23/08/2026
बहुत समय पहले गोदावरी के पावन तट पर बसी पैठण नगरी में संत एकनाथ महाराज का आश्रम था। उनका घर किसी साधारण गृहस्थ का घर नहीं, बल्कि करुणा और सेवा का तीर्थ था। वहां आने वाला कोई भी व्यक्ति कभी खाली हाथ नहीं लौटता था। भूखा आता तो भोजन पाता, प्यासा आता तो जल मिलता, दुखी आता तो सांत्वना मिलती और निराश व्यक्ति नई आशा लेकर लौटता।
संत एकनाथ का एक ही विश्वास था कि हर जीव में स्वयं भगवान का वास है, इसलिए किसी की सेवा करना ही ईश्वर की पूजा है। इसी कारण दूर-दूर तक लोग उन्हें संत नहीं, बल्कि भगवान का सच्चा सेवक कहते थे।
एक वर्ष वर्षा ऋतु की एक भयावह रात थी। आकाश में घनघोर बादल गरज रहे थे, बिजली बार-बार धरती को चीरती हुई चमक रही थी और मूसलाधार वर्षा से पूरा गांव डूबता हुआ प्रतीत हो रहा था। ऐसे ही समय आधी रात को उनके घर के द्वार पर धीमी-सी दस्तक हुई।
संत एकनाथ ने द्वार खोला तो सामने लगभग बारह-तेरह वर्ष का एक बालक खड़ा था। उसके वस्त्र पूरी तरह भीगे हुए थे, पैरों में कीचड़ लगी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक अद्भुत तेज और गहरी शांति थी।
संत ने स्नेह से पूछा, "बेटा, कौन हो? इस भयंकर रात में यहां कैसे आ गए?"
बालक ने हाथ जोड़कर कहा, "मेरा इस संसार में कोई नहीं है। मैंने सुना है कि आपके द्वार से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता। यदि अनुमति दें तो मैं यहीं रहकर आपकी सेवा करना चाहता हूं। मुझे धन नहीं चाहिए, सम्मान नहीं चाहिए, केवल सेवा का अवसर चाहिए।"
संत एकनाथ का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने बिना कोई प्रश्न किए उस बालक को भीतर बुला लिया। उसे भोजन कराया, सूखे वस्त्र पहनाए और स्नेह से कहा, "आज से यह घर तुम्हारा भी है।" जब संत ने उसका नाम पूछा तो उसने मुस्कुराकर उत्तर दिया, "मेरा नाम श्रीखंड्या है।"
उस दिन से श्रीखंड्या उसी घर का सदस्य बन गया। वह प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठ जाता, गोदावरी से जल लाता, आंगन साफ करता, तुलसी को जल चढ़ाता, रसोई में सहायता करता, अतिथियों की सेवा करता, गायों को चारा खिलाता और रात देर तक घर के छोटे-बड़े सभी कार्य करता रहता। आश्चर्य की बात यह थी कि इतना कठिन परिश्रम करने के बाद भी उसके चेहरे पर कभी थकान दिखाई नहीं देती थी।
उसके होंठों पर हर समय केवल एक ही नाम रहता "विठ्ठल... विठ्ठल... पांडुरंग..."
धीरे-धीरे घर के सभी लोग यह अनुभव करने लगे कि इस बालक में कुछ अलौकिक है।
संत एकनाथ की पत्नी गिरिजाबाई ने कई बार देखा कि जब श्रीखंड्या जल का घड़ा रखता तो उसके आसपास चंदन और तुलसी की दिव्य सुगंध फैल जाती। कई बार आधी रात को उन्होंने देखा कि घर के सारे कार्य बिना किसी प्रयास के पूरे हो चुके हैं, जबकि श्रीखंड्या एक कोने में बैठकर केवल भगवान का नाम जप रहा है।
उन्होंने एकनाथ से कहा, "मुझे लगता है यह कोई साधारण बालक नहीं है। इसके भीतर कोई दिव्य रहस्य छिपा है।" संत एकनाथ शांत स्वर में बोले, "यदि यह वास्तव में भगवान का भेजा हुआ है, तो समय आने पर स्वयं अपना परिचय देगा।"
उधर गांव के कुछ लोग इस बात से अत्यंत ईर्ष्या करने लगे। उन्हें यह स्वीकार नहीं था कि संत एकनाथ बिना जाति, कुल या वंश पूछे किसी अनजान बालक को अपने घर में रखे हुए हैं।
वे बार-बार कहते, "एकनाथ ने धर्म की मर्यादा तोड़ दी है। न जाने कौन है यह लड़का। इसका न कुल पता है, न गोत्र। ऐसे व्यक्ति को घर में रखकर इन्होंने अपनी जाति अपवित्र कर ली।"
एक दिन वे सब संत के घर पहुंचे और श्रीखंड्या को अपमानित करते हुए बोले, "यदि तू इतना ही समर्थ है तो आज रात अकेले पूरे खेत में पानी देगा, सारा अनाज पीसेगा और सुबह तक सभी काम पूरे करेगा। तभी मानेंगे कि तू कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।"
श्रीखंड्या ने बिना किसी विरोध के सिर झुका दिया और केवल इतना कहा, "जैसी आपकी आज्ञा।"
उस रात गांव के लोग निश्चिंत होकर सो गए, लेकिन प्रातः जब वे खेत पहुंचे तो उनकी आंखें आश्चर्य से फैल गईं। पूरा खेत अच्छी तरह सींचा जा चुका था, सारा अनाज पिसा हुआ रखा था और चारों ओर ऐसी सुगंध फैली थी जैसी किसी मंदिर में आरती के बाद आती है। लोग चमत्कार देखकर भी सत्य स्वीकार न कर सके। उनके मन का अहंकार अभी भी समाप्त नहीं हुआ था।
समय बीतता गया। एक-दो वर्ष नहीं, पूरे बारह वर्ष बीत गए। इन बारह वर्षों में श्रीखंड्या ने कभी अपने लिए कुछ नहीं मांगा। उसने केवल सेवा की, प्रेम दिया और हर परिस्थिति में भगवान विठ्ठल का नाम जपता रहा।
संत एकनाथ का मन भी अब बार-बार यही प्रश्न पूछता था कि आखिर यह बालक है कौन? एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि अब सत्य अवश्य जानेंगे।
एक रात संत एकनाथ की आंख अचानक खुल गई। वे जल पीने के लिए रसोई की ओर गए। जैसे ही उन्होंने भीतर प्रवेश किया, वे वहीं ठिठक गए। उनके सामने खड़ा श्रीखंड्या अब साधारण बालक नहीं था। उसके शरीर से हजारों सूर्यों के समान दिव्य प्रकाश निकल रहा था। अगले ही क्षण उसका स्वरूप बदल गया। सांवला, मनोहर शरीर, कमर पर दोनों हाथ, सिर पर मुकुट, गले में वैजयंती माला और मुख पर करुणा से भरी मधुर मुस्कान।
संत एकनाथ की आंखों से अश्रुधारा बह निकली। वे कांपते हुए बोले, "प्रभु...! क्या आप... स्वयं पांडुरंग हैं?"
