Rawat poonam

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This page will tell the Moral Story, which will be related to the true events of life, just the characters will be changed.Whatever will be talked about will be related to real life.

18/08/2025

। देखने का नजरिया।
सही बात है हम दूसरे को अवश्य बोलते हैं ना देखने का नजरिया बदलो हर बात को सकारात्मक तरीके से देखो।
सच बताऊं ऐसा सिर्फ बोलने में ही अच्छा लगता है ,जब बात अपने पर आती है सही बातों का अर्थ भी गलत निकालने लग जाते हैं।
यह मेरी और आप सभी की बात है। कभी कभी होता नहीं है, हमें कोई और कुछ ही कहना चाहता है ,परंतु वह जो कहना चाहता है ,उसे स्पष्ट रूप से नहीं कह पाता और हम तुरंत उसकी बातों का उल्टा पुल्टा ही अर्थ निकाल लेते हैं।
जो तुरंत बिना सोचे समझे दूसरे की बातों का गलत अर्थ निकालता है, सच मानो तो उसकी सोचने और समझने की क्षमता कम होती है।
तब चाहे मैं हूं या आप हो।
मैं अब कोशिश करती हूं कि पहले किसी की बातों को पूरा सुनूं,और फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया दिखाऊं।
अगर बात मेरे बारे में हो और वह बात गलत हो वह चीज मैंने की ना हो तो मैं अवश्य जवाब दूंगी ,क्योंकि कहते हैं ना जो गलत बोलते हैं उन्हें जवाब देना बहुत जरूरी है ।नहीं तो वह बातों को बहुत बड़ा चढ़ा कर के बोलते हैं।
हां अगर बात सच होगी तो वहां पर मैं चुप रहने की कोशिश करूंगी।
तो हमें अपना नजरिया बदलना चाहिए इसकी शुरुआत खुद से करनी चाहिए।
धन्यवाद्।।।

29/06/2025

मुझे नहीं पता कि भक्ति क्या है,
लेकिन मुझे विश्वास है कि तुम हो तो सब ठीक है।
#मातारानी

मैंने जाना कि सब कुछ लौट कर आता है,पर जो नहीं आता वो स्कूल और कॉलेज।
28/06/2025

मैंने जाना कि सब कुछ लौट कर आता है,
पर जो नहीं आता वो स्कूल और कॉलेज।

बेवक्त की बातें वक्त पर छोड़ी है,क्या ये वक्त जानता है कि,,,उसका बेवक्त कब आया?? आजकल मन में बस एक प्रश्न छाया है कि इतन...
27/06/2025

बेवक्त की बातें वक्त पर छोड़ी है,
क्या ये वक्त जानता है कि,,,
उसका बेवक्त कब आया??

आजकल मन में बस एक प्रश्न छाया है कि इतने हादसे,
क्या ये वक्त है या फिर कुछ और.....😔😔

मैंने कभी अकेले यात्राएं नहीं की है, क्योंकि मैं हमेशा से अकेले जाने से न जाने क्यों डरी हूं। मैं कभी नए स्थानों पर अकेल...
14/04/2023

मैंने कभी अकेले यात्राएं नहीं की है, क्योंकि मैं हमेशा से अकेले जाने से न जाने क्यों डरी हूं। मैं कभी नए स्थानों पर अकेले नहीं रही हूं। ये कहना भी गलत नहीं होगा कि बचपन से ही मेरे परिवार ने मेरी परवाह कि है, शायद इसीलिए आज भी अपने ही घर- गांव में एक- दूसरे के यहां जाने से पहले बता कर जाना होता है। न जाने क्यों मुझे अब ये सब कुछ एक बंधन लग रहा है, मानो मैं कहीं तो जाना चाहती हूं, बस अपने साथ। अपने साथ सफर करना चाहती हूं, जीवन क्षण भंगुर है इसलिए #एक सुंदर सी कल्पना- एक ऐसी जगह जहां मैं किसी को नहीं जानती ना कोई मुझे, और मैं वहां रहने की कोशिश करूं। कितना अलग होगा ना, क्योंकि अक्सर हम उन्हीं जगहों पर जाना चाहते हैं जहां हमारा कोई रहता हो, पर मैं नहीं। मुझे अंजान शहरों में, अंजान लोगों के बीच में अपने आप को पहचानना है। ☹️कहीं न कहीं देर हो गई है शायद।☹️ #देर रात अचानक नींद खुल गई, और ख्याल यात्रा का।

हाय ये कैसी सुबह आई, जिसके बारे में सोचा न था भाई.दिन वो सात फरवरी का, समय वो साढे दस का.चिपको आंदोलन हुआ जहा था, वही से...
10/02/2021

