Prem Bhakti

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श्रावण पुत्रदा एकादशी पौराणिक कथा…."ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"सनातन धर्म में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रावण पु...
23/08/2026

श्रावण पुत्रदा एकादशी पौराणिक कथा….

"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"

सनातन धर्म में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रावण पुत्रदा एकादशी कहा जाता है।
यह पावन कथा द्वापर युग में स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को सुनाई थी। आइए जानते हैं वह कथा जिसने एक निराश राजा के जीवन में खुशियाँ भर दीं।

प्राचीन काल में भद्रावती नगरी में सुकेतुमान नाम के एक राजा राज करते थे। उनकी पत्नी का नाम शैव्या था। राजा के पास धन, दौलत, वैभव और बड़ी सेना थी, लेकिन उनकी कोई संतान नहीं थी। संतान न होने के कारण राजा और रानी हमेशा गहरे दुख और चिंता में डूबे रहते थे।

राजा को हर समय यही चिंता सताती थी कि उनके जाने के बाद इस राज्य का क्या होगा? उनका पिंड दान और तर्पण कौन करेगा? राजा जब भी अपने पितरों को जल अर्पित करते, तो पितर उस जल को बहुत दुखी होकर ग्रहण करते थे।
पितरों को डर था कि राजा के बाद उनके वंश में कोई ऐसा नहीं बचेगा जो उन्हें याद कर सके। इस मानसिक पीड़ा से तंग आकर एक दिन राजा ने आत्महत्या तक का विचार कर लिया, लेकिन पाप के डर से वे चुपचाप अपना राजपाट छोड़कर अकेले जंगल की ओर चले गए।

जंगल में भटकते हुए राजा को प्यास लगी। पानी की तलाश करते-करते वे एक अत्यंत सुंदर सरोवर के किनारे पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि सरोवर के चारों ओर ऋषियों के पवित्र आश्रम बने हुए हैं और ऋषि-मुनि वेदपाठ कर रहे हैं। सौभाग्य से उस दिन श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि थी। राजा ने आश्रम में जाकर सभी ऋषियों को सादर प्रणाम किया।..

राजा के उदास चेहरे और विलाप को देखकर ऋषियों ने उनसे उनके दुख का कारण पूछा। राजा ने हाथ जोड़कर अपनी संतानहीनता और पितरों के कष्ट की व्यथा सुनाई।

राजा की बात सुनकर ऋषियों ने मुस्कुराकर कहा,

"हे राजन! घबराओ मत। आज श्रावण मास की 'पुत्रदा एकादशी' है। जो भी मनुष्य आज के दिन पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से इस एकादशी की कथा सुनता है और इसका महत्व समझता है, भगवान नारायण की कृपा से उसे अवश्य ही योग्य और प्रतापी संतान की प्राप्ति होती है।
तुम भी इस व्रत को विधि-विधान से करो।"

ऋषियों के दिव्य वचनों को सुनकर राजा सुकेतुमान के मन में नई आशा जागी। उन्होंने वहीं बैठकर ऋषियों के मुख से पुत्रदा एकादशी की महिमा और कथा को पूरे ध्यान से सुना। इसके बाद राजा ऋषियों का आशीर्वाद लेकर वापस अपने महल लौट आए।

कुछ समय बाद रानी शैव्या गर्भवती हुईं और उन्होंने एक अत्यंत सुंदर, तेजस्वी और गुणवान पुत्र को जन्म दिया। वह पुत्र आगे चलकर एक न्यायप्रिय राजा बना और उसने अपने माता-पिता व पितरों का उद्धार किया।

सुख, समृद्धि और संतान सुख देने वाली इस पावन कथा को दूसरों के साथ भी जरूर साझा करें।

"बोलिए लक्ष्मी नारायण भगवान की जय!"

"शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्।" 🌸🌼🌹🪻

बहुत समय पहले गोदावरी के पावन तट पर बसी पैठण नगरी में संत एकनाथ महाराज का आश्रम था। उनका घर किसी साधारण गृहस्थ का घर नही...
23/08/2026

बहुत समय पहले गोदावरी के पावन तट पर बसी पैठण नगरी में संत एकनाथ महाराज का आश्रम था। उनका घर किसी साधारण गृहस्थ का घर नहीं, बल्कि करुणा और सेवा का तीर्थ था। वहां आने वाला कोई भी व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं लौटता था। भूखा आता तो भोजन पाता, प्यासा आता तो जल मिलता, दुखी आता तो सांत्वना मिलती और निराश व्यक्ति नई आशा लेकर लौटता।

संत एकनाथ का एक ही विश्वास था कि हर जीव में स्वयं भगवान का वास है, इसलिए किसी की सेवा करना ही ईश्वर की पूजा है। इसी कारण दूर-दूर तक लोग उन्हें संत नहीं, बल्कि भगवान का सच्चा सेवक कहते थे।

एक वर्ष वर्षा ऋतु की एक भयावह रात थी। आकाश में घनघोर बादल गरज रहे थे, बिजली बार-बार धरती को चीरती हुई चमक रही थी और मूसलाधार वर्षा से पूरा गांव डूबता हुआ प्रतीत हो रहा था। ऐसे ही समय आधी रात को उनके घर के द्वार पर धीमी-सी दस्तक हुई।

संत एकनाथ ने द्वार खोला तो सामने लगभग बारह-तेरह वर्ष का एक बालक खड़ा था। उसके वस्त्र पूरी तरह भीगे हुए थे, पैरों में कीचड़ लगी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज और गहरी शांति थी।

संत ने स्नेह से पूछा, "बेटा, कौन हो? इस भयंकर रात में यहां कैसे आ गए?"

