06/09/2026
शिक्षक दिवस विशेष : डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन और भारतीय दर्शन की आधुनिक व्याख्या
— ज्ञान, मूल्य और शिक्षक की भूमिका
प्रस्तावना
भारत की ज्ञान-परंपरा में शिक्षक का स्थान सदैव अत्यंत विशिष्ट और सम्माननीय रहा है। भारतीय चिंतन में गुरु केवल ज्ञान प्रदान करने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि शिष्य के व्यक्तित्व, विवेक, चरित्र और जीवन-दृष्टि का निर्माण करने वाला मार्गदर्शक माना गया है। इसी गौरवशाली परंपरा के आधुनिक प्रतिनिधि के रूप में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का व्यक्तित्व भारतीय शिक्षा, दर्शन और संस्कृति के इतिहास में विशेष महत्त्व रखता है। वे दार्शनिक, शिक्षाविद्, लेखक, राजनयिक तथा स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। 5 सितंबर 1888 को जन्मे डॉ. राधाकृष्णन की स्मृति में भारत में प्रत्येक वर्ष 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है।
डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा को केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन न मानकर मनुष्य के बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया के रूप में देखा। उनकी दृष्टि में भारतीय परंपरा और आधुनिकता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। इसी कारण उनके दर्शन और शिक्षा-संबंधी विचार आज भी बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक और तकनीकी परिवेश में प्रासंगिक बने हुए हैं।
भारतीय दर्शन की आधुनिक व्याख्या
डॉ. राधाकृष्णन का प्रमुख योगदान भारतीय दर्शन को आधुनिक बौद्धिक विमर्श में प्रतिष्ठित करने का है। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘भारतीय दर्शन’ भारतीय दार्शनिक परंपराओं का व्यापक और व्यवस्थित विवेचन प्रस्तुत करती है। इसके अतिरिक्त ‘हिंदू जीवन-दृष्टि’, ‘जीवन की आदर्शवादी दृष्टि’, ‘पूर्वी धर्म और पाश्चात्य चिंतन’, ‘धर्म और समाज’ तथा ‘प्रमुख उपनिषद्’ जैसी कृतियों के माध्यम से उन्होंने भारतीय चिंतन और आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक विश्व के समक्ष प्रस्तुत किया।
राधाकृष्णन की विशेषता यह थी कि उन्होंने भारतीय दर्शन को केवल अतीत की धार्मिक अथवा आध्यात्मिक विरासत के रूप में नहीं देखा। उन्होंने उसके मूल सिद्धांतों को मनुष्य के वर्तमान जीवन, नैतिक आचरण और आत्मविकास से जोड़ने का प्रयास किया। उनके लिए दर्शन जीवन से पृथक कोई अमूर्त बौद्धिक अनुशासन नहीं था, बल्कि जीवन के स्वरूप, उद्देश्य और मानवीय अस्तित्व को समझने का माध्यम था।
उनकी दार्शनिक दृष्टि पर वेदांत, विशेषतः अद्वैत वेदांत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। तथापि उनका चिंतन किसी एक दार्शनिक मत की सीमाओं में बँधा हुआ नहीं था। उन्होंने भारतीय आध्यात्मिक चिंतन को व्यापक मानवीय अनुभव, नैतिक चेतना और सार्वभौमिक मानव-मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया। उनके दर्शन में आत्मबोध, नैतिकता, धार्मिक सहिष्णुता और मानवीय एकता को विशेष महत्त्व प्राप्त है।
भारतीय जीवन-दृष्टि और समन्वय की भावना
डॉ. राधाकृष्णन की कृति ‘हिंदू जीवन-दृष्टि’ भारतीय चिंतन को व्यापक आध्यात्मिक और दार्शनिक संदर्भ में समझने का महत्त्वपूर्ण प्रयास है। इसमें भारतीय जीवन-दृष्टि की उस विशेषता को रेखांकित किया गया है जिसमें सत्य की खोज को मनुष्य के व्यापक आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ा जाता है।
राधाकृष्णन के चिंतन में भारतीय परंपरा की व्यापकता और विविधता के साथ संवाद की भावना दिखाई देती है। वर्तमान बहुलतावादी समाज में यह दृष्टि विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। धार्मिक, सांस्कृतिक, भाषायी और वैचारिक विविधता से युक्त समाज में पारस्परिक सम्मान, सहिष्णुता, संवाद और सह-अस्तित्व लोकतांत्रिक जीवन के आवश्यक आधार हैं। शिक्षा इन मूल्यों को विकसित करने का प्रभावी माध्यम बन सकती है।
