Jhar UpDate

Jhar UpDate एक कदम नवनिर्माण झारखंड की ओर झारखंड की संस्कृति सभ्यता और अस्मिता को बचाना है।

15/02/2026
नगर निकाय शासन की मुख्य कार्यशक्ति (Functions & Powers):01- नगर नियोजन और विकास: शहर के मास्टर प्लान बनाना, भूमि उपयोग क...
13/02/2026

नगर निकाय शासन की मुख्य कार्यशक्ति (Functions & Powers):
01- नगर नियोजन और विकास: शहर के मास्टर प्लान बनाना, भूमि उपयोग का विनियमन (Land-use regulation), और भवन निर्माण की अनुमति देना।
02- बुनियादी सेवाएं: घरेलू, औद्योगिक और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए जलापूर्ति (Water Supply), जल निकासी (Sewerage), और सफाई प्रबंधन (Sanitation)।
03- स्वच्छता और स्वास्थ्य: ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management), अस्पतालों की व्यवस्था, और जन स्वास्थ्य के लिए आवश्यक उपाय।
04- बुनियादी ढांचा: सड़कों, पुलों का निर्माण और रखरखाव, स्ट्रीट लाइट (मार्ग प्रकाश) की व्यवस्था, और सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण।
05 -सामाजिक और आर्थिक विकास: गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, पार्क, खेल के मैदान, श्मशान घाटों का प्रबंधन, और सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना।
06- वित्तीय शक्तियां: कर (जैसे संपत्ति कर), टोल टैक्स, उपयोगकर्ता शुल्क, और अन्य फीस लगाना और वसूलना।
07-प्रशासनिक और कानूनी: अवैध निर्माण रोकना, जन्म-मृत्यु का पंजीकरण, और नगर निगम के उप-नियमों (Bye-laws) का निर्माण करना।

*समाज , समाज सेवा, विकास सर्वोपरी , समाजसेवी दुर्योधन महतो**गांव व समाज के निर्णय पर दानिश भाई की मां जहां आरा को समर्थन...
04/02/2026

*समाज , समाज सेवा, विकास सर्वोपरी , समाजसेवी दुर्योधन महतो*

*गांव व समाज के निर्णय पर दानिश भाई की मां जहां आरा को समर्थन*

चक्रधरपुर - लगातार पिछले 15 वर्षों से वार्ड नंबर 19 में निस्वार्थ भाव से जनसेवा करने को लेकर पूरा गांव टोला धातकीडीह दानिश जेब की मां जहां आरा को समर्थन देने का निर्णय लिया गया। वार्ड संख्या 19 की उम्मीदवार समाजसेवी दुर्योधन महतो की धर्मपत्नी भानुप्रिया इस बार नहीं लड़ेंगे चुनाव। नगर निकाय चुनाव में चक्रधरपुर नगर विकास को लेकर सही उम्मीदवार शिक्षित, समझदार, कर्मठ, जिन उम्मीदवार के पास चक्रधरपुर नगर पालिका क्षेत्र में विकास को लेकर पूरा प्लानिंग, विजन मिशन हो ऐसे प्रत्याशी को समर्थन और जीताने का काम करेगी धातकीडीह की जनता।

12/01/2026

टुसु परब :
अन्नशक्ति स्वरूपा धान की आराधना का विशिष्ठ जनजातीय आयोजन।
आदि सभ्यता के जनक "राढ़-संस्कृति" का सर्वकालीन महान सांस्कृतिक परब 'टुसु परब' झारखण्ड, बंगाल और उड़ीसा के कुड़मालि-संस्कृति के जनजातीय समुदायों- कोल-कुड़मि-भूमिज- संथाल तथा संगत जातियों द्वारा मनाया जाने वाला एक मुख्य त्यौहार है। पूस माह के दौरान होने के कारण इसे 'पूस परब' भी कहा जाता है और मकर-संक्रांति के महत्व हेतु इसे 'मकर परब' कहा जाता है। परन्तु, इस परब का मुख्य आधार है 'डिनि-टुसुमनि', इसलिए इसे 'टुसु परब' भी कहते हैं।

झारखंड का महापर्व है टुसु :
एक-माह-व्यापी टुसू परब का आयोजन मकर संक्रांति के दिन समाप्त होता है। इस दिन बच्चे बुढ़े महिलाएं सभी पास के नदी टुसु-चौड़ल लेकर जाते है। वहां टुसु को विदाई दी जाती है।

