Aaj ki Aawaj

Aaj ki Aawaj अपने पंख फैलाइए और हर दिन बेहतरीन अनुभव कीजिए।

29/04/2026

मर्यादा की भी सीमाएं होती है

सम्मान सबका करों, ये आपके संस्कार हैं, लेकिन" अपने आत्मसम्मान का ध्यान रखें ये आपका अधिकार हैं,

संस्कारों के कारण झुकना आपकी महानता है, लेकिन जहाँ बात आपके चरित्र और आत्मसम्मान पर आ जाए, वहाँ तनकर खड़ा होना ही आपका धर्म है,

दुनिया आपको उतना ही दबाएगी जितना आप दबेंगे। संस्कारों की चादर ओढ़िये, पर आत्मसम्मान का कवच कभी मत उतारिये,,.......

सती ने अपमान के बजाय अग्नि को चुना ... द्रोपति ने मौन के बदले युद्ध को चुना... सीता ने सुख के बजाय गरिमा को चुना इतिहास हमे यही सिखाता हैं कि अपने आत्मसम्मान से कभी समझौता ना करें।

हार जाय या जीत जाय .. अपने ईमान से समझौता नहीं होगा
समय पक्ष में हो या विपक्ष में स्वाभिमान से समझौता नहीं होगा 💯😌

01/04/2026

सोशल मीडिया पर इन दिनों एक सच्चाई बार-बार सामने आ रही है, और हर वीडियो सिस्टम के मुँह पर तमाचा है. कोई माँ कैमरे पर बिल दिखा रही है, कोई पिता गुस्से में पूछ रहा है कि पहली कक्षा के बच्चे की किताबें 8500 से 12000 रुपये तक कैसे पहुँच गईं? ये पढ़ाई है या खुलेआम लूट? अब जरा खेल समझिए. मान लीजिए Central Board of Secondary Education जैसा कोई बोर्ड है — वो सिर्फ syllabus तय करता है, यानी क्या पढ़ाया जाएगा. लेकिन किस किताब से पढ़ाया जाएगा, ये स्कूल तय करता है. और यहीं से “कमाई का मॉडल” शुरू होता है. उसी syllabus को National Council of Educational Research and Training की किताबों से भी आराम से पढ़ाया जा सकता है, जिनकी कीमत कुछ सौ रुपये में पूरा सेट खत्म हो जाता है. लेकिन स्कूल क्या करते हैं? private publishers की किताबें ठूंस देते हैं, जिनकी एक-एक किताब 600–700 रुपये की होती है. और फिर 10–12 किताबों का सेट बनाकर parents के हाथ में 10,000 का बिल थमा दिया जाता है. ऊपर से शर्त ये कि किताबें 'यहीं से खरीदनी होंगी'. यानी पहले किताबें महंगी चुनो, फिर खरीदने की आज़ादी भी छीन लो. ये शिक्षा नहीं है, ये पूरा organised extraction है — parents की जेब से पैसा निकालने का सिस्टम.

सवाल सीधा है कि जब उसी syllabus की पढ़ाई सस्ती किताबों से हो सकती है, तो ये महंगी किताबों की जबरन बिक्री क्यों? क्या ये बच्चों की पढ़ाई के लिए है या स्कूलों और publishers के बीच सेटिंग के लिए? और अगर नियम कहते हैं कि किसी एक दुकान से खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, तो फिर ये ज़मीनी सच्चाई क्यों अलग है? सरकार को जवाब देना होगा कि आखिर कब तक ये 'स्कूल के नाम पर कारोबार' चलता रहेगा? कब तय होगा कि कौन सी किताबें लगेंगी और उनकी कीमत क्या होगी? कब parents को ये हक मिलेगा कि वो अपनी मर्जी से, अपनी क्षमता के हिसाब से किताब खरीद सकें?