मनुष्य का आत्मविकास और शिक्षा
‘जीवन की आदर्शवादी दृष्टि’ में राधाकृष्णन ने मनुष्य के अस्तित्व और उसके आत्मविकास पर विशेष विचार किया। उनके अनुसार मनुष्य केवल भौतिक आवश्यकताओं और बाहरी उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। उसमें आत्मचिंतन, आत्मविकास और उच्चतर मानवीय मूल्यों की ओर अग्रसर होने की क्षमता विद्यमान है।
यही विचार उनकी शिक्षा-दृष्टि का आधार बनता है। यदि मनुष्य का विकास केवल आर्थिक सफलता तक सीमित नहीं है, तो शिक्षा का उद्देश्य भी केवल परीक्षा, प्रमाण-पत्र अथवा रोजगार प्राप्ति नहीं हो सकता। शिक्षा को व्यक्ति के बौद्धिक विकास के साथ उसके नैतिक, सामाजिक और मानवीय गुणों का विकास भी करना चाहिए।
इस दृष्टि से शिक्षा व्यक्ति को अपने भीतर निहित क्षमताओं को पहचानने, उनका विकास करने तथा समाज के प्रति उत्तरदायी जीवन जीने की प्रेरणा देती है। शिक्षा का वास्तविक मूल्य इसी समग्र विकास में निहित है।
शिक्षा : ज्ञान से विवेक तक
वर्तमान समय में सूचना और ज्ञान के स्रोत अत्यंत व्यापक हो गए हैं। अंतर्जाल, डिजिटल पुस्तकालय, दूरस्थ शिक्षा, मुक्त शैक्षिक संसाधन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित साधनों ने ज्ञान तक पहुँच को सरल बना दिया है। किंतु सूचना की अधिकता अपने आप में ज्ञान या विवेक की गारंटी नहीं है।
ऐसी स्थिति में शिक्षा का महत्त्व और बढ़ जाता है। विद्यार्थी को केवल सूचनाएँ उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है; उसे सूचना की सत्यता, उपयोगिता और विश्वसनीयता का मूल्यांकन करना भी आना चाहिए। शिक्षा में प्रश्न करने, तर्क करने, विश्लेषण करने और स्वतंत्र चिंतन की क्षमता का विकास आवश्यक है।
राधाकृष्णन की शिक्षा-दृष्टि इसी व्यापक अर्थ में ज्ञान को विवेक से जोड़ती है। उनके चिंतन की समकालीन प्रासंगिकता इस बात में है कि शिक्षा व्यक्ति को केवल दक्ष न बनाए, बल्कि उसे विवेकशील और उत्तरदायी भी बनाए।
शिक्षक की बदलती भूमिका
डॉ. राधाकृष्णन का जीवन स्वयं एक आदर्श शिक्षक के रूप में प्रेरणादायक रहा। उन्होंने विभिन्न विश्वविद्यालयों में अध्यापन किया तथा आंध्र विश्वविद्यालय और काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों के कुलपति के रूप में भी कार्य किया। उच्च शिक्षा और राष्ट्रीय शैक्षिक नीति से संबंधित महत्त्वपूर्ण संस्थाओं में भी उनकी सक्रिय भूमिका रही।
आज शिक्षा के स्वरूप में व्यापक परिवर्तन आया है। विद्यार्थी के पास ज्ञान प्राप्त करने के अनेक माध्यम हैं। ऐसी परिस्थिति में शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं रह सकती। वह ज्ञान का विवेचक, मार्गदर्शक, प्रेरक और मूल्य-निर्माता है।
शिक्षक का दायित्व विद्यार्थियों में जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन, सत्यनिष्ठा, अनुशासन, संवेदनशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना है। वह विद्यार्थी को विषय का ज्ञान देने के साथ-साथ उसके उचित उपयोग की दृष्टि भी प्रदान करता है। इस अर्थ में शिक्षक शिक्षा-प्रक्रिया का मानवीय केंद्र है।
ज्ञान और मूल्य का समन्वय
राधाकृष्णन के चिंतन में ज्ञान और मूल्य का संबंध अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। विज्ञान मनुष्य को प्रकृति और ब्रह्मांड को समझने की शक्ति देता है तथा तकनीक उसकी क्षमताओं का विस्तार करती है; किंतु इन शक्तियों का उचित उपयोग नैतिक विवेक पर निर्भर करता है।
वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, जैव-प्रौद्योगिकी, डिजिटल संचार और स्वचालन जैसी तकनीकों ने जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र को प्रभावित किया है। इन परिवर्तनों के बीच शिक्षा का दायित्व केवल तकनीकी दक्षता विकसित करना नहीं, बल्कि उसके साथ नैतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करना भी है।
