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20/09/2025

14 करोड़ का दान: सेवा या दान? — PK की स्वीकारोक्ति से उठे बड़े सवाल

भारतीय जनता पार्टी के सांसद संजय जायसवाल ने हाल ही में आरोप लगाया कि Ramsetu Infrastructure Pvt Ltd, जो खुद 19 करोड़ रुपये के घाटे में थी, ने प्रशांत किशोर (PK) को 14 करोड़ रुपये का चंदा दिया।

जब इस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में PK से सवाल पूछा गया, तो उन्होंने खुद स्वीकार किया कि हाँ, यह पैसा उन्हें मिला और यह दरअसल सांसद अयोध्या रामि रेड्डी की ओर से था। PK ने साफ कहा कि उन्होंने रेड्डी को चुनाव जिताने में मदद की थी और अब रेड्डी उसी वजह से उनकी मदद कर रहे हैं।

यानी PK की अपनी जुबानी यह साफ है कि यह पैसा चुनाव जिताने की सेवा के बदले दिया गया था। अब इसी से पूरे मामले की गंभीरता सामने आती है

चुनाव खर्च का नियम और सरल उदाहरण

भारत का कानून कहता है कि किसी भी उम्मीदवार या उसके हित में किया गया खर्च चुनाव खर्च माना जाएगा। और हर उम्मीदवार को चुनाव आयोग के सामने अपना पूरा खर्च दिखाना होता है।

उदाहरण से समझें:
मान लीजिए मैं चुनाव लड़ रहा हूँ। चुनाव आयोग कहता है कि मैं ज़्यादा से ज़्यादा 70 लाख रुपये खर्च कर सकता हूँ। अब मैं किसी कंसल्टेंट को बुलाता हूँ और उसे 5 करोड़ रुपये देता हूँ कि वह मेरी रणनीति बनाए और मुझे जिताए। भले ही मैं कहूँ कि “ये तो दान है”, लेकिन चूँकि वह खर्च चुनाव जिताने पर हुआ है, यह चुनाव खर्च ही माना जाएगा।

ठीक यही मामला यहाँ है। रेड्डी ने PK को 14 करोड़ दिए क्योंकि PK ने उन्हें चुनाव जिताने में मदद की थी। तो यह रकम रेड्डी का चुनाव खर्च है।

खर्च सीमा और कानून का उल्लंघन

2019 लोकसभा चुनाव में चुनाव खर्च की सीमा 70 लाख रुपये थी। रेड्डी अगर चुनाव जिताने के लिए 14 करोड़ रुपये देते हैं, तो यह सीमा से लगभग 20 गुना ज़्यादा है।

अगर यह रकम चुनाव आयोग को दिए गए खर्च के विवरण में दर्ज नहीं हुई, तो यह खर्च छिपाना (concealment) है। और अगर दर्ज हुई, तो भी सीमा तोड़ने की वजह से यह illegal election expenditure है।

टैक्स और GST का पहलू

अब बड़ा सवाल टैक्स का है। PK ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में माना कि उन्होंने चुनाव जिताने की सेवा दी। अगर कोई सेवा दी जाती है, तो उसका भुगतान Service Fee होता है। Service Fee पर GST और Income Tax दोनों लगते हैं।

उदाहरण:
एक डॉक्टर मरीज का इलाज करता है और 10,000 रुपये लेता है। यह फीस है और उस पर टैक्स देना पड़ता है। अगर डॉक्टर कह दे कि यह तो donation है, तो वह टैक्स चोरी कर रहा है।

यही यहाँ हुआ। PK की सेवा IPAC जैसी संस्था को देनी थी, जिस पर GST और Income Tax दोनों लागू होते। लेकिन इसे donation कहकर टैक्स से बचा लिया गया।

कंपनी का घाटा और संदिग्ध दान

सवाल और बड़ा हो जाता है जब हम देखते हैं कि दान देने वाली कंपनी Ramsetu Infrastructure Pvt Ltd खुद 19 करोड़ रुपये के घाटे में थी।

सरल उदाहरण:
अगर कोई परिवार खुद कर्ज में डूबा है और फिर भी 50 लाख रुपये किसी और को “दान” दे देता है, तो पहला सवाल यही उठेगा कि पैसा आया कहाँ से?