ये सिर्फ किताबों का मुद्दा नहीं है, ये शिक्षा के चरित्र का सवाल है. अगर पहली कक्षा में ही 10,000 की लूट शुरू हो गई, तो आगे क्या होगा? अब वक्त है कि इस पर लगाम लगे — सख्ती से, साफ नियमों के साथ, और ज़मीन पर लागू करके. वरना आने वाले समय में पढ़ाई नहीं, सिर्फ पैसा ही admission का असली आधार बन जाएगा।

भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"लेकिन उनको कहाँ पता था कि लो...
23/03/2026

भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"
लेकिन उनको कहाँ पता था कि लोगों की स्मृति इतनी कमज़ोर है कि उनके जाने के बाद वे सिर्फ़ उनका 'धमाका' ही याद रखेंगे। और उनको भूल जाएँगे, उनके संघर्ष को भूल जाएँगे।
28 सितंबर को भगत सिंह का जन्मदिन है। भगत सिंह पर आधारित कहानियाँ तो हम बचपन से ही देखते आए हैं। आज हम भगत सिंह के जीवन से कुछ तथ्य आपके लिए लाए हैं।
इन सारी घटनाओं के साथ, उस वक्त पर उनकी उम्र पर भी ध्यान दें। और विचार करें कि उस उम्र में आपका जीवन कैसा था।
जन्म: 28 सितंबर 1907, लायलपुर (पंजाब) में जन्म हुआ।
➖ 10 की उम्र में कक्षा 9 तक पढ़ाई पूरी की।
➖ 12 की उम्र में जलियाँवाला बाग हादसा देखा। वहाँ की खूनभरी मिट्टी बोतल में बंद कर घर लेकर आए।
➖ 14 की उम्र में नेशनल कॉलेज, लाहौर गए। पहली बार किसी छात्र को 10वीं किए बिना, प्रतिभा के दम पर कॉलेज में एडमिशन मिला।
➖ 16 की उम्र में इंटरमीडिएट की परीक्षा पास की। HRA (बाद में HSRA बना) जॉइन किया।
➖ 16 की उम्र में शादी के लिए दबाव के चलते घर से भागकर कानपुर चले गए।
➖ 16 की उम्र में 'प्रताप' नाम की पत्रिका में लेखन का काम मिला। साथ ही अलीगढ़ के एक स्कूल में हेडमास्टर की नौकरी मिली।
➖ 19 की उम्र में गरिबाल्डी व मज़ीनी की संस्था 'Young Italy' से प्रेरित होकर 'नौजवान भारत सभा' नाम की संस्था शुरू की। 20 की उम्र में पहली बार जेल गए। 5 हफ़्तों के लिए पुलिस हिरासत में रहे। 60 हज़ार रुपए देकर ज़मानत मिली। शहर से बाहर जाने पर पाबंदी लगी तो कीर्ति, अकाली, महारथी, प्रभा व चाँद जैसी पत्रिकाओं के लिए क्रांतिकारी लेख लिखे।
➖ 21 की उम्र में लाला लाजपत राय जी की हत्या का बदला लिया। लाहौर से वेश बदलकर निकल गए।
➖ 21 की उम्र में 'सेंट्रल असेम्ब्ली' (आज का संसद भवन) में बम व अपने मिशन से जुड़े पैम्फलेट फेंके।
➖ 22 की उम्र में राजनीतिक कैदियों के हितों के लिए 112 दिनों की भूख हड़ताल पर बैठे। साथ में, अपना केस भी लड़ा। केस के दौरान अलग-अलग मौक़ों पर आवाज़ ना सुने जाने पर दो बार फिर भूख हड़ताल पर बैठे।
➖ 23 की उम्र में 23 मार्च 1931 को फाँसी पर चढ़ गए। पार्थिव शरीर के टुकड़े कर, बोरे में भरा और गाँव के बाहर पुलिस कर्मियों द्वारा जला दिया गया।
विलक्षण प्रतिभा के धनी थे: 5 भाषाएँ जानते थे, कॉलेज के दिनों से ही अभिनय में रुचि रखते थे, उनके द्वारा लिखे गए 100+ लेख पत्रिकाओं व अख़बारों में प्रकाशित हुए, मृत्युदण्ड मिलने पर बिना कोई अपील दायर किए फाँसी पर चढ़ गए।

