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More about in India बेहतरीन लोग इत्तेफाक से मिलते है
और इत्तेफाक हर किसी की जिंदगी में नहीं होते

07/06/2026

फैजल खान की असलियत उसके अपनों की जुबानी

07/06/2026

🚨 बड़ी खबर पटना के चर्चित 'खान सर' (Khan Sir) पर चौतरफा संकट! फायरिंग मामले में गंभीर धाराएं, अब सगे चाचा ने खोला मोर्चा—कहा, "डिग्री फर्जी है, व्यवहार दबंगई वाला"

पटना के प्रसिद्ध यूट्यूबर और 'खान ग्लोबल स्टडीज' के संस्थापक खान सर (फैसल खान) इन दिनों कानूनी और पारिवारिक विवादों के भंवर में बुरी तरह फंस गए हैं। एक तरफ जहां उन पर दर्ज आपराधिक मामलों को लेकर उनकी कोचिंग इंस्टीट्यूट सील होने की कगार पर है, वहीं दूसरी तरफ उनके अपने ही रिश्तेदारों ने उनके खिलाफ गंभीर आरोप लगाकर सनसनी फैला दी है।

यहाँ जानिए इस पूरे मामले की विस्तृत और तथ्यात्मक रिपोर्ट:

सगे चाचा ने खोला मोर्चा, "डिग्री फर्जी, बोलने का खाता है"
उत्तर प्रदेश के देवरिया में रहने वाले खान सर के सगे चाचा निसार अहमद ने उनके खिलाफ बेहद तीखे और चौंकाने वाले बयान दिए हैं। निसार अहमद का दावा है कि

"खान के पास कोई खास शैक्षणिक योग्यता नहीं है। उसकी सारी डिग्रियां फर्जी हैं।"

"वह सिर्फ बोलने में माहिर है और अपनी इसी कला (बोली) के दम पर अपनी आजीविका चला रहा है, असल में उसे कुछ नहीं आता।"

चाचा ने खान सर के व्यवहार पर भी सवाल उठाते हुए उसे 'दबंगई वाला' और अड़ियल बताया है।

'शिक्षा माफिया' का आरोप: इससे पहले खान सर के एक और चाचा मो. इमरान ने भी मीडिया के सामने आकर उन्हें 'शिक्षा माफिया' करार दिया था और आरोप लगाया था कि वे ऑनलाइन क्लासेस के जरिए देश भर के लाखों छात्रों को धोखे में रख रहे हैं।

कोचिंग सील होने का खतरा और फायरिंग मामला
पटना में हुए एक कथित फायरिंग मामले के बाद खान सर की मुश्किलें पहले से ही बढ़ी हुई थीं। पुलिस प्रशासन इस मामले में बेहद सख्त रुख अपना रहा है और कयास लगाए जा रहे हैं कि नियमों के उल्लंघन और आपराधिक संलिप्तता के चलते उनके 'खान ग्लोबल स्टडीज' कोचिंग इंस्टीट्यूट को सील किया जा सकता है।

कितनी गंभीर हैं खान सर पर लगी कानूनी धाराएं?
खान सर पर दर्ज मामले में जो धाराएं शामिल बताई जा रही हैं, वे बेहद संगीन हैं। यदि ये आरोप अदालत में साबित होते हैं, तो उन्हें लंबी सजा हो सकती है:

हत्या का प्रयास (IPC 307) इस धारा के तहत गैर-जमानती वारंट बनता है। दोष सिद्ध होने पर 10 साल की जेल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान है।

आर्म्स एक्ट (Arms Act): अवैध हथियार रखने, प्रदर्शन करने या उसके इस्तेमाल की साजिश में कई साल की कठोर जेल और भारी जुर्माने का प्रावधान है।

अन्य आपराधिक धाराएं मामले से जुड़ी कुछ अन्य धाराओं में भी 3 साल तक की जेल की सजा हो सकती है।

