Divine Akhand Jyoti

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BioteMscSk
1. हम ईश्वर को सर्वव्यापी, न्यायकारी मानकार उसके अनुशासन को अपने जीवन में उतारेगें।
2. शरीर को भगवान का मंदिर समझकार आत्म-सयंम और नियमितता द्वारा आरोग्य की रक्षा करेंगे।
3. इंद्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, और विचार संयम का सत्त अभ्यास करेंगे।

*‼ अहंकारी बाध्यते लक्ष्यः ‼*            *‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖🌞 *30 May, 2026 Saturday* 🌞 🌻 *३० मई, २०२६...
30/05/2026

*‼ अहंकारी बाध्यते लक्ष्यः ‼*
*‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*
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🌞 *30 May, 2026 Saturday* 🌞
🌻 *३० मई, २०२६ शनिवार* 🌻
*!! ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, चतुर्दशी तिथि, संवत २०८३ !!*
*!! सूर्योदय 5:21 AM, सूर्यास्त 7:07 PM !!*
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*श्रावस्ती नगरी में सर्वत्र तपस्वी सुधारक की ही चर्चा थी। लोभ और मोह, वासना और तृष्णा पर उन्होंने विजय पा ली थी। तत्वदर्शियों ने साधना से सिद्धि के तीन सोपान बताये हैं–’मातृवत् परदारेषु पर द्रव्येषु लोष्ठवत् और आत्मवत् सर्वभूतेषु’। साधु−सुधारक रूपी आरम्भिक दो सोपानों पर चढ़ चुके थे।* उनके तप और त्याग से–निस्पृह जीवन चर्या से हर कोई प्रभावित था। लोगों की श्रद्धा एवं सम्मान के सुमन उन पर चढ़ रहे थे। उग्र साधन के ताप में इन्द्रियों की वासना विगलित हो चुकी थी। *संयम और तितिक्षा की अग्नि में तपने के बाद मन ने वित्तेषणा की निस्सारता सिद्ध कर दी थी, पर अभी भी लोकेषणा मन के एक कोने में अपना अड्डा मजबूती से जमाये हुई थी।* जिसके कारण साधना की अहम्यता पोषण पा रही थी। शास्त्रकारों ने लोकेषणा को सबसे सूक्ष्म और प्रबलतम शत्रु माना है जिस पर विजय पाना प्रायः कठिन पड़ता है। *यही तपस्वी सुधारक के साथ हुआ। सम्मान और श्रेय प्राप्त कर सुधारक का अहंकार बढ़ता ही गया।*

*निरासक्त तपस्वी के प्रति उमड़ने वाली श्रद्धा ने वन, सम्पत्ति, वस्त्र आदि उपादानों के अम्बार लगा दिए। यह देखकर सुधारक के मन में वितर्क उठा कि–अब मेरी तपस्या सफल हो गयी।* योग सिद्ध हो गया, जीवन मुक्ति का अधिकारी बन गया। अहंकार साधक के पतन का कारण बनता है। अनेकों स्थानों पर परिव्रज्या के निर्मित परिभ्रमण करने के उपरान्त जब वे आश्रम में वापिस लौटे तो वृद्ध गुरु की तीक्ष्ण दृष्टि से उनका अहंभाव छुपा न रह सका। *एक दिन गुरु ने उन्हें पास बुलाया और कहा “वत्स! आश्रम में समिधाएँ समाप्त हो चुकी है। जाओ जंगल से समिधाएँ ले आओ।* प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी करनी है। सुधारक ने उपेक्षा दर्शाते हुए कहा–”मुझे अब कर्म करने की आवश्यकता नहीं है। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।” *तत्वदर्शी गुरु भावी आशंका से चिन्तित हो उठे। उन्होंने स्नेह मिश्रित स्वर में कहा–”तात! तुम यह काम रहने दो, पर एक काम अवश्य करो।* भगवान बुद्ध श्रावस्ती नगरी में पधारे है। उनसे एक बार अवश्य मिल आओ।” सुधारक ने बुद्ध की ख्याति सुन रखी थी। मन में उत्कण्ठा भी थी मिलने की। गुरु के प्रस्ताव को स्वीकार करके वह महाप्राज्ञ से मिलने चल पड़े।

अहंकार नाश ही करता है | Ahankar Nash Hi Karta Hai | Dr Chinmay Pandya, https://youtu.be/vSKChpugH14?si=1o-XThgE5dM8MD_p