22/03/2026
उत्तराखण्ड में चैत (चैत्र) का महीना लग गया है. कुमाऊं में चैत के महीने में विवाहित बहनों व बेटियों को भिटौली देने की विश...
20/03/2026

उत्तराखण्ड में चैत (चैत्र) का महीना लग गया है. कुमाऊं में चैत के महीने में विवाहित बहनों व बेटियों को भिटौली देने की विशिष्ट सांस्कृतिक परम्परा है. चैत के पहले दिन बच्चे फूलदेई का त्यौहार मनाते हैं लेकिन यह महीना मुख्य रूप से विवाहित बहन-बेटियों को भिटौली देने का है. भिटौली का शाब्दिक अर्थ भेंट देने से है. जिसके तहत चैत के महीने में विवाहित बेटियों को मायके की ओर से भिटौली में पकवान के रूप में पूरी, हलवा, खीर, खजूरे, पुए, बढ़े, गुड़, मिश्री, मिठाई आदि दिये जाते हैं. पकवान के साथ वस्त्रों में साड़ी, ब्लाउज व रुमाल आदि मुख्य तौर पर दिये जाते हैं. मायके वालों में सामर्थ्य हो तो आभूषण भी दिये जाते हैं. भिटौली आमतौर पर पिता, भाई ही लेकर जाते हैं. भिटौली के रूप में मायके से आये पकवानों को बहन, बेटियां अपने ससुराल के हर घर में बांटती है. इससे पूरे गांव को यह पता भी चल जाता है कि किसकी भिटौली आ गयी है और किसकी अभी आनी है.

भिटौली की परम्परा को लेकर कुमाऊं में अनेक लोककथायें प्रचलन में हैं. पहले विवाहित बेटी का हाल-चाल जानने के लिये लोगों को काफी दूर तक पैदल चलना पड़ता था. कई बार तो सालों तक कोई भी खोज-खबर नहीं मिलती थी. भिटौली की परम्परा के बारे में कुमाऊं में कई लोक कथाएं प्रचलन में हैं. एक लोक कथानुसार सैकड़ों वर्ष पहले की बात है एक गांव में एक महिला रहती थी. उसके पति की मौत हो चुकी थी. उसकी लड़की का दूर के गांव में विवाह हो गया था. विवाह के समय लड़की का भाई काफी छोटा था. विवाह के बाद कई साल तक लड़की के मायके से कोई भी उसकी खोज-खबर लेने नहीं गया. लड़के के बड़े होने पर एक दिन उसकी मां ने बताया कि उसकी दीदी का विवाह काफी दूर हुआ है और शादी के बाद हम उसकी खोज-खबर लेने भी नहीं जा सके, पता नहीं वह किस हाल में होगी? बीते वर्षों में कितने तीज-त्यौहार गए पर कभी भी उसे न तो मायके बुला सके और न ही उसके ससुराल ही जा सके. इतना कहते ही बेटी की याद में मां फफक-फफक कर रोने लगी.

मां की बात सुनकर लड़के ने कहा, “कहां है दीदी का ससुराल? मैं जाऊंगा उसकी खोज-खबर करने.” लड़के की उम्र अभी मुश्किल से दस-बारह साल की ही हुई थी. यह उम्र इतनी भी नहीं थी कि बीहड़ जंगल वाले रास्ते से मां उसे अकेले ही उसकी दीदी के सुसुराल भेज देती. अपने बेटे की बात सुनते ही मां का कलेजा डर के मारे मुंह को आ गया. उसने अपने बेटे को चेताते हुए कहा कि वह इतनी दूर बीहड़ रास्तों से होते हुए कैसे अपनी दीदी के ससुराल जाएगा? रास्ते में बाघ, भालू, सुअर जैसे बहुत से हिंसक जानवर मिलेंगे. कहीं उन्होंने तुझ पर हमला कर दिया तो? तू उनका मुकाबला कैसे करेगा? कहीं तुझे कुछ हो गया तो? यह सब बातें करते हुए मां ने कहा कि तू अपनी दीदी के यहां नहीं जाएगा. जब तू कुछ और बड़ा हो जाएगा तो तब ही मैं तुझे तेरी दीदी के यहां उसके हाल-चाल लेने भेजूंगी.