देशभर के प्रतियोगी छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय खान सर के लिए यह समय उनके करियर का सबसे बड़ा संकट माना जा रहा है। एक तरफ जहां पुलिस की जांच और कोर्ट की कार्यवाही पर सबकी नजरें टिकी हैं, वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक कलह और 'फर्जी डिग्री' के दावों ने उनकी छवि को बड़ा झटका दिया है।

कानून की नजर में अभी जांच जारी है और आरोप सिद्ध होना बाकी है।

इस पूरे विवाद पर और खान सर के चाचा के इन दावों पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया जरूर दें।

सटीक और निष्पक्ष खबरों के लिए इस पोस्ट को शेयर करें।

🚨 असम के गोलपारा से बेहद चौंकाने वाली और गंभीर खबर! स्कूल में हिंदू छात्र को जबरन बीफ खिलाने की कोशिश, पुलिस ने आरोपी मह...
07/06/2026

🚨 असम के गोलपारा से बेहद चौंकाने वाली और गंभीर खबर! स्कूल में हिंदू छात्र को जबरन बीफ खिलाने की कोशिश, पुलिस ने आरोपी महिला को किया गिरफ्तार, छात्र हिरासत में।

असम के गोलपारा (Goalpara) जिले के कृष्णई इलाके से एक ऐसी घटना सामने आई है जिसने सबको हैरान कर दिया है। 'हबराघाट हायर सेकेंडरी स्कूल' (Habraghat HS School) में धार्मिक सद्भाव को बिगाड़ने और एक हिंदू छात्र की धार्मिक भावनाओं को जबरन ठेस पहुंचाने का गंभीर मामला प्रकाश में आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कक्षा 9 में पढ़ने वाले एक मुस्लिम छात्र (सुमित आलम) की मां नूर साहिदा बेगम ने अपने बेटे के टिफिन बॉक्स में बीफ (गोमांस) पकाकर दिया था। आरोप है कि महिला ने अपने बेटे को यह खाना स्कूल के हिंदू सहपाठियों को खिलाने के लिए कहा था।

स्कूल पहुंचने पर, सुमित आलम और उसके 4 अन्य मुस्लिम सहपाठियों ने मिलकर कक्षा के एक हिंदू छात्र को जबरन (Forcefully) वह बीफ खिलाने का प्रयास किया।

इस घटना की जानकारी मिलते ही पीड़ित छात्र के परिवार ने कृष्णई पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए गोलपारा जिला प्रशासन और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी तुरंत एक्शन में आए:

पुलिस ने साजिश रचने और धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में छात्र की मां नूर साहिदा बेगम को गिरफ्तार कर लिया है।

जबरन खाना खिलाने का प्रयास करने वाले मुख्य आरोपी छात्र और उसके 4 अन्य साथियों को पुलिस ने हिरासत (Detain) में ले लिया है।

आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं—जैसे आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy) और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के तहत मामला दर्ज किया गया है।

सतर्क रहें, अफवाहों से बचें
प्रशासन ने इलाके में शांति और कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है।

07/06/2026

सावधान! छात्र आंदोलन का मुखौटा पहनकर घुसे 'डफली गैंग' और वामपंथी संगठनों की मंशा पर बड़े सवाल खड़े हो रहे हैं।

कहाँ छात्रों के भविष्य और पेपर लीक की बात होनी थी, और कहाँ मंच से देशविरोधी और विभाजनकारी नैरेटिव बेचे जा रहे हैं। क्या इस तरह के उकसावे के पीछे आगे किसी बड़ी हिंसा या अराजकता फैलाने का गुप्त प्लान है? देश के युवाओं को इन आंदोलनजीवियों और इनके असली एजेंडे को पहचानकर सतर्क रहने की सख्त जरूरत है! 🛑👁️

07/06/2026

इस तिलचट्टे की बात सुन कर आपके होश उड़ जाएंगे ...

फुल टाइम आंदोलनजीवी महिला"जहां दिखेगा टेंट, हम वहीं गाड़ेंगे अपना परमानेंट!" 'Cockroach protest' का तमाशा चल रहा हो और ह...
07/06/2026

फुल टाइम आंदोलनजीवी महिला
"जहां दिखेगा टेंट, हम वहीं गाड़ेंगे अपना परमानेंट!"

