Aaj ki Aawaj

Aaj ki Aawaj अपने पंख फैलाइए और हर दिन बेहतरीन अनुभव कीजिए।

If u want to become a successful person.don't afraid from  failure...!!!
27/08/2026

If u want to become a successful person.
don't afraid from failure...!!!

27/08/2026

वो सुनती आई गीत
कि भीगी भीगी रातों में
मीठी मीठी बातों में
ऐसी बरसातों में
कैसा लगता है ?
उसके लिए तो हमेशा ही
अचानक बैठेबिठाए बेमन के
अनगिनत काम निकले
बाहर जाने वालों के लिए
छतरी रेनकोट ढूंढ कर रखनी
छत की नाली से पत्ते हटाने
टपकते कोनों के नीचे
बाल्टियां लगानी
नाजुक पौधे भीतर रखने
सीले कपड़े बारबार
प्रैस कर सुखाने
गरमागरम भजिया को
सब्जियाँ काट बेसन घोलना।
ऐसा लगता है जैसे
सावन के बहाने पूरा घर
उसपर फरमाइशें बरसा रहा है....
और तुम पूछते हो
ऐसी बरसातों में
कैसा लगता है?

जब फरमाइशें बरसती हैं
तब वह चहकती है
और रसोई महकती है....

छह साल का बच्चा… और हम किस बात की जल्दी में है ।हर बच्चा एक जैसा नहीं होता।हर बच्चे का स्टेमिना एक जैसा नहीं होता।हर बच्...
21/08/2026

छह साल का बच्चा… और हम किस बात की जल्दी में है ।
हर बच्चा एक जैसा नहीं होता।

हर बच्चे का स्टेमिना एक जैसा नहीं होता।
हर बच्चे की शारीरिक क्षमता एक जैसी नहीं होती।
हर बच्चे की मानसिक तैयारी एक जैसी नहीं होती।

अगर मेरा चार साल का बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से स्कूल की दिनचर्या के लिए तैयार नहीं है, तो उसे सिर्फ इसलिए स्कूल भेज देना कि "बाकी सब जा रहे हैं", मुझे सही नहीं लगता।

एक-दो साल बाद स्कूल जाएगा तो उसकी नौकरी की उम्र नहीं निकल जाएगी।

बचपन जरूर निकल जाएगा…
और बचपन वापस नहीं आता।

इसलिए अगर बच्चा किसी बीमारी, कमजोरी या किसी दूसरी परेशानी से गुजर रहा है, तो मुझे लगता है कि माता-पिता को उसकी स्थिति को समझकर फैसला लेना चाहिए।

एडमिशन करा दिया है तो स्कूल से बात कीजिए।
फीस देनी पड़ रही है तो दीजिए।
लेकिन बच्चे को तब भेजिए जब वह सच में स्कूल जाने के लिए तैयार हो।

क्योंकि स्कूल जाने की उम्र सिर्फ कैलेंडर में लिखी हुई संख्या नहीं है। बच्चे की तैयारी भी मायने रखती है।

छह साल के एक बच्चे की स्कूल में तबीयत बिगड़ने और मौत की खबर सामने आई है। परिवार की ओर से कई गंभीर आरोप लगाए गए हैं और मामले की जाँच हो रही है। इसलिए अभी किसी एक व्यक्ति को बच्चे की मौत के लिए जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी।

हम अपने छोटे-छोटे बच्चों को आखिर किस बात की इतनी जल्दी में बड़ा कर रहे हैं?

तीन-चार साल का बच्चा…

सुबह नींद से उठता है, कभी ठीक से आँखें भी नहीं खुली होतीं और हम कहते हैं—
"जल्दी करो, स्कूल के लिए देर हो रही है।"

कभी बच्चा कहता है,
"मम्मी आज स्कूल नहीं जाना।"

हम कहते हैं—
"नहीं बेटा, स्कूल जाना बहुत जरूरी है।"

वो भूखा है, हम कहते हैं—
"स्कूल में टिफिन खा लेना।"

और टिफिन में कभी-कभी सच में क्या होता है?