ठीक यही सवाल यहाँ उठता है — घाटे में डूबी कंपनी इतनी बड़ी रकम क्यों और कैसे दान करेगी? और क्या इस दान पर कंपनी ने टैक्स में छूट का दावा किया?

दोहरा फायदा और जनता के लिए नुकसान

यह पूरा खेल समझने लायक है:
1. रेड्डी को फायदा – उन्होंने चुनाव जिताने के लिए PK की सेवा ली और जीत भी गए।
2. PK को फायदा – उन्हें 14 करोड़ रुपये मिले, लेकिन donation दिखाकर GST और Income Tax से बच गए।
3. कंपनी को फायदा – अगर दान books में दिखाया गया तो कंपनी को टैक्स में छूट मिली।
4. जनता को नुकसान – चुनाव खर्च की पारदर्शिता ख़त्म हुई, टैक्स चोरी से सरकारी राजस्व घटा और चुनाव आयोग मूकदर्शक बना रहा।

निष्कर्ष

PK की अपनी स्वीकारोक्ति साबित करती है कि यह रकम चुनाव जीताने की सेवा के बदले दी गई थी। ऐसे में:
• यह सांसद अयोध्या रामि रेड्डी का चुनाव खर्च है और इसे खर्च विवरण में दिखाना ज़रूरी था।
• यह सेवा शुल्क है, donation नहीं; इस पर GST और Income Tax लगना चाहिए था।
• donation का नाम देकर टैक्स से बचा गया और कंपनी को टैक्स छूट भी मिली।

अगर यही मामला किसी छोटे नेता या क्षेत्रीय पार्टी के साथ हुआ होता, तो अब तक चुनाव आयोग, आयकर विभाग और अन्य एजेंसियाँ सक्रिय होकर नोटिस पर नोटिस भेज रही होतीं। लेकिन जब बड़े नेताओं और करोड़ों की रकम की बात आती है, तो सब चुप क्यों हो जाते हैं? यही लोकतंत्र और कानून की सबसे बड़ी विडंबना है।

जनता के सवाल
• प्रशांत किशोर से: आपने खुद माना कि 14 करोड़ चुनाव जिताने की सेवा के बदले मिले। तो यह donation कैसे हो गया? क्या आपने इस पर GST और Income Tax भरा?
• सांसद अयोध्या रामि रेड्डी से: आपने यह रकम चुनावी खर्च में क्यों नहीं दिखाई? क्या आपने चुनाव खर्च की सीमा तोड़ी?
• Ramsetu Infrastructure Pvt Ltd से: घाटे में होने के बावजूद आपने इतनी बड़ी रकम कैसे दान की? क्या आपने इस दान पर टैक्स छूट ली?
• चुनाव आयोग से: Representation of People Act के अनुसार यह खर्च चुनाव खर्च है। फिर अब तक कोई जांच क्यों नहीं हुई?
• आयकर विभाग से: जब रकम सेवा के बदले दी गई, तो उसे donation दिखाकर टैक्स से बचने पर आपने संज्ञान क्यों नहीं लिया?

मेरे अपने शहर, सीतामढ़ी की फुलमतिया की दिल को झकझोर देने वाली कहानी 🌿मिलिए फुलमतिया से, मेरे अपने शहर सीतामढ़ी की एक संघ...
14/09/2024

मेरे अपने शहर, सीतामढ़ी की फुलमतिया की दिल को झकझोर देने वाली कहानी 🌿

मिलिए फुलमतिया से, मेरे अपने शहर सीतामढ़ी की एक संघर्षशील महिला से। पिछले 20 सालों से वह सीतामढ़ी रेलवे स्टेशन पर पारंपरिक नीम और बांस के दातून बेचती आ रही हैं। उनके चेहरे पर बीते सालों की थकान और कठिनाइयों की कहानियाँ झलकती हैं। वह याद करती हैं जब स्टेशन पर 20-30 आदमी और औरतें उन्हीं की तरह ये साधारण हर्बल दातून बेचा करते थे। "अब कौन खरीदे हैं? नीम और बांस से मुंह साफ करने वाले लोग कहाँ हैं?" वह कहती हैं, उनकी आवाज़ में बीतते वक़्त की बेबसी झलकती है। "ज़माना बदल गया है, बाबू!"