पर लड़के के मन में अपनी दीदी से मिलने की इच्छा दिन प्रतिदिन बढ़ने लगी. वह हर रोज अपनी मां से दीदी से मिलने के लिए जाने को कहने लगा. लड़के की जिद के आगे एक दिन मां ने भी हार मान ली और उसने अपने बेटे को लड़की के ससुराल जाने की अनुमति दे दी. वह अपने बेटे को इतने वर्षों के बाद बेटी के ससुराल भेज रही थी तो खाली हाथ कैसे भेजती? तब उसने अपनी बेटी के लिए कई तरह के पकवान बना कर भेजने का मन बनाया और अपने बेटे से कहा कि वह कल सवेरे जल्दी उठ जाय ताकि वह सवेरे-सवेरे अपनी दीदी से मिलने चल दे. जिससे वह दोपहर तक वहां पहुंच सके क्योंकि शाम तक उसे लौट कर भी आना है.

अपनी दीदी से मिलने की उत्सुकता में वह लड़का रात को ठीक से सो भी नहीं पाया और सवेरे बहुत ही जल्दी उठ गया. तब तक रात का अंधियारा छाया हुआ था. जब वह उठा तो उसने देखा कि उसकी मां कई तरह के पकवान बनाने में लगी हुई थी. लड़के को अपनी दीदी से मिलने की बहुत ही जल्दी थी सो वह फटाफट नहा-धोकर तैयार हो गया. तब तक रात का अंधियारा भी खत्म हो चुका था और उसकी मां ने भी अपनी बेटी के लिए पकवान तैयार कर लिए थे. एक पोटली में बेटी के लिए तरह-तरह के पकवान उस महिला ने बांधे और साथ में एक नई धोती भी बेटी के लिए रख दी. चलते हुए उसने अपने बेटे को हिदायत दी कि अपनी दीदी से मिलकर समय से वापस घर को लौट आना क्योंकि बहन व बेटी के ससुराल में रात को नहीं रहते हैं. उल्लेखनीय है कि कुमाऊं में कुछ साल पहले तक भी यह प्रथा मौजूद थी. मायके वाले अपनी बेटी-बहन के ससुराल में न तो खाना खाते थे और न रात्रि विश्राम ही किया जाता था.

मां ने बेटे को रास्ते में जंगली जानवरों से मुकाबला करने के लिए एक मजबूत डंडा भी पकड़ा दिया और फिर एक बार सख्त हिदायत देते हुए कहा कि वह समय से घर लौट कर आ जाय. वह लड़का सवेरे-सवेरे अपनी दीदी से मिलने के लिए चल दिया. रास्ते भर चलते हुए वह अपनी दीदी के ख्यालों में खोया रहा और सोचता रहा कि उसकी दीदी कैसी दिखती होगी? उसका घर कैसा होगा? वह कैसे रहती होगी? वह उसे पहचानेगी कि नहीं? वह उससे कैसे बात करेगी? जब उसे पता चलेगा कि उसका छोटा सा भाई अब इतना बड़ा हो गया है तो वह उसे कितना लाड़ करेगी? इसी तरह के कई विचार व सवाल उसके मन में आ जा रहे थे. यह सब सोचते- विचारते वह दोपहर के समय अपनी दीदी के घर पहुँच गया.