बालक ने हाथ जोड़कर कहा, "मेरा इस संसार में कोई नहीं है। मैंने सुना है कि आपके द्वार से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता। यदि अनुमति दें तो मैं यहीं रहकर आपकी सेवा करना चाहता हूं। मुझे धन नहीं चाहिए, सम्मान नहीं चाहिए, केवल सेवा का अवसर चाहिए।"

संत एकनाथ का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने बिना कोई प्रश्न किए उस बालक को भीतर बुला लिया। उसे भोजन कराया, सूखे वस्त्र पहनाए और स्नेह से कहा, "आज से यह घर तुम्हारा भी है।" जब संत ने उसका नाम पूछा तो उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "मेरा नाम श्रीखंड्या है।"

उस दिन से श्रीखंड्या उसी घर का सदस्य बन गया। वह प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाता, गोदावरी से जल लाता, आंगन साफ करता, तुलसी को जल चढ़ाता, रसोई में सहायता करता, अतिथियों की सेवा करता, गायों को चारा खिलाता और रात देर तक घर के छोटे-बड़े सभी कार्य करता रहता। आश्चर्य की बात यह थी कि इतना कठिन परिश्रम करने के बाद भी उसके चेहरे पर कभी थकान दिखाई नहीं देती थी।
उसके होंठों पर हर समय केवल एक ही नाम रहता "विठ्ठल... विठ्ठल... पांडुरंग..."

धीरे-धीरे घर के सभी लोग यह अनुभव करने लगे कि इस बालक में कुछ अलौकिक है।

संत एकनाथ की पत्नी गिरिजाबाई ने कई बार देखा कि जब श्रीखंड्या जल का घड़ा रखता तो उसके आसपास चंदन और तुलसी की दिव्य सुगंध फैल जाती। कई बार आधी रात को उन्होंने देखा कि घर के सारे कार्य बिना किसी प्रयास के पूरे हो चुके हैं, जबकि श्रीखंड्या एक कोने में बैठकर केवल भगवान का नाम जप रहा है।

उन्होंने एकनाथ से कहा, "मुझे लगता है यह कोई साधारण बालक नहीं है। इसके भीतर कोई दिव्य रहस्य छिपा है।" संत एकनाथ शांत स्वर में बोले, "यदि यह वास्तव में भगवान का भेजा हुआ है, तो समय आने पर स्वयं अपना परिचय देगा।"

उधर गांव के कुछ लोग इस बात से अत्यंत ईर्ष्या करने लगे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि संत एकनाथ बिना जाति, कुल या वंश पूछे किसी अनजान बालक को अपने घर में रखे हुए हैं।

वे बार-बार कहते, "एकनाथ ने धर्म की मर्यादा तोड़ दी है। न जाने कौन है यह लड़का। इसका न कुल पता है, न गोत्र। ऐसे व्यक्ति को घर में रखकर इन्होंने अपनी जाति अपवित्र कर ली।"

एक दिन वे सब संत के घर पहुंचे और श्रीखंड्या को अपमानित करते हुए बोले, "यदि तू इतना ही समर्थ है तो आज रात अकेले पूरे खेत में पानी देगा, सारा अनाज पीसेगा और सुबह तक सभी काम पूरे करेगा। तभी मानेंगे कि तू कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।"

श्रीखंड्या ने बिना किसी विरोध के सिर झुका दिया और केवल इतना कहा, "जैसी आपकी आज्ञा।"

उस रात गांव के लोग निश्चिंत होकर सो गए, लेकिन प्रातः जब वे खेत पहुंचे तो उनकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं। पूरा खेत अच्छी तरह सींचा जा चुका था, सारा अनाज पिसा हुआ रखा था और चारों ओर ऐसी सुगंध फैली थी जैसी किसी मंदिर में आरती के बाद आती है। लोग चमत्कार देखकर भी सत्य स्वीकार न कर सके। उनके मन का अहंकार अभी भी समाप्त नहीं हुआ था।

समय बीतता गया। एक-दो वर्ष नहीं, पूरे बारह वर्ष बीत गए। इन बारह वर्षों में श्रीखंड्या ने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने केवल सेवा की, प्रेम दिया और हर परिस्थिति में भगवान विठ्ठल का नाम जपता रहा।
संत एकनाथ का मन भी अब बार-बार यही प्रश्न पूछता था कि आखिर यह बालक है कौन? एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि अब सत्य अवश्य जानेंगे।

एक रात संत एकनाथ की आंख अचानक खुल गई। वे जल पीने के लिए रसोई की ओर गए। जैसे ही उन्होंने भीतर प्रवेश किया, वे वहीं ठिठक गए। उनके सामने खड़ा श्रीखंड्या अब साधारण बालक नहीं था। उसके शरीर से हजारों सूर्यों के समान दिव्य प्रकाश निकल रहा था। अगले ही क्षण उसका स्वरूप बदल गया। सांवला, मनोहर शरीर, कमर पर दोनों हाथ, सिर पर मुकुट, गले में वैजयंती माला और मुख पर करुणा से भरी मधुर मुस्कान।

संत एकनाथ की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वे कांपते हुए बोले, "प्रभु...! क्या आप... स्वयं पांडुरंग हैं?"

