09/09/2026
■हरतालिका तीज : व्रत एक दिन का, साथ जीवनभर का
●परंपरा की देहरी से साझेदारी तक पहुंचा तीज का पर्व, अब पति की दीर्घायु के साथ पत्नी के स्वास्थ्य, सम्मान और सपनों की भी हो मंगलकामना
कुंदन झा
राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित सेवानिवृत्त शिक्षक,दुमका।
झारखण्ड देखो,डेस्क:भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया। घर-आंगन में उत्सव की तैयारी। हाथों में मेहंदी, माथे पर सिंदूर, चूड़ियों की खनक और लोकगीतों की मिठास। कहीं बेटी के मायके लौटने की खुशी है तो कहीं मां उसकी राह निहार रही है। इसी भावभूमि पर आती है हरतालिका तीज—आस्था, श्रृंगार, प्रेम और स्त्री के मन की अनेक परतों को अपने भीतर समेटे हुए एक विशिष्ट लोकपर्व।
परंपरा में विवाहित महिलाएं पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य और सुखी दांपत्य की कामना से यह व्रत रखती हैं। अविवाहित युवतियां भी मनचाहे जीवनसाथी की कामना से तीज करती हैं। लेकिन तीज की कहानी केवल पति की लंबी उम्र की कामना तक सीमित नहीं है। इसके भीतर प्रेम है, तपस्या है, संकल्प है और अपनी पसंद के जीवनसाथी को पाने की आकांक्षा भी है।
#पार्वती की तपस्या से निकली कथा
हरतालिका तीज की पौराणिक मान्यता माता पार्वती और भगवान शिव से जुड़ी है। लोकमान्यता के अनुसार पार्वती भगवान शिव को अपना जीवनसाथी मान चुकी थीं, लेकिन उनके पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे। अपनी इच्छा के विरुद्ध विवाह से बचने के लिए उनकी सखी उन्हें वन में ले गईं। वहां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तपस्या की।
इसी प्रसंग से ‘हरतालिका’ नाम जुड़ा माना जाता है—‘हरत’ अर्थात हरकर या ले जाकर और ‘आलिका’ अर्थात सखी।
धार्मिक दृष्टि से यह कथा आस्था का विषय है, लेकिन आधुनिक नजरिए से देखें तो इसमें अपनी पसंद और अपने जीवन के निर्णय स्वयं लेने की इच्छा का एक महत्वपूर्ण मानवीय पक्ष भी दिखाई देता है। इस अर्थ में पार्वती की कथा केवल तपस्या की कथा नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प और अपनी इच्छा के प्रति प्रतिबद्धता की कहानी भी है।
#व्रत के पीछे छिपी है प्रेम की सरल भावना
तीज का व्रत कठिन हो सकता है, लेकिन इसके पीछे की भावना बेहद सरल है—जिसे जीवनसाथी माना है, वह स्वस्थ रहे, सुखी रहे और दीर्घायु हो।
यही भावना इस पर्व को भावनात्मक गहराई देती है। पूजा में शिव-पार्वती की आराधना, तीज व्रत की कथा, आरती, मेहंदी और सुहाग की वस्तुओं का अर्पण—ये सभी उसी मंगलकामना के अलग-अलग प्रतीक हैं।
लेकिन आधुनिक समाज के सामने यहां एक स्वाभाविक सवाल भी खड़ा होता है—जब जीवन साथ-साथ जीना है तो मंगलकामना भी क्या एकतरफा होनी चाहिए?
#पुरुष क्यों नहीं रखें तीज?
तीज मुख्यतः महिलाओं का व्रत बन गया है। इसके पीछे भारतीय समाज की वह पारंपरिक संरचना रही है, जिसमें पत्नी से पति की दीर्घायु और परिवार के लिए त्याग की अपेक्षा अधिक की जाती थी।
हालांकि पुरुषों के लिए तीज का व्रत रखना कोई सार्वभौमिक धार्मिक निषेध नहीं है। यह मुख्यतः सामाजिक और सांस्कृतिक परंपरा का विषय है। ऐसे में यदि कोई पति अपनी पत्नी के स्वास्थ्य, सुख और दीर्घायु की कामना से व्रत रखता है, तो वह तीज की मूल भावना—प्रेम और मंगलकामना—को ही आगे बढ़ाता है।
आखिर पत्नी पति के लिए प्रार्थना कर सकती है तो पति पत्नी के लिए क्यों नहीं?