हाय ये कैसी सुबह आई,
जिसके बारे में सोचा न था भाई.
दिन वो सात फरवरी का, समय वो साढे दस का.
चिपको आंदोलन हुआ जहा था, वही से यह विपदा आई.
गौरा देवी के जो वचन थे, वो आज सत्य हुए.
जहा कहा था पेड़ों को बचाओ, पेड़ वही के काटे गए.
एक पेड़ सौ पुत्र बराबर, हज़ारो पुत्र वही मारे गए.
कहा जाना था इस पाप ने, पाप से ही आपदा आई.
प्रकृति ने चेताया होगा, मत करो मुझे मेरे बच्चो से अलग.
फिर भी करते गए अपनी मनमानी,
फिर धरा ने बदला लेने की ठानी.......
माँ को बच्चो से अलग करने की सजा हमने पाई.
मन भी रो रहा है, दिल भी रो रहा है.
आज देवभूमि रो रही है..,,
कौन चुकायेगा इन आँसुओं का कर्जा, आज धरा से पूछ रहे हो.
अरे! क्या जवाब देंगी धरती माँ , जिनकी आँखों मे बरसो पहले नमी आई.
अब भी समय है, मनुष्य को पीछे हटना होगा.
एक सीमा तक प्रकृति को बदलोगे.
सीमा जो तुम लाँघ दोगे, प्रकृति भी हद भूल जायेगी.
जिस दिन ये हद भूली गयी. उसी दिन प्रकृति तांडव मचाने आई,,, तांडव मचाने आई.
धन्यवाद (पूनम रावत)

एसु का बरस ना बरखा रे ,ना पाणी रे.न ह्यू पड़ी, न ठण्ड ह्वे.बिना बरखा पाणी का बाढ़ ए सकदी, यू भी देख्याली.जे बाढ़ की डौर ...
10/02/2021

एसु का बरस ना बरखा रे ,ना पाणी रे.
न ह्यू पड़ी, न ठण्ड ह्वे.
बिना बरखा पाणी का बाढ़ ए सकदी, यू भी देख्याली.
जे बाढ़ की डौर बकस्याल लगदी छे,
वी की डौर मौ का मैना लगी. यू क्या ह्वे गयै.
हे! मणखी तवेन् यू सब क्या कर्यलि.
अपंडा सुख का वास्ता, तु धरती माँ ते भूल गयाइ.
जन तेरा अपंडा रिश्ता छौ, वनी धरती मां का रिश्ता भी होला.
तु य बात कन बिसर गयाइ.......
कतगा डाला तवेन् काटी छा, धरती मां का त लाल काटी..
कतगा आग तु लगोदु छो, आग मा ही माँ ते जलोडु छो.
वे आग मा धरती माँ का कतगा अपना जल्या होला.
हमरु एक अपंडु मरदु ता, हम अपंडा जीवन छोड़ने बात कन.
धरती माँ का हज़ारों की संख्या मा अपंडा मौर् गयाइ.
कख जान्दु ई माँ कु दर्द, कख जांदा ई माँ का आँसू.
आज यी आँसू बग्गे गयाइ....., पाणी दग्डी क्वि सकी छो आज तक, जो तुम पाणी ते आज रोक्दा छीन.
अपंडि सुविधा सब देखना, वी धरती माँ कु दुख केन देखन.
यू कभी सोच्याली.......
नि देखदा त ना देखा, वा तुमु ते दिखे दयाली.
हवे सकदी व्यि कु दिखाऊ, तुम ते बदल दीयोलु,
या हवे सक्दि तुम देख नि पोला.......
वे दिन कु इंतज़ार ना करा, ते दिन कु इंतज़ार ना करा.

धन्यवाद (पूनम रावत)

23/01/2021

िन_पावन
"23 जनवरी/जन्म-तिथि"
*नेताजी सुभाषचन्द्र बोस*

स्वतन्त्रता आन्दोलन के दिनों में जिनकी एक पुकार पर हजारों महिलाओं ने अपने कीमती गहने अर्पित कर दिये, जिनके आह्नान पर हजारों युवक और युवतियाँ आजाद हिन्द फौज में भर्ती हो गये, उन नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का जन्म उड़ीसा की राजधानी कटक के एक मध्यमवर्गीय परिवार में 23 जनवरी, 1897 को हुआ था।

सुभाष के अंग्रेजभक्त पिता रायबहादुर जानकीनाथ चाहते थे कि वह अंग्रेजी आचार-विचार और शिक्षा को अपनाएँ। विदेश में जाकर पढ़ें तथा आई.सी.एस. बनकर अपने कुल का नाम रोशन करें; पर सुभाष की माता श्रीमती प्रभावती हिन्दुत्व और देश से प्रेम करने वाली महिला थीं। वे उन्हें 1857 के संग्राम तथा विवेकानन्द जैसे महापुरुषों की कहानियाँ सुनाती थीं। इससे सुभाष के मन में भी देश के लिए कुछ करने की भावना प्रबल हो उठी।