विद्यार्थियों में सत्यनिष्ठा, सहिष्णुता, संवेदनशीलता, सामाजिक समरसता, पर्यावरणीय उत्तरदायित्व, लोकतांत्रिक चेतना और मानवीय गरिमा के प्रति सम्मान जैसे मूल्यों का विकास शिक्षा के व्यापक उद्देश्य का हिस्सा होना चाहिए।
भारतीय ज्ञान-परंपरा और आधुनिकता
राधाकृष्णन की आधुनिकता भारतीय परंपरा से विच्छेद की आधुनिकता नहीं थी। उन्होंने भारतीय दार्शनिक विरासत को आधुनिक वैज्ञानिक और तार्किक दृष्टिकोण के साथ जोड़ने का प्रयास किया। उनकी कृतियों में पूर्वी और पाश्चात्य चिंतन के बीच संवाद की स्पष्ट आकांक्षा दिखाई देती है।
आज भारतीय ज्ञान-परंपरा को आधुनिक शिक्षा और अनुसंधान से जोड़ने की आवश्यकता पहले से अधिक अनुभव की जा रही है। भारतीय ज्ञान-परंपरा का अर्थ केवल अतीत का गौरवगान नहीं, बल्कि उसके दर्शन, साहित्य, कला, विज्ञान, तर्क, नैतिक मूल्यों और जीवन-दृष्टि का समकालीन संदर्भों में पुनर्पाठ करना भी है।
राधाकृष्णन का चिंतन इस दिशा में संतुलित दृष्टि प्रदान करता है। वे परंपरा को जड़ता के रूप में स्वीकार करने के पक्षधर नहीं थे और न ही आधुनिकता को अंधानुकरण के रूप में देखते थे। उनका दृष्टिकोण संवाद, विवेक और समन्वय पर आधारित था।
शिक्षक दिवस : आत्ममंथन का अवसर
शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान और अभिनंदन का अवसर नहीं, बल्कि शिक्षा के उद्देश्यों पर विचार करने का भी अवसर है। यह दिवस हमें यह प्रश्न करने के लिए प्रेरित करता है कि हमारी शिक्षा विद्यार्थियों को केवल प्रतियोगिता के लिए तैयार कर रही है अथवा जीवन के लिए भी।
क्या विद्यार्थी तकनीकी रूप से दक्ष होने के साथ सामाजिक रूप से संवेदनशील बन रहे हैं? क्या उनमें अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों की समझ विकसित हो रही है? क्या शिक्षा उनके भीतर प्रकृति, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व की भावना उत्पन्न कर रही है?
इन प्रश्नों के संदर्भ में डॉ. राधाकृष्णन की शिक्षा-दृष्टि आज भी दिशा प्रदान करती है। उनके विचार शिक्षा को मनुष्य के समग्र विकास से जोड़ते हैं और शिक्षक को उस विकास की महत्त्वपूर्ण कड़ी मानते हैं।
उपसंहार
डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय दर्शन, शिक्षा और आधुनिक बौद्धिक चेतना के बीच एक महत्त्वपूर्ण सेतु के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उन्होंने भारतीय दर्शन की विविध धाराओं को आधुनिक दार्शनिक विमर्श से जोड़ा और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा को व्यापक मानवीय संदर्भ में प्रस्तुत किया।
उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य केवल बौद्धिक क्षमता का विस्तार नहीं, बल्कि मनुष्य के विवेक, चरित्र, संवेदना और उत्तरदायित्व का विकास है। यही विचार वर्तमान शिक्षा-व्यवस्था के लिए भी महत्त्वपूर्ण मार्गदर्शन प्रदान करता है।
आज शिक्षक दिवस के अवसर पर डॉ. राधाकृष्णन का स्मरण तभी सार्थक होगा, जब शिक्षा को केवल परीक्षा और रोजगार की सीमाओं से आगे ले जाकर ज्ञान, विवेक, मूल्य, चरित्र और सामाजिक उत्तरदायित्व के समन्वित विकास का माध्यम बनाया जाए।
वर्तमान तकनीकी और वैश्विक परिवेश में शिक्षक की भूमिका और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है। शिक्षक यदि आधुनिक ज्ञान और तकनीकी दक्षता को मानवीय मूल्यों, भारतीय सांस्कृतिक चेतना और सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ सके, तो शिक्षा राष्ट्र-निर्माण की प्रभावशाली शक्ति बन सकती है।
इस दृष्टि से डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन केवल शिक्षक दिवस के प्रतीक नहीं, बल्कि ऐसी शिक्षा-दृष्टि के प्रतिनिधि हैं जिसमें ज्ञान प्रकाश है, मूल्य उसका आधार हैं और शिक्षक उस प्रकाश को समाज की भावी पीढ़ी तक पहुँचाने वाला मार्गदर्शक है।
यही शिक्षक दिवस की वास्तविक सार्थकता है और यही डॉ. राधाकृष्णन के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि भी है।
डॉ. प्रेमावती