'Cockroach protest' का तमाशा चल रहा हो और हमारी सदाबहार आंदोलनजीवी दीदी वहां न पहुंचे, ऐसा कैसे हो सकता है? 🤪

इनका डेली रूटीन फिक्स है

सुबह बेरोजगारी पर चिंता (चाय-समोसे के साथ) ☕️

दोपहर कॉकरोच प्रोटेस्ट में पहुंचकर 'क्रांति' लाना 🪳

शाम "आंदोलन सफल रहा" का ट्वीट दागना 📱

मुद्दा चाहे कोई भी हो—पेपर लीक हो, पर्यावरण हो, या मोहल्ले की नाली... दीदी का झोला और डफली हमेशा रेडी रहते हैं। इन्हें देखकर तो अब पुलिस वाले भी पूछने लगे हैं—"मैडम, आज किस बात पे गुस्सा हो?" 😭😂

छात्र हित का मुखौटा, बाहरी फंडिंग का खेल और 'हाईजैक' होता आंदोलन! 🤫मुद्दा वाकई बेहद गंभीर और सही था... NEET और कई अन्य प...
07/06/2026

छात्र हित का मुखौटा, बाहरी फंडिंग का खेल और 'हाईजैक' होता आंदोलन! 🤫

मुद्दा वाकई बेहद गंभीर और सही था... NEET और कई अन्य परीक्षाओं के पेपर लीक मामले में दोषियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी ही चाहिए। NTA की जवाबदेही तय करना सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है, और इसमें कोई दो राय नहीं है।

लेकिन, इस संवेदनशील मुद्दे की गरिमा तब खत्म हो जाती है, जब देश के युवाओं और प्रभावित अभिभावकों के हक की लड़ाई को कोई और हाईजैक कर लेता है। कितना बेहतर होता कि यह आंदोलन देश के छात्र खुद लड़ते, न कि बोस्टन (अमेरिका) में बैठकर किसी राजनीतिक पार्टी का एजेंडा चलाने वाला अभिजीत दीपके जैसा कोई गुर्गा इसे रिमोट कंट्रोल से ऑपरेट करता!

क्लिप्स सोशल मीडिया की और हकीकत जमीन की!
कल से इस तथाकथित प्रोटेस्ट के सैकड़ों क्लिप्स इंटरनेट पर तैर रहे हैं, जिन्हें देखकर कोई भी समझ जाएगा कि यह प्रदर्शन अपने मूल मुद्दे से पूरी तरह भटक चुका है।

चप्पे-चप्पे पर तमाशबीन, पुलिसकर्मी और पत्रकार भरे हुए थे, लेकिन जिनके दम पर यह तमाशा खड़ा किया गया था, उन 'कॉकरोच भाइयों' की उपस्थिति इनसे भी कम रही।

सोशल मीडिया पर फर्जी बोट्स और पीआर एजेंसियों के दम पर 22 मिलियन (2.2 करोड़) फॉलोअर्स का गुब्बारा फुलाना बहुत आसान है साहब, लेकिन उन फॉलोअर्स को जमीन पर उतारना उतना ही मुश्किल है, जितना फेसबुक पर 20-30 हजार फॉलोअर्स लेकर बैठने वालों के लिए असली 100 व्यूज का आंकड़ा छूना! 😂🔥

पेपर लीक के मंच पर डफली, LGBTQ और 'आजादी' गैंग का तमाशा!
कहाँ तो बात देश के लाखों छात्र-छात्राओं के भविष्य, पेपर लीक, और परीक्षा प्रणाली में सुधार जैसे संवेदनशील मुद्दे पर होनी थी... और कहाँ बातें होने लगीं इसके अलावा दुनिया भर के प्रपंचों पर!