भगवान विठ्ठल मुस्कुराए और प्रेम से बोले, "हाँ नाथ, मैं ही हूं। तुम्हारे प्रेम ने मुझे यहां बांध लिया।"

यह सुनते ही संत एकनाथ उनके चरणों में गिर पड़े। वे रोते हुए बोले,
"हे प्रभु! यह मैंने क्या किया? मैंने आपको अपना सेवक समझकर इतने वर्षों तक घर के काम करवाए।
आप जगत के स्वामी होकर मेरे लिए जल भरते रहे, आंगन साफ करते रहे, अतिथियों की सेवा करते रहे और मैं आपको पहचान भी न सका। मुझे क्षमा कर दीजिए।"

भगवान विठ्ठल ने संत को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।
उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, "एकनाथ, जहां सच्चा प्रेम होता है, वहां मैं स्वयं सेवा करने चला आता हूं। जिसने मुझे अपने हृदय में स्थान दिया, उसके लिए कोई कार्य छोटा नहीं होता। तुमने कभी मुझसे धन, वैभव या सिद्धि नहीं मांगी। तुमने केवल मुझे चाहा।

इसलिए मैं तुम्हारे घर आया। भक्त का प्रेम मुझे सबसे अधिक प्रिय है। मैं मंदिरों में अवश्य रहता हूं, लेकिन अपने सच्चे भक्त के घर में और भी अधिक आनंद से निवास करता हूं।"

संत एकनाथ ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, अब मुझे छोड़कर मत जाइए।" भगवान विठ्ठल मुस्कुराकर बोले, "मैं कहीं नहीं जा रहा। मैं तो सदा तुम्हारे हृदय में ही रहूंगा। जब भी कोई भूखे को भोजन कराएगा, दुखी को सहारा देगा, बिना भेदभाव के प्रेम करेगा और सच्चे मन से मेरा नाम लेगा, समझ लेना मैं वहीं उपस्थित हूं।"

इतना कहकर भगवान का दिव्य स्वरूप धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन हो गया। पूरा घर फिर सामान्य दिखाई देने लगा, लेकिन वातावरण में तुलसी और चंदन की दिव्य सुगंध लंबे समय तक बनी रही। संत एकनाथ वहीं बैठे-बैठे भगवान का नाम लेते रहे और उनके नेत्रों से अश्रु बहते रहे।

अगले दिन जब यह समाचार पूरे पैठण में फैला तो वही लोग, जिन्होंने कभी श्रीखंड्या का अपमान किया था, संत एकनाथ के चरणों में गिर पड़े। उन्हें समझ आ गया कि भगवान को धन, वैभव, जाति या पद से नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम और सेवा से पाया जा सकता है। उस दिन से संत एकनाथ का घर केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विठ्ठल की लीला-भूमि माना जाने लगा।

यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि भगवान को पाने का मार्ग कठिन तपस्या या बड़े-बड़े यज्ञ नहीं, बल्कि सरल हृदय, निष्काम सेवा और सच्चा प्रेम है। जिस घर में करुणा रहती है, जहां किसी भूखे को भोजन मिलता है, जहां किसी दुखी को अपनापन मिलता है और जहां हर सांस के साथ भगवान का नाम लिया जाता है, वहां स्वयं प्रभु किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं।

इसलिए आज भी भक्त श्रद्धा से कहते हैं—"विठ्ठल विठ्ठल जय हरि विठ्ठल... पांडुरंग विठ्ठल... भक्त के प्रेम से बंध जाने वाले प्रभु विठ्ठल की जय।"

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सुख और दुःख दोनों ही जीवन के अतिथि हैं…न तो सुख में अहंकार कीजिए,और न ही दुःख में धैर्य खोइए।समय सदैव एक-सा नहीं रहता धै...
22/08/2026

सुख और दुःख दोनों ही जीवन के अतिथि हैं…
न तो सुख में अहंकार कीजिए,
और न ही दुःख में धैर्य खोइए।

समय सदैव एक-सा नहीं रहता
धैर्य हर कठिनाई को छोटा कर देता है
और समभाव मन को स्थिर बनाए रखता है 💙

श्रीकृष्ण सिखाते हैं
जो व्यक्ति हर परिस्थिति में स्वयं को संतुलित रखता है,
वही जीवन के वास्तविक आनंद का अनुभव करता है।

इसलिए परिस्थितियों के नहीं,
अपने मन के स्वामी बनने का प्रयास कीजिए।

🪷 ।। राधे राधे ।। 🪷

22/08/2026

The beauty of krishna

बालखिल्य ऋषि कौन थे और उनका रूप कैसा था?सृष्टि के प्रारंभ में, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि क्रतु का विवाह दक्ष प्रजा...
22/08/2026

बालखिल्य ऋषि कौन थे और उनका रूप कैसा था?