*जैतवन बौद्ध बिहार में बौद्ध भिक्षुकों की मण्डली ठहरी थी। वहाँ पहुँचने पर सुधारक को मालूम हुआ कि बुद्ध भिक्षाटन कि लिए गये है। इतने भिक्षुओं के रहते हुए भी बुद्ध को भिक्षाटन के लिए जाना पड़ता है, यह बात सुधारक की समझ में न आ सकी। खोजते−खोजते एक गृहस्थ के यहाँ भीख मांगते बुद्ध से उनकी भेंट हो गयी। अपना परिचय सुधारक न स्वयं एक तपस्वी के रूप में दिया तथा बन्धन मुक्ति का उपदेश देने का आग्रह किया। महाप्राज्ञ मौन रहे और सुधारक के साथ जैतवन वापिस लौटे। रात्रि विश्राम करने का आदेश देने तथा प्रातः− कान सम्बन्धित विषय पर चर्चा करने के साथ संक्षेप में वार्ता समाप्त की।*

*दूसरे दिन भगवान बुद्ध के सामने अपनी जिज्ञासा लिए सुधाकर बैठे थे। अंतर्दृष्टा महाप्राज्ञ से सुधारक की स्थिति दर्पण की भाँति स्पष्ट थी। तपस्वी और त्यागी होते हुए भी सुधारक अहंकारी है, यह अपनी सूक्ष्म दृष्टि से, वे देख चुके थे। उनकी मर्मभेदी वाणी फूट पड़ी–”वत्स! जीवन मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोधक है–अहंकार। यह लोकेषणा की कामना से बढ़त है, पर निरासक्त कर्मयोग–सेवा भावना से भावना से घटता है। लोकसेवा में निरत होकर ही अहंकार पर विजय प्राप्त की जा सकती है। आत्मवत् सर्वभूतेषु की उच्चस्तरीय अनुभूति इस सेवा साधना से ही सम्भव है।”*

*सुधारक को अपनी भूल ज्ञान हुई। भगवान बुद्ध के चरणों में गिरकर उन्होंने क्षमा माँगी और लोकसेवा में प्रवृत्त होकर अपनी अवरुद्ध आत्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने में लग गये।*

*✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *अखण्ड ज्योति मई 1982*

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*‼ देवी प्रतिशोध ‼*            *‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖🌞 *28 May, 2026 Friday* 🌞 🌻 *२८ मई, २०२६ शुक्रवार* 🌻...
29/05/2026

*‼ देवी प्रतिशोध ‼*
*‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*
➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖
🌞 *28 May, 2026 Friday* 🌞
🌻 *२८ मई, २०२६ शुक्रवार* 🌻
*!! ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, त्रयोदशी तिथि, संवत २०८३ !!*
*!! सूर्योदय 5:22 AM, सूर्यास्त 7:07 PM !!*
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सूर्यास्त के बाद —अन्धकार घना होता जा रहा था। अरब की मरुभूमि में रातें भी बड़ी भयावह लगा करती हैं। ऐसे ही रेतीले सुनसान स्थान पर यात्री को एक झोंपड़ी दिखाई दी। जिसमें कोई व्यक्ति गीत गा रहा था। यात्री एक क्षण को रुका और गीत के बोल सुनने लगा।

यात्री को झोंपड़ी में रहने वाले वृद्ध पुरुष की आकृति जानी-पहचानी लगी। स्मृतियाँ उघड़ती गयीं और उसे याद आया कि इस व्यक्ति से उनका निकटतम सम्बन्ध रह चुका है। झोंपड़ी में रहने वाला वृद्ध व्यक्ति युसुफ के नाम से जाना जाता था। यात्री ने युसुफ से कहा—मैं समाज द्वारा बहिष्कृत एक पापी हूँ। सभी ने मुझे अषम कहकर मेरा परित्याग कर दिया। राज कर्मचारी मुझे पकड़ कर दण्डित करने के लिए मेरा पीछा कर रहें है। आज की रात आपके घर में गुजारने का मौका मिल जाय तो बड़ी दया होगी। युसूफ आप तो अपनी दया के लिये संसार भर में प्रसिद्ध है।

युसूफ ने बड़ी विनम्रता पूर्वक कहा—भद्र पुरुष यह घर मेरा नहीं उस परमात्मा का ही है। इसमें तुम्हारा भी उतना ही अधिकार है जितना कि मेरा। मैं तो इस देह का भी स्वामी नहीं हूँ, यह भी एक धर्मशाला है। तुम प्रसन्नता पूर्वक जी चाहे जब तक यहाँ रहो।’

वह अन्दर खाना लाने के लिए चला गया। अभ्यागत को भरपेट भोजन करवा कर सोने के लिए बिस्तर लगा दिया और बिना परिचय पूछे ही सो जाने के लिए कहा।

प्रातःकाल हुआ। पूर्व दिशा में अरुणिमा फैलने लगी और पक्षियों का कलरव गूँजने लगा। युसुफ उठ गये थे और नहा-धोकर अतिथि के जागने का इन्तजार कर करे रहे थे। उधर अतिथि कई दिनों का हारा थका होने के कारण चैन की नींदें ले रहा था। युसुफ अतिथि के पास गये और धीरे से जगा कर बोले—”उठो भाई—सूरज उग आया है। तुम्हारी सुविधा के लिये मैं थोड़ा-बहुत लाया हूँ उसे लेकर मेरे द्रुतगामी घोड़े पर सवार होकर दूर चले जाना ताकि तुम अपने शत्रुओं की पहुँच से बाहर निकल सको।”

