12/09/2025
विद्वान् विप्र लेख क़ो पूरे धैर्य के साथ पढ़ें मूर्ख दूर रहें! पौराणिक जी के फेसबुक से कॉपी किया हुँ। हो सकता हैआप समझ सकें। औऱ सही निर्णय हो जाए।।
।।अथ जीवित्पुत्रिका व्रतस्य सार्वभौमिक निर्णय:।।वर्ष २०२५।।
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15 सितम्बर 2025 दिन सोमवार को ही जीवत् पुत्रिका व्रत है।
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16 सितम्बर 2025 दिन मंगलवार को सुबह सूर्योदयोपरान्त पारण करना है ।
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सनातन व्रत धर्मानुरागी प्रेमियों!
विगत कुछ वर्षों से ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जीवित्पुत्रिका व्रत का निर्णय ''व्रत के मौलिक" सिद्धान्तों के प्रतिकूल तथा परस्पर विरूद्ध (निर्णय)किया जा रहा है।
कभी सप्तमी विद्ध अष्टमी,यानी सप्तमी में सूर्योदय तथा अष्टमी में चन्द्रोदय होने पर व्रत करने को बताया जा रहा है ,
तो कभी अष्टमी विद्ध नवमी में अर्थात् अष्टमी में सूर्योदय नवमी में चन्द्रोदय होने पर (व्रत निर्णय) किया जा रहा है।
इन विद्वानों का यह दोहरा चरित्र व्रतियों के लिए शुभ व कल्याणकारी नहीं है ।अभी तक वे विद्वान् न तो एक मत हो पाये हैं ना ही उनका कोई सिद्धान्त ही स्थिर हो पाया हैं ।उन सभी विद्वानों का यह आचरण सर्वाधिक विचारणीय है।
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इस सन्दर्भ में मैं दासानुदास पौराणिक जो कुछ शास्त्रों के अवलोकन से प्राप्त किया हूं उसके अनुसार आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को मुख्यतः दो व्रत आपतित होते हैं ।
(१) प्रथम महालक्ष्मी व्रतम्।।यह व्रत षोड़श दिनात्मक होता है।
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(२) द्वितीय जीवत्पुत्रिका व्रतम्।।
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आइए हम सर्व प्रथम महालक्ष्मी व्रत को संक्षेप में समझेंगे इससे जीवित्पुत्रिका व्रत को ठीक-ठीक जानने में सहयोग मिलेगा ।
(१) महालक्ष्मी व्रत ।।
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इस व्रत का मूल स्वभाव चन्द्रोदय परक होने के कारण अष्टमी तिथि में चन्द्रोदय होने पर ही यह व्रत करना चाहिए। वस्तुत: व्रत का आग्रह सूर्योदय परक नहीं होने के कारण यह व्रत सप्तमी विद्ध अष्टमी तिथि में करणीय है।
यह महालक्ष्मीव्रत भाद्रपद माह शुक्ल पक्ष के प्रदोष काल व्यापिनी अष्टमी तिथि से प्रारम्भ होता है तथा आश्विन कृष्ण पक्ष प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि को पूर्ण होता है। १६ दिनों का यह व्रत महालक्ष्मी व्रत के नाम से प्रसिद्ध है । विगत १०० वर्षों के पंचांगों में यह तथ्य सप्रमाण द्रष्टव्य है। उन पंचांगों में दोनों व्रतों (महालक्ष्मीव्रत + जीवत पुत्रिका व्रत) को स्पष्ट रूप से पृथक-पृथक- निराकृत करके निर्णय किया गया है।
----चन्द्रोदये पूजा लक्ष्मीव्रतम् ।
---+चन्द्रोदयेSष्टमी योग सत्वात् महालक्ष्मी व्रतम्।
अतः यह महालक्ष्मी व्रत जीव पुत्रिका व्रत से अलग तथा स्वतन्त्र व्रत है। इस व्रत का मूलतः जीवत पुत्रिका व्रत से कोई संदर्भ है ना हीं सन्दर्श। जो लोग खींचा तानी कर के उपरोक्त व्रत द्वयों का एकत्व स्थापित कर के यह सिद्ध करना चाहते हैं कि महालक्ष्मी व्रत की ही तरह चन्द्रोदय प्रधान जीतिया व्रत भी है उन लोगों का कथन शास्त्र सम्मत प्रतीत नहीं हो रहा है ।
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(२) जीवित्पुत्रिका व्रत।।
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यहां इस लेख में यही "जीवत पुत्रिका व्रत" मुख्य रूप से विवेच्य है। जिसका हम सभी को तात्विक दृष्टि से अवलोकन करना चाहिए।
जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का सन्दर्भ महाराज जीमूतवाहन वाहन तथा श्रीविष्णु भगवान के प्रिय वाहन वेदात्मा खगराज गरुण देव से है । हम इस रहस्यमय तथ्य को संक्षेप में समझेंगे ।
कथानक में वर्णित कि राजा के परोपकार, त्याग,धैर्य आदि -आदि गुणों से प्रसन्न होकर भगवान तार्क्ष्य ने अमृत कलश लाकर पूर्व में स्वयं द्वारा भक्षित तथा मृत मानवों को जीवित करने के बाद कहा कि हे राजन मैं तुम पर अति प्रसन्न होने के कारण विशेष वर दे रहा हूं। द्रष्टव्य भविष्योत्तर पुराण से निर्गत जीवित पुत्रिका व्रत कथा ---------------
अपरं च वरं दास्ये लोकानां हित काम्यया।
आश्विने बहुले पक्षे तिथिश्चाद्याष्टमी शुभा।। ३०।।
सप्तमी रहिता चाद्य प्रजानां जीवितोSसि त्वम्।
अतोSयं वासरो वत्स ब्रह्मभावं गमिष्यति।।३१।।
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गरुण जी बोले हे राजन ! मैं समस्त संसार के हित की कामना से दूसरा वरदान दे रहा हूं । आज आश्विन कृष्ण पक्ष सप्तमी रहित अष्टमी तिथि को तुमने मरे हुए इन तमाम मनुष्यों को जिलाया है अत एव यह तिथि अभी से ब्रह्म भाव से भावित हो गई है । ज्यों ही आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि में सूर्योदय होगा तत्क्षण वह तिथि ब्रह्य भाव को प्राप्त कर लेगी ।
( यहां यह ध्येय है कि सप्तमी रहित अष्टमी तिथि को ही ब्रह्म भाव प्राप्त होने का वर प्रदान किया गया है )
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दूर्गाया मूर्तिभेदेन ख्याता त्रैलोक्य पूजिता।
अमृता हरणे वत्स स्मृता सा जीव पुत्रिका।।३२।।
पुनः गरुण जी ने कहा कि हे राजन! मूर्ति भेद के कारण अनेकानेक नामों से जानी जाने वाली त्रिभुवन पूजिता दूर्गा अमृत प्राप्त करने के अर्थ में जीवित्पुत्रिका कहलाई हैं।( अर्थात् ब्रह्म भाव को प्राप्त इस अष्टमी तिथि का ही जीवित्पुत्रिका नाम है , यानी यह अष्टमी साक्षात् दुर्गा जी ही हैं जो जीवत पुत्रिका कहलायी हैं)
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सत्तिथौ पूजयिष्यन्ति या स्त्रियो जीवपुत्रिकाम्।
त्वं च दर्भमयं कृत्वा श्रद्धा भक्ति समन्वित:।। ३३।
तासां सौभाग्य वृद्धिश्च वंश वृद्धिश्च शाश्वतम्।
भविष्यति महाभाग नात्र कार्या विचारणा।।३४।।
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जो स्त्रियां ब्रह्म भाव प्राप्त इस सत् तिथि ( जीवत् पुत्रिका) को तथा कुश की आकृति बना कर तुम्हारी (जीमूतवाहन) की पूजा करेंगी तो वे स्त्रियां दिनानुदिन सौभाग्य तथा वंश वृद्धि को प्राप्त होती रहेंगी। ( यहां पर यह ज्ञेय है कि वही अष्टमी तिथि सत् तिथि है जो सूर्योदय के समय में भोग कर रही है अर्थात् सप्तमी से रहित है )
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उपोष्य चाष्टमीं राजन् सप्तमी रहिता शिवा।
यस्यामुदयते भानु: पारणं नवमी दिने।।३५।।
वर्जनीया प्रयत्नेन सप्तमी सहिताष्टमी।
अन्यथा फल हानि: स्यात् सौभाग्यं नश्यति ध्रुवम्।।३६।।
एवं दत्वा वरं तस्मै ययौ हरि पुरं खग:।।
राजाSपि भार्यया सार्द्धं स्वपुरं वै जगाम स:।।३७।।
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गरुण जी ने कहा हे राजन् ! सप्तमी रहित उदया तिथि की अष्टमी व्रत करें ।
प्रयत्न पूर्वक सप्तमी विद्ध अष्टमी का त्याग कर के शुद्ध अष्टमी का व्रत कऱना चाहिए ।अन्यथा "व्रत" तथा "व्रत फल" दोनों ही नष्ट हो जाएगा। ऐसा वर प्रदान करके गरुण जी वैकुंठ में चले गये राजा जीमूतवाहन भी अपनी रानी के साथ अपने राज्य को वापस चले आए ।।
उपरोक्त पौराणिक कथानक में विशेष ध्यातव्य तथ्य हैं---------