सृष्टि के प्रारंभ में, ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि क्रतु का विवाह दक्ष प्रजापति की पुत्री सन्नति से हुआ था। माता सन्नति के गर्भ से साठ हजार पुत्रों का जन्म हुआ। ये सभी पुत्र ही आगे चलकर 'बालखिल्य ऋषि' कहलाए।

इन ऋषियों की शारीरिक बनावट और जीवनशैली अत्यंत अनोखी थी…इनका शरीर मात्र एक अंगूठे के बराबर था। भले ही इनका कद छोटा था, लेकिन उनकी तपस्या का तेज इतना भयानक था कि वे अपनी दृष्टि मात्र से पूरी सृष्टि को भस्म कर सकते थे।
वे अन्न नहीं खाते थे। पत्तों पर गिरने वाली ओस की बूंदें पीकर और हवा खाकर वे जीवित रहते थे। उन्होंने अपनी सभी इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली थी।

ब्रह्मांड के नियम के अनुसार, ये साठ हजार ऋषि रोजाना भगवान सूर्य के रथ के आगे-आगे, सूर्य देव की तरफ मुख करके उल्टे चलते हैं। वे चलते-चलते सामवेद की ऋचाओं का पाठ करते हैं। ऐसा इसलिए है ताकि सूर्य देव का प्रचंड तेज नियंत्रित रहे और पृथ्वी उनकी गर्मी से झुलस न जाए।

यह घटना सतयुग की है। प्रजापति कश्यप जो देवताओं और असुरों दोनों के पिता हैं, एक महाप्रतापी पुत्र चाहते थे। इस इच्छा को पूरा करने के लिए उन्होंने एक विशाल 'पुत्रकामेष्टि यज्ञ' का आयोजन किया।इस महायज्ञ के लिए सूखी लकड़ियां (समिधा) लाने का काम देवताओं, गंधर्वों और सभी ऋषियों को सौंपा गया। सभी अपनी-अपनी शारीरिक क्षमता के अनुसार लकड़ियों के बड़े-बड़े गट्ठर ला रहे थे।

देवराज इंद्र को अपनी असीम शक्ति पर बहुत घमंड था। वे पलक झपकते ही पहाड़ों जैसी भारी लकड़ियों के गट्ठर उठाकर यज्ञशाला में लाकर पटक रहे थे।तभी रास्ते में इंद्र ने एक अजीब दृश्य देखा।
साठ हजार बालखिल्य ऋषि एक कतार में चले आ रहे थे। उन सब ने मिलकर पलाश के पेड़ की एक छोटी सी सूखी टहनी को अपने कंधों पर उठाया हुआ था। अपने छोटे-छोटे पैरों के कारण उन्हें वह सूखी लकड़ी भी पहाड़ जैसी भारी लग रही थी। वे पूरी ताकत लगाकर "हरि ॐ" का जाप करते हुए आगे बढ़ रहे थे।

तभी रास्ते में एक गाय के पैर के खुर के कारण जमीन में एक छोटा सा गड्ढा बन गया था, जिसमें बारिश का थोड़ा सा पानी भरा हुआ था इसे शास्त्रों में 'गोष्पद' कहा गया है…एक आम इंसान के लिए वह महज एक चम्मच पानी था, लेकिन अंगूठे के आकार के बालखिल्य ऋषियों के लिए वह एक उफनती हुई विशाल नदी जैसा था।

जैसे ही ऋषियों ने उसे पार करने की कोशिश की, वे असंतुलित होकर उस पानी में गिर गए। वे अपनी धोती और जटाओं को बचाते हुए, उस पानी से बाहर निकलने के लिए संघर्ष करने लगे।

ऊपर आकाश से उड़ते हुए देवराज इंद्र ने जब यह नजारा देखा। अपने बल के घमंड में चूर इंद्र अपनी हंसी रोक नहीं पाए। वे जोर-जोर से हंसने लगे और बोले
"अरे! ये कैसे ऋषि हैं, जो एक गाय के पैर के गड्ढे में डूब रहे हैं? ऐसे लोग यज्ञ में क्या योगदान देंगे!"

इंद्र ने न सिर्फ उनका मजाक उड़ाया, बल्कि उन्हें लांघकर यानी उनके ऊपर से पैर बढ़ाकर आगे निकल गए, जो कि ऋषियों का घोर अपमान था।

इस अपमान ने बालखिल्य ऋषियों के भीतर के ब्रह्मतेज की अग्नि को भड़का दिया। वे पानी से बाहर निकले और उनके चेहरे क्रोध से लाल हो गए। उन्होंने कहा

"इंद्र को अपने पद और बल का इतना घमंड है कि वह भूल गया कि तपस्या की शक्ति क्या होती है। हम इसी समय इस इंद्र का अंत करेंगे।"

सभी 60,000 ऋषियों ने तुरंत उसी गड्ढे के जल को हाथ में लिया और मंत्र पढ़ते हुए एक समानांतर यज्ञ शुरू कर दिया।

उन्होंने संकल्प लिया कि "हम अपने जीवन की संपूर्ण तपस्या की आहुति देते हैं। इस यज्ञ से एक ऐसा 'नया इंद्र' पैदा होगा, जो मौजूदा देवराज इंद्र से सौ गुना ज्यादा शक्तिशाली, बुद्धिमान और पराक्रमी होगा। वह इस अहंकारी इंद्र को स्वर्ग के सिंहासन से खींचकर नीचे फेंक देगा और खुद देवताओं का राजा बनेगा।"

ऋषियों के इस संकल्प की गूंज से तीनों लोक कांपने लगे। इंद्र का राजसिंहासन डोल गया और स्वर्ग में हाहाकार मच गया। ऋषियों का वचन कभी खाली नहीं जा सकता था।

घबराए और थर-थर कांपते हुए देवराज इंद्र सीधे अपने पिता महर्षि कश्यप के चरणों में जा गिरे और अपनी जान की भीख मांगने लगे।

