21/09/2026
"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग... जिसकी आवाज़ में दर्द, नफ़ासत, और मल्लिका-ए-तरन्नुम का पूरा जलाल बसता था, उस बेमिसाल सुर-साम्राज्ञी नूरजहां (Noor Jehan) की 100वीं जयंती पर शत-शत नमन व रूहानी नज़राना-ए-अकीदत!" 🎙️👑🪔✨
> "जब वे गाती थीं, तो लगता था कि सुर खुद झुककर उनके कदमों में ताज़ीम कर रहे हों। चेहरे पर वह शाही हुस्न, माथे पर झूमर, और गले से निकलता वह रूहानी कंपकंपाता हुआ दर्द—जिसने हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों मुल्कों की रूहों को एक ही धागे में पिरो दिया। सरहदें खिंच गईं, नक्शे बदल गए, लेकिन दोनों तरफ के अवाम के दिलों पर जिस मल्लिका की हुकूमत कभी कम न हुई, उसका नाम था—नूरजहां।"
>
भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत और सिनेमाई इतिहास में अल्ला रक्खी वसाई यानी 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहां केवल एक गायिका या अभिनेत्री नहीं थीं; वे गायकी का एक मुकम्मल दौर, एक संजीदा विरासत और शास्त्रीय मिठास का वो हिमालय थीं, जिसकी परछाईं में लता मंगेशकर से लेकर सुरैया तक ने अपने सुर तराशे।
21 सितंबर 1926 को पंजाब के कसूर (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मी नूरजहां की आज 21 सितंबर 2026 को जन्म शताब्दी (100वीं जयंती) है। एक सदी बीत जाने के बाद भी उनकी गायकी का वो शाही अंदाज़ आज भी हवाओं में उसी ताज़गी और सलीके के साथ गूंजता है।
1. कसूर की नन्हीं अल्ला रक्खी से 'बेबी नूरजहां' बनने का सफर 🎶👶
नूरजहां के खून में ही संगीत और शायरी रची-बसी थी:
* बचपन में ही उनकी आवाज़ की असीम रेंज और लोच को पहचान लिया गया। उन्होंने पटियाला घराने के प्रख्यात उस्ताद बड़े गुलाम अली खान के भाई उस्ताद गुलाम मोहम्मद खान से शास्त्रीय संगीत की तालीम हासिल की।
* 1930 के दशक में कलकत्ता के मूक और शुरुआती टॉकीज युग में 'बेबी नूरजहां' के नाम से पंजाबी और उर्दू फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू किया।
* उनकी आवाज़ में वो प्राकृतिक 'हरकत' और मुर्कियां थीं जो बिना किसी बनावट के सीधे सीने के पार उतर जाती थीं।
2. बॉम्बे का स्वर्णिम दौर: जब बनीं हिंदुस्तान की पहली 'गायन नायिका' (Singing Star) 🎥🌹
1940 के दशक में जब नूरजहां मुंबई (तब बॉम्बे) आईं, तो उन्होंने हिंदी सिनेमा के इतिहास का सबसे चमकदार अध्याय लिखा:
* खानदान (1942): निर्देशक शौकत हुसैन रिज़वी की इस फिल्म ने नूरजहां को रातों-रात भारत का सबसे बड़ा सिंगिंग स्टार बना दिया।
* अनमोल घड़ी (1946): महबूब खान की इस कालजयी फिल्म में नौशाद का संगीत और नूरजहां की आवाज़ ने जो जादू रचा, उसने भारतीय सिनेमा के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। "आवाज़ दे कहाँ है, दुनिया मेरी जवां है", "जवां है मोहब्बत हसीं है ज़माना", और "मेरे बचपन के साथी मुझे भूल न जाना"—ये वो गीत हैं जो आज 80 साल बाद भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों को थाम लेते हैं।
* जुगनू (1947): नौजवान दिलीप कुमार के साथ उनकी जोड़ी और उनका गाया गीत "यहाँ बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है" उस दौर का सबसे बड़ा दर्दभरा तराना बन गया।