उसने वहां पहुंचकर देखा कि उसकी दीदी के घर तो सन्नाटा पसरा हुआ है. उसने कुछ देर तक इधर-उधर देखा. उसे कोई नहीं दिखाई दिया. जब उसे कोई नहीं दिखाई दिया तो उसने जोर-जोर से “दीदी, ओ दीदी” कहते हुए अपनी दीदी को धात लगाई पर उसके बाद भी वहां कोई हलचल नहीं हुई और न कोई घर से बाहर ही निकला. घर का दरवाजा खुला हुआ था. वह लड़का थोड़ा सहमते हुए घर के अन्दर गया. वहां जाकर देखता है कि उसकी दीदी तो गहरी नींद में सोई हुई है. वह खेत से काम करने के बाद घर लौटी तो थकान से चूर होकर यूं ही थोड़ा आराम करने के लिए लेटी तो उसे गहरी नींद आ गई. अपनी दीदी को गहरी नींद में देखकर उस लड़के ने उसे उठाना उचित नहीं समझा. उसने समझ लिया कि उसकी दीदी खेत में काम करने के बाद थक कर सोई हुई है.

उसने सोचा कि थोड़ी देर में जब उसकी दीदी की थकान दूर हो जाएगी तो वह अपने आप ही उठ जाएगी. यह सोचकर उसने अपनी दीदी के सिरहाने पकवानों की पोटली (भिटौली) रखी और तिबारी में बैठकर उसके उठने का इंतजार करने लगा. इंतजार करते-करते दोपहर भी ढलने को आ गई पर उसकी दीदी की नींद नहीं खुली. वह न जाने कैसे गहरी नींद में सोई रही. अब उस लड़के को बैचेनी भी होने लगी, क्योंकि उसकी मां ने कहा था कि समय से घर को लौट आना. दीदी के ससुराल में नहीं रहना है. उधर वह लड़की भी सपने में अपने भाई को देखती रही कि वह उससे मिलने के लिए आया है और साथ में भिटौली भी लाया है. जब दोपहर ढलने के बाद भी उसकी नींद नहीं खुली तो लड़के ने भारी मन से बिना अपनी दीदी से मिले ही घर वापस लौटने का निर्णय किया. वह भिटौली की पोटली अपनी दीदी के सिरहाने ही छोड़कर भारी मन से घर वापस लौट गया. उसके मन में यह कसक रह गई कि इतने साल बाद दीदी से मिलने के लिए आने के पर भी वह उससे नहीं मिल पाया.

उधर, जब सूरज ढलने लगा तो अपने घौंसलों को लौट रही चिड़ियों की चहचहाहट से उस विवाहिता लड़की की आंखें खुल गई. जब उसकी आंख खुली तो उसने सिरहाने में रखी पोटली देखी. जब उसने उसे खोला तो उसमें कई तरह के पकवानों के साथ एक नई धोती भी थी. उसे अपना सपना सच होता हुआ महसूस हुआ. भाई से मिलने की आस में उसने पहले घर के अन्दर उसे ढूंढा. जब वह नहीं मिला तो वह घर के बाहर निकली और उसे चारों ओर देखने लगी. पर उसका भाई कहीं नहीं दिखाई दिया. उसने सोचा कि शायद उसे सोता हुआ देखकर वह खेतों की ओर न चला गया हो. उसने अपने भाई को जोर-जोर से आवाज लगाई. पर वह कहां से आता? वह तो अपनी दीदी से बिना मिले ही निराश होकर घर वापस लौट चुका था.