सुभाष ने कटक और कोलकाता से विभिन्न परीक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। फिर पिताजी के आग्रह पर वे आई.सी.एस की पढ़ाई करने के लिए इंग्लैंड चले गये। अपनी योग्यता और परिश्रम से उन्होंने लिखित परीक्षा में पूरे विश्वविद्यालय में चतुर्थ स्थान प्राप्त किया; पर उनके मन में ब्रिटिश शासन की सेवा करने की इच्छा नहीं थी। वे अध्यापक या पत्रकार बनना चाहते थे। बंगाल के स्वतन्त्रता सेनानी देशबन्धु चितरंजन दास से उनका पत्र-व्यवहार होता रहता था। उनके आग्रह पर वे भारत आकर कांग्रेस में शामिल हो गये।

कांग्रेस में उन दिनों गांधी जी और नेहरू की तूती बोल रही थी। उनके निर्देश पर सुभाष बाबू ने अनेक आन्दोलनों में भाग लिया और 12 बार जेल-यात्रा की। 1938 में गुजरात के हरिपुरा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में वे कांग्रेस के अध्यक्ष बनाये गये; पर फिर उनके गांधी जी से कुछ मतभेद हो गये। गांधी जी चाहते थे कि प्रेम और अहिंसा से आजादी का आन्दोलन चलाया जाये; पर सुभाष बाबू उग्र साधनों को अपनाना चाहते थे। कांग्रेस के अधिकांश लोग सुभाष बाबू का समर्थन करते थे। युवक वर्ग तो उनका दीवाना ही था।

सुभाष बाबू ने अगले साल मध्य प्रदेश के त्रिपुरी में हुए अधिवेशन में फिर से अध्यक्ष बनना चाहा; पर गांधी जी ने पट्टाभि सीतारमैया को खड़ा कर दिया। सुभाष बाबू भारी बहुमत से चुनाव जीत गये। इससे गांधी जी के दिल को बहुत चोट लगी। आगे चलकर सुभाष बाबू ने जो भी कार्यक्रम हाथ में लेना चाहा, गांधी जी और नेहरू के गुट ने उसमें सहयोग नहीं दिया। इससे खिन्न होकर सुभाष बाबू ने अध्यक्ष पद के साथ ही कांग्रेस भी छोड़ दी।

अब उन्होंने ‘फारवर्ड ब्लाक’ की स्थापना की। कुछ ही समय में कांग्रेस की चमक इसके आगे फीकी पड़ गयी। इस पर अंग्रेज शासन ने सुभाष बाबू को पहले जेल में और फिर घर में नजरबन्द कर दिया; पर सुभाष बाबू वहाँ से निकल भागे। उन दिनों द्वितीय विश्व युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। सुभाष बाबू ने अंग्रेजों के विरोधी देशों के सहयोग से भारत की स्वतन्त्रता का प्रयास किया। उन्होंने आजाद हिन्द फौज के सेनापति पद से जय हिन्द, चलो दिल्ली तथा तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा का नारा दिया; पर दुर्भाग्य से उनका यह प्रयास सफल नहीं हो पाया।

सुभाष बाबू का अन्त कैसे, कब और कहाँ हुआ, यह रहस्य ही है। कहा जाता है कि 18 अगस्त, 1945 को जापान में हुई एक विमान दुर्घटना में उनका देहान्त हो गया। यद्यपि अधिकांश तथ्य इसे झूठ सिद्ध करते हैं; पर उनकी मृत्यु के रहस्य से पूरा पर्दा उठना अभी बाकी है।...................................

क्यों?तुझे घमंड है अपने जीवन पर ए! मानव, क्यों ?तुझे घमंड है अपने जीवन पर ए! मानव, घमंड भी टूटेगा और जीवन भी ना रहेगा। श...
20/12/2020

क्यों?तुझे घमंड है अपने जीवन पर ए! मानव,
क्यों ?तुझे घमंड है अपने जीवन पर ए! मानव,
घमंड भी टूटेगा और जीवन भी ना रहेगा।

शक्ल की खूबसूरती मत देख दिल की खूबसूरती देख,
शक्ल की खूबसूरती मत देख दिल की खूबसूरती देख
शक्ल तो बदल जाएगी पर दिल ना बदलेगा।

क्या गरीब क्या अमीर फर्क इतना छोड़ दे, क्या गरीब क्या अमीर फर्क इतना छोड़ दे,
अमीर साथ छोड़ दे गर गरीब तो साथ रहेगा।

कौन अपना कौन पराया सोचना अब बंद कर दे ,
कौन अपना कौन पराया सोचना अब बंद कर दे ,
कब अपना- पराया और पराया -अपना हो जाए इसका जवाब तो तेरा वक्त देगा।
हां जी वक़्त ही जवाब देता है।
धन्यवाद

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