इस तथाकथित छात्र आंदोलन का रंग-ढंग देखिए

अचानक से LGBTQ वालों को इस छात्रों के प्रोटेस्ट में अपने अधिकारों की लड़ाई दिखने लगी।

वामपंथी (लेफ्टिस्ट) भाई, जिनका काम ही हर चलते-फिरते मुद्दे में अपनी राजनीतिक रोटियां सेकना है, वे हर बार की तरह यहां भी अपनी डफली बजाते और कोरस गाते दिख गए।

सबसे हैरान करने वाली और घटिया बात... न जाने ये कौन से मानसिक दिवालिया लोग हैं, जिन्हें देश की हर समस्या, यहाँ तक कि 'पेपर लीक' के पीछे भी सिर्फ और सिर्फ ब्राह्मणवाद नजर आता है!

सवाल यह है कि छात्रों के इस हक की लड़ाई में "आरएसएस से आजादी" और "ब्राह्मणवाद से आजादी" जैसे घिसे-पिटे, एजेंडा-ड्रिवेन नारों की क्या जरूरत थी? इसका छात्रों के भविष्य से क्या लेना-देना था?

हकीकत यह आंदोलनजीवियों का रोजगार है!
जब भी देश में कोई वास्तविक समस्या खड़ी होती है, तो ये भाड़े के आंदोलनजीवी, अर्बन नक्सल और टूलकिट गैंग गिद्धों की तरह उस पर झपट पड़ते हैं। मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और मंच से देशविरोधी, जातिवादी और विभाजनकारी नैरेटिव बेचे जाने लगते हैं।

यही वजह है कि देश का आम नागरिक और समझदार युवा अब इन नौटंकियों से दूरी बना चुका है, क्योंकि लोग समझ चुके हैं कि यह छात्रों का दर्द नहीं, बल्कि सोशल मीडिया के फर्जी व्यूज और विदेशी फंडिंग के दम पर देश का माहौल खराब करने की एक और नाकाम साजिश थी।

आपका क्या मानना है? क्या छात्रों के मुद्दों में इस तरह की बाहरी और राजनीतिक दखलअंदाजी सही है? अपनी राय कमेंट में जरूर साझा करें। 👇

फ्रॉड सोशल मीडिया का गुब्बारा फूटाजमीन पर 5 हजार की भीड़ नहीं, और दावा करोड़ों के समर्थन का!  🤫आज की सबसे बड़ी हकीकत यही...
07/06/2026

फ्रॉड सोशल मीडिया का गुब्बारा फूटा
जमीन पर 5 हजार की भीड़ नहीं, और दावा करोड़ों के समर्थन का! 🤫
आज की सबसे बड़ी हकीकत यही है कि "चुनाव जमीन पर लड़े जाते हैं, डिजिटल बोट्स और फेक व्यूज के दम पर नहीं!" जो लोग खुद को सोशल मीडिया का बेताज बादशाह समझते हैं, आज उनकी जमीनी औकात पूरी तरह बेनकाब हो गई।

तथाकथित आंदोलन के नाम पर ये 'कॉकरोच' 5 हजार की भीड़ तक इकट्ठा नहीं कर सके! सच तो यह है कि जितनी भीड़ वहां थी, उससे ज्यादा तो मीडिया वाले और कॉन्टेंट क्रिएटर पहुंचे हुए थे, जो सिर्फ अपना धंधा चमकाने और व्यूज बटोरने वहां गए थे।

ड्रोन, बॉडीकैम और 22 मिलियन का 'बोट्स' रायता!
सुरक्षा का आलम यह था कि चप्पे-चप्पे पर 5 हजार पुलिस वाले बॉडीकैम और ड्रोन लेकर निगरानी कर रहे थे। पहले भी कई बार यह बात सामने आई है कि इनके जो 22 मिलियन फॉलोअर्स दिखते हैं, वो असल में फर्जी बोट्स (Bots) हैं।

जब पहले पोल खुली थी, तो इन्होंने बहाना बना दिया कि "हमें तो भारत के कोने-कोने से समर्थन है, इसलिए लोग आ नहीं पाए।"

आज तो वो पोल भी पट्टी समेत खुल गई। ये इस उम्मीद में बैठे थे कि विपक्षी पार्टियां अपने यूथ विंग को भेज देंगी, तो उनकी भीड़ को अपनी बताकर मीडिया में छा जाएंगे... पर वो दांव भी उलटा पड़ गया।

लेकिन याद रखिएगा, ये लोग धूर्तता के उस्ताद हैं। शाम होते-होते ये और इनका पूरा दलाल गैंग घोषित कर देगा कि "आंदोलन ऐतिहासिक रूप से सफल रहा!"

