29/07/2026
जेन-ज़ी की गालियों को लेकर 'प्रबुद्ध-समाज' के द्वारा बहुत चिंताएं जताई जा रही हैं, जैसे कि समाज में इससे पहले गालियाँ थी ही नहीं, इन्हें जेन-ज़ी ने ही आविष्कृत किया है। सच्चाई तो यह है कि समाज हमेशा से गालियों से भरा रहा है, अब तो केवल मवाद फूटा है। मंटो साहब कहते थे ना, "मैं समाज की चोली क्या उघाडूंगा, वह तो पहले से ही नंगा है!"
गाली एक विचार नहीं है, वह एक भावाभिव्यक्ति है। कभी-कभार उसमें एक बददुआ ('कर्सिंग') भी होती है। लोग अलग-अलग कारणों से गालियाँ देते हैं। कल्पना करें कि एक ऊँचे ओहदे पर बैठा आदमी है, जो अपने से नीचे ओहदे वाले आदमी को दुत्कारता है, हिकारत से गालियाँ देता है। तब उसकी गाली में श्रेष्ठता-बोध का रोग है। वो जानता है कि वह छोटा आदमी (साहित्य का 'लघुमानव' / दोस्तोयेव्स्की का 'अंडरग्राउंड-मैन') असहाय है और उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। लेकिन एक दिन उस छोटे आदमी का धैर्य जवाब दे जाता है और वो किसी नतीजे की परवाह किए बिना उस ऊँचे ओहदे वाले सामंत को इससे भी भद्दी गाली देता है। तब इस गाली में प्रतिरोध है, विद्रोह है, बग़ावत है। आप कहेंगे, भाषा की शुचिता नष्ट हो गई। मैं कहूँगा, व्यापक दमन और उत्पीड़न का प्रेशर-कुकर जब फटता है तो उस विस्फोट की ध्वनि सुमधुर और कर्णप्रिय नहीं होती! आप अपनी भाषाई-शुचिता का अचार डाल लीजिये, एक मनुष्य की कुचली जा रही अस्मिता का विद्रोह उससे ज़्यादा मूल्यवान वस्तु है।
इन अर्थों में जेन-ज़ी की गालियों का एक राजनैतिक पक्ष था। उसमें निडरता थी और संघर्ष का माद्दा था। कोई भी ये नहीं कह रहा है कि यह पीढ़ी विचारवान या मूल्यों से समृद्ध है या इनकी भाषा का मुख्यधारा में उपयोग किया जाना चाहिए। लेकिन जिस बेख़ौफ़ अंदाज़ में उन्होंने सड़कों पर उतरकर सत्ता को चुनौती दी, उसने उन्हें एक 'पोलिटिकल कैपिटल' बनाया है और इसकी देश को ज़रूरत थी। ज़मीनी आन्दोलनों में धार होनी चहिए, उसमें राजनयिक-शैली की 'पहले आप, पहले आप' वाली नफ़ीस ख़तो-किताबत नहीं चलती।
ध्यान रहे कि दलित-साहित्य में गालियों का प्रयोग होता रहा है। तब वह 'साधुभाषा' के प्रति प्रतिरोध की एक भंगिमा है। मराठी साहित्यकार नामदेव ढसाळ की 1986 में प्रकाशित एक पुस्तक के शीर्षक में ही अपशब्द है। और 1999 में उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया गया था। एक सीमा के बाद संसदीय-असंसदीय भाषा का द्वैत मिट जाता है। सोशल-मीडिया तो अनफिल्टर्ड माध्यम है, इसमें चीज़ों को सेंसर नहीं किया जाता। पहले जिन शब्दों का मुख्यधारा के मीडिया में उपयोग नहीं किया जाता था, उन्हें सोशल-मीडिया ने प्रकट कर दिया है।
सिनेमा में भी पहले नायक को खलनायक पर ग़ुस्सा आता था तो वो उसे 'झूठे', 'फ़रेबी', 'मक्कार' और बहुत ज़्यादा हुआ तो 'कुत्ते', 'कमीने', 'हरामज़ादे' कह बैठता था (प्रसंगवश, अकविता के दौर वाले एक हिन्दी कवि की एक कविता में 'आज़ादी' शब्द की तुक 'हरामज़ादी' से मिलाई गई है, तब उसने 1970 के दशक में बहुत हलचलें मचाई थीं), लेकिन आज के ओटीटी सिनेमा में वो ठेठ गालियाँ भी चली आई हैं, जो पहले फिल्मों में सुनाई नहीं देती थीं। पर समाज में तो वो हमेशा से मौजूद रही हैं, समय के साथ उन्होंने केवल अपना माध्यम बदला है।
मेरा तो पूरा जीवन ही गाली देने वाले लोगों के बीच में बीता। कानों में बचपन से ही गालियाँ गूँजती रहीं। ये गालियाँ देने वाले अधिकतर सफ़ेदपोश और सवर्ण ही थे। मैं जो साहित्य रचता हूँ, उसमें आपको कभी कोई अपशब्द नहीं दिखाई देगा, लेकिन वह 'मैं' हूँ और 'मेरा साहित्य' है। दुनिया इस कुएँ की मेंढक नहीं है। क्या मैं वैसा साहित्य पढ़ना चाहूँगा, जिसमें गालियाँ हों? शायद नहीं। या अगर वह कृति किसी विशेष सामाजिक या राजनैतिक-परिप्रेक्ष्य को उजागर करती हो तो शायद हाँ भी। लेकिन देश और दिल्ली में जेन-ज़ी का आन्दोलन साहित्य नहीं था, प्रतिरोध था। सड़क की भाषा और किताब की भाषा में अकसर फ़र्क़ होता है। अलबत्ता, मुक्तिबोध ने कहा था- 'पोस्टर ही कविता है!'
वैसे गालियाँ बड़ी पेचीदा शै होती हैं, उनसे आप किसी के व्यक्तित्व का अंदाज़ा नहीं लगा सकते। हमारे विराट कोहली साहब खुलेआम गालियाँ बकते हैं, लेकिन वास्तविक जीवन में एक प्रेमल पति और एक बेटी के संवेदनशील पिता हैं। दूसरी तरफ़ संस्कारी प्रजाति के प्राणी सोशल मीडिया पर सबसे ज़्यादा गालियाँ बकते हैं जबकि उनकी डीपी में देवी-देवताओं के चित्र लगे होते हैं। हाँ, शायद लड़कियों को वैसी गालियाँ देने से बचना चाहिए, जो स्त्री के ही यौन-प्रतीकों और अंग-विशेषों को अवमानित करती हों। कौन जाने, अगले प्रोटेस्ट तक जेन-ज़ी लड़कियाँ पुरुषों और उनके फ़र्ज़ी-पुरुषत्व-बोध को चुनौती देने वाली कुछ नई गालियाँ ईजाद कर लें। क्यों नहीं?
अगर नई पीढ़ी खुलेआम गालियाँ देगी तो क्या मुझे अच्छा लगेगा? नहीं लगेगा। लेकिन अगर वो दक्षिणपंथी राजनीति का मोहरा बन जाए तब मुझे और ज़्यादा बुरा लगेगा। और अगर वो वैसी राजनीति के विरोध में आन्दोलन करती है तो इससे मुझे ख़ुशी ही होगी। क्योंकि गाली देना फिर भी बेहतर है, बनिस्बत इसके कि आप एक 'भक्त' बन जाएँ!
Sushobhit