(१)वर्षों पूर्व से मरे हुए असंख्य मनुष्य जिस दिन जिन्दा हुए थे वह दिन आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि थी जिसमें सूर्योदय हुआ था ।। श्लोक३०।
(२) सृष्टि के पञ्च देवताओं
"गणेश विष्णु सूर्येश दुर्गाख्यं देव पंञ्चकं "-----------------
में परिगणित पंचम स्थानापन्न देवी जिन्होंने ने अमृत रूप में प्रकट हो कर वर्षों पूर्व तक भक्षित तथा मृत नर समुदाय को जीवन प्रदान की थी उन्हीं का अपर नाम जीवत पुत्रिका हुआ ।श्लोक३२।
(३) उस दिन (घटना वाले दिवस ) का सूर्योदय अष्टमी तिथि में ही हुआ था । श्लोक ३१।
(४) गरुण देव जी द्वारा अपने विशेष वरदान में जिस तिथि को ब्रह्म भाव प्राप्त होने के लिए वर प्रदान किया गया वह तिथि अष्टमी में सूर्योदय होने वाली ही अष्टमी तिथि है जिसका दूसरा नाम जीव पुत्रिका व्रत है। श्लोक ३१-३२।
(५) सप्तमी रहित अष्टमी को ही सत्तिथि (जीवित्पुत्रिका) व्रत मानकर धर्ममय जीमूतवाहन एवं अष्टमी तिथि को जीवपुत्रिका के रूप में व्रत पूजन करना है । श्लोक ३४।
(६) इस नियम का पालन विना विचार किये अनिवार्य रूप से करना है । श्लोक ३४।
(७) सप्तमी रहित अष्टमी में हुए सूर्योदय वाली अष्टमी ही व्रत के लिए ग्राह्य है । श्लोक ३५।
(८)सप्तमी सहित अष्टमी का त्याग अत्यावश्यक है अन्यथा निश्चित रूप से व्रत की हानी के साथ ही सौभाग्य का भी नाश हो जाता है ।श्लोक ३६।
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यद्व्रतस्य प्रभावेण पुत्रा स्युश्चिर जीविन:।
पूर्वोक्तेन विधानेन तत:फलमवाप्स्यसि।।३८।।३९।।
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जो स्त्रियां अपने पुत्रों को चिर जीवी होने का वर चाहती हों उन स्त्रियों को उपरोक्त कहे गये नियम के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह व्रत अवश्य ही व्रती के लिए सर्वथा हानी प्रद होगा।
इससे स्पष्ट होता है कि यह व्रत गरुण देव जी द्वारा विशिष्ट तौर पर कीलित कर दिया गया है। उपरोक्त आठों तत्वों के विद्यमान होने पर आश्विन माह कृष्ण पक्ष कि अष्टमी तिथि को ब्रह्म भाव प्राप्त होकर जीवित पुत्रिका की संज्ञा प्राप्त होगी तब यह व्रत पूर्ण रूपेण प्रभावी होकर व्रतियों के मनों वाञ्छित फल का दाता बनेगा।
यही कारण है कि ---प्राचीन पंचाङ्ग कारों ने ----
यत्रोदयं वै कुरुते दिनेशस्तदा भवेत् जीवत पुत्रिकाख्या।
सूर्योदयेSष्टमी योगत्वात् जीवत पुत्रिका व्रतम्।।
को प्रमाणत: संधारित करते हुए पूर्व के पंचांगों में जीवित पुत्रिका व्रत का निर्णय किया गया है । तथा महाष्टमी व्रत से इस व्रत को अलग कर दिया गया। इन तथ्यों को दरकिनार करते हुए वर्तमान समय में जो व्रत निर्णय किया जा रहा है वह सोचनीय ही नहीं अत्यधिक चिन्तनीय भी है । यह कृत्य किसी भी स्थिति में उचित नहीं है। ऐसा निर्णय आध्यात्मिक व्रत धर्म के लिए अत्यन्त दु:खद भी है । जीवत पुत्रिका व्रत को निष्प्राण बना कर सर्वतोभावेन मानव समूह को अपूरणीय क्षति पहुंचाना है ।
अत एव विद्वत् समाज को आग्रह, दुराग्रह से ऊपर उठकर जीवत पुत्रिका व्रत के मूल स्वरूप की रक्षा करते हुए विशुद्ध तथा परम कल्याणकारी व्रत निर्णय करते हुए सनातन व्रत धर्म की सर्व प्रकारेण रक्षा करनी चाहिए।
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।।व्रत पारणार्थ शास्त्रीय विधि-विधान का सप्रमाण निरूपण।।
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सामान्य रूप पर से यह नियम सुनिश्चित है कि व्रत का पारण व्रत कि तिथि से बाद कि तिथि में किया जाना चाहिये।किन्तु यह शाश्वत तथा अपरिवर्तनीय नियम नहीं हैं। पारण के सम्बन्ध में शास्त्रों का उदारतम दृष्टिकोण कि जानकारी होना अनिवार्य है।
इसलिए इस लेख में पारण के नियमों का भी सप्रमाण उल्लेख किया जा रहा है।