'नाखून कटाकर शहीद' होने का मौका नहीं मिला!
सरकार को इनकी औकात दिखानी थी, सो परमिशन देकर सरकार ने भी दिखा दी। वरना अगर परमिशन न मिलती, तो ये फर्जी 'भगत सिंह' नाखून कटाकर शहीद होने का ड्रामा रच देते कि "देखो, सरकार हमसे डर गई!"

वैसे, वो 'जर्मन कॉकरोच' भी कबसे 2 करोड़ फॉलोअर्स का घमंड लिए घूम रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि उसके फॉलोअर्स भी उतने ही फर्जी हैं, तभी तो वो अपने आका को दिल्ली तक में चुनाव नहीं जिता पाया था। वीडियो चाहे वो हर चुनाव में 'महा-बदलाव' के नाम पर बना ले और समूचा विपक्ष उसे शेयर करके खुश होता रहे, पर जमीन नहीं बदलती।

कैसे बनाया जाता है आपको बेवकूफ? (क्रोनोलॉजी समझें)
यह सोशल मीडिया का एक सुनियोजित फ्रॉड है

पहले फर्जी व्यूज और बोट्स के जरिए दिखाओ कि करोड़ों का जनसमर्थन मिल रहा है।

फिर जब चुनाव में जनता नकार दे और जमानत जब्त हो जाए...

तो ठीकरा फोड़ दो कि "EVM हैक हो गई है!"

सच्चाई यह है कि जमीन पर 5 हजार लोग जुटाने की औकात नहीं है, और बात सीधे वोटिंग की करते हैं। यही वजह है कि जब नतीजे आते हैं, तो इनका 'विलाप पार्ट-2' शुरू हो जाता है कि चुनाव में चीटिंग हुई है।

भारत का असली वोटर 'शहरी चोंचलों' से दूर है
भारत का अधिकांश वोटर आज भी गरीब है, गांवों में रहता है। उस वोटर के बीच सेंध लगाए बिना आप भारत में राजनीति नहीं कर सकते—चाहे वह जाति के नाम पर हो या फ्रीबीज (मुफ्त योजनाओं) के।

गांव के उस आम वोटर को इस 'शहरी नौटंकी' और ड्रामेबाजी से कोई मतलब नहीं है। वो इसे सिर्फ बड़े शहर वालों के चोंचले समझता है। और शहर में भी भीड़ जुटाने के लिए बड़ी पार्टियां चाहिए होती हैं, जिनके पास संगठन का माद्दा हो। ये कल के लौंडे या इनका 'लवणासुर' भला क्या भीड़ लाएगा, जब तक पूरा इंडी गिरोह साथ न दे?

विपक्षी खेमा भी समझदार है। उन्हें पता था कि यह 'लवणासुर' इन कॉकरोचों के कंधे पर बैठकर अपनी मरी हुई राजनीति फिर से जिंदा करना चाह रहा है, इसीलिए उन्होंने भी बस फॉर्मेलिटी के लिए एक-आध ट्वीट या बयानबाजी की और चुपके से कलटी मार ली।

नतीजा? आज वहां भाड़े के आंदोलनजीवियों उर्फ 'अर्बन नक्सलियों' के अलावा कोई और नजर नहीं आया। खैर, इनका तो परमानेंट रोजगार ही यही है... जहां तमाशा होगा, ये दिहाड़ी पर पहुंच ही जाएंगे! 🍿

'खान सर' या सिर्फ 'फैजल खान'? ब्रांडिंग का धंधा, छात्रों का भविष्य और बिहार का नया कानून! बिहार की राजनीति और शिक्षा जगत...
07/06/2026

'खान सर' या सिर्फ 'फैजल खान'? ब्रांडिंग का धंधा, छात्रों का भविष्य और बिहार का नया कानून!