अमृतवाणी:- श्रद्धा और विश्वास: भगवान को अपने जीवन में बुलाने का मंत्र: भाग 2, https://youtu.be/dv8jnOBZ5K8?si=9aWQB8n5JAbhCQLO

इस सत्पुरुष के मुखमण्डल पर हार्दिक पवित्रता ‘शीतल’ रजनी चन्द्रिका की भाँति फैली हुई थी। उनके शब्द जैसे अन्तःकरण से निकल कर आ रहें थे तभी तो उनका व्यवहार इतना दिव्य बन पड़ा था। इस दिव्य व्यवहार के प्रभाव स्वरूप की आगन्तुक के हृदय में भी पवित्र और सात्विक विचारों का प्रवाह बहने लगा था। अतिथि को अपना पूरा विगत स्मृत हो आया और लगा कि पाप पूर्ण प्रवृत्तियों की कालिमा पश्चाताप के रसायन से स्वच्छ होती जा रही हैं और उनके स्थान पर निर्मल भावों की तरंगें उठने लगी हैं।
पृथ्वी पर घुटने टेक युसुफ के चरणों में झुक कर अतिथि ने कहा—’हे शेख! आपने मुझे शरण दी, भोजन दिया, शान्ति दी और पवित्रता भी दी अब आपके प्रति कृतज्ञता के लिये क्या कहूँ?”

‘मैं कैसे कहूँ कि यह उपकार पापी इब्राहिम के लिए किया है जो आपके बड़े पुत्र का हत्यारा है। हमारे कबीलों में हत्यारे का शिरच्छेद कर ही मृतात्माओं शाँति पहुँचायी जाती है, आप भी उसी परम्परा का पालन कीजिए।’

इब्राहिम यह कहकर मौन हो गया। परन्तु युसुफ ने तो उसे भगाने में और भी जल्दी की क्योंकि वे डरने लगे थे—अपने आप से कि कहीं अपने पुत्र के हत्यारे का वध करने के लिए पाशविक प्रतिशोध न जाग पड़े।” वे बोले-तब तो तुम और भी जल्दी चले जाओ। कहीं मैं प्रतिशोध के कारण कर्त्तव्य भ्रष्ट न हो जाऊँ।

इब्राहिम चला गया और युसुफ ने अपने दिवंगत पुत्र को सम्बोधित करते हुए कहा—मैं तेरे लिये दिन-रात तड़पता रहा हूँ। आज मैंने तेरा बदला ले लिया है। तेरे हत्यारे की नृशंसभावना पश्चात्ताप की अग्नि में जलकर नष्ट हो गयी हैं और उसका हृदय पवित्र हो गया है। अब तू शान्ति की चिरनिद्रा में सो जा।

*✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *अखण्ड ज्योति मई 1974*

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*‼ गतिशीलता की संजीव सरसता ‼*            *‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖🌞 *28 May, 2026 Wednesday* 🌞 🌻 *२८ मई, २०२...
28/05/2026

*‼ गतिशीलता की संजीव सरसता ‼*
*‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*
➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖
🌞 *28 May, 2026 Wednesday* 🌞
🌻 *२८ मई, २०२६ बुधवार* 🌻
*!! ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि, संवत २०८३ !!*
*!! सूर्योदय 5:22 AM, सूर्यास्त 7:06 PM !!*
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*उस दिन लहर बड़ी निराश और दुखित बैठी थी। समुद्र उसे आगे और बिखरने के लिए कह रहा था। किन्तु वह डर रही थी। अपने आश्रयदाता के अञ्चल में छिपकर बैठे रहना ही उसे प्रिय था। वह इतने में ही सन्तुष्ट रहना चाहती थी।*

*समुद्र ने उसे समझाया भद्रे, आगे बढ़ो। मिलन का आनन्द जड़ता में नहीं गति के साथ जुड़ा हैं। विद्रोह के बिना प्रणय की सरसता की अनुभूति कैसी होगी। शीत के अभाव में आतप का स्वाद कैसे चखा जा सकेगा?*

*लहर चाहती नहीं कि उसे आगे बढ़ने के झंझट में पड़ना पड़े। भविष्य न जाने कैसा होगा? इस अनिश्चितता की कल्पना उसे भयभीत कर रही थी। उसने संतृष्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखा और चाहा कि उसे जहाँ का तहाँ रहने दिया।*