कश्यप जी तुरंत बालखिल्य ऋषियों के पास पहुंचे।कश्यप मुनि ने ऋषियों को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर बोले कि
"हे महान तपस्वियों! आपका क्रोध उचित है। इंद्र ने अज्ञानतावश यह पाप किया है। लेकिन यदि ब्रह्मांड में दो इंद्र हो गए, तो ब्रह्मा जी का बनाया नियम टूट जाएगा और पूरी प्रकृति नष्ट हो जाएगी। कृपया कोई बीच का रास्ता निकालें।"

बालखिल्य ऋषियों ने कहा कि "हे महर्षि, हम आपका सम्मान करते हैं। लेकिन ऋषियों का संकल्प कभी झूठा नहीं होता। 'इंद्र' तो पैदा होकर ही रहेगा।"

तब महर्षि कश्यप ने एक अद्भुत समाधान निकाला। उन्होंने कहा कि

“आपकी बात भी सच रहे और सृष्टि भी बची रहे, इसके लिए आप ऐसा वरदान दें कि जो नया शक्तिशाली जीव पैदा हो, वह देवताओं का इंद्र न बनकर 'पक्षियों का इंद्र' बने। इस तरह आपका वचन भी पूरा हो जाएगा और देवराज का पद भी बच जाएगा।"

बालखिल्य ऋषि शांत हुए और उन्होंने कश्यप मुनि की बात मान ली। उन्होंने अपने यज्ञ की पूरी ऊर्जा और 'पक्षियों के राजा' का वरदान महर्षि कश्यप को सौंप दिया।

कश्यप मुनि ने वह दिव्य ऊर्जा अपनी पत्नी विनता को सौंप दी। इसी तपोबल के प्रभाव से विनता के गर्भ से एक विशाल अंडा उत्पन्न हुआ, जिससे आगे चलकर पक्षीराज गरुड़ का जन्म हुआ।

गरुड़ इतने शक्तिशाली थे कि उनके पंखों की फड़फड़ाहट से पहाड़ हिल जाते थे। उन्होंने बाद में अकेले ही स्वर्ग पर आक्रमण करके देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं को हरा दिया था और वहां से अमृत कलश छीन लाए थे।

इस प्रकार बालखिल्य ऋषियों का वह वचन सच साबित हुआ कि नए इंद्र के सामने वर्तमान इंद्र टिक नहीं पाएंगे। बाद में भगवान विष्णु ने गरुड़ की शक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपना वाहन और ध्वज बनाया।

यह कथा हमें सिखाती है कि कभी भी किसी के बाहरी आकार, रूप या कद को देखकर उसकी आंतरिक क्षमता का उपहास नहीं उड़ाना चाहिए। पद और शक्ति का अहंकार बड़े से बड़े राजा को भी मिट्टी में मिला देता है।

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🕉️ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 🙏🙏

जो बीत गयाउस पर विलाप कैसा ?जो है उस पर अंहकार कैसा ? और जो आने वाला है उसका मोह कैसा ?।। कृष्ण वाणी ।।
21/08/2026

जो बीत गया
उस पर विलाप कैसा ?
जो है उस पर अंहकार कैसा ?
और जो आने वाला है
उसका मोह कैसा ?

।। कृष्ण वाणी ।।

बिहार पौराणिक कथाओं का एक केंद्र रहा है। आप जब बिहार के मधुबनी जिले के भवानीपुर कस्बे में प्रवेश करते हैं तो वहाँ आपको द...
21/08/2026

बिहार पौराणिक कथाओं का एक केंद्र रहा है। आप जब बिहार के मधुबनी जिले के भवानीपुर कस्बे में प्रवेश करते हैं तो वहाँ आपको दो सर्वाधिक प्रसिद्ध नाम सुनने को मिलते हैं।

पहला है मैथली भाषा के महान कवि विद्यापति और दूसरा है महादेव का उगना शिवलिंग मंदिर। ये दोनों एक दूसरे से सम्बंधित हैं जिनकी कथा मधुबनी की लोक कथाओं में हमें मिलती है।

लोक कथाओं के अनुसार विद्यापति भगवान् शिव के अनन्य भक्त थे और वे प्रतिदिन प्रातः और सायं भगवान शिव का भजन किया करते थे। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। अपने पति का मन इस प्रकार वैराग्य की ओर झुका देख वे उतनी प्रसन्न नहीं थी।

विद्यापति प्रतिदिन इतने मधुर स्वर में शिव-भजन किया करते थे कि एक बार स्वयं भगवान शंकर को उनके भजन को सुनने की आकांक्षा हुई। इसी कारण उन्होंने एक निर्धन व्यक्ति का वेश बनाया और विद्यापति के घर पहुँचे। वहाँ उन्होंने कहा कि उन्हें वे अपने सेवक के रूप में अपने घर में ही रहने दें।
हालाँकि विद्यापति इससे सहमत नहीं थे किन्तु सुशीला ने ये सोच कर कि वो उनके काम में सहायता करेगा, भगवान् शंकर को अपने घर पर सेवक के रूप में रख लिया।

भगवान् शंकर ने अपना नाम "उगना" बताया। अब तो वे प्रतिदिन विद्यापति का भजन सुनने लगे। वे भजन सुनते समय इतना खो जाते थे कि घर के काम में उनका ध्यान ही नहीं रहता था। इसी कारण सुशीला उगना से चिढ़ने लगी।