बिहार की राजनीति और शिक्षा जगत से इस वक्त एक बहुत बड़ी बहस सामने आ रही है। फैजल खान को पूरे भारत और विदेशों तक “खान सर” के नाम से जाना जाता है, लेकिन अब बिहार के मंत्री दिलीप जायसवाल ने उनके इस टाइटल पर एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

मंत्री जी ने साफ शब्दों में कहा है कि—"जो फैजल खान के छात्र नहीं हैं, वे उन्हें 'सर' कहकर क्यों पुकारते हैं? उन्हें 'सर' नहीं, बल्कि 'खान जी' या 'फैजल खान' ही कहना चाहिए।"

क्या मंत्री जी का यह बयान बिल्कुल सही है?
अगर गहराई से देखा जाए, तो इस बयान के पीछे की क्रोनोलॉजी को समझना बेहद जरूरी है। आज के दौर में ये 'कोचिंग वाले' सिर्फ नाम और ब्रांडिंग के आधार पर बच्चों और अभिभावकों को सरकारी नौकरी दिलाने के बड़े-बड़े झांसे देते हैं।

असलियत यह है कि आज कई बड़े कोचिंग संस्थानों में पढ़ाई से कहीं ज्यादा राजनीतिक बयानबाजी, रील-संस्कृति और अनर्गल प्रचार होता है।

गरीब और मध्यमवर्गीय छात्रों का भविष्य दांव पर लगाकर, उनकी भावनाओं से खेलकर खुद का करोड़ों का बिजनेस साम्राज्य खड़ा करना आज कई लोगों का मुख्य धंधा बन चुका है।

हाल ही में फैजल खान के कोचिंग संस्थान और 'ज्ञान बिंदु' के बीच हुए विवाद ने इस पूरे खेल की परतों को खोलकर रख दिया है। पर्दे के पीछे चल रही इस आपसी लड़ाई के बाद अब बिहार सरकार भी पूरी तरह से एक्शन मोड में नजर आ रही है।

सुगबुगाहट तेज है कि बिहार सरकार जल्द ही इन शिक्षा माफियाओं के खिलाफ बेहद कड़े कानून और नियम लाने की तैयारी कर रही है:

लाइसेंसिंग और रजिस्ट्रेशन: हर कोचिंग संस्थान की सख्त क्रेडेंशियल जांच होगी।

मनमानी फीस वसूलने पर पूरी तरह रोक लगेगी ताकि गरीब बच्चों को लूटा न जा सके।

कोचिंग की आड़ में नफरत या राजनीतिक एजेंडा फैलाने वालों पर ताला लगेगा।

शिक्षा की गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर की नियमित जांच होगी।

आजकल पढ़ाने से कहीं ज्यादा 'नौटंकी का धंधा' हावी होता दिख रहा है। खुद को एक बड़ा ब्रांड बनाकर लाखों-करोड़ों रुपये कमाना, क्लासरूम को सिनेमा हॉल बना देना और शिक्षा की जगह सनसनी बेचना—ये सब मिलकर बिहार की गरिमामयी शिक्षा व्यवस्था को अंदर से खोखला कर रहे हैं।

बिहार के सुदूर गांवों से गरीब परिवारों के बच्चे अपनी आंखों में सुनहरे सपने लेकर इन बड़े शहरों की कोचिंग्स में आते हैं, कर्ज लेकर फीस भरते हैं। लेकिन जब वे इन माफियाओं के चंगुल और उनके थंबनेल-मार्केटिंग के जाल में फंसते हैं, तो अंततः उनका भविष्य अंधकारमय हो जाता है।

