28/05/2026
इतना तो निश्चित है कि जो हिन्दू स्वयं मांस का सेवन करते हैं, अपने धर्म की पशुबलि पर मौन साधते हैं, केंद्र सरकार के बीफ़ निर्यात का विरोध नहीं करते हैं, उन्हें बकरीद का भी विरोध करने का नैतिक अधिकार नहीं है। किन्तु लाखों लोग ऐसे भी हैं- फिर चाहें हिन्दू हों या ग़ैर-हिन्दू- जो हर तरह के एनिमल-एब्यूज़, जानवरों के साथ हर तरह की क्रूरता का विरोध करते हैं, उसमें किन्तु-परन्तु नहीं करते। उनकी क्यों नहीं सुनी जानी चाहिए और धार्मिक अंधविश्वासों के प्रति अपनी बुद्धि-चेतना को क्यों समर्पित कर देना चाहिए?
प्रश्न यह है कि हमारे बुद्धिजीवियों को हिन्दू धर्म में निहित बुराइयों का हवाला देकर इस्लाम में निहित बुराइयों को न्यायोचित ठहराने की ज़रूरत क्यों महसूस होती है? इनका आत्मविश्वास इतना क्षीण क्यों है? ये दोनों की ही बुराइयों की खुलकर आलोचना क्यों नहीं कर सकते?
हिन्दू धर्म में भी पशुबलि है! हाँ तो मित्र, उसका भी विरोध करो ना। उसको ढाल बनाकर इस्लाम की पशुबलि का बचाव क्यों करते हो?
हिन्दू औरतें भी घूँघट काढ़ती हैं। हाँ तो मित्र, उसका भी विरोध करो ना। उसको ढाल बनाकर इस्लाम की बुर्क़ा प्रथा का समर्थन क्यों करते हो?
हिन्दू भी काँवड़ यात्रा, धार्मिक जुलूसों में सड़कें घेर लेते हैं। हाँ तो मित्र, उसका भी विरोध करो ना। उसको ढाल बनाकर मुसलमानों के द्वारा सड़कों पर नमाज़ पढ़ने को क्यों जायज़ ठहराते हो?
हिन्दुत्ववादी सरकार बीफ़ निर्यात करती है। हाँ तो मित्र, उसका विरोध करने से तुम्हें किसने रोका है? हम तो पुरज़ोर विरोध करते हैं। हम यानी पशुओं के अधिकारों के लिए बोलने, उनके लिए संघर्ष करने वाले लोग। हम समझते हैं कि भारत का बीफ़ निर्यात भारत के माथे का कलंक है। भारत में 80 प्रतिशत मांसभक्षियों का होना भी भारत के लिए लज्जा और धिक्कार के विषय से कम नहीं।
हमें जीवहत्या के प्रश्न पर हिन्दू धर्म, उसकी संस्कृति-परम्परा और भारत-देश की रीति-नीति की कठोर-आलोचना करने से कोई संकोच नहीं होता, फिर तुम क्यों इस्लाम के प्रश्न पर घबड़ा उठते हो?
हिन्दुओं की जीवहत्या से मुसलमानों की जीवहत्या सही सिद्ध नहीं हो जाती। एक ग़लत दूसरे को सही साबित नहीं करता, दोनों ही ग़लत होते हैं। बुद्ध और महावीर ने भी वैदिक यज्ञों में पशुबलि का विरोध किया था, उस प्रसंग में शायद ही कोई प्रगतिशील चेतना का व्यक्ति बुद्ध को ग़लत ठहरायेगा और वैदिक हिंसा को जायज़ क़रार देगा। वही साहस इस्लाम की पशुबलि के विरोध में भी क्यों नहीं दिखलाया जा सकता?
वैदिक पशुबलि का विरोध और इस्लामिक पशुबलि पर ईद मुबारक- यह किस प्रकार का पाखण्ड है?
आप धर्मान्ध लोगों को सामने रखकर दूसरे धर्मान्ध लोगों को सही क्यों ठहराते हो? देश में उदार-चेतना के भी तो लोग हैं। हिन्दुओं में अगर पशुबलि है तो क्या कई हिन्दुओं के भीतर पशुबलि का विरोध नहीं है? तब इस्लाम के भीतर से भी पशुबलि का विरोध क्यों नहीं सामने आना चाहिए और बुद्धिजीवियों को वैसी पशुबलि का बचाव करने के बजाय उसे हतोत्साहित क्यों नहीं करना चाहिए?
हर लिहाज़ से पशुबलि एक अंधविश्वास से भरा, प्रकृति और पर्यावरण के विरुद्ध, हिंसक और क्रूर कृत्य है। यह निर्दोष प्राणियों के साथ विश्वासघात है। यह शरणागति की हत्या है। बुद्धिजीवी यों तो धर्मों का बड़ा आलोचक होता है और बड़ा पर्यावरणप्रेमी होता है। कभी-कभी वह पशुप्रेम का भी दिखावा करता है, दिवाली के पटाखों और संक्रांति की पतंग के बहाने। फिर इस्लाम की दुर्दम्य-पशुबलि के मुद्दे पर वह हकलाने क्यों लगता है? बुद्धिजीवी मुसलमानों को नाराज़ करने से इतना डरता क्यों है? उसे ऐसा क्यों लगता है कि अगर वह इस्लाम की आलोचना में एक भी शब्द बोलेगा तो उसे हिन्दुत्ववादी, भाजपाई, संघी समझ लिया जाएगा? और अगर कोई समझ भी ले तो क्या? इस डर से सच बोलना तो नहीं छोड़ा जा सकता?
अगर कुछ व्यक्ति केवल बकरीद के अवसर पर ही जीवदया की बात करते हैं, तो इससे जीवदया का स्वयं का आदर्श झूठा साबित नहीं होता, बल्कि वो व्यक्ति झूठे और अवसरवादी साबित होते हैं।
लेकिन संसार में ऐसे भी लोग हैं, जो वर्षभर हर प्रकार की जीवहत्या-पशुबलि का विरोध करते हैं, जिन्होंने हिन्दुओं की पशुबलि और मांसाहार के विरोध में भी मुखर लेखन किया है, जो फ़ैक्टरी-फ़ार्मिंग और मांसाहार में निहित क्रूरता को निरंतर उजागर करते हैं। ऐसे लोग हिन्दू-ग़ैरहिन्दू, भारतीय-अभारतीय दोनों हैं। और एक-दो नहीं, असंख्य हैं।
लेकिन केवल भारत में ही बौद्धिकों को ऐसी बातें करते हुए पाया जाता है कि हिन्दू भी यह ग़लत काम करते हैं, तब तो मुसलमानों को भी वह करने दो। इसका क्या नैतिक और बौद्धिक तर्क है? दोनों को कोई ग़लत काम करने से क्यों नहीं रोका जा सकता? हिन्दू अगर चोरी करेगा तो क्या मुसलमान की चोरी अपराध नहीं रह जाएगी?
बुद्धिजीवी बुद्धि का ही परित्याग कर देवे, पक्षपात करने लगे, एक साइड लेकर उसका बचाव करने लगे तो वो बुद्धिजीवी नहीं रह जाता। बुद्धिजीवी तो वो होता है, जो सदैव न्याय की बात करे। अन्याय करने वाले का नाम-पहचान देखकर अपनी राय ना बदल ले!
Sushobhit