की फ़ौज से निकलकर अपनी फौजी टुकड़ी समेत लोदी की फ़ौज से मिल गया। इस वक्त मियां मारूफ़ के नेतृत्व में 6 हज़ार घुड़सवार थे, जो महाराणा सांगा की फ़ौज से 2 मील की दूरी पर था।
तीनों नेतृत्वकर्ताओं ने एक साथ मिलकर मेवाड़ की सेना पर आक्रमण किया, परन्तु यह एकता भी उनके किसी काम न आ सकी। महाराणा सांगा ने इब्राहिम लोदी की इस सेना को बुरी तरह परास्त किया।
लोदी का सेनापति मियां माखन भाग निकला। महाराणा सांगा ने बयाना तक शाही फ़ौज का पीछा किया और मालवा का कुछ भाग अपने अधीन कर लिया।
इस तरह लगातार दूसरी बार पराजित होने से दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी की कमज़ोरी और महाराणा सांगा का रौब समूचे हिंदुस्तान के सामने जाहिर हो गया।
"चन्देरी पर विजय"
चन्देरी के गौड़ राजा महाराणा के आदेश नहीं मानते थे। जब महाराणा सांगा बाड़ी का युद्ध जीतकर मालवा के कुछ भाग जीत रहे थे, तभी उन्होंने ठाकुर कर्मचन्द पंवार के बेटे जगमाल को फौज देकर चन्देरी भेजा।
जगमाल गौड़ राजा को बंदी बनाकर महाराणा के दरबार में ले आए, जहां गौड़ राजा ने महाराणा की अधीनता स्वीकार की। महाराणा सांगा ने जगमाल पर प्रसन्न होकर उनको 'राव' का खिताब दिया।
अगले भाग में मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय व महाराणा सांगा के बीच हुए गागरोन के भीषण युद्ध के बारे में लिखा जाएगा
पोस्ट लेखक :- तनवीर सिंह सारंगदेवोत (लक्ष्मणपुरा - मेवाड़)