अब सिर्फ बयानबाजी नहीं, ठोस एक्शन की जरूरत है!
बिहार के युवाओं का भविष्य अब इन तथाकथित माफियाओं और व्यापारियों के हाथों में नहीं सौंपा जा सकता। सरकार से अब जनता की कुछ सीधी मांगें हैं:

सभी बड़े और छोटे कोचिंग संस्थानों का सख्त फाइनेंशियल और इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट होना चाहिए।

सिलेक्शन के झूठे और फर्जी वादे (Fake Claims) करने वाले विज्ञापनों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई हो।

जो जमीनी स्तर पर असली शिक्षक हैं, जो बिना किसी तमाशे के पूरी ईमानदारी से बच्चों का भविष्य संवार रहे हैं, उन्हें प्रमोट किया जाए।

आखिरी बात हमारे समाज में 'गुरु' का स्थान भगवान से भी ऊपर है। असली गुरु वे होते हैं जो शांत रहकर ज्ञान देते हैं और राष्ट्र का निर्माण करते हैं, न कि वे जो सिर्फ अपना नाम, चेहरा, और ब्रांड बेचकर मासूमों की उम्मीदों को लूटते हैं।

नियम पहले भी थे, नीयत आज भी गायब है!बेहद दुखद। दिल दहल जाता है ये पढ़कर...अस्पताल के बेड पर लेटे उस 75 साल के बूढ़े पिता...
07/06/2026

नियम पहले भी थे, नीयत आज भी गायब है!

बेहद दुखद। दिल दहल जाता है ये पढ़कर...
अस्पताल के बेड पर लेटे उस 75 साल के बूढ़े पिता, राधेश्याम अग्रवाल पर क्या बीत रही होगी? यह सवाल अंदर तक झकझोर देता है।

जरा आंखें बंद कीजिए और सोचिए... पिता अस्पताल में भर्ती हैं। पूरा परिवार—बेटा, बहू, पत्नी, पोती—उनका हाल पूछने, उनका संबल बनने दिल्ली आते हैं। वे एक होटल में रुकते हैं। सुबह एक भयानक आग लगती है, और हंसता-खेलता बेटा पूरे परिवार समेत इस दुनिया से चला जाता है... और वह बूढ़ा बाप अस्पताल के बेड पर अकेला रह जाता है।

अब उस लाचार पिता के साथ क्या होगा?
वो अभी ICU में हैं उन्हें इस तबाही की खबर दी गई या नहीं, पता नहीं। इस उम्र में यह सदमा अपने आप में जानलेवा है। शरीर शायद दावों और इलाज से लड़ भी रहा होगा, पर मन? मन तो उसी आग में जलकर खाक हो चुका है।

रूह कंपा देने वाली कानूनी औपचारिकताएं: जब पुलिस बयान लेने आएगी और वो कांपती आवाज में कहेंगे—"हां, मेरा बेटा मुझसे मिलने आया था..."—यह वाक्य बोलते हुए एक पिता के दिल पर क्या बीतेगी?

जिस उम्र में बेटे के मजबूत कंधे का सहारा चाहिए था, अब उस बूढ़े बाप को अपने पूरे परिवार की अर्थियों का बोझ उठाना है। एक ही झटके में पूरी पीढ़ी खत्म! वह बाप अब किसके लिए और क्यों जिएगा?

"हादसे के बाद सख्त नियम आएंगे" — यही हमारी सबसे बड़ी बीमारी है!
सालों से हर बड़े हादसे का यही एक तय, घिसा-पिटा पैटर्न बन चुका है:

सूरत कोचिंग आग (22 बच्चे मरे) ➡️ "कोचिंग के नियम सख्त होंगे!"

राजकोट गेम जोन (27 लोग जले) ➡️ "गेम जोन के नियम सख्त होंगे!"

दिल्ली होटल आग (21 लोग मरे) ➡️ "होटल के नियम सख्त होंगे!"