भगवान विठ्ठल मुस्कुराए और प्रेम से बोले, "हाँ नाथ, मैं ही हूं। तुम्हारे प्रेम ने मुझे यहां बांध लिया।"
यह सुनते ही संत एकनाथ उनके चरणों में गिर पड़े। वे रोते हुए बोले,
"हे प्रभु! यह मैंने क्या किया? मैंने आपको अपना सेवक समझकर इतने वर्षों तक घर के काम करवाए।
आप जगत के स्वामी होकर मेरे लिए जल भरते रहे, आंगन साफ करते रहे, अतिथियों की सेवा करते रहे और मैं आपको पहचान भी न सका। मुझे क्षमा कर दीजिए।"
भगवान विठ्ठल ने संत को उठाकर अपने हृदय से लगा लिया।
उन्होंने स्नेहपूर्वक कहा, "एकनाथ, जहां सच्चा प्रेम होता है, वहां मैं स्वयं सेवा करने चला आता हूं। जिसने मुझे अपने हृदय में स्थान दिया, उसके लिए कोई कार्य छोटा नहीं होता। तुमने कभी मुझसे धन, वैभव या सिद्धि नहीं मांगी। तुमने केवल मुझे चाहा।
इसलिए मैं तुम्हारे घर आया। भक्त का प्रेम मुझे सबसे अधिक प्रिय है। मैं मंदिरों में अवश्य रहता हूं, लेकिन अपने सच्चे भक्त के घर में और भी अधिक आनंद से निवास करता हूं।"
संत एकनाथ ने हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, अब मुझे छोड़कर मत जाइए।" भगवान विठ्ठल मुस्कुराकर बोले, "मैं कहीं नहीं जा रहा। मैं तो सदा तुम्हारे हृदय में ही रहूंगा। जब भी कोई भूखे को भोजन कराएगा, दुखी को सहारा देगा, बिना भेदभाव के प्रेम करेगा और सच्चे मन से मेरा नाम लेगा, समझ लेना मैं वहीं उपस्थित हूं।"
इतना कहकर भगवान का दिव्य स्वरूप धीरे-धीरे प्रकाश में विलीन हो गया। पूरा घर फिर सामान्य दिखाई देने लगा, लेकिन वातावरण में तुलसी और चंदन की दिव्य सुगंध लंबे समय तक बनी रही। संत एकनाथ वहीं बैठे-बैठे भगवान का नाम लेते रहे और उनके नेत्रों से अश्रु बहते रहे।
अगले दिन जब यह समाचार पूरे पैठण में फैला तो वही लोग, जिन्होंने कभी श्रीखंड्या का अपमान किया था, संत एकनाथ के चरणों में गिर पड़े। उन्हें समझ आ गया कि भगवान को धन, वैभव, जाति या पद से नहीं, बल्कि निष्कपट प्रेम और सेवा से पाया जा सकता है। उस दिन से संत एकनाथ का घर केवल एक आश्रम नहीं, बल्कि स्वयं भगवान विठ्ठल की लीला-भूमि माना जाने लगा।
यह दिव्य कथा हमें सिखाती है कि भगवान को पाने का मार्ग कठिन तपस्या या बड़े-बड़े यज्ञ नहीं, बल्कि सरल हृदय, निष्काम सेवा और सच्चा प्रेम है। जिस घर में करुणा रहती है, जहां किसी भूखे को भोजन मिलता है, जहां किसी दुखी को अपनापन मिलता है और जहां हर सांस के साथ भगवान का नाम लिया जाता है, वहां स्वयं प्रभु किसी न किसी रूप में अवश्य आते हैं।
इसलिए आज भी भक्त श्रद्धा से कहते हैं—"विठ्ठल विठ्ठल जय हरि विठ्ठल... पांडुरंग विठ्ठल... भक्त के प्रेम से बंध जाने वाले प्रभु विठ्ठल की जय।"
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