आदि काल से चले आ रहे टुसु के बारे में वर्तमान समय के लोगों की आधारभूत सटीक जानकारी नही रहने के कारण कई भ्रांतियां फैल गई है। कोई कहते है कि टुसु काशीपुर के राजा की पुत्री थी, तो कोई टुसु को किसी कुड़मी जमींदार की साहसी कन्या के रुप मे चित्रित करते हैं तो कोई इसे किसी की प्रयसी का रूप दे देते है। परंतु काशीपुर राजघराने के रिकार्ड मे ऐसी किसी कन्या का कोई जिक्र तक नही है तथा किसी अंजाने जमींदार की कन्या का भी झारखंड-बंगाल के इतिहास गाथाओं में जिक्र तक नही पाया गया है। अंग्रेज काल की गजेटियरों मे भी टुसु के बारे में अत्यल्प जानकारी ही पायी जा सकती है। इसका मुख्य कारण है राढ़-सभ्यता के जनक जनजातीय संस्कृति के प्रति कथित सभ्य समाज की उदासीनता।

तो टुसु है क्या?

वास्तव मे अलिखित इतिहास की झारखंडी सभ्यता संस्कृति के अनेक अमूल्य धरोहर कालक्रम में मिटते चले गये है, पर जो अभी भी बचे है, वो इसलिए कि उन्हें पर्व के रुप मे जनजीवन का अंग बनाकर रखा गया है। दरअसल, सदियों से चौतरफा साम्राज्यवादी सांस्कृतिक आक्रमणों की मार से असली झारखंडी संस्कृतियां लगभग पुर्णतया मिट गई या उनका कायांतरण हो गया है। इससे इन त्योहारों का मूल भाव को समझना काफी कठिन हो गया है। फिर भी शोध करते-करते कई तथ्यों के मूलभाव स्पष्ट होने चले है।

इसी संदर्भ मे 'टुसु' के बारे मे यह स्पष्ट किया जा सका है, कि टुसु न तो कोई राजकन्या थी और न जमींदार की बेटी। यह दरअसल आदिकालीन कृषि सभ्यता के जनक रहे राढ़ संस्कृति के वाहक यहाँ की जनजाति के कृषिजनित जनमानस की अन्नरुपी "मातृशक्ति" थी, जिसे 'डिनि-टुसुमनि' कहा जाता है।
आदिकाल से जब हमारे पुरखोंं ने अन्न उगाकर जीवनयापन करना आरंभ किया, तभी से उन्होने यह महसूस किया कि जन्मदायिनी माँ का दुध तो हम लगभग दो साल तक ही पीते है परंतु धरती माता की छाती का दुध जीवनपर्यंत पीते-खाते है। अतः जिस धरती माता के कोख से उत्पन्न अन्न के द्वारा हमारी जीवन की सृष्टि व यापन का स्वतः संचालन होता आ रहा है तथा मानव जीवन पुष्पित-पल्लवित हो रहा है. उस प्रकृति की मातृशक्ति की आराधना करके ही मानव आगे भी अपनी संतति की रक्षा कर सकता है।

