11/07/2024
एक स्त्री प्रेम की कितनी प्यासी होती है इस बात का अंदाजा केवल उसके करीब जाने से ही लगाया जा सकता है 🤗😘
मादा एक संभोग के बाद दूसरे को तैयार रहती है।
इसी नियम पर दुनिया भर के वेश्याघर चलते हैं।
जबकि नर के दो संभोगों के बीच अंतराल होगा ही होगा।
वो पहले संभोग के बाद झटके से मादा से अलग हटेगा
और सो जाना चाहेगा ये उसकी प्रकृति है।
जबकि मादा की प्रकृति इसके ठीक बिल्कुल विपरीत होती है।
वो संभोग के तुरंत बाद उसके मुँह से वो शब्द सुनने को आतुर होती है जो उसे गुदगुदा दे।
वो ये नहीं जानती कि नर प्रेम के बाद प्रेम नहीं कर सकता।
वो युद्ध के बाद प्रेम को लालायित हो सकता है।
वो मूल रूप से शिकारी की भूमिका ही अदा करता है।
हाँ सभ्य समाज में उसकी इस प्रवृत्ति को खूबसूरत धारणाओं में ढका जाता है।
दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह हिटलर रोजाना पाँच सौ आदमियों को कटवाकर अपनी प्रेमिका की गोद में सर रखकर प्रेमगीत लिखता था।
उससे जुदाई के बीते लम्हों का वर्णन करते उसके गाल भीगते थे।
अशोक कलिंग युद्ध में हुई मारकाट से दु:खी होकर प्रेमालिंगन को तड़प उठा था।
उसने बौद्ध दर्शन को अपने अंदर यूँ ही नहीं समाहित किया था।
आज अशोक और बौद्ध दर्शन को अलग किया ही नहीं जा सकता।
नेपोलियन बोनापार्ट भी अपने बख्तरबंद कवच को उतारकर प्रेम रस में डूबता था , इतना रोमांटिक या प्रेयसी को समर्पित होता था।
इस समय जितना कोई कवि , शायर या मासूम दिल का नर भी समर्पित नहीं हो सकता।
सामान्य नर इस प्रकार के न युद्ध कर सकता है।
न ही प्रेमातुर हो सकता है।
वो न घृणा के चरम पर जाएगा न प्रेम तल की गहराई में आएगा।
वो कुछ 15 मिनट का खेल करेगा।
जो उसे किसी भी रूप से संतुष्ट नहीं करेगा।
इसी संतुष्टि की प्राप्ति हेतु वो साथी को बदलने को उत्सुक हो सकता है।
जहाँ - जहाँ सामाजिक बंधन कमजोर हैं ये बदलाव लगभग छ: महीने के अंदर हो जाते हैं।
पर इन बदलावों से न परिस्थिति बदलती है न उसकी मनोरचना।
यानी कि वो प्रेम पाने में प्रेम करने में असफल रहता है।
यदि नर के जंगलीपन को निकालने का रास्ता बन जाए
तो वो प्रेम कर सकता है , पा सकता है और दे भी सकता है।
यही एक कारण है कि मादा हमेशा समाजिक रूप से सभ्य की अपेक्षा उद्दंड नर की तरफ झुकती है।
इसलिए बिगड़े हुए लड़कों को समर्पित प्रेमिकाएँ मिलती हैं।
बजाय सामाजिक दृष्टि से सभ्य का टैग पाए लड़कों को।