फुलमतिया के शब्द उस विकास के शोर में सुई की तरह चुभते हैं जिसके दावे रोज़ किए जाते हैं। वह और उनके जैसे कुछ लोग अब भी संघर्ष कर रहे हैं, अपने अस्तित्व की छोटी-सी जगह से चिपके हुए, जबकि पुलिस उन्हें हर जगह से धकेल देती है। वह नेपाल सीमा के पास के थोक विक्रेताओं से अपना माल खरीदती हैं और उसे बेचती हैं, जिससे उन्हें मुश्किल से ही गुज़ारा होता है। जो पहले ₹1 में 20-25 दातून बिकते थे, अब ₹1 में केवल एक मिलता है, और नीम का दातून ₹2 में। उनका रोज़ का मकसद? किसी तरह ₹20-₹25 जुटाना, ताकि दो वक्त की साधारण रोटी का इंतज़ाम हो सके।

मानो जीवन पहले ही कठिन न हो, जब भी रेलवे के बड़े अधिकारी आते हैं, फुलमतिया और उनके जैसे अन्य लोगों को मारा-पीटा जाता है और भगा दिया जाता है, मानो उनका कोई अस्तित्व ही नहीं। सोचिए, 20 साल ऐसे जीकर देखिए। सोचिए, एक ऐसे देश में रहकर, जो विकास की बड़ी-बड़ी बातें करता है, फिर भी फुलमतिया जैसी महिला की गरिमा की रक्षा नहीं कर पाता।

यह कहानी सिर्फ फुलमतिया की नहीं है; यह उन अनगिनत गुमनाम चेहरों की कहानी है जो हर दिन अपनी ज़िन्दगी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सरकार एक के बाद एक योजना घोषित करती है, गरीबी हटाने और रोजगार सृजन की बातें करती है, लेकिन फुलमतिया के लिए ये वादे खोखले हैं। वह इन योजनाओं को जानती तक नहीं; उसने इन्हें कभी देखा तक नहीं। ये योजनाएँ उस तक पहुँचती ही नहीं।

विकास कहाँ है? 78 साल की आज़ादी के बाद भी फुलमतिया जैसी लोग अंधकार में क्यों हैं? इन योजनाओं का क्या फायदा अगर वे उनके जीवन में उजाला नहीं ला सकतीं?

और हम यहाँ हैं—मध्यवर्गीय वेतनभोगी, भारी-भरकम टैक्स से दबे हुए, लाखों रुपये हर साल हमारी कमाई से काट लिए जाते हैं। हमें बदले में क्या मिलता है? कुछ भी नहीं, जो न्यायपूर्ण महसूस हो। हमारी मेहनत की कमाई, जिसे हम उम्मीद करते हैं कि वह फुलमतिया जैसे लोगों को उठाने में काम आएगी, वह कहीं इस नौकरशाही और अक्षमता की मशीनरी में गायब हो जाती है। क्यों? क्यों हमारा सिस्टम सबसे कमजोर लोगों को ही विफल कर देता है?

अब समय आ गया है कि हम आँखें मूँदना बंद करें। अब समय आ गया है कि हम जवाब और जवाबदेही की माँग करें। क्योंकि अगर सिस्टम फुलमतिया को विफल कर रहा है, तो वह हम सबको विफल कर रहा है।

हमें बदलाव चाहिए। एक ऐसा बदलाव जहाँ विकास सिर्फ भाषणों का शब्द नहीं, बल्कि इस देश के हर कोने में महसूस किया जाने वाला हकीकत हो। एक हकीकत जो हर फुलमतिया तक पहुँचे।

आइए, सिर्फ बदलाव की बात न करें—उसकी माँग करें।

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