चिप्स का पैकेट…
कुरकुरे…
बिस्किट…

मैं किसी माँ को इसके लिए कटघरे में खड़ा नहीं करना चाहती।

क्योंकि माँ भी क्या करे?

उसे घर संभालना है, नौकरी करनी है, बच्चे को तैयार करना है, टिफिन बनाना है, बस पकड़ानी है और शायद अपनी सांस लेने की बारी शाम को आती है।

लेकिन हमें अपने आप से सवाल जरूर पूछना चाहिए।

क्या चार-पाँच साल के बच्चे के लिए स्कूल की पढ़ाई इतनी जरूरी है कि उसके खेल, नींद, खाना और मानसिक सुकून पीछे छूट जाए?

क्या KG के बच्चे का होमवर्क इतना महत्वपूर्ण है कि उसके अधूरे होने पर उसे डराया जाए?

क्या छह साल का बच्चा "डाँट खाने के डर" को उसी तरह समझ सकता है जैसे कोई बड़ा आदमी समझता है?

नहीं।

उसके लिए टीचर सिर्फ टीचर नहीं होती।

वो स्कूल में उसकी दुनिया होती है।

और अगर वही दुनिया उसे डराने लगे तो बच्चा उस डर को कहाँ रखेगा?

हम आजकल बच्चों के तनाव की बात बहुत करते हैं।

लेकिन कभी ये सोचते हैं कि तनाव उनके जीवन में आया कहाँ से?

छोटे बच्चे को जल्दी स्कूल भेजना है।

जल्दी पढ़ाना है।

जल्दी लिखाना है।

जल्दी राइम याद करानी है।

जल्दी नंबर चाहिए।

जल्दी बच्चा दूसरे बच्चों से आगे निकल जाए।

और बच्चा अगर थोड़ा पीछे रह गया तो हमें लगता है कि पता नहीं भविष्य में क्या हो जाएगा।

हम भूल जाते हैं कि जिस बच्चे को हम "भविष्य के लिए तैयार" कर रहे हैं, उसका आज भी तो कोई भविष्य नहीं, आज उसका वर्तमान है।

उसे आज खेलना है।

आज मिट्टी में हाथ गंदे करने हैं।

आज माँ के पास बैठकर खाना है।

आज पापा की पीठ पर घोड़ा बनकर घूमना है।

आज स्कूल से आकर अपना बैग फेंककर खिलौनों से लड़ना है।

और हाँ…

कभी-कभी होमवर्क भी नहीं करना है।

इसका मतलब ये नहीं कि बच्चों को अनुशासन की जरूरत नहीं।

बिल्कुल है।

लेकिन अनुशासन और डर में बहुत महीन अंतर होता है।

बच्चे को समझाना और बच्चे को आतंकित कर देना—दोनों एक बात नहीं हैं।

और शायद इस घटना से हमें स्कूलों से भी उतना ही सवाल पूछना चाहिए जितना माता-पिता से।

अगर छह साल का बच्चा होमवर्क नहीं कर पाया तो पहले ये पूछा जाए कि क्यों नहीं कर पाया?

वो समझ नहीं पाया?

घर में कोई परेशानी थी?

वो थका हुआ था?

बीमार था?

या बस उसका मन नहीं था?

हर अधूरा होमवर्क आलस नहीं होता।

हर बच्चा एक जैसा नहीं होता।

और हर बच्चे की क्षमता भी एक जैसी नहीं होती।

मुझे लगता है आज बच्चों को पढ़ाने से पहले हमें उन्हें समझना सीखना होगा।

और माता-पिता को भी ये समझना होगा कि स्कूल भेज देना parenting की जिम्मेदारी खत्म कर देना नहीं है।

बच्चे ने सुबह क्या खाया?

कितनी नींद ली?

उसका मन कैसा है?

वो स्कूल जाने से खुश है या डरा हुआ?