*समुद्र गम्भीर हो गया उसने कहा—देखती नहीं मेरे अन्दर कितना दर्द है जो मुझे क्षण भर चैन से नहीं बैठने देता। उस दर्द में हिस्सा बटाये बिना तुम कैसे मेरी प्रियतमा बन सकोगी? अन्तर को छूना चाहोगी तो दर्द भी तुम्हारे हिस्से में आवेगा। ज्वार−भाटों के रूप में उछलती मेरी पीड़ा में से क्या तुम लहराती हलचल जितना हिस्सा भी नहीं बटा सकोगी? प्रेम के साथ क्या मेरा दर्द भी अंगीकार न करोगी?*

अमृतवाणी:- साधना से सिद्धि | Sadhna Se Siddhi | Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/l-h0rWft5WY?si=mJuz95xXb-qZILqZ

*लहर युवक रही थी। अतीत की सरसता और आगत की अनिश्चितता के बीच वह असमंजस में खड़ी थी—उस स्तब्धता को तोड़ती हुई आगे वाली लहरें हंस पड़ी और बोलीं—सहेली हमें देखो न, उद्गम से बिछुड़ कर ही तो हम भी अनन्त की ओर जा रही है, अपने प्रियतम की महानता के अंतर्गत ही तो क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं—हम उससे बिछुड़ी कहाँ हैं। सीमित से असीम बनकर हमने प्रणय की सरसता को खोया कहाँ बढ़ाया ही तो है। फिर तु क्यों डरती हो। चर्चा बड़ी मधुर थी। सो उसे सुनकर सूर्य की किरणें भी ठिठक गई। प्रौढ़ाओं के समर्थन में सिर हिलाते हुए उनने भी कहा—हमें अपने प्रियतम की विशालता में विचरण करते हुए, तब की अपेक्षा अब अधिक उल्लास है जब हम निकटता की निष्क्रियता को जकड़े बैठी थीं।*

*प्रसंग पूरा नहीं हो पाया था कि महकती गन्ध सी वहीं आ पहुँची और बोली पुष्प की गरिमा के सुविस्तृत क्षेत्र को बढ़ाती हुई हम बिछुड़न का नहीं पुलकन का अनुभव करती हैं फिर छोटी सहेली—तुम्हीं क्यों कर रुक बैठने के लिए मचल रही हो।*

*समुद्र इस दोष चर्चा को मनोयोग पूर्वक शान्त चित से सुन रहा था। इतने में इन्द्र ने द्वार खटखटाया और कहा—चलने में विलंब न करो। प्यारी दुनिया तुम्हारी प्रतीक्षा में कब से बैठी है।*

*सागर सकपका कर उठ खड़ा हुआ। गेध का वाहन तैयार था। भाव बनकर वरुण ने उस पर आसन जमाया और इन्द्र के इशारे पर सुदूर यात्रा पर चल पड़ा।*
*नवोढ़ने संतृष्ण नेत्रों से देखा और पूछा—मेरे आश्रय दाता, क्या तुम्हें भी वियोग सहना पड़ता है—क्या बिछुड़न तुम्हारा भी पीछा नहीं छोड़ती।*

*सागर की आंखें छलक पड़ी। उसने कहा—भद्रे, यह बिछुड़न नहीं—नवीनीकरण है। जीवन इसी का नाम है। मैं मेघ बनकर आकाश में गमन करता हूँ और सरिताओं की जल राशि बनकर फिर वापिस लौट आता हूँ। इस गतिशीलता से किसी जीवित को छुटकारा नहीं। गमन का परित्याग करने पर तो मरण ही हाथ रह जायगा। सड़ना मुझे कब सुहाता है— कल्याणी।*

*लहर की आंखें खुल गई उसने चलना आरम्भ कर दिया।*

*✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *अखण्ड ज्योति मई 1974*

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*‼ वह जो प्राणवानों को इन्हीं दिनों करना है। ‼*            *‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖🌞 *27 May, 2026 Wednesda...
27/05/2026

