27/08/2026
राघव की शादी शहर के एक बड़े व्यापारी की बेटी शिखा से तय हुई थी। शादी की तैयारियां एक आलीशान पांच सितारा होटल में जोरों पर थीं। राघव के पिता, पंडित दीनानाथ, गांव में एक छोटी सी परचून की दुकान चलाते थे। धूप और मेहनत से उनका रंग गहरा हो चुका था, हाथों में छाले थे और उनकी एकमात्र अच्छी कमीज़ भी जगह-जगह से घिसी हुई थी।
होटल के सजे-धजे बैंक्वेट हॉल में जब दीनानाथ जी पहुंचे, तो शिखा के अमीर रिश्तेदारों की नज़रें उनके पुराने जूतों और मैली कमीज़ पर टिक गईं।
शिखा की मां ने नाक सिकोड़ते हुए राघव से कहा, "राघव बेटा, तुम्हारे पिताजी को किसी पीछे के कमरे में बैठा दो। हमारे वीआईपी मेहमान आ रहे हैं, ऐसे हुलिए में वो स्टेज पर खड़े अच्छे नहीं लगेंगे। हमारे रुतबे का सवाल है।"
राघव ने अपने पिता की तरफ देखा। दीनानाथ जी ने समधन की बात सुन ली थी। उन्होंने बिना कोई शिकायत किए अपने बेटे के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले, "बेटा, तू फिक्र मत कर। मैं पीछे के लॉन में बैठता हूँ, तेरी खुशी से बढ़कर मेरे लिए कुछ नहीं।"
जयमाला का वक्त हुआ। ढोल-नगाड़ों के बीच राघव और शिखा स्टेज पर खड़े थे। सब लोग महंगे तोहफे और लिफाफे दे रहे थे। तभी होटल का एक वेटर दौड़ता हुआ आया और उसने राघव के हाथ में एक मुड़ा हुआ भूरा लिफाफा थमाया।
"सर, बाहर बैठे आपके पिताजी ने यह लिफाफा दिया है और कहा है कि इसे अभी खोलकर देख लें।"
शिखा ने चिढ़कर कहा, "अब इस पुराने लिफाफे में क्या होगा? चंद सौ रुपये का शगुन!"
राघव ने जैसे ही लिफाफा खोला, उसके अंदर से एक छोटा सा पत्र और कुछ सरकारी स्टाम्प पेपर निकले। पत्र में लिखा था:
"बेटा राघव, मैं जानता हूँ कि मेरी मैली कमीज़ तेरे ससुराल वालों के रुतबे के सामने छोटी पड़ गई। लेकिन तू कभी किसी के सामने सिर मत झुकाना। आज से पंद्रह साल पहले जब तेरी मां इस दुनिया से गई थी, तब मैंने अपनी जान लगाकर गांव की बंजर ज़मीन को सींचा था। पिछले महीने जब उस ज़मीन से हाईवे निकला, तो सरकार से मुझे चार करोड़ रुपये का मुआवज़ा मिला।
तेरे ससुर सोचते हैं कि तू एक गरीब का बेटा है। ये सारे कागज़ात और बैंक ड्राफ्ट तेरे नाम हैं। मैं अपनी गरीबी का दाग तेरे दामन पर नहीं लगने दूंगा बेटा। खुश रहना।"
लिफाफे के अंदर चार करोड़ रुपये की फिक्स्ड डिपॉजिट की रसीद और ज़मीन के पूरे अधिकार राघव के नाम दर्ज थे।
पूरे हॉल में सन्नाटा पसर गया। शिखा और उसके माता-पिता के चेहरे की हवाइयां उड़ गईं। जो रिश्तेदार दीनानाथ जी के कपड़ों पर हंस रहे थे, उनकी नज़रें शर्म से झुक गईं।
राघव की आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने हाथ में पकड़ी जयमाला वहीं स्टेज पर फेंकी, किसी की परवाह किए बिना दौड़ा और सीधे पीछे वाले लॉन में पहुंचा।
वहां दीनानाथ जी एक टूटी प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बैठे पानी पी रहे थे। राघव उनके पैरों में गिर पड़ा, उनकी मैली कमीज़ को अपने सीने से लगा लिया और रोते हुए बोला—
"बाबूजी, मुझे किसी रुतबे या दौलत की ज़रूरत नहीं है। जिस स्टेज पर आपकी इज़्ज़त नहीं, वो स्टेज मेरे किसी काम का नहीं। आप चलिए मेरे साथ, फेरे तभी होंगे जब मेरा बाप मेरे सिर पर हाथ रखेगा।"
शिखा और उसके परिवार ने हाथ जोड़कर दीनानाथ जी से माफी मांगी और उन्हें पूरे सम्मान के साथ स्टेज के मुख्य आसन पर बैठाया।