टिफिन में सिर्फ कुछ डाल देना और टिफिन बनाना—दो अलग बातें हैं।

और सबसे जरूरी…

बच्चा घर लौटकर अगर सिर्फ इतना कहे—

"मम्मी, आज टीचर ने डाँटा।"

तो तुरंत ये मत पूछिए—

"होमवर्क क्यों नहीं किया था?"

पहले उसे अपने पास बैठाइए।

उसका चेहरा देखिए।

उसे गले लगाइए।

और पूछिए—

"डर तो नहीं गए थे?"

क्योंकि शायद इस उम्र में बच्चों को हमारी सबसे ज्यादा जरूरत नंबरों की नहीं…

एक ऐसी जगह की होती है जहाँ वो बिना डरे रो सकें।

और अंत में एक बात उस बच्चे की माँ के लिए भी…

हम बाहर बैठकर फैसला बहुत जल्दी कर देते हैं कि माँ ने ऐसा क्यों किया, टीचर ने वैसा क्यों किया।

लेकिन जिस माँ की गोद आज हमेशा के लिए खाली हो गई है, उसके हिस्से का दुख हम शायद कभी समझ ही नहीं सकते।

इसलिए दोष तय करने से पहले जाँच होने दीजिए।

लेकिन सवाल जरूर उठाइए।

क्योंकि अगर एक छह साल का बच्चा भी स्कूल जाने से पहले डरने लगे…

तो हमें सिर्फ बच्चे को नहीं,

अपनी पूरी व्यवस्था को देखना चाहिए।

02/08/2026

बचपन में जब भी पूछता था कोई,
कितने भाई बहन हैं तुम्हारे ,,
जोड़ने लगते थे हम सभी ,,,
जल्दी जल्दी,,
अपनी नन्हीं नन्हीं उंगलियों पे,,
उंगलियाँ खत्म हो जातीं ,,
जोड़ना नहीं,
क्योंकि
कजिन, रियल क्या होता है ??? ,,,
पता ही नहीं था ।
माँ ने कहा
ये तेरे बड़े भाई हैं ये छोटी बहन,,
बस ,,
हो गए हम ढे़र सारे,
गर्मी की छुट्टियाँ,
कब आतीं,
कब बीत जातीं,
पता ही नहीं था ।
जब भूख लगे,
जिस घर के बाहर खेलते
उसी में घुस जाते,
वे अपने ना थे,
पता ही ना था ।
चाची, ताई, मासी, बुआ,
ना जाने कितने अपने लोग ,
ना जाने कितने प्यारे रिश्ते,,
एक ही टोकरी मे सजे,
अलग अलग फूलों की भाँति,
उतना ही "अपनापन" ,,
उतनी ही "डाँट",,
"परायापन" क्या होता है"
पता ही ना था ।

बड़े हुए तब सुना ,,,
अपने परायों के किस्से,,
पर मन,
,वो तो रंग चुका था ,,
प्यार और अपनेपन के उन रंगों में,
जो कभी नहीं छूटता ,
बंध चुका था
उन रिश्तों की अदृश्य डोरियों में,
जो कभी नहीं टूटती ।
लगभग तीन चार दशकों बाद,
आज, जब जीने चले,
फिर से उन पलों को,
तो इतना सुखद अहसास,,
आज भी सभी,
मेरे जैसे ही,
खड़े हैं उसी मोड़ पर,
एक दूसरे का इंतजार करते,
उन यादों को मुट्ठियों में थामे
खोलते उड़ाते से,,
रंग-बिरंगी यादों की तितलियाँ,,
और
उन्हें पकड़ते हम सभी
उल्लास और आन्नद से भरे हुए ।
सच है ,
बचपन वापस तो नहीं लौटता ,,
पर जिया जा सकता है,
उन यादों को, फिर से एकबार,
संजोये जा सकता हैं,
फिर से एकबार
उन रिश्तों को
पर कभी नहीं टूटे ,,,
दिल के करीब जो थे ।
😊

24/07/2026

17/07/2026

Saat Mod Rishikesh Uttarakhand

17/07/2026
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13/07/2026

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