एक बार विद्यापति उगना के साथ बाहर निकले। जेठ का महीना था और पूरी भूमि जैसे तवे की तरह तप रही थी। जंगल से गुजरते हुए भीषण गर्मी के कारण विद्यापति अचेत होकर गिर पड़े। उन्होंने उगना से कहा कि प्यास के कारण उनकी मृत्यु हो जाएगी इसीलिए कैसे भी हो उनके पीने के लिए पानी ले आये।

अपने स्वामी की रक्षा के लिए उगना पानी की खोज में गए किन्तु उन्हें तो पता ही था कि यहाँ आस-पास दूर-दूर तक पानी की एक बून्द भी नहीं है। तो अपने भक्त की रक्षा के लिए उगना रुपी भगवान् शंकर ने थोड़ी दूर जाकर अपनी जटा से गंगाजल निकाल कर विद्यापति को दिया। पवित्र गंगाजल पीते ही विद्यापति की चेतना लौटी और उनके शरीर में शक्ति का संचार हुआ।

उन्होंने आश्चर्य से उगना से पूछा कि इस निर्जन वन में उसे गंगाजल कहाँ से प्राप्त हुआ। उगना रुपी भगवान ने बात को बदलने की कोशिश की किन्तु तबतक विद्यापति समझ चुके थे कि ये कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे वहीँ भगवान् शिव के ध्यान को बैठ गए।
अपने भक्त को इस हालत में देख कर अंततः भगवान शंकर अपने रूप में आ गए।

अपने आराध्य को अपने सामने देख कर विद्यापति भाव-विभोर हो गए। भगवान शंकर ने विद्यापति से वरदान माँगने को कहा। इसपर विद्यापति ने जीवन पर्यन्त उन्हें अपने घर पर रहने का वरदान माँगा।

भगवान् ने मुस्कुराते हुए कहा कि वे जीवन भर किसी के पास नहीं रह सकते अतः वे कोई और वरदान माँग ले किन्तु विद्यापति अपने हठ पर अड़े रहे।

ऐसा देख कर भगवान् शंकर ने कहा कि वे उनके घर पर रहेंगे किन्तु जैसे ही विद्यापति उनका रहस्य किसी को बताएँगे, उसी क्षण वे उन्हें छोड़ कर चले जाएँगे। विद्यापति ने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया।

वे दोनों वापस घर आ गए। विद्यापति को तो जैसे पूरा संसार मिल गया। वे और अधिक उगना को लेकर भगवान् के भजन में रम गए। इस कारण उनकी पत्नी सुशीला का असंतोष और बढ़ गया। एक बार शुशीला ने उगना को किसी कार्य के लिए बुलाया किन्तु भगवान शंकर विद्यापति का भजन सुनने में मग्न थे।
अपनी आज्ञा की ऐसी अवहेलना होते देख सुशीला क्रोध से भर गयी। उसने वहीँ रसोई से एक जलती हुई छड़ी उठाई और उगना को पीटना शुरू कर दिया।

जब विद्यापति ने ऐसा देखा तो अनायास ही उनके मुख से निकल गया कि "तुमने ये क्या किया? ये साक्षात् भगवान शंकर हैं।"

विद्यापति का ऐसा कहना था कि अपने वरदान के अनुसार भगवान शंकर वहाँ से अंतर्धान हो गए। अपने स्वामी को इस प्रकार जाता देख विद्यापति पागलों की तरह उन्हें सब जगह खोजने लगे।

अपने भक्त की ऐसी हालत देख कर एक बार फिर भगवान् शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अब मैं तुम्हारे साथ नहीं जा सकता किन्तु तुम्हारे लिए मैं सदा इस स्थान पर शिवलिंग के रूप में रहूँगा।

उनके जाते ही वहाँ एक शिवलिंग प्रकट हुआ जिसे विद्यापति ने "उगना महादेव" की संज्ञा दी। आज भी मधुबनी में देश भर से लोग इस धार्मिक स्थल के दर्शनों को आते हैं।

#भक्ति

कैसे हुआ नारियल का जन्म पौराणिक कथाहिन्दू धर्म में नारियल का विशेष महत्तव है। नारियल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम सं...
20/08/2026

कैसे हुआ नारियल का जन्म पौराणिक कथा

हिन्दू धर्म में नारियल का विशेष महत्तव है। नारियल के बिना कोई भी धार्मिक कार्यक्रम संपन्न नहीं होता है। नारियल से जुडी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है जो जिसके अनुसार नारियल का इस धरती पर अवतरण ऋषि विश्वामित्र द्वारा किया गया था। आज हम आपको नारियल के जन्म से जुडी यही कहानी बता रहे है।

यह कहानी प्राचीन काल के एक राजा सत्यव्रत से जुड़ी है। सत्यव्रत एक प्रतापी राजा थे, जिनका ईश्वर में सम्पूर्ण विश्वास था। उनके पास सब कुछ था लेकिन उनके मन की एक इच्छा थी जिसे वे किसी भी रूप में पूरा करना चाहते थे।

वे चाहते थे की वे किसी भी प्रकार से पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक जा सकें। स्वर्गलोक की सुंदरता उन्हें अपनी ओर आकर्षित करती थी, किंतु वहां कैसे जाना है, यह सत्यव्रत नहीं जानते थे।

एक बार ऋषि विश्वामित्र तपस्या करने के लिए अपने घर से काफी दूर निकल गए थे और लम्बे समय से वापस नहीं आए थे। उनकी अनुपस्थिति में क्षेत्र में सूखा पड़ा गया और उनका परिवार भूखा-प्यासा भटक रहा था। तब राजा सत्यव्रत ने उनके परिवार की सहायता की और उनकी देख-रेख की जिम्मेदारी ली।

