06/04/2026
आप शुरुआत में इशा की नमाज सत्रह रकअतें पढ़ते थे,
फिर जब इल्म हासिल किया तो तेरह रकअतें पढ़ने लग गए।
आप एक सादे इंसान थे, सालों से अस्र की आठ रकअतें पढ़ते थे।
कुछ पढ़े-लिखे लोगों के साथ उठना-बैठना शुरू किया तो उन्होंने बताया कि अस्र की चार रकअतें सुन्नत हैं और चार फर्ज़ हैं।
जब आपको पता चला कि ये सुन्नत हैं, तो आपने सुन्नतें पढ़ना बिल्कुल ही छोड़ दिया। अब बताइए, आपने सुन्नत को अहमियत दी या गैर-अहम समझा ?
आप पूरी ज़िंदगी रमज़ान की कद्र करते थे,
दिन रोज़ों में गुज़ारते और आपकी रातें तरावीह से सजी रहती थीं।
फिर किसी दिन आधुनिक दौर के किसी आलिम से सुन लिया कि तरावीह तो एक अतिरिक्त (ज़्यादा) इबादत है।
तीस साल पढ़ने के बाद उसे गैर-ज़रूरी समझकर छोड़ बैठे।
तो याद रखिए, यह नफ़ा देने वाला इल्म नहीं बल्कि नुकसान देने वाला इल्म है। यह ख़ुदा की बंदगी नहीं, बल्कि बंदगी से भागना है, जिसे आप इल्म समझते हैं।
आज का मसला जहालत नहीं, बल्कि बड़ा मसला इल्म है।
आज की जहालत न जानने से नहीं, बल्कि इस दौर की जहालत जानने के बावजूद है।
लोग इस वजह से गुमराह नहीं हो रहे कि उन्हें पता नहीं, बल्कि इस वजह से गुमराह हो रहे हैं कि उन्हें पता है।
और ऐसा इल्म जो इंसान को ख़ुदा से दूर कर दे, वह मुफ़ीद (लाभदायक) इल्म नहीं बल्कि नुकसानदेह है।
अल्लाह पाक हमें नफ़ा देने वाला इल्म सीखने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए।
आमीन या रब्बुल आलमीन