*‼ वह जो प्राणवानों को इन्हीं दिनों करना है। ‼*
*‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*
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🌞 *27 May, 2026 Wednesday* 🌞
🌻 *२७ मई, २०२६ बुधवार* 🌻
*!! ज्येष्ठ माह, शुक्ल पक्ष, एकादशी तिथि, संवत २०८३ !!*
*!! सूर्योदय 5:22 AM, सूर्यास्त 7:06 PM !!*
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*युग परिवर्तन के इस प्रभात पर्व में जागृत आत्माओं की भूमिका ठीक उषा काल जैसी होनी चाहिये, जिससे असंख्यों की प्रेरणा मिले और माहौल बदले।* प्रज्ञा परिजनों में से जिनकी मनःस्थिति एवं परिस्थिति उलझी हुई है और उन्हें भी इन दिनों केवट, शवरी, गिलहरी जितना तो कुछ करना ही होगा। *हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहने में तो उनकी भी गति नहीं। इन ऐतिहासिक क्षणों में जो पेट प्रजनन की ही दुहाई देते रहेंगे और व्यस्तता अभाव ग्रस्तता की कहानी कहते रहेंगे, वे घाटे ही घाटे में रहेंगे।* कृपणताजन्य दरिद्रता तो उन पर छाई ही रहेगी, वह सुयोग बेला भी हाथ से निकल जायगी जिसमें वे सुदामा के तंदुल प्रस्तुत करके असंख्य गुना पाने का सौभाग्य उपलब्ध कर सकते थे। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए *सामान्य स्थिति के प्रज्ञा परिजनों को कहा गया है कि वे न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना करने छोटे-छोटे प्रज्ञा परिवार चलाने जितना उत्तरदायित्व तो ओढ़े हैं।* इस सरलतम सृजन प्रक्रिया में हर स्तर का व्यक्ति सहगामी बन सकता है। उसमें जोखिम तनिक भी नहीं। लाभ इतना जिसका सत्परिणाम हाथों हाथ देखा जा सकता है।

*समझा जाना चाहिए कि ढाई हजार वर्ष पूर्व बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन का उत्तरार्ध ही प्रज्ञा अभिमान है। इसमें “बुद्ध शरणं गच्छामि”, “धर्म शरणं गच्छामि”, “संघं शरणं गच्छामि” के तीनों ये सूत्र बौद्धिक कर्म, नैतिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति के रूप में सामयिक परिस्थितियों के अनुरूप मुखर एवं प्रखर हुए हैं।*

अमृत सन्देश:- अतीत को छोड़ो, भविष्य को संवारो : स्वर्ग के समान जीवन जिएं, https://youtu.be/JvjNlN0DmPg?si=oRzwKYWNd4zkltM4

*एक-एक कदम बढ़ाते हुए युगान्तरीय चेतना ने बीज से बढ़कर अब वृक्ष का रूप धारण किया है। विद्यार्थी एक वर्ष एक कक्षा उत्तीर्ण करते हुए बाल कक्षा से स्नातकोत्तर बनता है।* यही क्रम प्रज्ञा अभियान ने भी अपनाया है। बसन्त पर्व उसका जन्म दिवसोत्सव है। इस पुनीत अवसर पर हर वर्ष अंतरिक्ष में उस पर दिव्य अनुग्रहों की पुष्प

*👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 2)**रस लोनी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ, एक फूल को चूस कर दूसरे पर जा बैठती ह...
23/05/2026

*👉 प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 2)*

*रस लोनी भ्रमर और पराग प्रेमी मधुमक्खियाँ, एक फूल को चूस कर दूसरे पर जा बैठती है। तितलियों को एक फूल पर बैठे रहने से सन्तोष नहीं होता, उन्हें क्षण−क्षण नवीनता चाहिए। प्रेम जहाँ होगा वहाँ यह अस्थिर उन्माद कभी भी दृष्टिगोचर न होगा। जहाँ आस्थाएँ काम कर रही होंगी वहीं तो विश्वास दे सकने और पा सकने की स्थिति बनेगी।* आजीवन मैत्री निर्वाह का आधार वहीं तो बनेगा। प्रेम धर्म निबाहना केवल शूरवीरों का काम है—उसके लिए बहुत चौड़ा दिल चाहिए। मोहग्रस्त लोभीजन उसका निर्वाह कर सकें यह सम्भव नहीं हो सकता।

*मोहग्रस्त मनःस्थिति में भौतिक अनुदान, उपहार देने या पाने की प्रवृत्ति रहती है। यदि इस स्तर की प्रेम विडम्बना नर−नारी के बीच चल रही होगी तो उसमें यौन लिप्सा की आतुर माँग होगी।* भले ही प्रिय पात्र का गृहस्थ, भविष्य एवं स्तर पतन के गर्त में गिरता हो तो गिरे। उन्माद की पूर्ति किसी भी कीमत पर होनी चाहिए। आवेश में यह मोह ही प्रेम जैसा लगता है और उस आतुर मनःस्थिति में पड़े हुए उन्मादी अपने आपको ‘प्रेमी’ कहने लगते हैं, जबकि यह आचरण प्रेम के तत्व दर्शन की सीमा को छू भी नहीं रहा होता।