जब ऋषि विश्वामित्र वापस लौटे तो उन्हें परिवार वालों ने राजा की अच्छाई बताई। वे राजा से मिलने उनके दरबार पहुंचे और उनका धन्यवाद किया। शुक्रिया के रूप में राजा ने ऋषि विश्वामित्र द्वारा उन्हें एक वर देने के लिए निवेदन किया। ऋषि विश्वामित्र ने भी उन्हें आज्ञा दी।

तब राजा बोले की वो स्वर्गलोक जाना चाहते हैं, तो क्या ऋषि विश्वामित्र अपनी शक्तियों का सहारा लेकर उनके लिए स्वर्ग जाने का मार्ग बना सकते हैं? अपने परिवार की सहायता का उपकार मानते हुए ऋषि विश्वामित्र ने जल्द ही एक ऐसा मार्ग तैयार किया जो सीधा स्वर्गलोक को जाता था।

राजा सत्यव्रत खुश हो गए और उस मार्ग पर चलते हुए जैसे ही स्वर्गलोक के पास पहुंचे ही थे, कि स्वर्गलोक के देवता इन्द्र ने उन्हें नीचे की ओर धकेल दिया। धरती पर गिरते ही राजा ऋषि विश्वामित्र के पास पहुंचे और रोते हुए सारी घटना का वर्णन करने लगे।

देवताओं के इस प्रकार के व्यवहार से ऋषि विश्वामित्र भी क्रोधित हो गए, परन्तु अंत में स्वर्गलोक के देवताओं से वार्तालाप करके आपसी सहमति से एक हल निकाला गया। इसके मुताबिक राजा सत्यव्रत के लिए अलग से एक स्वर्गलोक का निर्माण करने का आदेश दिया गया

ये नया स्वर्गलोक पृथ्वी एवं असली स्वर्गलोक के मध्य में स्थित होगा, ताकि ना ही राजा को कोई परेशानी हो और ना ही देवी-देवताओं को किसी कठिनाई का सामना करना पड़े। राजा सत्यव्रत भी इस सुझाव से बेहद प्रसन्न हुए, किन्तु ना जाने ऋषि विश्वामित्र को एक चिंता ने घेरा हुआ था।

उन्हें यह बात सत्ता रही थी कि धरती और स्वर्गलोक के बीच होने के कारण कहीं हवा के ज़ोर से यह नया स्वर्गलोक डगमगा ना जाए। यदि ऐसा हुआ तो राजा फिर से धरती पर आ गिरेंगे। इसका हल निकालते हुए ऋषि विश्वामित्र ने नए स्वर्गलोक के ठीक नीचे एक खम्बे का निर्माण किया, जिसने उसे सहारा दिया।

माना जाता है की यही खम्बा समय आने पर एक पेड़ के मोटे तने के रूप में बदल गया और राजा सत्यव्रत का सिर एक फल बन गया। इसी पेड़ के तने को नारियल का पेड़ और राजा के सिर को नारियल कहा जाने लगा। इसीलिए आज के समय में भी नारियल का पेड़ काफी ऊंचाई पर लगता है।

इस कथा के अनुसार सत्यव्रत को समय आने पर एक ऐसे व्यक्ति की उपाधि दी गई जो ना ही इधर का है और ना ही उधर का। यानी कि एक ऐसा इंसान जो दो धुरों के बीच में लटका हुआ है।

जय श्री कृष्ण

हनुमान जी कृपा आप सब पर सदैव बनी रहे..🙏🙏बोलो जय श्रीराम 🙏🙏🙏
19/08/2026

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आपने सत्यवान-सावित्री की कथा तो कई बार सुनी होगी। कैसे पतिव्रता सावित्री अपने दृढ़ संकल्प से यमराज के पीछे-पीछे चली गईं ...
19/08/2026

आपने सत्यवान-सावित्री की कथा तो कई बार सुनी होगी। कैसे पतिव्रता सावित्री अपने दृढ़ संकल्प से यमराज के पीछे-पीछे चली गईं और अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले आईं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाभारत के आदिपर्व में एक ऐसी ही अद्भुत कथा एक पुरुष की भी है?
यह कहानी है ऋषि रूरू की, जिन्होंने अपनी होने वाली पत्नी प्रमद्वारा को यमराज के चंगुल से छुड़ाने के लिए अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा बलिदान दे दिया था।

आइए जानते हैं निश्छल प्रेम, त्याग और प्रतिशोध की यह अनसुनी गाथा।

यह बात महाभारत के आदिपर्व की है। महर्षि भृगु के वंशज और च्यवन ऋषि के पौत्र रूरू अत्यंत तेजस्वी और तपस्वी युवक थे। एक दिन वन में विचरते समय उनकी नजर प्रमद्वारा पर पड़ी। प्रमद्वारा कोई साधारण स्त्री नहीं थीं; वे स्वर्ग की अप्सरा मेनका और गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री थीं, जिनका लालन-पालन महर्षि स्थूलकेश ने अपनी बेटी की तरह किया था।

प्रमद्वारा के अलौकिक सौंदर्य और सरल स्वभाव को देखकर रूरू पहली ही नजर में अपना दिल हार बैठे। प्रमद्वारा के मन में भी रूरू के लिए प्रेम अंकुरित हुआ। दोनों के परिवारों ने प्रसन्नतापूर्वक उनके विवाह की तिथि उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में तय कर दी। चारों तरफ खुशियों का माहौल था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