काफी देर तक आवाज लगाने के बाद भी जब भाई कहीं नहीं दिखाई दिया तो वह लड़की जोर-जोर से रोने लगी. उसके रोने की आवाज सुनकर गांव के लोग उसके घर की ओर दौड़ पड़े, यह सोचकर कि पता नहीं उस पर क्या मुसीबत आ गई है. गांव वाले जब उसके घर पहुंचे तो उससे पूछने लगे कि वह क्यों रो रही है? उसे क्या हुआ है? उसने जोर-जोर से रोते हुए कहा,”भै भुको, मैं सिती”, “भै भुको,मैं सिती” (भाई भुखा ही रहा और मैं सोती रही). ऐसा कहते-कहते और जोर-जोर से रोते हुए उसने अपने घर के आंगन में प्राण त्याग दिए. वह लड़का अपनी दीदी से मिलने के लिए चैत के महीने ही गया था. बाद में गांव वालों व दूसरे लोगों को जब वास्तविकता का पता चला तो उन्हें बहुत ही दुख हुआ. कहते हैं कि उसके बाद ही हर साल चैत के महीने में विवाहित बहन व बेटियों को भिटौली देने की परम्परा की शुरुआत हुई ताकि इसी बहाने मायके वाले दूर-दराज बिवाई गई बहन-बेटियों की कम से कम साल में एक बार तो खोज-खबर ले सकें और उनके लिए भिटौली भी लाएं.

चैत के महीने में भिटौली की परम्परा के शुरू होने से साल में एक बार जहां बहन-बेटी के हाल-चाल मिल जाते थे, वहीं उससे मुलाकात भी हो जाती थी. यह परम्परा भाई-बहन के आपसी प्रेम व अपनत्व को भी प्रदर्शित करती है. बाद में इसने एक सांस्कृतिक परम्परा का रूप ले लिया. जो आज कुमाऊं की एक विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान बन गया है. चैत का महीना लगते ही सास हो चाहे बहू हर उम्र की महिला को भिटौली का इंतजार रहता है. जब तक भिटौली नहीं आती तब तक महिलायें घुघुती नामक पक्षी से न बासने (बोलने) की विनती इस लोकगीत को गाकर करती हैं – “न बासा घुघुती चैत की, याद ऐ जांछी मैंकैं मैत की”.

चैत का महीना विवाहित बेटियों की भिटौली का होने के कारण ही इस महीने कुमाऊं में विवाह नहीं होते हैं. जिन लड़कियों का विवाह चैत का महीना लगने से पहले हो जाता है. उनकी पहली भिटौली फागुन के महीने में ही दे दी जाती है, क्योंकि विवाह के बाद पड़ने वाले पहले चैत के महीने बेटियां मायके में ही रहती हैं. वैसे नव विवाहित बेटी को पहली भिटौली उसकी शादी के दूसरे दिन दुरगूण के समय भी दी जाती है. अगर दुर्भाग्यवश बेटी व बहन के पति की मौत हो जाय तो उनके पति की मौत के बाद जो पहली भिटौली मायके की ओर से दी जाती है, उसमें कपड़े नहीं दिए जाते. केवल फल व पकवान भिटौली में देते हैं. उसके बाद हर साल पूरी भिटौली साड़ी, ब्लाउज व रुमाल सहित दी जाती है. पिता व भाई की मौत होने के बाद भी मायके से ईजा, भद्यो (भाई के बेटे,) बौजी (भाभी,) आदि भिटौली देने की परम्परा का निर्वाह करते हैं और बहन व बेटी के अलावा बुआ को भी अपने भद्यो की ओर भिटौली मिलती रहती है. जिन परिवारों में एक से अधिक भाई होते हैं और उन सब के परिवारों में से अगर किसी भाई के बेटी नहीं होती तो वह अपने दूसरे भाई की बेटियों को भिटौली देते हैं. भिटौली देने के लिए भी मंगलवार, बृहस्पतिवार व शनिवार को नहीं जाते हैं. कुछ जगहों पर सोमवार के दिन भी नहीं जाते हैं.

17/03/2026

Brilliant person kadar khan sir ki acting aaj tak koi nahi kar saka na kar sakta hai bahut se voice artist aaye aur gaye lekin kadar sir saahab ki mimicry itni bhi aasan nhi hai well done sunil grover sir aap to har taraf chha gaye ho har taraf aapka hi jalwa hai god bless u with your confidence sir you are always great 👍👍👍👍

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