25/09/2026
कहानी
खेत के किनारे एक पुराना कुआँ था।
एक दिन किसान ने उसमें एक मरा हुआ सूअर डाल दिया।
गंध फैली तो आसपास के ढेर सारे चूहे कुएँ में कूद पड़े।
कुएँ में उन्हें खाने को बहुत कुछ मिल गया।
वे कई दिनों तक सूअर को खाते रहे।
किसान रोज़ दूर से कुएँ को देखता और मुस्कुराता।
एक दिन सूअर खत्म हो गया।
अब कुएँ में सिर्फ चूहे थे और भूख थी।
पहले चूहों ने एक-दूसरे से खाना छीना।
फिर झगड़े हुए।
फिर उन्होंने एक-दूसरे को खाना शुरू कर दिया।
कुछ दिन बाद सिर्फ एक चूहा बचा।
किसान ने उसे कुएँ से बाहर निकाला।
लेकिन यह दया नहीं थी।
किसान ने उसे खेत में छोड़ दिया।
कुएँ में कई दिनों तक अपनी बिरादरी को खाते-खाते उस चूहे को यह आदत पड़ चुकी थी।
खेत में आते ही उसने अनाज की तरफ देखा तक नहीं।
वह दूसरे चूहों पर टूट पड़ा।
बाकी चूहे आपस में लड़ने लगे—
“इसे भगाओ!”
“नहीं, पहले उसे पकड़ो!”
“वह हमारी बिरादरी का दुश्मन है!”
और किसान?
वह पेड़ के नीचे बैठकर मुस्कुराता रहा।
क्योंकि उसे अनाज की रखवाली के लिए बिल्ली नहीं चाहिए थी।
उसने चूहों के बीच से ही एक ऐसा चूहा तैयार कर दिया था, जो बाकी चूहों को अपना दुश्मन समझता था।
और किसान का फायदा यही था—
चूहे आपस में लड़ते रहें,
चूहे एक-दूसरे को खाते रहें,
और खेत का अनाज किसान के घर जाता रहे।
कहानी में किसान कोई एक व्यक्ति नहीं है।
कभी-कभी वह सिर्फ एक व्यवस्था होता है।
और कुएँ से निकला चूहा कोई चूहा नहीं—
वह वह सोच है, जिसे पहले भूखा किया जाता है,
फिर डराया जाता है,
फिर अपने ही लोगों के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है।
सबसे बड़ा खेल तब होता है,
जब चूहों को लगता है कि वे आपस में लड़ रहे हैं—
जबकि फायदा किसी तीसरे का हो रहा होता है।
Note ---
इस कहानी से हमारे नेताओं का कोई संबंध नहीं है।