विवाह में अभी कुछ ही दिन शेष थे। प्रमद्वारा अपनी सखियों के साथ आश्रम के पास वन में खेल रही थीं। दौड़ते-दौड़ते अनजाने में उनका पैर झाड़ियों में सोए हुए एक अत्यंत विषैले सर्प पर पड़ गया। क्रोधित सर्प ने तुरंत प्रमद्वारा को डस लिया।
विष इतनी तेजी से फैला कि देखते ही देखते प्रमद्वारा के प्राण पखेरू उड़ गए। जहाँ कुछ दिन बाद शहनाइयां गूंजने वाली थीं, वहाँ चीख-पुकार मच गई। सुंदर प्रमद्वारा धरती पर बेजान पड़ी थीं।

जब रूरू को यह समाचार मिला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वे अपनी होने वाली पत्नी के शव से लिपटकर फूट-फूटकर रोने लगे। उनका दुःख इतना गहरा था कि वे वन के एकांत में चले गए और रोते हुए भगवान को पुकारने लगे।
उन्होंने रोते हुए कहा— "यदि मैंने जीवन में सच्चे मन से तपस्या की है, गुरुओं की सेवा की है और मेरा प्रेम सच्चा है, तो मेरी प्रियतमा जीवित हो जाए।"
रूरू के इस सच्चे प्रेम और तपोबल के प्रभाव से देवताओं के दूत वहाँ प्रकट हुए। देवदूत ने कहा कि
हे रूरू! तुम्हारा विलाप व्यर्थ है। प्रमद्वारा की इस संसार में आयु समाप्त हो चुकी थी, इसलिए प्रकृति के नियम के अनुसार वह वापस नहीं आ सकती।"

रूरू हार मानने को तैयार नहीं थे। तब देवदूत ने यमराज के न्याय का एक गुप्त मार्ग बताया। देवदूत ने कहा कि
"एक ही शर्त पर प्रमद्वारा जीवित हो सकती है। यदि तुम स्वेच्छा से अपने जीवन की आधी आयु प्रमद्वारा को दान कर दो, तो यमराज उसे वापस भेज देंगे।"

आमतौर पर इंसान अपनी जिंदगी का एक दिन भी किसी को नहीं देना चाहता। लेकिन रूरू ने बिना एक पल गंवाए, बिना किसी हिचकिचाहट के कहा कि
"मुझे अपनी आधी उम्र की कोई परवाह नहीं। मेरी आधी आयु प्रमद्वारा को मिल जाए, बस वह जीवित हो उठे।"

यमराज ने रूरू के इस महान और निश्छल बलिदान को स्वीकार किया। रूरू की आधी उम्र पाते ही प्रमद्वारा ऐसे उठ बैठी जैसे गहरी नींद से जागी हो। इसके बाद दोनों का विवाह अत्यंत धूमधाम से संपन्न हुआ।

इस घटना ने प्रमद्वारा को तो जीवन दे दिया, लेकिन रूरू के दिल में सर्पों के प्रति नफरत का अंगारा भड़का दिया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि
"जिस सर्प जाति ने मेरी पत्नी को मुझसे छीना था, मैं इस धरती से उनका विनाश कर दूंगा।"

रूरू हाथ में डंडा लेकर जहाँ भी सांप देखते, उसे मार डालते। एक दिन उनकी मुलाकात डुंडुभ नाम के एक सीधे-साधे, बिना विष वाले सांप से हुई। जैसे ही रूरू उसे मारने बढ़े, वह सांप मनुष्यों की भाषा में बोल उठा
"हे ऋषिकुमार! मैंने आपका क्या बिगाड़ा है? सभी सांप एक जैसे नहीं होते। ब्राह्मण का धर्म तो रक्षा करना और क्षमा करना है, फिर आप इस प्रतिशोध की आग में क्यों जल रहे हैं?"

रुरु ने पूछा कि “तुम कौन हो?”
तब वो सर्प बोला कि मैं ऋषि सहस्रपात हूँ।
एक बार मैंने अपने मित्र को मज़ाक में नकली साँप दिखाया था और उसने क्रोध में मुझे श्राप दे दिया…
“जैसे तुमने मुझे नकली साँप से डराया, वैसे ही तुम विषहीन सर्प बनोगे।लेकिन उसने यह भी कहा था कि जब रुरु मुझे देखेगा, तब यह श्राप समाप्त होगा।”

अब श्राप खत्म हुआ,
ऋषि सहस्रपात अपने असली रूप में लौट आए।

उन्होंने रूरू को समझाया कि क्रोध और प्रतिशोध अंततः खुद को ही नष्ट करते हैं…हर जाति, हर जीव का विनाश अधर्म है। क्रोध में न्याय नहीं होता। सच्चा ब्राह्मण क्षमा में बल देखता है, विनाश में नहीं।

ऋषि के ज्ञान से रूरू की आंखें खुल गईं। उन्होंने सर्पों को मारने की अपनी प्रतिज्ञा वापस ले ली और हमेशा के लिए अहिंसा का मार्ग अपना लिया।

जहाँ सत्यवान के लिए सावित्री यमराज से लड़ीं, वहीं प्रमद्वारा के लिए रूरू ने अपनी खुद की जिंदगी आधी कर दी।

क्या आपने इससे पहले रूरू और प्रमद्वारा की यह अद्भुत प्रेम कहानी सुनी थी?

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