*विशुद्ध प्रेम व्यक्तियों के बीच आदर्शवादी विशेषताओं के कारण ही आरम्भ होता और पनपता है। वास्तविक सौंदर्य शरीर का नहीं आत्मा का होता है। वह आकृति को देखकर ठिठकता नहीं, वरन् गहराई में प्रवेश करके प्रकृति के मर्मस्थल तक चला जाता है।* ऐसे व्यक्ति शारीरिक आकर्षण को तनिक भी महत्व नहीं देते। उनके लिए काली कुरूप आकृति में ऐसी कोई न्यूनता दिखाई नहीं पड़ती, जिसकी तुलना में किसी रूप यौवन सम्पन्न को महत्व दिया जा सके। ऊपर चमड़ी के भीतर सर्वत्र रक्त, माँस, अस्थि जैसे घिनौने और दुर्गन्ध युक्त पदार्थ ही तो भरे पड़े हैं। उनमें केवल मूढ़ मति ही उलझती हैं। *शरीर आकर्षण को लेकर आरम्भ हुआ ‘प्रेम’ संध्याकाल के रंगीले बादलों की तरह देखते−देखते धूमिल होता चला जाता है और फिर कुछ समय बाद उसका कहीं पता भी नहीं चलता।*

*प्रेम गुण ग्राही होता है और वह केवल वहीं जमता है जहाँ व्यक्ति में आदर्शवादी विशेषताएँ परिलक्षित होती हैं। आत्मा की भूख है कि आत्मिक विभूतियों से भरे व्यक्ति के सजातीय आकर्षण से प्रभावित होकर उसकी भावनात्मक समीपता चाहे।* जड़वादी मोह ग्रस्तता के पीछे यौन लिप्सा का ताण्डव रहता है जबकि आत्मवादी प्रेम में केवल सद्भाव सम्पन्न आत्मीयता के आदान−प्रदान की माँग मात्र रहती है। *ऐसे प्रेमीजन यदि नर−नारी हैं तो वे आजीवन अति पवित्र सम्बन्ध खुश−खुशी बनाये रह सकते हैं और एक−दूसरे के चरित्र को उज्ज्वल सिद्ध करने के लिए अपनी दुर्बलता पर सदा−सदा तक काबू रख सकते हैं।*

*नर और नर के बीच—नारी और नारी के बीच उन्मादी प्रेम सघन नहीं हो सकता किन्तु निष्ठावान प्रेम के लिए लिंग भेद जैसी कोई अड़चन नहीं है। दाम्पत्य−जीवन में एक दूसरे पर जैसी निर्भरता होती है एक दूसरे के सान्निध्य में जितना आनन्द प्राप्त करते है वैसा ही विश्वस्तता और भाव भरी स्थिति नारी और नारी के बीच अथवा नर और नर के बीच भी रह सकती है। मैत्री और कामुकता दो भिन्न वस्तुएँ हैं। आवश्यक नहीं कि दोनों साथ रहें। कामुकता विहीन मैत्री भी उसी प्रकार निभायी जा सकती है जिस प्रकार दुनियादार लोगों की मैत्री विहीन कामुकता का क्रीड़ा−विनोद प्रायः चलता रहता है।*

*लोभ और स्वार्थ की पूर्ति के लिए उत्पन्न हुआ प्रेम पानी के बबूले की तरह उठता है और झाग की तरह बैठ जाता है। मतलब निकालने के लिए चापलूसी की डडडड विद्या अब एक सर्व विदित कथा कारिता रह गई है। प्रेम शब्द का उपयोग इस कला−कौशल के साथ भी आये दिन होता है—वैसी ही कृति अनुकृति—वैसी ही भाषा शब्दावली प्रयुक्त होती है पर वस्तुतः बगुला द्वारा मछली पकड़ने अथवा बिल्ली द्वारा चूहा दबोचने से पूर्व साध कर उठाये गये कदमों जैसी ही होता है। प्रयोजन पूर्ण होने के बाद तथाकथित प्रेम पात्र चूसे हुए नींबू के छिलके की तरह कूड़े के ढेर में फेंक दिया जाता है। यही तो आज का डडडड व्यवहार है। कैसा दुखद और कैसी दयनीय है यह विडम्बना।*

*.....क्रमशः जारी*
*✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
*📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई*

👉 *प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 1)**मोटी बुद्धि प्रेम और मोह को एक ही मानती है जबकि उनमें जमीन आसमान जितना अन्तर ह...
22/05/2026

👉 *प्रेम का अमृत बनाम मोह का विष (भाग 1)*

*मोटी बुद्धि प्रेम और मोह को एक ही मानती है जबकि उनमें जमीन आसमान जितना अन्तर है। व्यक्तियों अथवा वस्तुओं के प्रति इतनी अधिक आसक्ति का होना कि उन्हें पाने अथवा कब्जे में रखे रहने के लिए कुछ भी करने पर उतारू रहा जाय मोह है।* व्यक्ति गत रुचि, आकर्षण अथवा उपयोग की दृष्टि से किन्हीं पदार्थों एवं व्यक्तियों के साथ घनिष्टता स्थापित हो जाती है और वह इतनी सघन हो जाती है कि विछोह की बात सोचने से कष्ट होता है। *यह मोह की स्थिति है। मोह यह चाहता है कि प्रिय वस्तु का साथ छूटने न पाये, चाहे इसके लिए अपना अथवा प्रिय पात्र का कितना ही अहित क्यों न होता हो यह मोह भी मोटी बुद्धि का प्रेम ही लगता है और इसी शब्द से उस आसक्ति का उल्लेख भी किया जाता है, पर वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न होती है।*

