06/05/2021
*काल्पनिक कहानी*
*संगीत की गहराई।*
©Vernal Books
इंस्टंट रचना: श. नि.
प्राचीन समय में एक राजा ने घोषणा करवाई, कि जो इंसान उस्तादों को टक्कर दे सकेगा उसे आधा राज्य दिया जाएगा।
अब तो लाखों युवक संगीत सीखने के लिए जी-जान से जुट गए।
एक सप्ताह बीता, एक माह बीता, एक वर्ष बीता और अंत में एक दशक बीत गया।
कोई भी संगीत के उस्तादों को टक्कर देने नहीं आया।
राजा ने सभी उन युवकों को बुलवाया जिन्होंने दस वर्ष पहले दावा किया था कि वे उस्तादों को हरा देंगे।
उनका गायन सुना। वे सभी उस्तादों के स्तर पर ही गा रहे थे और कुछ तो बहुत ही उत्कृष्ट थे।
राजा ने प्रसन्न होकर उनमें से हर एक को आधा राज्य देना चाहा।
किन्तु किसी ने भी न स्वयं को जीता माना, और न ही आधा राज्य लिया।
राजा को यह बात समझ नहीं आई। उसने अपने गुरु से पूछा कि यह क्या राज है?
तब गुरु ने समझाया, "राजन, उस्तादों के स्तर तक पहुंचने के बाद इंसान के सप्त चक्र जाग्रत हो जाते हैं, उन्हें ईश्वर मिल जाते हैं। इस स्तर पर आत्मा और परमात्मा एक हो जाते हैं। अर्थात तब नर और नारायण में कोई अंतर नहीं रह जाता। इसी कारण हार-जीत और विश्व की समस्त निधियां भी आपको लुभा नहीं सकतीं। आप स्वयं संगीत को डूब कर सीखिए तब ही आप इस बात का मर्म समझ सकेंगे।"
तब राजा पूछता है, "संगीत में ऐसा क्या है कि इंसान ईश्वर को पा लेता है?"
गुरु कहते हैं, "संगीत का हर सुर इंसान के सप्त चक्रों से जुड़ा है। जैसे जैसे आप एक एक सुर साधते जाते हो, आपके चक्र जाग्रत होते जाते हैं। और जब ये सातों जागृत हो जाते हैं तब ईश्वर से सम्बंध बन जाता है। जो लोग वर्षों तक जप-तप, साधना, योग, पूजा-पाठ आदि करते हैं वे वास्तव में अपना समय व्यर्थ करते हैं, क्योंकि संगीत ईश्वर प्राप्ति सबसे तीव्र साधन है। बहुत से संगीत साधक तो पहले सुर पर ही ईश्वर को प्राप्त कर लेते हैं।"
"क्या किसी ने संगीत से ईश्वर प्राप्ति की है?" राजा ने पूछा।
"सन्त मीरा बाई, सन्त सूरदास, सन्त हरिदास। इन सभी ने ईश्वर को उस स्तर तक पा लिया था कि इनके लिये यह संसार निरर्थक हो गया था। बादशाह अकबर भी स्वामी हरिदास का गायन सुनने को तरसते थे। उनका सारा राजकोष भी बेकार था।"
राजा को अपनी गलती का अहसास हुआ। उसने सभी संगीत साधकों से क्षमा मांगी और उन्हें सम्मान के साथ विदा किया।