हर 6 महीने में मासूमों की लाशें गिरती हैं, तब जाकर हमारा प्रशासन गहरी नींद से जागता है। यह Authority (धौंस) दिखाना है, साहब, Leadership (नेतृत्व) नहीं।

असली समस्या "नियम" नहीं, हमारी "नियत" है!
नियमों की किताबें पहले से ही लाइब्रेरी में धूल फांक रही हैं, कमी है तो बस उन्हें जमीन पर लागू करने की नीयत की:

होटल मालिक को सब पता था, उसे बखूबी मालूम था कि उसके पास Fire NOC नहीं है, पूरी बिल्डिंग में केवल एक ही संकरी सीढ़ी है, और खिड़कियों पर लोहे की ग्रिल लगी है। फिर भी उसने कमरे बेचे। क्यों? क्योंकि उसे कानून का कोई डर नहीं था, उसकी आंखों पर पैसे का लालच हावी था।

प्रशासन को सब पता था; सबको मालूम है कि हमारे शहरों की तंग गलियों में कितने गेस्ट हाउस और कमर्शियल इमारतें अवैध रूप से मौत का कुआं बनी बैठी हैं। फिर भी कार्रवाई नहीं हुई। क्यों? क्योंकि या तो ऊपर बैठे आकाओं का दबाव था, या फिर "महीने की बंधी-बंधाई रिश्वत" ने सिस्टम की आंखें बंद कर दी थीं।

हम सबको पता है, और सबसे कड़वा सच यह है कि यह फिर होगा। आज से 6 महीने बाद फिर कोई शहर ऐसी ही दर्दनाक सुर्खियों से लाल होगा। क्यों? क्योंकि हम हादसे के तुरंत बाद दो दिन मोमबत्तियां जलाते हैं, सोशल मीडिया पर गुस्सा निकालते हैं, और फिर बहरे-अंधे बन जाते हैं।

याद रखिए, जब तक "पकड़े जाने का डर" > "पैसे का लालच" नहीं होगा, तब तक जमीन पर एक इंच भी कुछ नहीं बदलेगा।

तो अब क्या? सिर्फ शोक संदेश लिखने से क्या होगा?
अगर वाकई इस सड़े हुए सिस्टम में थोड़ा भी बदलाव चाहिए, तो शुरुआत हमें खुद से करनी होगी:

👉 अपने लिए स्टैंड लें अगली बार जब भी कोई होटल बुक करें या किसी मॉल-बिल्डिंग में जाएं, तो सबसे पहले Fire Exit और खिड़कियों का रास्ता देखें। "चलो, एडजस्ट कर लेते हैं" वाला यह घातक रवैया आज ही छोड़ें।

👉 अपने काम में ईमानदारी लाएं यदि आप किसी भी बिजनेस, कंस्ट्रक्शन या कंसल्टेंसी में हैं, तो अपने क्लाइंट्स से साफ कहें—"कम्प्लायंस या चालान का डर बड़ा नहीं है, किसी की लाश का डर बड़ा होना चाहिए।" चंद सिक्के बचाने के लिए किसी की जिंदगी दांव पर मत लगाइए।

👉 सिस्टम से जवाबदेही मांगें; हमें कागजों पर सख्त नियम नहीं, जमीन पर सख्त नीयत चाहिए। जो अफसर टेबल के नीचे से रिश्वत लेकर बिना जांच के सेफ्टी NOC साइन करता है, उसे सिर्फ भ्रष्टाचार का नहीं, बल्कि "सामूहिक हत्या का सह-आरोपी" बनाकर जेल भेजा जाए।

अगर हमें बहरे मेंढक बनकर ही कुएं में रहना है, और इस "चलता है" वाले एटीट्यूड की आदत डालनी है, तो सहते रहिए...

लेकिन एक बात हमेशा याद रखिएगा, अगर आज हमने मिलकर आवाज़ नहीं उठाई, तो अगला नंबर खुदा न खास्ता हमारा या हमारे किसी अपने का भी हो सकता है। 🙏

इस आवाज़ को सिर्फ अपने तक मत रखिए। इसे शेयर कीजिए ताकि यह सिस्टम के उन कानों तक पहुंचे जो बहरे हो चुके हैं।

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