30/05/2026
तमिलनाडु में सबकुछ ठीक है,लेकिन घर की बहुत याद आती है।
मां, बाबू जी, और भाई बहन सबकी याद आती है।
घर से दूर रहने का सिला ये है कि
जब भी घर जाता हूं तो अपने हीं घर में मेहमान जैसा बर्ताव पाता हूं। जिस भाई - बहन के साथ बचपन में झगड़ता था, खेलता था।
आज उनके लिए हीं मेहमान बन गया हूं।
महीनों बाद जब भी घर जाता हूं तो अपने मां बाबू जी को कुछ बूढ़ा पाता हूं। धीरे धीरे उनकी उम्र ढल रही है। जब उनके साथ था तो उनकी उम्र का पता नहीं चलता था, अब पता चलता है।
काश ये नौकरी , ये रोजगार अपने राज्य में करता तो मां बाबू जी के साथ कुछ सुनहरे पल बिता पाता!
बाहर रहना कितना दुखद होता है एक उदाहरण बताता हूं -
मेरा यहां लगभग 7 साल होने को है और मेरा भतीजा 6 साल का है। उनको लगता है कि चाचा(यानी मैं) का घर चेन्नई में है। छोटा बच्चा है उनको क्या पता कि जिस घर में वह आज उत्पाद मचा रहा है , कभी मै उस घर का सबसे बड़ा उत्पादी हुआ करता था। भतीजे को देख के खुशी होती है बहुत प्यारा है वह, बहुत प्यार भी करता है मुझसे।
मेरे एक बेटा भी है, वो तो साथ ही रहता है। कभी कभी उनके साथ मैं खेल में इतना घुल जाता हूं कि मुझे याद ही नहीं रहता कि मैं 29 साल का हूं।
मै भी अपने आप को 2 साल का समझने लगता हूं।
लेकिन इस बात से खुशी होती है कि मेरे वजह से घर में सब खुश है। मै अपने घर के बच्चों में अपना बचपन देखता हूं। कभी कभी उनके बचपन में मै खो जाता हूं ,लगता है मै हीं जी रहा हूं।
खैर इसी उम्मीद में समय बीत रहा है कि एक दिन अपना घर जाएंगे और फिर यहां कभी नहीं आयेंगे। मां, बाबू जी के साथ अपना इकलौता और कीमती जीवन बिताएंगे।
सच्चाई यही है कि समय बीतता है। समय के साथ सब कुछ बदलता है और हमें सच को स्वीकार करना पड़ता है।
यही जीवन है , यही सत्य है।
राम भी श्री राम तब हीं कहलाए जब वे घर छोड़े। कृष्ण भी श्री कृष्ण तब कहलाए जब वे अपने गोकुल छोड़े।
कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है।
क्या आप भी मेरी तरह अपना घर , गांव को मिस कर रहे हैं ??
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