उस दौर में नूरजहां का रुतबा यह था कि वे किसी भी फिल्म के लिए हीरो से ज्यादा फीस लेती थीं और उनकी मखमली आवाज़ ही टिकट खिड़की पर भीड़ खींचने की सबसे बड़ी गारंटी थी।
3. बंटवारे का दर्द और पाकिस्तान का 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' का ताज 🕊️💔
1947 में जब मुल्क का बंटवारा हुआ, तो नूरजहां ने अपने पति शौकत हुसैन रिज़वी के साथ पाकिस्तान जाने का फैसला किया:
* बॉम्बे की फिल्म इंडस्ट्री उनके जाने से रो पड़ी। नौशाद साहब, दिलीप कुमार और खुद लता मंगेशकर के लिए यह एक बहुत बड़ा भावनात्मक सदमा था।
* पाकिस्तान पहुंचकर उन्होंने न सिर्फ वहां की फिल्म इंडस्ट्री ('लॉलीवुड') की नींव रखी, बल्कि बतौर निर्देशक और मुख्य अभिनेत्री कई ऐतिहासिक फिल्में दीं—जैसे 'चन्न वे' (1951) और 'दोपट्टा' (1952)।
* 1965 के युद्ध के दौरान जब उन्होंने रेडियो पाकिस्तान पर देश-भक्ति के तराने गाए—"ऐ वतन के सजीले जवानो"—तो पूरी कौम भावुक हो उठी। पाकिस्तान सरकार ने उन्हें सर्वोच्च नागरिक सम्मानों और आधिकारिक रूप से 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' (Melody Queen) के खिताब से नवाजा।
4. फ़ैज़ की शायरी और नूरजहां का सुर: जब नज़्म अमर हो गई 📖🕯️
महान शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की मशहूर नज़्म "मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग" को जब नूरजहां ने अपनी रूहानी तान और शास्त्रीय ठहराव के साथ गाया, तो फ़ैज़ साहब खुद दंग रह गए थे।
फ़ैज़ ने भरी महफिल में मुस्कुराकर कहा था—"यह नज़्म अब मेरी नहीं रही, आज से इस पर सिर्फ और सिर्फ नूरजहां का मालिकाना हक है।" किसी शायर द्वारा एक गायिका को दिया गया यह दुनिया का सबसे बड़ा सम्मान था।
5. लता मंगेशकर और नूरजहां: सरहदों से परे दो रूहों का प्यार 🤍🤝
बंटवारे की कांटेदार तारें कभी भी इन दो महान फनकारों के रिश्ते के बीच नहीं आ सकीं:
* लता मंगेशकर हमेशा नूरजहां को अपनी 'बड़ी आपा' और प्रेरणा मानती रहीं। लता जी ने हमेशा स्वीकारा कि उनके शुरुआती गायन पर नूरजहां की शैली की गहरी छाप थी।
* जब दोनों 1952 में वाघा बॉर्डर पर 'नो मैन्स लैंड' में मिले, तो दोनों गले लगकर फूट-फूट कर रोए थे। घंटों बैठकर दोनों ने एक-दूसरे के हाथ थामे रखे और एक-दूसरे के लिए गीत गाए। यह दृश्य इस बात का गवाह था कि सियासत मुल्क बांट सकती है, मगर सुरों के रिश्ते कभी नहीं टूटते।
6. सुरों की रानी का वो शाही अंदाज़ 👑✨
23 दिसंबर 2000 को कराची में जब 74 वर्ष की उम्र में नूरजहां ने आखिरी सांस ली, तो भारतीय उपमहाद्वीप के संगीत का एक जादुई युग हमेशा के लिए शांत हो गया। उनका वो बड़ा सा मांग-टीका, सिल्क की साड़ियां, आंखों का गाढ़ा सुरमा, और हाथ के इशारों से सुरों को नचाने का वो अंदाज़ आज भी किसी रानी की तरह अमर है।
आवाज़ की मलिका, हुस्न और नज़ाकत की मिसाल, 'मल्लिका-ए-तरन्नुम' नूरजहां जी की 100वीं जयंती पर शत-शत नमन! आपके सुर जब तक हवाओं में रहेंगे, दुनिया में मोहब्बत और सुकून कभी खत्म नहीं होगा। 🫡🎙️🌹✨
मल्लिका-ए-तरन्नुम नूरजहां का गाया कौन सा अमर नग़मा—'आवाज़ दे कहाँ है' (अनमोल घड़ी), 'मुझसे पहली सी मोहब्बत', या 'चांदनी रातें'—आपकी रूह को सबसे गहरा सुकून देता है? कमेंट्स में इस सुर-साम्राज्ञी को अपनी स्वरांजलि ज़रूर अर्पित करें! 👇❤️📻