24/05/2026
अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए हैं, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन! तू युद्ध कर
॥18॥
व्याख्या:
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने शरीर की नश्वरता और आत्मा की अनश्वरता की बात की है।
अन्तवन्त इमे देहा: ये शरीर, जो वर्तमान में हमें दिखाई देता है, नश्वर है। इसका जन्म और मृत्यु होती है, इसलिए यह समाप्त होने वाला है।
नित्यस्योक्ताः शरीरिणः: इसके विपरीत, आत्मा (जिसे शरीर में रहने वाला कहा जाता है) नित्य है। आत्मा को जन्म और मृत्यु का कोई अनुभव नहीं होता। यह सदा अचल और शाश्वत है।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य: आत्मा अचंचल (अनाशिन) और अदृश्य (अप्रमेय) है। यह न तो समाप्त होती है, न देखी जा सकती है, और न ही मापी जा सकती है।
तस्माद्युध्यस्व भारत: इस ज्ञान को समझते हुए, हे भारत (अर्जुन), तुम युद्ध करो। क्योंकि, शरीर का विनाश असहनीय है, जबकि आत्मा अमर है। इसलिए, युद्ध में लिप्त रहना तुम्हारे धर्म का हिस्सा है, और इसमें तुम्हें किसी प्रकार की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है।
इस श्लोक के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाते हैं कि भौतिक शरीर की मृत्यु से आत्मा पर कोई असर नहीं होता। आत्मा अमर है, और इसलिए वह अपने कर्तव्यों को निभाने में किसी भी प्रकार की संकोच या डर का शिकार नहीं होना चाहिए।