Bhuvik Sagar - Uvi

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27/08/2026

दुनिया जीतने वाले लोग
अक्सर
अपने ही घर से हार जाते हैं।



22/08/2026

यह समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है, जहाँ इंसान का मूल्य उसके स्वभाव या आचरण से नहीं, बल्कि उसकी उपयोगिता से तय किया जाता है। जो अधिक देता है, उसके दोष भी गुण बन जाते हैं; और जो कम देता है, उसकी अच्छाई भी अक्सर अनदेखी रह जाती है।

"कितनी भी सींग मारने वाली भैंस हो,
अगर दूध सबसे ज़्यादा देती है,
तो उसे पुचकार-पुचकार कर
उसकी उत्तम सेवा की जाती है।

कम दूध देने वाली
सीधी-सादी भैंसें
बस मुँह तकती रह जाती हैं।

क्योंकि दुनिया को
तुम्हारा स्वभाव नहीं,
तुम्हारा आचरण नहीं...
दिखाई देती है केवल
तुम्हारी उपयोगिता।"



22/08/2026

जब रिश्तों से बड़ा स्वार्थ हो जाए, तो सही और गलत का फैसला नैतिकता से नहीं, अपनी सुविधा के हिसाब से होने लगता है। ऐसे परिवार में रिश्ते रहते तो हैं, लेकिन उनका अर्थ धीरे-धीरे बदल जाता है।

"जब परिवार में स्वार्थ
रिश्तों और नैतिकता से ऊपर हो जाए,
तब परिवार का चरित्र नहीं,
सुविधा तय करती है
कि कौन सही है
और कौन गलत।"



Amit Saagar - सागराज़
22/08/2026

Amit Saagar - सागराज़

माँ अपने स्नेह से जीवन को महसूस करना सिखाती है,
पिता अपने विश्वास से जीवन को संभालना।

दोनों की भूमिकाएँ अलग हो सकती हैं,
लेकिन जीवन में दोनों का स्थान
कभी कम नहीं होता।

क्योंकि माँ सिर्फ़ ममता नहीं,
और पिता सिर्फ़ विश्वास नहीं—
दोनों मिलकर
जीवन को पूरा करते हैं।

"माँ जीवन की ममता है,
पिता जीवन का विश्वास।"



09/08/2026

अमीरी के नीचे गुलामी पलती है,
मुझको गुरबत के रहीस रास आते हैं।






02/08/2026

"जब सच दिखाई दे रहा हो, तब 'ऐसा इनका आरोप है' कहना पत्रकारिता नहीं, जिम्मेदारी से बचना है।"

चौथा स्तंभ

पत्रकार...

कितना छोटा-सा शब्द,
लेकिन लोकतंत्र का
चौथा स्तंभ कहलाता है।

फिर जब किसी खबर के बीच
बार-बार सुनाई देता है—

"ऐसा इनका आरोप है..."
"ऐसा इनका मानना है..."

जबकि सच
उनकी अपनी आँखों के सामने
घटित हो रहा होता है,

तब विश्वास नहीं,
यक़ीन हो जाता है
कि हाथ में माइक लिए
हर व्यक्ति पत्रकार नहीं होता।

कई बार
वह सिर्फ़
किसी मालिक,
किसी कंपनी,
या किसी सत्ता के हितों का
वेतनभोगी प्रतिनिधि भर होता है।

जहाँ सच नहीं,
मालिक की इच्छा चलती है।

जहाँ सवाल नहीं,
स्क्रिप्ट पढ़ी जाती है।

जहाँ जनता की आवाज़ नहीं,
जनता से वही कहलवाया जाता है
जो पहले से तय होता है।

ऐसे में
चौथा स्तंभ नहीं,
सिर्फ़ एक नौकरी दिखाई देती है।

सोचता हूँ...
आख़िर कितने स्तंभों में
दीमक लग चुकी है?

अब जनता को ही जागना होगा।

क्योंकि
सफ़ाई
घर के भीतर की हो
या व्यवस्था के बाहर की,

यदि समय पर न की जाए,
तो बदबू आना
लाज़िमी है।

✍️



















02/08/2026

...............
जो था, उसकी क़द्र नहीं की...
जो नहीं था, उसके पीछे भागते रहे।
और जब समझ आया,
तब तक जो था, वो भी नहीं रहा।

❤️ अगर ये पंक्तियाँ आपके दिल तक पहुँची हों, तो इन्हें शेयर करें। शायद कोई आज अपने पास मौजूद अनमोल चीज़ की क़द्र करना सीख जाए।
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02/08/2026

❤️ अगर ये पंक्तियाँ आपके दिल तक पहुँची हों, तो अपनी राय दें और आगे भी शेयर करें।

"मरा हुआ ज़मीर"

मरा हुआ ज़मीर
सिर्फ़ जी-हुज़ूरी करना जानता है।

वह यह भूल जाता है कि
अन्याय के सामने झुका हुआ सिर
कभी सुरक्षित नहीं रहता।

आज जो चुप्पी
किसी और के हिस्से का अँधेरा लिख रही है,

कल वही चुप्पी
उसके अपने घर का उजाला भी निगल सकती है।

समय किसी का पक्ष नहीं लेता…

वह हर समझौते,
हर मौन
और हर मृत ज़मीर का हिसाब
एक दिन अवश्य लिखता है।

✍️

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