11/06/2026
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रेस कॉन्फ्रेंस न करने का लोकतांत्रिक निहितार्थ
भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में प्रधानमंत्री का पद संवैधानिक रूप से कार्यपालिका का प्रमुख है। यह पद केवल शासन करने का नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने का भी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस इस जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जिसमें प्रधानमंत्री मीडिया (जो जनता का प्रतिनिधि माना जाता है) के माध्यम से नीतियों, निर्णयों और चुनौतियों पर खुलकर सवालों का सामना करते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 2014 से अब तक के कार्यकाल में भारत में कोई खुली, अनियोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है। विदेशों में भी लगभग हर जगह सवालों से बच निकलने का हर संभव प्रयास किया गया है(एकाध अपवाद छोड़कर)। यह परंपरा से विचलन लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
लोकतंत्र के मानदंड (Democratic Norms),
लोकतंत्र की आधारशिला पारदर्शिता (Transparency), जवाबदेही (Accountability) और स्वतंत्र प्रेस पर टिकी है।
प्रेस को “लोकतंत्र का चौथा स्तंभ” कहा जाता है क्योंकि यह सरकार को जनता के सामने जवाबदेह बनाता है।
नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस से नेता कठिन सवालों का सामना करते हैं, अफवाहों को रोका जाता है और नीतिगत स्पष्टता आती है।
यदि नेता प्रेस से बचते हैं, तो यह सूचना के अधिकार का हनन है और शक्ति का बढ़ते केंद्रीकरण का सबूत है।
अमेरिका जैसे परिपक्व लोकतंत्रों में राष्ट्रपति नियमित प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं (Eisenhower काल से आधुनिक प्रथा)। बाइडेन, ट्रंप या ओबामा जैसे नेताओं ने सैकड़ों बार मीडिया का सामना किया। यह प्रथा जवाबदेही की संस्कृति को मजबूत करती है।
भारत में स्वतंत्रता के बाद से प्रधानमंत्रियों ने प्रेस से संवाद को लोकतांत्रिक परंपरा माना है:
• जवाहरलाल नेहरू: लगभग 75 प्रेस कॉन्फ्रेंस।
• लाल बहादुर शास्त्री: 56।
• इंदिरा गांधी: 42।
• राजीव गांधी: 62।
• अटल बिहारी वाजपेयी: 55।
• मनमोहन सिंह: 114 या उससे अधिक — विदेश यात्राओं सहित नियमित रूप से सवालों का जवाब दिया।
ये नेता असहमति और कठिन सवालों का सामना करते थे, जो लोकतंत्र की ताकत दिखाता है। मोदी सरकार में यह परंपरा पूरी तरह टूट गई है — केवल 2019 में एक बार (जिसमें उन्होंने अमित शाह को सवालों का जवाब देने का ज़िम्मा सौंप दिया था)वे प्रेस के सामने आ फँसे थे । विदेशों में भी उनके”मजबूरी” में सीमित इंटरैक्शन हुए हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के अभाव में प्रधानमंत्री संसद या नियंत्रित इंटरव्यू तक सीमित रह जाते हैं। कठिन सवाल (बेरोजगारी, अर्थव्यवस्था, सामाजिक मुद्दे) टल जाते हैं, जिससे जनता को पूर्ण जानकारी नहीं मिलती।
स्वतंत्र प्रेस का कमजोर होना,मीडिया को “प्रतिद्वंद्वी” मानना (जिसकी Editors Guild of India ने आलोचना की) प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला है। भारत के प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में इससे अपमानजनक गिरावट आई है।
लोकतंत्र में नेता जनता के सेवक होते हैं, न कि अपरिहार्य। प्रेस से बचना “एक व्यक्ति केंद्रित” छवि को बढ़ावा देता है, जो संसदीय लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है।
अधिकांश लोकतांत्रिक देशों (UK, Canada, Australia, Germany) के नेता नियमित रूप से प्रेस का सामना करते हैं। भारत जैसे विविध और बड़े लोकतंत्र में तो यह और भी आवश्यक है।
प्रधानमंत्री का प्रेस कॉन्फ्रेंस न करना केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक परंपरा, जवाबदेही और पारदर्शिता से विचलन है। यह पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों की विरासत को कमजोर करता है और जनता को पूर्ण रूप से सूचित रहने से वंचित रखता है। सच्चा लोकतंत्र बहस, संवाद और scrutiny पर टिका होता है।
संदर्भ: विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स, Editors Guild statements और ऐतिहासिक आंकड़े।