इसी के तहत अथक मेहनत करके उपजाए गये खेतों से अन्नमाता (धान) के घर लाने और इससे जीवनयापन संपन्न होने का प्रतीक स्वरुप "डिनि-टुसुमनि" की आराधना एक माह पर्यंत करने का विधान है। यह अनुष्ठान मकर संक्रांति से ठीक एक माह पहले यानी अगहन संक्रांति जिसे "डिनि-सांकराइत" कहा जाता है, के दिन खेत से सांयकाल डिनि-माता को किसान दंपति द्वारा विधि-विधान स्वरूप खलिहान लाने और तत्पश्चात कृषक बालाओं द्वारा अन्न के दानों लेकर रात में टुसु-थापन करने की परंपरा के साथ आरंभ होता है। इस एक माहव्यापी अवधि में कृषक-बालाएं टुसु को अपनी संगी-सहेली मानती है, जिसे एक माह पर्यंत गीतों से प्रतिदिन सांयकाल आराधना करते हुए और प्रति आठवें दिन आठकलइआ का भोग समर्पित करके तथा नित नये फुल देकर सेंउरन करके जीवंत बंधुता स्थापित कर पुस संक्राति अर्थात मकर संक्रांति के दिन पास के नदी-तालाबों में ले जाकर पुनः अगले वर्ष आने को कहते हुए जलरुपी ससुराल की ओर विदा कर दिया जाता है। विदाई की वेला अत्यंत भावप्रवण और दुखद होता है। कृषक बालाएं अत्यंत भावुकता भरें गीतों से टुसु-घाटों के चट्टानों को भी मानो पिघला डालती है। रंगबिरंगें चौड़लों पर सवार डिनी-टुसुमनि की भव्य शोभायात्रा में बच्चे बुढे सभी भाग लेते है। टुसु-घाट जाने के दौरान विभिन्न टुसु-दहँगियों द्वारा रास्ते भर तर्क-वितर्कों के टुसु-गित भी गाने की परंपरा हैजिसमे अपने टुसु को दुसरो से अच्छा जताने की होड़ भी दिखाई पड़ती है जिसे गीतों के माध्यम से ही जताया जाता है।
इस मौके पर "चासा" यानि कृषि-संस्कृति के जनजातीय समुदायों मे खासकर कोल, कुड़मि, संथाल, भूमिज आदि में "आँउड़ि, चाँउड़ि, बाँउड़ि, मकर और आखाइन" नाम से पाँच दिवसीय विशेष उल्लासमय परब आयोजित होते है। प्रतिदिन सुबह नहाकर ही चावल से बने विशेष प्रकार के पिठा जिसे "उँधि-पिठा" कहते है, खाने का रिवाज है। परंतु यह पिठा बनने के बड़े कठिन नियम भी है। वर्ष भर अगर पुरे गुसटि के घर में किसी की मृत्यु नही हुआ हो अथवा सुरजाहि पुजा आदि नही हुआ हो तभी आप इस पिठा को बना व सेवन कर सकते है। इसलिए इसे "गुसटिक पिठा" भी कहा जाता है। बाँउड़ि के दिन मुर्गा-लड़ाई का विशेष प्रचलन है। पुरे वर्ष भर में इसी दिन रसिक लोग मुर्गा अखाड़ा जरूर जाते है तथा एक से बढ़कर एक शानदार मुर्गों की लड़ाई में क्षेत्र के गणमान्य लोग भी उपस्थित रहते है।
ग्रामीण क्षेत्रों मे बाँउड़ि के दिन धान/चावल का बिटा/कुचड़ि बांधने की भी परंपरा रही है। मकर संक्रांति के दिन जनजाति युवा समुदाय "बेझा-बिंधा" नामक प्रतियोगिता के आयोजन में भाग लेते है। जिसमें विजयी प्रतिभागी को खेत/तालाब/गाय आदि एक वर्ष तक उपयोग करने हेतू पुरस्कार स्वरूप प्रदान करने की परंपरा है। यह बहुत ही आकर्षक एवं रोमांचक आयोजन होता है। अखाड़े के मेले टुसु-घाटों के आसपास ही लगते है। यहां दही-चूड़ा खाना अनिवार्य परंपरा है। बेझा-बिंधा में विवाह योग्य युवाओं की भागीदारी भी निश्चित की जाती है इसी के साथ दिनभर हर्षोल्लास से बीत जाता है। आखाइन जातरा के दिन सुबह नदी तालाब में स्नान कर नये फाल लगा हल बैलों को लेकर खेत में "ढाई-पाक" हल चलाने की परंपरा पुरी की जाती है अर्थात नये कृषि-संवत् मे प्रवेश किया जाता है। इसके बाद तालाब से मिट्टी उठाने, गोबर-गड्ढा खोदने तथा नये घर बनाने हेतू मिटाटी पूजन करने की जनजातीय परंपरा भी निभाई जाती है। इन सभी कामों में विशिष्ठ प्रकार के नेगाचारि पद्धति का निर्वहन करना अत्यावश्यक होता है वरना कार्य असफल हो जाते है ऐसी मान्यता है। "आखाइन जातरा" राढ़-संस्कृति का नववर्ष है। खगोल विज्ञान के दृष्टिकोण से भी सूर्य की परिक्रमा का नया चक्र इसी आखाइन दिन से ही आरंभ हुआ माना गया है जिसे जनजातीय संस्कृति के पुर्वज हजारों साल पहले से ही मानते रहे है। इसके तहत बाँउड़ी मकर व आखाइन जातरा के दिन से शुरू हो कर अगले कई-कई दिनो तक क्षेत्रीय मेलों का रेला लगा रहता है। जिसमें सतीघाट, देलघाटा, भाव मेला, दिबघारा, दारहा मेला, खेलाइचंडि, जिआरि मेला, रांगाहाड़ी मेला, भुआ मेला, माठा मेला, जइदा मेला, हिड़िक मेला, बुटगड़ा मेला, सालघाटा मेला, जारगो मेला, पुरनापानी मेला, हथिआपाथर मेला, सिरगिटी मेला, टुंगरि मेला, कुलकुली मेला, जबला मेला, दिउड़ी मेला, हाथीखेदा मेला, झाबरि मेला, बाधाघाट मेला, कोचो मेला, पानला मेला, चड़गई मेला, बानसिनि मेला, चेड़ि मेला, छाताघाट मेला आदि सैकड़ों मेले लगते है जिसमे झाड़खंडी जनमानस सारे दुख भूलकर प्रकृति के साथ जुड़कर हिलोरें लेता है।
इस प्रकार देखा जाए तो भारत की बहुआयामी सांस्कृतिक धरोहर में से कुड़मालि जनजाति संस्कृति का एकमाह व्यापी यह टुसु पर्व बहुत ही विशेष मायने रखता है। दुर्भाग्यवश इस विशिष्ठ संस्कृति और इसकी उपादेयता पर कथित मुख्यधारा के विद्वजनों का सदैव उदासीन रवैया ही दिखता रहा है। जनजातीय संस्कृति के आयोजनों को हासिए पर रखने के प्रचलन सा रहने के कारण ही देश के अनेक विशिष्ठ जनजातीय संस्कृतियों का लोप भी हो चूका है। अतः जरूरत इस बात की है कि विविधता से भरे भारतीय संस्कृति की अमुल्य संपदा कुड़मालि संस्कृति जो राढ़-सभ्यता का अवशेष मात्र कहा जा सकता है, का पुनर्जागरण हो इसके लिए युवा विद्वजनों को आगे आने की आवश्यकता है। झाड़खंडी जनजीवन के गहराई तक रचा-बसा टुसु-परब वाकई झारखंडी संस्कृति की मातृशक्ति का जीवंत प्रतीक है।
साभार : ✍️महादेब डुंगरिआर
संयोजक- कुड़मालि भाखि चारि आखड़ा।

