07/06/2026
नियम पहले भी थे, नीयत आज भी गायब है!
बेहद दुखद। दिल दहल जाता है ये पढ़कर...
अस्पताल के बेड पर लेटे उस 75 साल के बूढ़े पिता, राधेश्याम अग्रवाल पर क्या बीत रही होगी? यह सवाल अंदर तक झकझोर देता है।
जरा आंखें बंद कीजिए और सोचिए... पिता अस्पताल में भर्ती हैं। पूरा परिवार—बेटा, बहू, पत्नी, पोती—उनका हाल पूछने, उनका संबल बनने दिल्ली आते हैं। वे एक होटल में रुकते हैं। सुबह एक भयानक आग लगती है, और हंसता-खेलता बेटा पूरे परिवार समेत इस दुनिया से चला जाता है... और वह बूढ़ा बाप अस्पताल के बेड पर अकेला रह जाता है।
अब उस लाचार पिता के साथ क्या होगा?
वो अभी ICU में हैं उन्हें इस तबाही की खबर दी गई या नहीं, पता नहीं। इस उम्र में यह सदमा अपने आप में जानलेवा है। शरीर शायद दावों और इलाज से लड़ भी रहा होगा, पर मन? मन तो उसी आग में जलकर खाक हो चुका है।
रूह कंपा देने वाली कानूनी औपचारिकताएं: जब पुलिस बयान लेने आएगी और वो कांपती आवाज में कहेंगे—"हां, मेरा बेटा मुझसे मिलने आया था..."—यह वाक्य बोलते हुए एक पिता के दिल पर क्या बीतेगी?
जिस उम्र में बेटे के मजबूत कंधे का सहारा चाहिए था, अब उस बूढ़े बाप को अपने पूरे परिवार की अर्थियों का बोझ उठाना है। एक ही झटके में पूरी पीढ़ी खत्म! वह बाप अब किसके लिए और क्यों जिएगा?
"हादसे के बाद सख्त नियम आएंगे" — यही हमारी सबसे बड़ी बीमारी है!
सालों से हर बड़े हादसे का यही एक तय, घिसा-पिटा पैटर्न बन चुका है:
सूरत कोचिंग आग (22 बच्चे मरे) ➡️ "कोचिंग के नियम सख्त होंगे!"
राजकोट गेम जोन (27 लोग जले) ➡️ "गेम जोन के नियम सख्त होंगे!"
दिल्ली होटल आग (21 लोग मरे) ➡️ "होटल के नियम सख्त होंगे!"
हर 6 महीने में मासूमों की लाशें गिरती हैं, तब जाकर हमारा प्रशासन गहरी नींद से जागता है। यह Authority (धौंस) दिखाना है, साहब, Leadership (नेतृत्व) नहीं।
असली समस्या "नियम" नहीं, हमारी "नियत" है!
नियमों की किताबें पहले से ही लाइब्रेरी में धूल फांक रही हैं, कमी है तो बस उन्हें जमीन पर लागू करने की नीयत की:
होटल मालिक को सब पता था, उसे बखूबी मालूम था कि उसके पास Fire NOC नहीं है, पूरी बिल्डिंग में केवल एक ही संकरी सीढ़ी है, और खिड़कियों पर लोहे की ग्रिल लगी है। फिर भी उसने कमरे बेचे। क्यों? क्योंकि उसे कानून का कोई डर नहीं था, उसकी आंखों पर पैसे का लालच हावी था।
प्रशासन को सब पता था; सबको मालूम है कि हमारे शहरों की तंग गलियों में कितने गेस्ट हाउस और कमर्शियल इमारतें अवैध रूप से मौत का कुआं बनी बैठी हैं। फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। क्यों? क्योंकि या तो ऊपर बैठे आकाओं का दबाव था, या फिर "महीने की बंधी-बंधाई रिश्वत" ने सिस्टम की आंखें बंद कर दी थीं।
हम सबको पता है, और सबसे कड़वा सच यह है कि यह फिर होगा। आज से 6 महीने बाद फिर कोई शहर ऐसी ही दर्दनाक सुर्खियों से लाल होगा। क्यों? क्योंकि हम हादसे के तुरंत बाद दो दिन मोमबत्तियां जलाते हैं, सोशल मीडिया पर गुस्सा निकालते हैं, और फिर बहरे-अंधे बन जाते हैं।
याद रखिए, जब तक "पकड़े जाने का डर" > "पैसे का लालच" नहीं होगा, तब तक जमीन पर एक इंच भी कुछ नहीं बदलेगा।
तो अब क्या? सिर्फ शोक संदेश लिखने से क्या होगा?
अगर वाकई इस सड़े हुए सिस्टम में थोड़ा भी बदलाव चाहिए, तो शुरुआत हमें खुद से करनी होगी:
👉 अपने लिए स्टैंड लें अगली बार जब भी कोई होटल बुक करें या किसी मॉल-बिल्डिंग में जाएं, तो सबसे पहले Fire Exit और खिड़कियों का रास्ता देखें। "चलो, एडजस्ट कर लेते हैं" वाला यह घातक रवैया आज ही छोड़ें।
👉 अपने काम में ईमानदारी लाएं यदि आप किसी भी बिजनेस, कंस्ट्रक्शन या कंसल्टेंसी में हैं, तो अपने क्लाइंट्स से साफ कहें—"कम्प्लायंस या चालान का डर बड़ा नहीं है, किसी की लाश का डर बड़ा होना चाहिए।" चंद सिक्के बचाने के लिए किसी की जिंदगी दांव पर मत लगाइए।
👉 सिस्टम से जवाबदेही मांगें; हमें कागजों पर सख्त नियम नहीं, जमीन पर सख्त नीयत चाहिए। जो अफसर टेबल के नीचे से रिश्वत लेकर बिना जांच के सेफ्टी NOC साइन करता है, उसे सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि "सामूहिक हत्या का सह-आरोपी" बनाकर जेल भेजा जाए।
अगर हमें बहरे मेंढक बनकर ही कुएं में रहना है, और इस "चलता है" वाले एटीट्यूड की आदत डालनी है, तो सहते रहिए...
लेकिन एक बात हमेशा याद रखिएगा, अगर आज हमने मिलकर आवाज़ नहीं उठाई, तो अगला नंबर खुदा न खास्ता हमारा या हमारे किसी अपने का भी हो सकता है। 🙏
इस आवाज़ को सिर्फ अपने तक मत रखिए। इसे शेयर कीजिए ताकि यह सिस्टम के उन कानों तक पहुंचे जो बहरे हो चुके हैं।