*प्रेम चूँकि एक आदर्श है। इसलिए उसकी घनिष्टता एकात्मता आदर्श के साथ ही जुड़ी रहेगी। जहाँ आदर्श न हो वहाँ प्रेम का अस्तित्व रह ही नहीं सकता। व्यक्ति गत मोह किसी के रंग, रूप, व्यवहार, उपयोग एवं आकर्षण के आधार पर पनपता है। जो रुचिर लगा उसी के प्रति आकर्षण बढ़ गया।* जिसकी समीपता में सुखद कल्पना कर ली गई उसी के पीछे मन चलने लगा। यह आसक्ति किसी को देखने मात्र से पनप सकती है और उसके घनिष्ठ सान्निध्य की आतुरता उन्माद बनकर कुछ भी कर गुजर सकती है। प्रेम के नाम पर ऐसी ही दुर्घटनाएँ आये दिन होती रहती है। *इनका परिणाम वैसा ही होता है जैसा नशा उतरने पर पैसा, समय और खुमारी गँवाकर असहाय अशक्त बने हुए शराबी का। इस प्रेमोन्माद में कभी किसी को शान्तिदायक परिणाम हाथ नहीं लगा है। यह जुआ खेलने वालों को सदा हार ही हाथ लगती रही है।*

*प्रेम न तो आकस्मिक होता है और न अकारण। उसके पीछे ऐसे तथ्य होते हैं जो आदर्शवादिता की पृष्ठभूमि पर ही उदय हो सकते हैं। उसमें रंग−रूप की—आकर्षक व्यक्तित्व की—आवश्यकता नहीं पड़ती।* वरन् यह परख रहती है कि प्रिय−पात्र कितना आदर्शवादी है। उसमें सज्जनता, कर्त्तव्य−निष्ठा, उदारता, सहृदयता जैसे सद्गुणों की कितनी मात्रा है। जहाँ विभूतियों के प्रति आकर्षण होगा वहाँ मैत्री केवल सद्भाव सम्पन्न सच्चरित्र व्यक्ति से ही बन पड़ेगी। *और तब तक यथावत् बनी रहेगी जब तक उन सद्गुणों का अस्तित्व अक्षुण्ण रह सके।*

*मोह में गुणों की अपेक्षा नहीं रहती। शारीरिक आकर्षण की इसके लिए पर्याप्त है।* कुरूप से अरुचि रूप वाले की मनुहार जहाँ हो रही हो वहाँ मोह के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। ऐसा आदर्श रहित आकर्षण सर्वथा अस्थिर रहता है। उसमें अधिक गहरे नशे की प्यास रहती है। *अपनी कुरूप पत्नी के प्रति रुखाई धारण करके जो रूपवान प्रेयसी है पीछे लगा फिरता है उसके सम्बन्ध में यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि वह उस प्रेयसी के प्रति भी अपनी अनुरक्ति देर तक बनाये रह सकेगा।* नवीनता का—अधिक गहरे नशे का आकर्षण उसे फिर कहीं से कहीं से भागेगा। *दूसरी के बाद तीसरी, तीसरी के बाद चौथे प्रेयसी तलाश करने की कभी न बुझने वाली अतृप्ति का मोह ग्रस्तों में सदा ही बनी रहेगी। वे किसी के भी सगे न बन सकेंगे।*

*.....क्रमशः जारी*
*✍️ परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
*📖 अखण्ड ज्योति 1974 मई*

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Thought of the DAY
21/05/2026

Thought of the DAY

*‼ क्या काफिला बिछड़ ही जायगा? (भाग 2) ‼*            *‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖🌞 *15 May, 2026 Friday* 🌞 🌻 *१...
15/05/2026

*‼ क्या काफिला बिछड़ ही जायगा? (भाग 2) ‼*
*‼ शांतिकुंज ऋषि चिंतन ‼*
➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖
🌞 *15 May, 2026 Friday* 🌞
🌻 *१५ मई, २०२६ शुक्रवार* 🌻
*!! ज्येष्ठ माह, कृष्ण पक्ष, त्रयोदशी तिथि, संवत २०८३ !!*
*!! सूर्योदय 5:28 AM, सूर्यास्त 6:58 PM !!*
➖➖➖➖➖‼️➖➖➖➖➖