11/01/2026
11/01/2026

टुसु परब एवं मकर परब के अवसर पर नदी, घाटो, तालाबों, अन्य जल स्रोतों पर स्वच्छता एवं आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित करने के संबंध में। जोहार झारखंड,

झारखंड आंदोलन के प्रखर नेता एवं जमशेदपुर के पूर्व सांसद वीर शहीद सुनील महतो दादा की जयंती पर कोटि-कोटि नमन, विनम्र श्रद्...
11/01/2026

झारखंड आंदोलन के प्रखर नेता एवं जमशेदपुर के पूर्व सांसद वीर शहीद सुनील महतो दादा की जयंती पर कोटि-कोटि नमन, विनम्र श्रद्धांजलि...

वीर सुनील महतो अमर रहे

11/01/2026
11/01/2026

जेपीएससी-सीडीपीओ परीक्षा का निकला रिजल्ट, सोनुआ की बबली महतो चयनित

जेपीएससी (झारखंड लोक सेवा आयोग) के बाल विकास परियोजना पदाधिकारी (सीडीपीओ) के रिक्त पदों के लिए आयोजित की गई परीक्षा का रिजल्ट जारी हो गया है। सीडीपीओ के रूप में कुल 64 अभ्यर्थियों का चयन हुआ है। इनमें सोनुवा के महुलडीहा गांव निवासी डॉक्टर महतो की पुत्री बबली महतो भी चयनित हुईं हैं। रिजल्ट जारी होने के बाद बबली महतो सीडीपीओ बनीं हैं। डॉक्टर महतो आदिवासी कुडमि समाज के जिला अध्यक्ष व शिक्षा विभाग (सोनुआ बीआरसी) में सीआरपी के रूप में कार्यरत हैं।
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