व्रत में पारण का सोदाहरण प्रतिपादन----------
(१) यत्र पारण तिथि लुप्ता स्यात् तत्र परस्यां तिथौ प्रतरारभ्य पारणं कार्यम्। इति धर्म सिन्धौ।
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(२)यदि पारण दिनं लुप्तं स्यात् तर्हि तस्या: पर दिने प्रतरारभ्य पारणं विधीयते। (व्रताधिकार) निर्णय सिन्धौ।
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(३) पारण तिथौ लुप्तायामन्यस्मिन्नेव दिने प्रातः पारणं कारयेत्।
(व्रतप्रकरणम्)पराशर माधवीये।
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(४) पारण तिथ्याभावे तु परस्यामह्नि पारणं कार्यम्।
निर्णयामृत(व्रताधिकारे)
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(५) यदि पारण तिथि: न लभ्यते तथा परस्यामह्नि प्रातरारभ्य पारणं विधीयते। स्मृति मुक्ताफले (व्रत खण्डे)
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(६)पारण तिथि लोपे दशम्यां प्रातः पारणं एवं सर्व व्रतिषु।
गृह्य रत्नाकरे (व्रतोपवासे)
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(७) यदा पारण तिथि: सम्पूर्णं लुप्यते तदा परस्यां प्रातरारभ्य पारणम्। शुद्धि कौमुद्याम्।
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(८) नास्ति यदि परा तिथि: ततोSन्तरायामेव समाप्ति: कार्याSन्यथा दोष:। निर्णय सिन्धौ।।
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(९) यदा व्रत समाप्त्युपयोगिनी तिथि:लुप्यते तथा तस्या: परा तिथि ग्राह्यम्।। व्रत रहस्ये।।
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(१०) नवम्यां पारणं लुप्तायां अनन्तर दिने प्रातरारभ्य।
व्रत राजे( जितिया व्रत विधौ)
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(११) लुप्ते समापन तिथौ तस्या: परा दिनं श्रेय:। हारीत स्मृतौ (सर्व व्रत साधारण नियमे)
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उपरोक्त सभी शास्त्रों का कथन यही है कि व्रत नियमानुसार ही किया जाना चाहिए। पारण कि तिथि लोप होने पर उसके बाद की तिथियों में पारण किया जाना चाहिए।
प्रमाण स्वरूप एकादशी का पारण द्वादशी में होना श्रेष्ठ माना जाता है । किन्तु यदि द्वादशी तिथि का लोप हो जाये तो त्रयोदशी में पारण किया जाना चाहिए। इसी प्रकार सभी व्रतों के बारे यह नियम प्रभावी होगा।
जीवित्पुत्रिका व्रतियों का पारण ( यदि नवमी लुप्त हो तो) दशमी में होगा। जैसा कि --नवम्यांपारणं लुप्तायामनन्तरदिने प्रातरारभ्य।व्रतराजेति।।
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संक्षेपत: कहा जाना सर्वथा शास्त्र सम्मत ही होगा कि जीवत पुत्रिकाव्रत की मूल प्रकृति सूर्योदय से सम्बन्धित होने के साथ - साथ वेदात्मा गरुण देव जी द्वारा कीलित भी है ।यह व्रत अन्य व्रतों की प्रकृति से भिन्न प्रकृति वाला व्रत है। इसमें सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि का होना अनिवार्य है । तभी ब्रह्म भाव की प्राप्ति होकर इसका नाम जीवत पुत्रिका होगा ।
अन्यथा कि स्थिति में (अर्थात् सप्तमी तिथि में सूर्योदय होने पर ) न तो ब्रह्म भावत्व की प्राप्ति होगी ना ही जीवत पुत्रिका हो पाएगी।इस स्थिति में व्रत हि निरर्थक तथा प्रभाव रहित होकर व्रती के लिए हानी कारक हो जाएगा।
हमें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए तथा आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी में सूर्योदय होने पर ही जीवित पुत्रिका व्रत कर के अपना सर्व विध कल्याण सम्पादन करना चाहिए।इति शम।।
आचार्य श्रीकृष्णा नन्द पौराणिक सिद्धाश्रम धाम बक्सर (विहार)
दिनांक ०१--०९--२०२५ दिन सोमवार।। हरि ॐतत्सत् ३।।
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