*दुर्घटना और विपत्ति की घड़ियों में सेवा सहायता का पुकार होती है और वह जुटाई भी जाती है। पर यह तो आपत्तिकालीन समाधान हुआ। स्थायी की समस्या का समाधान कहाँ हुआ? दुर्घटना और विपत्ति की रोकथाम तो एक आवश्यकता है।* माना कि आज की कराहें बड़ी मर्मभेदी है, माना कि उनका तात्कालिक उपचार होना चाहिए, पर यह भला नहीं जाना चाहिए कि कराहों की परिस्थिति उत्पन्न करने वाली विडम्बनाएँ भी जहाँ की तहाँ नहीं पड़ी रहने देनी चाहिए। परिवर्तन और सुधार उनका भी सोचा जाना चाहिए।

*मनुष्यों का दूसरा वर्ग वरिष्ठों का है। वरिष्ठ वे जो अपनी समस्या का आप समाधान कर सके साथ ही बचे हुए पराक्रम का उपयोग दूसरों को उबारने में कर सके! महत्ता इन्हीं की है। नदी की प्रचण्ड धारा को चुनौती देने वाले मांझी न हों तो भयानक आपत्तिकाल सामने रहने पर भी लोग नदी किनारे खड़े असहाय अपंगों की तरह रोते−कलपते रहेंगे। पुरुषार्थ उस मांझी का है जिसकी माँस−पेशियाँ चप्पू को दोनों हाथों से पकड़ती हैं और नाव पर लदे हुओं को पार उतारने का विश्वास भरा अभयदान देती है। पार उतरने के लिए व्याकुल भीड़ की तुलना में एक माँझी वरिष्ठ हैं। भगवान किसी को सम्पन्नता भले ही न दे, पर यदि सच्ची अनुकम्पा बरसा सके तो उसे माँझी जैसी बलिष्ठता अवश्य प्रदान कर दे।*

*रोगियों की कहीं कमी नहीं। आवश्यकता कुशल चिकित्सक की हैं। ज्योति गँवाकर दिन में रात्रि जैसा अँधेरा अनुभव करने वालों की कमी नहीं। सराहनीय वे हैं जिन्हें निष्णात चिकित्सक कहा जाता है।* वे अस्पताल में प्रातःकाल घुसते हैं और संध्याकाल तक आपरेशन की मेज पर योगी की तरह समाधिस्थ होकर शल्यक्रम चलाते रहते हैं। शल्यगृह से वापिस निकलने पर खोई ज्योति फिर पा लेने वाले सराहना करें या उपेक्षा, इससे कुछ बनता बिगड़ता नहीं। *तथ्य वरिष्ठता के सौभाग्य का है, जिसे वह मिला वह सन्तोष के साथ जियेगा और शान्तिपूर्वक मरेगा। भगवान किसी को धन कुबेर भले ही न बनायें, पर उनकी करुणा बरसनी ही हो तो उस चिकित्सक की पदवी मिले जिसने असंख्यों को अन्धतमिस्रा से उबारा और आलोक की दुनिया में हाथ पकड़कर ला बिठाया।*

अमृतवाणी:- बीज की तरह गलें : भाग 01 | Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya, https://youtu.be/dQ-KWJmk1aU?si=xPy5FXNOb-F7e-Aw

*अभागों की दुनिया अलग है और सौभाग्यवानों की अलग। अभागे जिस−तिस प्रकार लालच को पोषते, अविवेकी प्रजनन में निरत रहकर कमर तोड़ने वाला बोझ लादते, व्यामोह में तथाकथित अपनों को कुसंस्कारी बनाते, अपव्ययी असंयमी रहकर दुर्व्यसनों के शिकार बनते, अहंता के परिपोषण में आक्रमण करते और प्रत्याक्रमण सहते हुए समय बिताते हैं।* यही है उनकी जीवन गाथा का सार संक्षेप। यह घिनौनी परिचर्या अपनाते तो असंख्यों हैं, पर उनमें से ऐसे कदाचित ही कोई हों जो पथ भ्रष्टता की कष्टदायक प्रतिक्रिया से बच सके। रोते−कलपते, खीजते खिजाते, डरते−डराते छेड़ते पिटते लोगों के ठट्ठ के ठट्ठ रह गली चौराहे पर खड़े देखे जा सकते हैं। *इन्हीं दुर्दशाग्रस्तों की भीड़ में जा घुसना समझदारी कहाँ है? भगवान किसी को उच्चशिक्षा से वंचित भले ही रखे पर इतनी समझ तो दें कि हित−अनहित में अन्तर करना आये। भले ही शूर−वीर योद्धा बनने का श्रेय किसी को न मिले पर इतनी सूझ−बूझ तो रहे कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है और उसे सार्थक बनाने के लिए भीड़ के साथ न चलने और अपना रास्ता आप चुनने जितना विवेक तो चाहिए ही। भगवान उससे वंचित किसी को भी न करे।*

✍️ *परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य*
📖 *अखण्ड ज्योति 1982 अप्रैल*

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