यह सवाल परंपरा को चुनौती देने के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों में समानता और साझेदारी को समझने के लिए है।
#तीज केवल पूजा नहीं, स्त्री का अपना संसार भी
तीज का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसके लोक-सांस्कृतिक रूप में दिखाई देता है। मायके जाना, बहनों और सखियों से मिलना, झूला झूलना, मेहंदी लगाना और लोकगीत गाना—ये सब स्त्री को उसके सामाजिक और भावनात्मक संसार से जोड़ते हैं।
पुराने तीज गीतों को ध्यान से सुनें तो उनमें केवल श्रृंगार नहीं मिलता। उनमें मायके की याद है, ससुराल का अनुभव है, पति की प्रतीक्षा है और कई बार ऐसी पीड़ा भी है, जिसे स्त्री सीधे शब्दों में कह नहीं पाती।
इस दृष्टि से तीज के लोकगीत स्त्री के मौन की आवाज भी हैं। वे उसके सुख-दुख, उम्मीदों, शिकायतों और भावनाओं को अभिव्यक्ति देते रहे हैं।
#समय बदला तो तीज का अर्थ भी बदलना चाहिए
आज की महिला केवल घर की जिम्मेदारियों तक सीमित नहीं है। वह शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय और सामाजिक जीवन में बराबर की भागीदारी निभा रही है। ऐसे में तीज का अर्थ भी व्यापक होना स्वाभाविक है।
पति की दीर्घायु की कामना के साथ पत्नी के स्वस्थ और सुखी जीवन की कामना भी हो। पति के सपनों का सम्मान हो तो पत्नी के सपनों का भी। पति घर की जिम्मेदारी उठाए तो पत्नी की मेहनत और योगदान को भी बराबर मान्यता मिले।
यही वह रास्ता है, जो तीज को परंपरा से आधुनिकता की ओर ले जा सकता है।
#व्रत से बड़ा है एक-दूसरे का ख्याल
किसी महिला का दिनभर भूखा-प्यासा रहना उसकी आस्था का प्रतीक हो सकता है, लेकिन प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण जरूरी नहीं।
कई बार पत्नी के लिए पति का एक छोटा-सा सहयोग उससे बड़ा व्रत बन जाता है—घर के काम में हाथ बंटाना, उसकी थकान समझना, उसकी बात ध्यान से सुनना, उसके निर्णय का सम्मान करना या उसके सपनों के रास्ते में साथी बनकर खड़ा होना।
और यदि तीज के दिन पति अपनी पत्नी से कहे—“मेरे लिए अपने स्वास्थ्य को मत बिगाड़ो, तुम्हारा स्वस्थ रहना ही मेरे लिए सबसे जरूरी है”—तो शायद प्रेम की इससे सुंदर अभिव्यक्ति मुश्किल है।
#आस्था के साथ विवेक भी जरूरी
निर्जला उपवास तीज की प्रचलित परंपरा है, लेकिन हर व्यक्ति की स्वास्थ्य-स्थिति अलग होती है। बीमारी, गर्भावस्था, उम्र या अन्य परिस्थितियों में कठोर उपवास उचित नहीं हो सकता।
आस्था का अर्थ शरीर को कष्ट देना ही नहीं है। अपनी स्वास्थ्य-स्थिति को समझते हुए श्रद्धा निभाना भी उतना ही सार्थक है। पर्व की पवित्रता तभी सार्थक है, जब उसके साथ जीवन और स्वास्थ्य के प्रति संवेदनशीलता भी जुड़ी हो।
#परंपरा रहे, लेकिन उसमें समय की धड़कन भी सुनाई दे
परंपरा को बचाने का अर्थ यह नहीं कि उसके हर पुराने रूप को ज्यों का त्यों बनाए रखा जाए। परंपरा तभी जीवित रहती है, जब वह नए समय से संवाद करती है।
तीज में झूले रहें, मेहंदी रहे, लोकगीत रहें, शिव-पार्वती की पूजा रहे और मायके की मिठास भी बनी रहे—लेकिन इसके साथ बराबरी, सम्मान और साझेदारी भी आए।
क्यों न इस तीज पर पत्नी पति के लिए व्रत रखे और पति पत्नी के लिए एक संकल्प ले?
संकल्प—उसके स्वास्थ्य का ध्यान रखने का।
उसके सपनों का सम्मान करने का।
घर की जिम्मेदारियां बांटने का।
और जीवन के कठिन मोड़ पर उसका हाथ थामे रहने का।